Wednesday, October 31, 2018

मुगल कालीन आर्थिक अवस्था (Financial status of Mughal era) मुगल कालीन भारत

मुगल कालीन आर्थिक अवस्था (Financial status of Mughal era) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

मुगल कालीन आर्थिक अवस्था

  • इस काल की आर्थिक स्थिति की एक महत्वपूर्ण विशेषता शासक वर्ग एवं जन-साधारण के जीवन में पाई जाने वाली घोर आर्थिक विषमता थी.
  • लोग बिना सरकारी हस्तक्षेप के किसी भी व्यवसाय को चुन सकते थे.
  • मुख्य व्यवसाय कृषि था तथा गाँव प्रायः आत्म-निर्भर थे.

मुगल कालीन आर्थिक अवस्था (Financial status of Mughal era) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

कृषि

  • लोग प्रायः गेहूँ, चावल, जौ, मटर, चना, तिल, तिलहन, ज्वार, बाजरा, कपास, गन्ना, दालें, फल, सब्जियाँ, तम्बाकू, पोस्त, चाय, कॉफी, जूट, चन्दन आदि की कृषि करते थे.
  • बाबर ने आगरा के आस-पास के क्षेत्रों में सिंचाई का वर्णन किया है.
  • अकबर ने कृषि की उन्नति हेतु विशेष ध्यान दिया.
  • प्राकृतिक विपत्तियों के समय कई बार किसानों की कठिनाइयां बढ़ जाती थीं, किन्तु ऐसी परिस्थिति में सरकार प्रायः सहायता तथा राहत कार्य करती थी.

मुगल कालीन उद्योग

  • कई बार गाँवों में कुटीर उद्योग स्थापित किए जाते थे तथा इनके श्रमिक प्रायः वंशानुगत रहते थे.
  • इस काल में कृषि पैदावार पर आधारित सबसे महत्वपूर्ण उत्पादन गुड़, इत्र तथा रावाब थे.
  • मुगल काल में शहरों के प्रमुख उद्योग धन्धे थे-वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग, पत्थर तथा ईंटों के उद्योग, चीनी का उद्योग, चमड़े का उद्योग, हाथी दाँत, मूँगे और नकली जवाहरात बनाने के उद्योग आदि.
  • दिल्ली, आगरा, श्रीनगर, लाहौर, कैम्बे, अहमदाबाद, ढाका, खम्बात, मुल्तान, बरार, बरहानपुर आदि नगर विभिन्न उद्योग के लिए प्रसिद्ध थे.

 

  • बिहार, बंगाल, आगरा, बनारस, जौनपुर, पटना, मालवा इत्यादि सूती वस्त्र के प्रमुख केन्द्र थे.
  • बंगाल सूती तथा रेशमी वस्त्र उद्योग का प्रमुख केन्द्र था.
  • बढ़िया किस्म की रेशम चीन से मंगाई जाती थी.
  • जहाँगीर ने ऊनी वस्त्र उद्योग अमृतसर में स्थापित किया था.
  • देश के कई स्थानों पर सुन्दर चादरें, फूलदार कालीन, साड़ियाँ, शालें आदि भी बनाई जाती थीं.
  • अंग्रेजों के सत्ता सम्भालने तक वस्त्र उद्योग निरन्तर प्रगति करता रहा.
  • इसके निर्यात के कारण भारत को काफी मात्रा में सोना चाँदी प्राप्त होता था.
  • आइने अकबरी के अनुसार लोहे और धातुओं के उपकरण और औजार बंगाल, पंजाब और गुजरात में बनाए जाते थे.
  • सोमनाथ बढ़िया और मजबूत तलवारों के लिए विख्यात था.
  • गया, कश्मीर, सियालकोट और शाहजुदपुर चीड़ की लकड़ी से कागज बनाने के प्रमुख केन्द्र थे.
  • सियालकोट में मानसिंगी एवम् सिल्फ नामक कागज का निर्माण होता था.
  • चमड़े का उद्योग गाँवों और शहरों में फैल हुआ था. इस उद्योग का बाजार अन्तर्देशीय था.
  • उत्तर-प्रदेश, पंजाब, गुजरात, बंगाल आदि में गन्ने पर आधारित गुड़, खाँडसारी, चीनी, शक्कर, मिस्री आदि का निर्माण होता था.
  • कई स्थानों पर शहद की मक्खियां पाली जाती थीं .
  • काँच का उत्पादन बरार, बिहार और फतेहपुरसिकरी में होता था.
  • अन्य कई लघु उद्योग भी अस्तित्व में थे.

मुगल कालीन आयात निर्यात

  • मुगल काल में आन्तरिक तथा बाह्य दोनों व्यापार प्रगति पर थे.
  • आन्तरिक व्यापार पर वैश्य, मारवाड़ी, चैट्टी, बंजारा आदि जातियों का एकाधिकार था.
  • व्यापार जल तथा स्थल दोनों मार्गों से होता था.
  • कैम्बे, सूरत, भड़ौच, गोआ, चटगाँव, सोनार गाँव, मच्छलीपट्टनम, कोचीन, कालीकट इत्यादि प्रमुख बन्दरगाह थे.
  • स्थल मार्ग में मुल्तान और कश्मीर प्रमुख थे.
  • सूती वस्त्र, रेशमी वस्त्र, गर्म मसाला, अफीम, नील, लाख, कालीमिर्च, चीनी आदि निर्यात की प्रमुख वस्तुएँ थी.
  • भारत ईरान से घोड़े, चीन से रेशम तथा चीनी मिट्टी के बर्तन, वेनिस और ईरान से काँच के बर्तन, तथा यूरोपीय शराव, अफ्रीकी दास, सोना-चाँदी इत्यादि का आयात करता था.

