Sunday, October 14, 2018

शाहजहाँ | मिर्जा शाहब-उद-दीन बेग मुहम्मद खान खुर्रम (1627-58 ई.) Shahjahan | Khurram

शाहजहाँ | मिर्जा शाहब-उद-दीन बेग मुहम्मद खान खुर्रम (1627-58 ई.) Shahjahan | Mirza Shahab-ud-din Baig Muhammad Khan Khurram

शाहजहाँ (1627-58 ई.) Shahjahan

  • शाहजाहाँ (Shahjahan) के बचपन का नाम खुर्रम था.
  • उसका जन्म 1592 ई. में लाहौर में एक हिन्दू माता के गर्भ से हुआ था.
  • वह बड़ा महत्वाकांक्षी और प्रतिभाशाली व्यक्ति था.
  • 1612 ई. में उसका विवाह आसफ खाँ की पुत्री से हुआ.
  • परन्तु नूरजहाँ की पुत्री का शाहजादा शहरयार से विवाह होने के कारण नूरजहाँ का व्यवहार पक्षपातपूर्ण हो गया.
  • 1622 ई. में शाहजहाँ के विद्रोह का यही कारण था.

शाहजहाँ | मिर्जा शाहब-उद-दीन बेग मुहम्मद खान खुर्रम (1627-58 ई.) Shahjahan | Mirza Shahab-ud-din Baig Muhammad Khan Khurram

  • 1627 ई. में जब जहाँगीर की मृत्यु हुई तो सिंहासन पर बिठाने हेतु नूरजहाँ ने शहरयार का और आसफ खाँ ने शाहजहाँ का पक्ष लिया.
  • शाहजहाँ उस समय दक्षिण में था तथा शीघ्र वहाँ नहीं पहुँच सकता था.
  • परिणामस्वरूप आसफ खाँ ने अन्तरिम प्रबन्ध के रूप में खुसरो के पुत्र दावरबख्श को सिंहासन पर बिठाया.
  • नूरजहाँ ने सार्वजनिक जीवन से अवकाश प्राप्त कर लिया तथा शहरयार को बन्दी बनाया गया.
  • 1628 ई. में शाहजहाँ के आगमन पर उसका राज्याभिषेक हुआ और दावरबख्श को फारस भेज दिया गया.
  • सौभाग्यवश दावरबख्श अपना जीवन बचाने में सफल रहा.
  • शाहजहाँ अपने सभी सम्बन्धियों की हत्या के लिए उत्तरदायी था.
  • 1645 ई. में नूरजहाँ की मृत्यु हुई.

बुन्देला राजपूतों का विद्रोह

  • अबुल फज़ल के हत्यारे वीरसिंह बुन्देला के पुत्र जुझार सिंह ने मुगल अधिकृत प्रदेशों पर आक्रमण करके विद्रोह की धमकी दी, किन्तु उसे पराजित होकर आत्मसमर्पण करना पड़ा.
  • उसे हरजाने के रूप में बहुत सारी धनराशि देनी पड़ी तथा शाहजहाँ (Shahjahan) के अभियानों के समय उसने शाहजहाँ को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया.
  • उसे 4000 जात व 4000 सवारों का खर्चा चलाने हेतु एक जागीर दी गई.
  • 1635 ई. में जुझार सिंह ने एक बार पुनः विद्रोह कर दिया.
  • मुगल सेना ने उसका पीछा किया, किन्तु वह गौंडों से एक अकस्मात् झड़प में मारा गया.

खानजहाँ लोदी का विद्रोह (1628 ई.)