मुगल कालीन लेन-देन

  • मुगल काल में कोई व्यवस्थित बैंकिंग प्रणाली और बीमा कम्पनी नहीं थी.
  • ग्रामीण साहूकार और शहरी सर्राफ ऋण लेने-देन का काम करते थे.
  • हुण्डियों के माध्यम से रुपयों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर लेन-देन होता था.
  • बड़े स्तर के व्यापारियों का जीवन-स्तर बहुत ऊँचा था.
  • छोटे व्यपारी सरकारी अधिकारियों, चोरों तथा डाकुओं के डर से अपनी सम्पत्ति का अधिकांशतः प्रदर्शन नहीं करते थे.
  • उनका जीवन स्तर बहुत ऊँचा नहीं था.

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मुगल कालीन सामाजिक अवस्था (Social status of Mughal era) मुगल कालीन भारत

मुगल कालीन सामाजिक अवस्था (Social status of Mughal era) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

मुगल कालीन सामाजिक अवस्था

समाज में वर्ग

  • समाज में मुख्यतः तीन वर्ग अस्तित्व में थे-
  1. निम्न वर्ग ,
  2. मध्यम वर्ग और
  3. उच्च वर्ग अस्तित्व में थे.

मुगल कालीन सामाजिक अवस्था (Social status of Mughal era) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

निम्न वर्ग

  • निम्न या जनसाधारण वर्ग में किसान, मजदूर, दस्तकार, नौकर, दास, भिखारी आदि शामिल थे.
  • चावल, बाजरा, दाल आदि का इनका प्रचलित आहार था.
  • खाने के बाद जनसाधारण लोग भी पान का सेवन करते थे.
  • जनसाधारण का जीवन बहुत कठिन था.

मध्यम वर्ग

  • मुगलकाल के मध्यम वर्ग में इतिहासकार, व्यापारी, वैद्य, हकीम, मध्य स्तर के सरकारी अधिकारी, धार्मिक नेता, विद्वान, कलाकार, सर्राफ तथा निजी व्यवसाय करने वाले लोगों को शामिल किया जाता था.
  • यद्यपि इस वर्ग के लोगों की इच्छा होती थी कि वे शासक वर्ग की तरह ठाठ-बाठ से रहें, लेकिन उनकी तुलना में आय कम होने के कारण इन्हें निराशा होती थी.

उच्च वर्ग

  • उच्च वर्ग में मुगल सम्राट् के अतिरिक्त प्रान्तीय प्रशासक या सूबेदार, बड़े-बड़े उच्च उमरा या सरकार, बड़े-बड़े जमींदार, राजपूत राजा, उच्च मनसबदार तथा सशस्त्र सेना के विभिन्न अधिकारी शामिल थे.
  • इनका जीवन स्तर बहुत ऊँचा था.
  • इनके विशाल भवन प्रायः विशाल किलों में बने होते थे.
  • इस वर्ग का जीवन स्तर बहुत ही विलासी था.
  • अनेक लोग अपनी आय से ज्यादा व्यय करने के कारण सफओं तथा उच्च व्यापारियों के ऋणी के रूप में ही मर जाते थे.
  • ये किसानों एवं अन्य लोगों से कई प्रकार के बेगार लेते थे.
  • मुगल काल में अधिकतर लोग संयुक्त परिवार में रहते थे.
  • ‘कुटुम्ब’ पारिवारिक जीवन की मुख्य संस्था थी.
  • हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदाय स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों को और पुत्री की अपेक्षा पुत्र को प्राथमिकता देते थे.

जाति प्रथा

  • हिन्दू समाज में जाति प्रथा, ऊँच-नीच तथा छुआ-छुत की भावना प्रचलित थी.
  • मुसलमानों में भी किसी-न-किसी आधार पर ऊँच-नीच की भावना प्रचलित थी.
  • अकबर के काल में तथा उसके पश्चात् हिन्दू और मुस्लिमों के हार्दिक घनिष्ठता स्थापित होने लगी तथा
  • देश में एक मिली-जुली संस्कृति एवं विभिन्नता में एकता की भावना सुदृढ़ हुई है.

मुगल कालीन स्त्री

  • मुगल कालीन भारत में भी स्त्रियों के कार्य और उनकी स्थिति विशेष रूप से अधीनस्थ रही 
  • कालान्तर में पुरुष की सेवा और जीवन के प्रत्येक चरण में उस पर निर्भर रहना ही क्रमशः उसके कार्य और स्थिति माने जाने लगे.
  • राजपूतों में कन्या का जन्म अब भी बुरा माना जाता था.
  • पर्दा-प्रथा प्रचलित थी, किन्तु इस युग में कुछ महिलाएं इस प्रथा का पालन नहीं करती थीं.
  • हिन्दुओं में मुस्लिमों की अपेक्षा विवाह अधिक छोटी उम्र में होता था.
  • अकबर ने बाल-विवाह पर नियन्त्रण करने का प्रयत्न किया.

भोजन और मनोरंजन

  • इस युग में भारतीय भोजन व्यापक तथा विभिन्न किस्मों के पकवानों का होता था.
  • लोगों का खान-पान उनकी आर्थिक क्षमता पर आधारित था.
  • विभिन्न खाद्यान्न, फल, सब्जियाँ, दूध, घी, मक्खन, मिठायां आदि का सेवन किया जाता था.
  • लोग, शराब, ताड़ी भांग, अफीम आदि नशीले पदार्थों का भी प्रयोग करते थे.
  • सैनिक और शरीरिक खेल उस काल में मनोरंजन के प्रमख साधन थे.
  • सैनिक खेलों में पोलो, पटेबाजी, मल्लयुद्ध, घुड़दौड़, कुत्ते दौड़ाना, तीरंदाजी आदि अनेक खेल लोकप्रिय थे.
  • शिकार खेलना, मछली पकड़ना तथा विभिन्न उत्सव व त्यौहार आदि के द्वारा भी मनोरंजन किया जाता था.

आभूषण तथा श्रृंगार

  • लोग विभिन्न प्रकार के वस्त्र, आभूषण तथा श्रृंगार प्रसाधनों का प्रयोग करते थे.
  • हिन्दू पुरुष धोती कुर्ता, कमीज, टोपी, कोट, नियान, जांघिया तथा पगड़ी आदि पहनते थे तथा महिलाएं साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट, अंगिया, बनियान, घाघरा, सलवार, कजीज आदि पहनती थीं.
  • मुस्लिम पुरुष कोट एवं चूड़ीदार पायजामा, सलवार, लम्बी या गोल टोपी आदि पहने थे तथा महिलाएं पायजामा, सलवार, कुर्ता तथा बुरका आदि पहनती थीं.
  • अकबर कालीन इतिहासकार अबुल फज़ल ने उन 37 प्रकार के आभूषणों का उल्लेख किया है जो उस समय प्रचलित थे.
  • लोग शरीर पर इत्र और सुगन्धित तेल की मालिश करते थे तथाकई लोग बुढ़ापे में सिर तथा दाढ़ी रंगते थे.

हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही अपनी संस्कृति के अनुरूप अनेक रीति-रिवाजों, उत्सवों और विश्वासों का पालन करते थे. अकबर के काल में हिन्दू तथा मुस्लिम एक-दूसरे के उत्सवों में सहर्ष शामिल होते थे.

मुगल कालीन सामाजिक अवस्था

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Tuesday, October 30, 2018

मुगल शासन प्रणाली (Mughal governance system) मुगल कालीन भारत

मुगल शासन प्रणाली (Mughal governance system) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

मुगल शासन प्रणाली (Mughal governance system)

जानकारी के साधन

  • मुगल शासन के विषय में जानकारी के साधन कई स्थानों पर असम्बद्ध और बिखरे पड़े हैं.
  • इस विषय की जानकारी हमें अनेक विवरणों यथा-
  1. अबुल फज़ल की ‘आइन-ए-अकबरी‘,
  2. मुहम्मद खान कृत ‘इकबालनामा जहाँगीर‘,
  3. अब्दुल हमीद लाहौरी कृत ‘पादशाह- नामा’,
  4. निजामुद्दीन कृत ‘तुजके जहाँगीरी‘ और ‘तबकाते अकबरी‘,
  5. बदायूँनी कृत ‘मॅतख़ब-उत-तवारीख‘ तथा
  • सर थामस रो, बर्नियर, हॉकिन्स, मनुक्की, टेरी इत्यादि विदेशियों के लेखों से प्राप्त होती है.
  • कुछ सामग्री हमें शाहजहाँ और औरंगजेब के शासनकाली में रखी जाने वाली सरकारी नियमावली (दस्तूर-उल-अमल) तथा श्री यदुनाथ सरकार द्वारा पटना से प्राप्त ‘अधिकारियों के कर्तव्य‘ से भी प्राप्त होती है.

मुगल शासन प्रणाली (Mughal governance system) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

मुगल राज व्यवस्था

  • मुगल शासन व्यवस्था मुख्यतः सैनिक तथा आधार रूप से केन्द्रित सामन्तशाही थी.
  • बादशाह धर्म और राज्य का सरताज होता था.
  • मुगल शासन प्रणाली वास्तविक रूप से फारस और अरब की प्रणाली भारतीय परिस्थितियों में प्रयोग की गई थी.
  • तत्कालीन प्रचलित भारतीय व्यवस्था और व्यावहारिक रीति-रिवाजों का सम्मान किया जाता था, किन्तु उसी सीमा तक जहाँ तक वे मुसलमान शासन प्रणाली के आधारभूत सिद्धान्तों से नहीं टकराते थे.

मुगल सम्राट की स्थिति

  • मुगल सम्राट् शासन का स्वामी था.
  • सम्राट् निरंकुश था, किन्तु स्वेच्छाचारी नहीं था.
  • उलेमा फतवे द्वारा सम्राट् को सिंहासनच्युत कर सकते थे.
  • किन्तु जब तक सम्राट् के पास शक्तिशाली सेना रहती, ये फतवे केवल कागज के टुकड़े ही रह जाया करते थे.
  • शासन कई विभागों में बंधा हुआ था.
  • कुछ प्रमुख विभागें हैं–
अधिकारी उत्तराधिकारी
(1) दीवाने आला राज्य कोष और राजस्व
(2) खाने सामान शाही हरम का प्रबन्ध
(3) शाही बख्शी सेना का वेतन तथा हिसाब कार्यालय
(4) मुख्य काजी कानून विभाग, दीवानी और फौजदारी
(5) मुख्य सरदार धार्मिक दान-दक्षिणा विभाग
(6) मोहतसिव प्रजा के चरित्र व व्यवहार की देखभाल
(7) मीर आतिश तोपखाना
(8) दरोगा-ए-डाक चौकी सूचना विभाग और डाक कार्य
(9) दरोगा टकसाल

अधिकारी वर्ग

वजीर या दीवान

  • वजीर राज्य का प्रधानमन्त्री होता था.
  • अकबर के समय प्रधानमन्त्री को ‘वकील‘ और वित्तमन्त्री को ‘वजीर‘ कहते थे.
  • आरम्भ में वजीर राजस्व विभाग का सर्वोच्च अधिकारी होता था, किन्तु कालान्तर में अन्य विभागों पर भी इसका अधिकार हो गया.
  • बादशाह या सम्राट् के पश्चात् शासन पर उसका सबसे अधिक प्रभाव था.
  • उसके दो सहायक ‘दीवाने आम’ अर्थात वेतन का हिसाब रखने वाला तथा ‘दीवाने खास’ अर्थात् की निजी भूमि का दीवान होते थे.

मीर बख्शी

  • यह सैन्य विभाग का मुखिया था तथा सेना सम्बन्धी सभी कार्यों यथा अनुशासन, प्रशिक्षण वेतन आदि के प्रति उत्तरदायी था.
  • वह सैनिकों का हुलिया आदि रखता था तथा घोड़ों पर दाग लगवाता था. उसकी सहायता के लिए अनेक कर्मचारी होते थे.