  • खानजहाँ लोदी दक्षिण का प्रधान सेनापति व राज्यपाल था.
  • उसने अहमदनगर के साथ मित्रता करके विद्रोह कर दिया.
  • शाहजहाँ स्वयं 1629 ई. में युद्ध का नेतृत्व करने के लिए दक्षिण की ओर रवाना हुआ.
  • मुगल सेनापति अजीम खाँ खानजहाँ लोदी के लिए बड़ी मजबूत टक्कर थी.
  • खानजहाँ लोदी के साथियों- शाहजी भोसले तथा कालूजी भोसले ने मुगलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.
  • खानजहाँ ने बीजापुर तथा बुन्देलखण्ड के सरदारों से सहायता प्राप्त करने का असफल प्रयास किया.
  • बुन्देलखण्ड के सरदारों ने उसका विरोध किया.
  • फलस्वरूप 1630 ई. में खानजहाँ कालिंज, के किले के निकट युद्ध करता हुआ मारा गया.

1628 के नौरोज

  • 1628 ई. में शाहजहाँ (Shahjahan) ने नौरोज त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया.
  • इस अवसर को पवित्र बनाने का भरसक प्रयत्न किया गया.
  • शाहजहाँ ने अपने कुटुम्बियों को उदारतापूर्वक उपहार दिए.
  • आसफ खाँ को 9000 जात व 9000 सवार का मनसब दिया गया.

1630 ई. का दुर्भिक्ष (Famine)

  • 1630 ई. में दक्षिण, गुजरात और खानदेश में दुर्भिक्ष (Famine) पड़ा.
  • यह दुर्भिक्ष इतना भयानक था कि सहस्त्रों मनुष्य भूख से मर गए.
  • उसके पश्चात् महामारी का प्रकोप हुआ.
  • इससे अनेक ग्राम नष्ट हो गए.
  • डा. वी.ए. स्मिथ के अनुसार सरकार ने जनता का दुःख दूर करने के लिए अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया.
  • अब्दुल हमीद के कथनानुसार सम्राट् ने कर-निर्धारण में लगभग 70 लाख रुपये माफ कर दिए तथा दरिद्रों व निराश्रितों के लिए बहरानपुर, अहमदाबाद व सूरत प्रदेश में दलिया बाँटने के ढाबे तथा लंगर स्थापित किए.

मुमताज महल

  • आसफ खाँ की पुत्री मुमताज महल वास्तव में ताज की रानी थी.
  • शाहजहाँ उससे प्रगाढ़ प्रेम करता था.
  • वह सुन्दरी ही नहीं अपितु, अत्यन्त पतिपरायणा भी थी.
  • वह शाहजहाँ के उसके बुरे दिनों में सहयोगिनी रही .
  • वह अनेक दुःखी व पीड़ित नर-नारियों का आश्रय थी.
  • 1631 ई. में उसकी मृत्यु हुई.
  • शाहजहाँ (Shahjahan) ने उसकी स्मृति में ‘ताजमहल‘ बनवाया.

पुर्तगालियों के साथ युद्ध (1631-32 ई.)

  • पुर्तगाली कारखाने स्थापित होने के कारण हुगली नगर की महत्ता बढ़ गई थी.
  • पुर्तगाली प्रायः हिन्दू और मुसलमानों के अनाथ बच्चों को पकड़कर बलपूर्वक ईसाई बना देते थे.
  • उनका यह कार्य सर्वथा अनुचित था.
  • 1631 ई. में कासिम खाँ को बंगाल का राज्यपाल बना कर पुर्तगालियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की आज्ञा दी गई.
  • पुर्तगालियों को चारों ओर से घेर लिया गया.
  • तीन महीने के घेरे के पश्चात तीव्र अवरोध के बाद पुर्तगालियों ने आत्मसमर्पण कर दिया.
  • 10,000 से अधिक पुर्तगाली मारे गए तथा लगभग 4,000 बन्दी बनाए गए.
  • बन्दियों में से कुछ ने इस्लाम ग्रहण करके अपनी जान बचा ली तथा शेष यातनाएँ भोगते हुए मर गए.
  • उल्लेखनीय है कि शाहजहाँ पुर्तगालियों के प्रति बड़ा द्वेष रखता था.