खान-ए-सामान

  • वह शाही भण्डारी था तथा सम्राट् के उद्योग, भण्डार, सेना और शाही परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रबन्ध करता था.
  • वह सम्राट् के व्यक्तिगत सेवकों का अधिकारी था.
  • यह पद महत्वपूर्ण होने के कारण किसी विश्वासपात्र तथा प्रभावशाली व्यक्ति को ही सौंपा जाता था.

सद्स सदर

  • यह सम्राट् को धार्मिक विषयों में परामर्श देता था.
  • उसे ‘सदरे कुल’ या सदरे जहान’ भी कहा जाता था.
  • वह प्रजा और सम्राट का सम्पर्क बनाए रखने वाली कड़ी थी.
  • वह इस्लामी कानून का संरक्षण और उलेमा का प्रतिनिधि होता था.
  • प्रत्येक सूबे में एक ‘सदर नियुक्त होता था.
  • प्रत्येक ‘सदर’ ‘सदरे दूर’ की आज्ञा का पालन करता था.

मोहतसिब

  • इनका कार्य पैगम्बर की आज्ञाओं को लागू करना और उन सब विधि-विधानों का दमन करना था जो इस्लाम के अनुकूल नहीं थे.
  • औरंगजेब के शासन काल में इनको नए मन्दिरों को तुड़वाने की आज्ञा दी गई.
  • कभी-कभी इन्हें वस्तुओं का मूल्य निर्धारित करने और सही वजन और माप इत्यादि रखने का काम भी दिया जाता था.
  • इनका काम सिपाहियों के साथ नगर का दौरा करके शराब, जुए आदि के अड्डों को समाप्त करना भी था.

काजी-उल-कजात या मुख्य काजी

  • सम्राट् के पश्चात् न्यायिक मामलों का यह सर्वोच्च अधिकारी था.
  • निर्णय इस्लामिक नियमों के आधार पर लिए जाते थे.
  • मुख्य काजी नगरों, जिलों और सूबों के काजियों की नियुक्ति भी करता था.
  • काजियों की सहायता हेतु मुफ्ती होते थे.
  • अधिकतर काजी भ्रष्ट होते थे.

बुयुतात

  • यह उपाधि उस मनुष्य को दी जाती थी, जिसका कार्य मृत पुरुर्षों के धन और सम्पत्ति को रखना, राज्य का हिस्सा काट कर उस सम्पत्ति को उसके उत्तराधिकारी को सौंपना, वस्तुओं के दाम निर्धारित करना, शाही कारखानों के लिए माल लाना तथा इनके द्वारा निर्मित वस्तुओं और खर्चे का हिसाब रखना था.

तोपखाने का दरोगा

  • यह मीर बख्शी के अधिकार में कार्य करता था.
  • मीर आतिश भी तोपखाने का अधिकारी था.
  • यह सम्राट् के व्यक्तिगत सम्पर्क में आने के कारण अत्यन्त प्रभावशाली माना जाता था.

दरोगा-ए-डाक चौकी

  • यह गुप्तचर और डाक विभाग का अधिकारी था.
  • इसके दूत सारे देश में होते थे और प्रत्येक देश में हरकारों (सूचना देने वाले’ या सन्देश वाहक) के लिए घोड़े होते थे.
  • यह साप्ताहिक सूचना-पत्र राजधानी में सम्राटू के सूचनार्थ भेजना होता था.

अन्य पदाधिकारी

मीर बाहरी जल सेना का प्रधान
मीर बर्र वन सचिव
कुर बेगी ध्वजारोही
अख्त बेगी शाही अस्तबल का दरोगा
मुशरिफ राजस्व सचिव
नाजिरे बुयुतात शाही कारखानों का प्रबन्धक
मुस्तैफी मुख्य आय-व्यय निरीक्षक
अवरजाह नवीस दरवार के दैनिक खर्च का लेखा रखने वाला
खवां सालार शाही बावर्चीखाने का दरोगा
मीर अर्ज सम्राट के सम्मुख प्रार्थना-पत्र रखने वाला

प्रान्तीय शासन

  • शासन की सुविधा हेतु साम्राज्य को अनेक प्रान्तों अथवा सूबों में विभक्त किया गया था.
  • मुगल साम्राज्य में प्रान्तों की संख्या
  1. अकबर के समय 15,
  2. जहाँगीर के समय 17,
  3. शाहजहाँ के समय 11 तथा
  4. औरंगजेब के समय 21 हो गई थी.
  • केन्द्र के समान प्रान्तों में व्यवस्था हेतु अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की गई थी.
  • प्रमुख अधिकारी इस प्रकार थे.

सूबेदार

  • यह सूबे का सर्वोच्च अधिकारी था.
  • उसकी सहायता के लिए दीवान, बख्शी, फौजदार, कोतवाल, काजी, सदर, आमिल, बितिकची, पोतदार या खिजानदार, वाकया नवीस, कानूनगो और पटवारी आदि होते थे.
  • सूबेदार का प्रति दो-तीन वर्ष में स्थानान्तरण कर दिया जाता था, क्योंकि एक ही स्थान पर अधिक समय तक रहने से यह अपनी शक्ति तथा अधिकारों का दुरुपयोग कर सकते थे.
  • फिर भी सूबेदार या राज्यपाल अत्याचारी और दुश्चरित्र होते थे.
  • केन्द्रीय राजधानी के सूबों की भौगोलिक दूरी तथा मध्यकालीन यातायात के साधनों के कारण राज्यपाल अपने प्रान्त में मनमानी करते थे.

दीवान

  • प्रान्त में यह द्वितीय प्रमुख अधिकारी तथा सूबेदार का प्रतिद्वन्द्वी होता था.
  • शाही दीवान से सम्पर्क बनाए रखना तथा उसकी आज्ञाओं का पालन करना इसका कर्तव्य था.
  • प्रान्तीय वित्त विभाग इसी के अधीन होता था.
  • सूबेदार तथा दीवान परस्पर एक दूसरे की अनाधिकार चेष्टा पर रोक का काम करते थे.

फौजदार

  • यह सूबेदार द्वारा नियुक्त किया जाता था तथा प्रान्तीय सेना का सेनानायक होता था.
  • ये आमिल के लगान वसूली के कार्य में भी सहायता करते थे.
  • श्री सरकार के अनुसार, फौजदार का कार्य छोटे-छोटे विद्रोहों का दमन करना, डाकुओं के दलों को भगा देना या बन्दी बना लेना और
  • राजस्व अधिकारियों अथवा फौजदारी अधिकारियों या मोहतसिब के विरोध का शक्ति प्रदर्शन द्वारा आतंक जमा कर दमन करना था. 

सदर 

  • इसकी नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा की जाती थी.
  • इसका मुख्य कार्य सयरहालों अर्थात् धार्मिक तथा सार्वजनिक कार्यों के लिए लगान से छूटी हुई धरती का प्रबन्ध करना था.
  • इसका अपना एक अलग कार्यालय होता था तथा यह दीवान से कहीं अधिक स्वतन्त्र था.
  • काजी और मीर अदल इसके अधीन कार्य करते थे.

आमिल

  • आमिल मुख्यतः लगान वसूल करने वाला हेता था और इसे बहुत से कार्य करने पड़ते थे.
  • इसे भूमि की नपाई या ‘पैमाइश’, लगान वसूली, कारकुनों, मुकद्दमों और पटवारियों के खाते निरीक्षण आदि कार्य करने पड़ते थे.

बख्शी 

  • यह प्रान्तीय सेना का वेतन अधिकारी होता था और मीर बख्शी के अधीन कार्य करता था.

बितकची 

  • यह आमिल की स्वेच्छाचारिता पर रोक लगाता था.
  • राजस्व तथा कानूनगो के कार्यों की देखभाल करता था.
  • उसके लिए अच्छा लेखक और मुन्शी होना तथा अपने जिले के रीति-रिवाजों की जानकारी होना आवश्यक था.

कोतवाल

  • यह रक्षा विभाग का अधिकारी था किन्तु उसे न्यायाधीश की शक्ति भी दी गई थी.
  • उसका उत्तरदायित्व नगर से शान्ति और व्यवस्था बनाए रखना था.
  • वह विभिन्न वर्गों के आय-व्यय का ब्यौरा भी रखता था.

वाकया नवीस

  • यह प्रान्त में घटित घटनाओं का ब्यौरा रखता था.
  • वह छोटी-बड़ी प्रान्तीय घटनाओं की सूचना बराबर केन्द्र सरकार तक पहुंचाता रहता था.
  • यह अपने कार्य बहुत सावधानी से करता था, क्योंकि कोई गलत सूचना दिए जाने पर सम्राट् उसे कठोर दण्ड देता था.

सरकार या जिले

  • प्रत्येक सूबा या प्रान्त आगे कई जिलों या सरकारों में विभक्त था.
  • यह क्षेत्र फौजदार के अधिकार में था.
  • उसे राज्यपाल के आदेशों का पालन करना तथा उससे सतत् सम्पर्क बनाए रखना पड़ता था.

परगना या महल

  • सरकार आगे परगनों या महलों में विभक्त होते थे.
  • प्रत्येक परगने में एक शिकदार, एक आमिल, एक पोतदार तथा थोड़े, से बितिकची होते थे.

शासन की सबसे छोटी इकाई ‘ग्राम’ या ‘गाँव’ थी.

  • केन्द्र अथवा प्रान्तीय सरकारें गाँव के लोगों के जीवन व मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती थीं.
  • प्रत्येक ग्राम स्वायत्त शासन गण-संघ माना जाता था.

सैनिक व्यवस्था

  • मुगल सेना के पाँच अंग थे यथा-
  1. पैदल,
  2. घुड़सवार,
  3. हाथी,
  4. तोपखाना तथा
  5. जल सेना.
  • मुगल सेना का वास्तविक संगठनकर्ता अकबर था.
  • उसने मनसबदारी प्रथा के आधार पर लगभग 4 लाख की विशाल सेना का गठन किया जिसमें लगभग 25,000 स्थायी सेना थी.
  • पैदल सेना में बन्दूकची, दरबान, पहलवान, कहार, खिदमतिया, मेवरा, चेला आदि प्रमुख थे.
  • इनके कार्य मुख्यतः महलों की रक्षा करना, जासूसी करना आदि थे.
  • पैदल सेना से बन्दूकची सबसे महत्वपूर्ण थे.
  • उन्हें 15 रु. प्रतिमाह वेतन दिया जाता था.
  • साधारण सैनिक को 8 रु. प्रति माह वेतन मिलता था.
  • घुड़सवार सेना मुगल सेना का प्रमुख अंग थी.
  • यह प्रमुख विभागों में विभाजित थी यथा-मनसबदारों द्वारा प्रदत्त घुड़सवार सेना, अहदी तथा दाखिली .

 

  •  मनसबदारों की सेना रखने हेतु जागीर के रूप में वेतन दिया जाता था.
  • घोड़ों को दागने और घुड़सवारों का हुलिया दर्ज करने का कार्य भी इन्हीं का था.
  • अहदी घुड़सवारों की भर्ती सीधे केन्द्र द्वारा की जाती थी.
  • इनके लिए अलग दीवान तथा बख्शी नियुक्त होता था. उनका वेतन 50 रु. से भी अधिक था.
  • दाखिली सैनिक अर्द्ध अश्वारोही तथा अर्द्ध सैनिक की श्रेणी में आते थे.
  • दाखिली सेना में एक-चौथाई बन्दूकची तथा बाकी तीरदाज होते थे.