शाहजहाँ की दक्षिणी नीति

  • समस्त उत्तर भारत पर मुगलों का आधिपत्य हो गया था.
  • अतः शाहजहाँ (Shahjahan) ने भी अपना ध्यान दक्षिण की ओर लगाया .
  • 1632 ई. में सुल्तान हुसैनशाह को बन्दी बनाकर ग्वालियर भेज दिया गया तथा अहमदनगर में निजामशाही वंश का अन्त हो गया.
  • शाहजी भोसले ने निजामशाही राजवंश को पुनर्जीवित करने के लिए राजवंश के अन्य बालक को सिंहासन पर बैठाया.
  • परन्तु उसे भी शाहजहाँ के सम्मुख आत्मसमर्पण करना पड़ा.
  • 1636 ई. में अहमदनगर राज्य को पूर्णतया नष्ट कर दिया गया और उसका प्रदेश शाहजहाँ और बीजापुर के सुल्तान ने आपस में बाँट लिया.

बीजापुर के साथ युद्ध (1631 ई.)

  • बीजापुर के मोहम्मद आदिलशाह ने मुर्ताजा निजाम के साथ मित्रता के सम्बन्ध स्थापित करके मुगल सत्ता की अवहेलना की थी.
  • आसफ खाँ की सेनाओं ने बीजापुर को घेर लिया.
  • मराठों ने बीजापुर को सहयोग दिया.
  • मुगलों का यह प्रयास असफल रहा.
  • 1635 ई. में शाहजहाँ को शाहजी भोसले के विरुद्ध कदम उठाना पड़ा.
  • गोलकुण्डा तथा बीजापुर को शाहजी भोसले की सहायता न करने हेतु शाही-पत्र भेजे गए.
  • गोलकुण्डा के शासक ने यह स्वीकार कर लिया, किन्तु बीजापुर ने शाही आज्ञा मानने से इन्कार किया.
  • अतः मुगल सेना ने खान दौरान के नेतृत्व में बीजापुर की राजधानी को घेर लिया.
  • मुगल बीजापुर के शासक को पराजित नहीं कर सके और उन्होंने आसपास के क्षेत्रों में मार-काट की.
  • अपनी प्रजा की असहाय अवस्था के कारण बीजापुर के शासक को मुगलों से सन्धि हेतु बाध्य होना पड़ा और उसे 20 लाख रु. “शन्ति के उपहार स्वरूप” मुगलों को देने पड़े.

औरंगजेब दक्षिण का राज्यपाल

  • 1636-44 ई. के काल में औरंगजेब दक्षिण का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • उसने इस काल में नासिक के निकट बगलाना को अपने राज्य में मिला लिया और शाहजी भोसले की शक्ति को कम किया.
  • 1656 ई. में दूसरी बार उसे दक्षिण का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • गोलकुण्डा के शासक ने पूर्व में मुगलों से हुई सन्धि (1636 ई.) के अनुसार निर्धारित वार्षिक कर नहीं दिया तथा मीर जुमला की सहायता से अपने राज्य की सीमा बढ़ा दी.
  • 1656 ई. में गोलकुण्डा के शासक को काफी धन राशि और प्रदेश देकर मुगलों से सन्धि करनी पड़ी.
  • उसने अपनी पुत्री का विवाह औरंगजेब के पुत्र से करना तथा अपने दामाद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना स्वीकार किया.
  • बीजापुर के साथ औरंगजेब के सम्बन्ध मित्रतापूर्ण नहीं थे, क्योंकि मोहम्मद आदिलशाह दारा शिकोह का पक्ष लेता था.
  • 1656 ई. में आदिलशाह की मृत्यु के बाद उसका 19 वर्षीय पुत्र सिंहासन पर बैठा.
  • औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण करके बीदर और कल्याणी पर अधिकार कर लिया.
  • बीजापुर का शासक सन्धि के लिए बाध्य हुआ.
  • औरंगजेब का विचार युद्ध अभी और जारी रखने का था, परन्तु शाहजहां की बीमारी के समाचार ने उसे युद्ध बन्द करने व उत्तर की ओर आने के लिए बाध्य कर दिया.