 

  • हस्ति सेना हेतु पीलखाना नामक अलग विभाग गठित किया गया था.
  • अकबर के काल में हाथियों की संख्या 6751 थी तथा जहाँगीर के काल में यह 1400 रह गई.
  • हाथियों को भी दागा जाता था.
  • कुछ मनसबदारों को भी हाथी रखने पड़ते थे.
  • कई बार सेनापति हाथी सवार होकर सेना का संचालन करते थे.
  • कई बार हाथी युद्ध में अपनी ही सेना के लिए हानिकारक साबित होते थे. 
  • बाबर के काल में दो सौ तोपें मुगल सेना का महत्वपूर्ण अंग थीं.
  • अकबर ने तोपखाने में अनेक सुधार किए.
  • अकबर के काल में गजनाल और नरनाल (क्रमशः हाथी और आदमी द्वारा ले जायी जाती थीं, शुतरनाल (ऊँट पर ले जायी जाने वाली), जंबूर (मधुमक्खी जैसी आवाज वाली) तथा धमाका नाम तोपें थीं.
  • मुगलों ने कालान्तर में फ्रांसीसी और पुर्तगालियों को भी तोपखाने में नियुक्त किया.

 

  • 1573 ई. में अकबर ने जल सेना का गठन किया था.
  • इसका प्रमख अधिकारी ‘मीर-ए-बहर‘ कहलाता था.
  • अकबर के बाद सेना के इस अंग को दर करने की और औरंगजेब ने ध्यान दिया.
  • वास्तव में मुगल सम्राट नौसेना की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सके तथा कालान्तर में यूरोपीय जातियों से पराजित हुए.

मनसबदारी व्यवस्था

  • अकबर द्वारा आरंभ की गई मनसबदारी प्रथा साम्राज्य (मुगल) की प्रशासनिक व्यवस्था की अनोखी विशेषता थी.
  • अरबी भाषा के ‘मनसव’ का शब्दार्थ होता है-पद.
  • मनसब शब्द इसके धारक (मनसबदार) की प्रतिष्ठा का सूचक था.
  • मध्य एशिया में उद्भव हुए मनसबदारी प्रथा के अन्तर्गत सैनिक ओहदेदारों, नौकरशाही वर्ग तथा अमीर वर्ग को मनसब प्राप्त होते थे.
  • अकबर की मनसबदारी व्यवस्था मंगोल नेता चंगेज खाँ की ‘दशमलव प्रणाली‘ पर आधारित थी.

 

  • मनसब शब्द का प्रथम उल्लेख अकबर के शासन के 11वें वर्ष में मिलता है, किन्तु 1577 ई. में मनसब जारी किया गया.
  • मनसब में सवार शब्द 1594-95 ई. से जुड़ने लगा.
  • इस प्रकार मनसब का अकबर के शासनकाल में क्रमिक विकास होता गया तथा यह व्यवस्था विकसित होकर अपने उत्कर्ष पर पहुंच गई.

 

  • अकबर के शासनकाल में काजी तथा सद्र को छोड़ सभी पदाधिकारियों को जरूरत पड़ने पर सैन्य संचालन करना होता था.
  • अतः सभी को मनसब दिया जाता था.
  • लेकिन, गैर सैनिक अधिकारियों को मनसबदार की जगह ‘रोजिनदार’ कहा जाता था.
  • मुगल साम्राज्य के मनसबदार अपना वेतन या तो नकद या जागीर के रूप में प्राप्त करते थे.
  • इससे वे भू-राजस्व तथा सम्राट द्वारा नियत अन्य कर वसूल करते थे.
  • इस प्रकार मनसबदारी प्रथा कृषि तथा जागीरदारी प्रथा का भी एक अभिन्न अंग थी.

मनसबदारी प्रथा की विशेषताएँ

  • मुगल मनसब का स्वरूप दोहरा होता था तथा यह दो स्थितियों का परिचायक था-जात, जो कि व्यक्तिगत पद का सूचक था तथा सवार, जोकि सैनिक संख्या द्योतक अथवा अश्वारोही पद था.
  • जात मुख्यतः शासकीय पदानुक्रम में मनसबदार की स्थिति को रेखांकित करता था.
  • अकबर के शासनकाल में सबसे कम मनसब 10 से लेकर 10,000 तक होता था, किन्तु कलान्तर में यह अधिकतम 12,000 तक हो गया.
  • मनसब प्राप्त करने वाले तीन तरह के थे-10 से 500 तक मनसब प्राप्त करने वाले ‘मनसबदार’ कहे जाते थे, 500 से 2500 तक मनसब प्राप्त करने वाले ‘अमीर’ तथा 2500 से ऊपर मनसब प्राप्त करने वाले ‘अमीर-ए-उम्दा’ या ‘अमीर-ए-आजम’ या ‘उमरा’ कहे जाते थे.

 

  • जात के साथ सवार को 1595 ई. में जोड़ देने से जात-व-सवार पद तीन श्रेणियों में बंट गया.
  • प्रथम श्रेणी के मनसबदार को अपने जात के बराबर सवार की संख्या रखनी पड़ती थी .
  • अर्थात् घुड़सवारों की संख्या जात के बराबर होती थी, जैसे 5000/5000 जात/सवार .
  • द्वितीय श्रेणी के अंतर्गत मनसबदार को अपने जात पद से थोड़ा कम या आधे घुड़सवार सैनिकों को रखना होता था, जैसे-3000/2000 जात/सवार.
  • तृतीय श्रेणी के अंतर्गत वे मनसबदार आते थे, जो अपने जात पद के आधे से भी कम सवार (घुड़सवार सैनिक) रखते थे. जैसे-5000/2000 जात/सवार.

 

  • मनसबदार सैनिक तथा नागरिक दोनों ही विभागों से सम्बद्ध होते थे.
  • उन्हें सैनिक विभाग से नागरिक तथा नागरिक विभाग से सैनिक विभाग में स्थानान्तरित किया जाता था.

 

  • ‘जब्ती’ मनसबदारी प्रथा की एक प्रमुख विशेषता थी.
  • इसके अनुसार जब किसी मनसबदार की मृत्यु हो जाती थी, तो उसकी सारी सम्पत्ति सम्राट द्वारा जब्त कर ली जाती थी .
  • ऐसा इसलिए किया जाता था कि मनसबदार जनता का मनमाने ढंग से शोषण न करे.

 

  • आइने अकबरी में 66 मनसबों का उल्लेख है, किन्तु व्यवहार में केवल 33 मनसब ही प्रदान किए जाते थे.
  • 1595 ई. या इसके आस-पास मनसबदारों की कुल संख्या 1803 थी, किन्तु औरंगजेब के शासन के अन्त में यह संख्या बढ़कर 14,449 हो गई.

 

  • जहाँगीर के शासनकाल में इस प्रथा में कुछ परिवतर्नन करते हुए दो अस्पा तथा सिह-अस्पा को मनसब से जोड़ा जाने लगा.
  • इस व्यवस्था में किसी मनसबदार को दो-अस्पाट पद प्राप्त होने पर निर्धारित संख्या के अतिरिक्त उतनी ही संख्या में और घोड़े रखने पड़ते थे तथा सिह-अस्पा पद प्राप्त मनसबदार को निर्धारित संख्या के अतिरिक्त दुगने घोड़े रखने पड़ते थे.

 

  • शाहजहाँ ने मनसबदारी प्रथा में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक नियम बनाया जिसके अनुसार पद की तुलना में घुड़सवारों की संख्या कम कर दी गई.
  • अब अपने पद हेतु निर्धारित संख्या की कम-से-कम एक चौथाई फौजी टुकड़ी रखनी पड़ती थी.
  • भारत के बाहर यह संख्या 1/5 होती थी.

 

  • अकबर के समय से ही यह शिकायत मिलती आ रही थी कि जागीरों की अनुमानित आय (जमा) तथा वास्तविक आय (हासिल) में अंतर होता था.
  • अर्थात्, हासिल, जमा से कम होती थी.
  • शाहजहाँ ने इस समस्या का हल निकाला; जिसके अनुसार, वास्तविक वसूली के आधार पर महीना जागीरों-शिशमाहा, सीमाहा आदि व्यवस्था शुरू की.
  • यदि किसी जागीर से राजस्व की वसूली 50 प्रतिशत (जमा की तुलना में) होती थी तो उसे शिशमाहा जागीर माना जाता था तथा वसूली एक चौथाई होती थी तो उसे सीमाहा जागीर माना जाता था.
  • इस तरह की प्राप्त जागीरों के अनुपात में ही मनसबदारों के दायित्वों में भी कटौती कर दी जाती थी.

 

  • औरंगजेब के समय में एक और व्यवस्था ‘मशरूत‘ के तहत् सक्षम मनसबदारों के किसी महत्वपूर्ण पद जैसे फौजदार या किलेदार अथवा किसी महत्वपूर्ण अभियान पर जाते समय उसके सवार पद में अतिरिक्त वृद्धि कर दी जाती थी.
  • औरंगजेब के शासनकाल में खासकर उच्च श्रेणी के मनसबदारों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होने के कारण ऐसी परिस्थिति पैदा हो गई कि उन्हें प्रदान करने के लिए जागीर ही नहीं रह गई.
  • फलस्वरूप जागीर के अभाव में जागीरदारी तथा कृषिजन्य संकट पैदा हो गए तथा अंततः औरंगजेब के बाद के शासकों के काल में मनसबदारी प्रथा का ही पतन हो गया.

वित्त प्रशासन

  • मुगल काल में वित्त प्रशासन विस्तृत तथा व्यवस्थित था.
  • राज्य की आय तथा व्यय की अनेक मदें थीं.
  • आय के प्रमुख साधन निम्नलिखित थे

खराज या भू-राजस्व

  • राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमि कर था.
  • अकबर ने 1560 ई. में भू-राजस्व की ओर विशेष ध्यान दिया और कई कर निर्धारण प्रणालियों को अपनाया जैसे टोडरमल की जाब्ता प्रणाली, करोड़ी व्यवस्था, दहसाला प्रणाली, बटाई तथा नसल अथवा कानकुत पद्धति .
  • भू-राजस्व अनाज अथवा नकदी के रूप में लिया जाता था तथा इसकी दर सामान्यतः उपज का 1/2 भाग या 1/3 भाग थी.

जकात

  • मुस्लिम जनता से उनकी दृष्टिगत सम्पत्ति का 2.5 प्रतिशत भाग जकात के रूप में लिया जाता था.
  • हुमायूँ ने इसे लेना बन्द कर दिया, किन्तु औरंगजेब के काल में यह कर फिर से लिया जाने लगा.

खम्स

  • खम्स युद्ध में लूट के माल में सरकार का भाग था जो इस्लामी नियमों के अनुसार 20 प्रतिशत भाग था, किन्तु मुगलकाल में सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था.
  • अतः सारा लूट का माल राजकोष में जमा करवाया जाता था.

जजिया

  • यह गैर-मुस्लिमों से लिया जाने वाला धर्मनिरपेक्ष कर था.
  • अकबर ने 1564 ई. में इसे समाप्त कर दिया,
  • किन्तु औरंगजेब ने 1697 ई. में इसे पुनः लागू कर दिया.
  • सम्भवः यह व्यक्ति की आय का 2.5 प्रतिशत होता था.
  • 1720 ई. में इसे जब मुहम्मदशाह ने समाप्त किया, उस समय इससे राज्य की 4 करोड़ रु. वार्षिक आय होती थी.

पेशकश अथवा नजर

  • बड़े-बड़े पदाधिकारी, मनसबदार आदि सम्राट् को मिलने के अवसर पर बहुमूल्य भेटें देते थे.
  • जमींदार, बड़े-बड़े जागीरदार तथा रजवाड़े सम्राट् को वार्षिक पेशकश देते थे.

जब्त की गई सम्पत्ति

  • जिस सम्पत्ति का कोई वारिस नहीं होता था उसे मुगल सरकार द्वारा जब्त कर लिया जाता था.