मुगल साम्राज्य को कन्धार की हानि

  • कन्धार 1626 ई. में मुगलों के हाथ से निकल चुका था.
  • फारस के शाह की ओर से अलीमदन खाँ को कन्धार का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • 1638 ई. में मुगलों ने कन्धार विजय की तैयारी की; तो अलीमर्दानि खाँ ने फारस के शाह से सहायता हेतु प्रार्थना की, किन्तु फारस के शाह ने भ्रमवश अलीमर्दान को कैद करने का प्रयल किया. अलीमर्दान के लिए यह अपमानजनक बात थी.
  • अतः उसने कन्धार मुगलों को सौंप दिया.
  • मुगल दरबार में उसका स्वागत किया गया और उसे काबुल और कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया.
  • फारसियों ने पुनः कन्धार पर आक्रमण किया व 57 दिन के घमासान युद्ध के पश्चात् 11 फरवरी, 1649 ई. को मुगलों ने आत्म-समर्पण कर दिया.
  • 1649 ई. में औरंगजेब की अधीनता में एक विशाल मुगल सेना ने कन्धार को 3 महीने 20 दिन तक घेरे रखा, किन्तु कोई परिणाम न निकला और मुगल सेना को वापस बुला लिया गया.
  • 1652 ई. में औरंगजेद की अध्यक्षता में दूसरी बार 2 मास 8 दिन तक कुन्धार को घेरे रखा.
  • औरंगजेब के विरोध के बाद भी शाहजहां ने उसे घेरा छोड़ देने की आज्ञा दी.
  • 1653 ई. में शाहजहां के सबसे बड़े पुत्र दारा शिकोह के नेतृत्व में कन्धार विजय हेतु तीसरा अभियान भेजा गया.
  • दारा शोकोह ने गर्व-पूर्वक कहा कि वह कन्धार को एक सप्ताह में ले लेगा.
  • किन्तु उसका घेरा भी महीनों तक चलता रहा और उसके पश्चात् यह प्रयत्न छोड़ देना पड़ा.
  • 1653 ई. के पश्चात् कन्धार को विजय करने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया.
  • कन्धार विजय के असफल प्रयत्नों से मुगलों के सम्मान को धातक चोट पहुंची व लगभग 12 करोड़ से अधिक की धनराशि नष्ट हुई.
  • सर वुल्जले हे के अनुसार कन्धार विजय की असफलता का मुख्य कारण मुगलों की अपने शत्रुओं से हीन सैन्य शक्ति थी.
  • इसमें आश्चर्य नहीं कि 17वीं शताब्दी के शेष काल में फारसी आक्रमण का खतरा भारत के शासकों को सदा ही व्यग्न करता रहा.

बल्ख और बदख्शाँ

  • शाहजहां ने बल्ख तथा बदख्शा को जीतने के लिए 1646 ई. में शाहजादा मुराद तथा अलीमन को और 1647 ई. में औरंगजेब और शाह शुजा को भेजा.
  • किन्तु इस कार्य में भी वे असफल रहे.
  • मुगल इन प्रदेशों पर किसी भी प्रकार से नियन्त्रण करने में असफल रहे.
  • सर यदुनाथ सरकार के अनुसार

” ऐसा युद्ध जिसमें हिन्दुसतानी खजाने से ही साल में 4 करोड़ रुपये खर्च किए और विजित प्रदेश से सिर्फ साढे बाईस लाख की आमदनी वसूल की.”

  • मुगलों को जब-धन की बहुत हानि उठानी पड़ी.

उत्तराधिकार का युद्ध (1657-59 ई.)

  • सितम्बर, 1657 ई. में शाहजहां बहुत बीमार पड़ गया.
  • उसने अपनी अन्तिम वसीयत भी बना दी.
  • उसकी मृत्यु के विषय में अनेक प्रकार की अफवाहें फैल गई.
  • शाहजहां की मुमताज द्वारा उत्पन्न 14 सन्तानों में से 7 जीवित थीं.
  • इनमें से चार पुत्र थे, जोकि उस समय प्रौढ़ अवस्था में थे.
  1. 1657 ई. में दारा शिकोह 43 वर्ष का,
  2. शाहशुजा 41 वर्ष का,
  3. औरंगजेब 39 वर्ष का तथा
  4. मुराद 33 वर्ष का था.
  5. तीन पुत्रियाँ जहान आरा,
  6. रोशन आरा तथा
  7. गोहन आरा थी.
  • जहान जारा ने दारा शिकोह का, रोशन आरा ने औरंगजेब का तथा गोहन आरा ने मुराद का पक्ष लिया .
  • शाहजहां ने दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा इस घोषणा के साथ ही उत्तराधिकारी का युद्ध आरम्भ हो गया.

प्रथम युद्ध (dara shikoh vs shahashja)

  • सर्वप्रथम युद्ध शाहशुजा एवं दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह तथा आमेर के राजा जयसिंह के मध्य 24 फरवरी, 1658 ई. को बहादुर गढ़ में हुआ था.
  • शाह शुजा पराजित हुआ.

दूसरा युद्ध (dara shikoh vs aurangzeb)

  • दूसरा युद्ध 25 अप्रैल, 1658 को दारा शिकोह व औरंगजेब की सेनाओं के मध्य धर्मत के स्थान पर हुआ .
  • दारा इस युद्ध में पराजित हुआ.
  • इस विजय के उपलक्ष्य में औरंगजेब ने फतेहाबाद नामक नगर की स्थापना की.

तीसरा युद्ध (dara shikoh vs aurangzeb)

  • तीसरा युद्ध दारा शिकोह एवं औरंगजेब के मध्य 8 जून, 1658 ई. को सामूगढ़ में हुआ
  • और इसमें भी दारा शिकोह की पराजय हुई.

चौथा व अन्तिम युद्ध (dara shikoh vs aurangzeb)

  • उत्तराधिकार का अन्तिम युद्ध 12-14 अप्रैल, 1659 ई. को दारा व औरंगजेब के मध्य ‘देवराई की घाटी’ में लड़ा गया.
  • दारा को बन्दी बना लिया गया तथा 30 अगस्त, 1659 ई. को उसका वध करवा दिया गया.

शाहजहां (Shahjahan) की कैद और मृत्यु

  • औरंगजेब ने सितम्बर, 1658 ई. में शाहजहां को भी कैद कर लिया.
  • 31 जनवरी, 1666 ई. को 74 वर्ष की अवस्था में कैदी के रूप में ही शाहजहां की मृत्यु हुई.
  • शाहजहां (Shahjahan) को ताजमहल में मुमताज महल के बगल में दफनाया गया.
  • औरंगजेब ने अपने तीनों भाईयों को रास्ते से हटा लिया था.
  • मुराद को दावत पर बुलाकर नशे की अवस्था में उसे बन्दी बना लिया तथा 1661 ई. में ग्वालियर में उसकी हत्या कर दी गई.
  • शाहशुजा पराजित होकर अराकान भाग गया, जहां माघों ने उसकी हत्या कर दी .
  • दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह ने भी विद्रोह कर दिया था.
  • उसे दिसम्बर, 1660 ई. में बन्दी बना लिया गया तथा ग्वालियर के किले में उसे अफीम खिला-खिला कर मार डाला गया.
  • दारा का पुत्र सिफर शिकोह भाग्यशाली निकला.
  • बाद में उसका विवाह औरंगजेब की पुत्री से कर दिया गया.

शाहजहाँ (Shahjahan) के रत्नजड़ित सिंहासन ‘तख्ते-ताऊस’ में विश्व का सबसे मंहगा हीरा ‘कोहिनूर‘ लगा था.

वास्तुकला की दृष्टि से शाहजहाँ (Shahjahan) का शासन काल मध्य कालीन इतिहास का ‘स्वर्णयुग’ कहा गया है.

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