टकसाल 

  • टकसाल से राज्य को बट्टा तथा पुराने घिसे हुए सिक्कों को बदलने पर अतिरिक्त कीमत ली जाती थी.
  • इनके अतिरिक्त कारखानों तथा खानों से आय, नमक कर, जुर्मान, शुल्क या फीस, गड़ा हुआ धन, चुंगी तथा व्यापार कर आदि से राज्य की आय होती थी.
  • इस जमा धन राशि को प्रशासनिक अधिकारियों के वेतन, शाही दरबार के खर्च, सैनिक व्यय, सार्वजनिक निर्माण कार्यों, साहित्य-कला के सरंक्षक और प्रोत्साहन आदि पर व्यय किया जाता था.

भू-राजस्व

  • बाबर ने लोदी काल से चली आ रही भूमिकर प्रणाली को ही अपनाए रखा.
  • हुमायूं ने भू-राजस्व व्यवस्था में कुछ साधारण सुधार किए.
  • मुगल कालीन भू-राजस्व व्यवस्था को संगठित करने का श्रेय अकबर को जाता है.
  • उसने शेरशाह सूरी की भूमि-व्यवस्था को जारी रखा तथा वार्षिक अनुमान पद्धति को पुनः चालू किया.
  • 1562 ई. में अकबर ने आसफ खाँ के स्थान पर मलिक फूल को एतीमाद खाँ की उपाधि देकर खालसा भूमि का दीवान नियुक्त किया.
  • उसने ‘करोड़ी पद्धति’ को आरम्भ किया.
  • इस व्यवस्था के अन्तर्गत सारी खालसा भूमि को ऐसे बराबर भागों में विभाजित किया, जिससे हर भाग की मालगुजारी एक करोड़ दाम (2,50,000 रु.) एकत्र होती थी.
  • इस भू-भाग का आमिल नामक अधिकारी सर्वसाधारण में करोड़ी नाम से विख्यात हुआ.
  • उसकी मदद के लिए एक बितिकची (मुन्शी) और एक खजांची नियुक्त किया गया.

 

  • सन् 1567 ई. में अकबर ने एतिमाद खाँ के स्थान पर मुजफ्फर खाँ को दीवान बनाया.
  • उसने उपज या अनाज के रूप में निश्चित भू-कर के स्थान पर नकद जमा की प्रथा शुरू की और हर परगने की फसलों के लिए अलग-अलग मालगुजारी की व्यवस्था की.
  • 1573-74 तक अकवर प्रचलित मालगुजारी की किसी भी व्यवस्था से सन्तुष्ट नहीं था.
  • अतः उसने भूमि सम्बन्धी कुछ सुधार किए, यथा खालसा भूमि का विस्तार भूमि की पैमाइश वर्गीकरण और वास्तविक उपज के आधार पर भू-राजस्व तय करना आदि .
  • उत्पादकता के आधार पर भूमि को चार भागों में विभाजित किया गया था-
  1. पोलज भूमि-सबसे अधिक उपजाऊ व प्रतिवर्ष कृषि के काम आने वाली भूमि .
  2. पड़ौती भूमि-पोलज से कम उपजा तथा एक फसल के पश्चात् एक या डेढ़ वर्ष के लिए खाली छोड़ी जाने वाली भूमि .
  3. चाचर भूमि-एक फसल के बाद तीन-चार वर्षों तक खाली छोड़ी जाने वाली भूमि .
  4. बन्जर भूमि-जो प्रायः खाली पड़ी रहती थी तथा कभी-कभी कृषि काम में ली जाती थी.
  • 1580 ई. में अकबर ने वास्तविक उत्पादन, स्थानीय कीमतें, उत्पादकता आदि के आधार पर ‘दहसाला प्रणाली’ प्रचलित की.
  • इसके अनुसार अलग-अलग फसलों के पिछले दस वर्षों के उत्पादन और इसी उवधि में उनकी कीमतों का औसत निकाला जाता था.
  • इस औसत ऊपज का एक-तिहाई भाग राजस्व होता था.
  • औसत ऊपज को नकदी में परिवर्तित करने के लिए पिछले दस वर्षों की कीमत के औसत के आधार पर उसे परिवर्तित कर दिया जाता था.

 

  • वस्तुतः अकबर के काल में राजा टोडरमल और ख्वाजा शाह मंसूर ने इस प्रणाली को सफल बनाने में बहुत योगदान दिया.
  • इन प्रणालियों के अतिरिक्त अकबर के काल में बटाई या गल्ला बख्शी तथा जब्ती प्रणालियां भी अपनाई गईं.
  • जहाँगीर ने अकबर की प्रणाली को ही लागू रखा, किन्तु उसका शासन प्रबन्ध इतना कुशल नहीं था.
  • उसने ‘जागीदारी प्रथा’ को भी प्रोत्साहन दिया तथा उसके काल में अलतमगा’ नामक एक नई जागीर प्रथा शुरू हुई.
  • भू-राजस्व व्यवस्था में शाहजहाँ के काल में कुछ परिवर्तन हुए.
  • इतिहासकार बेनी प्रसाद सक्सेना के अनुसार,

“उसके काल में जाब्ती प्रथा के स्थान पर जागीर प्रथा को इतनी प्राथमिकता दी गई कि लगभग 70 प्रतिशत खालसा भूमि जागीरों में परिवर्तित हो गई.” 

  • औरंगजेब ने शरा के अनुसार भू-राजस्व की दर बढ़ाकर 50 प्रतिशत तय की.
  • उसके काल में ‘इजारेदारी‘ और ‘जागीरदारी‘ प्रथा चलती रही.

संक्षेप में, अकबर के काल के बाद धीरे-धीरे ‘जागीरदारी’ और ‘इजारेदारी‘ प्रथा को अधिक पसन्द किया गया. भू-राजस्व की दर बढ़ा कर 50 प्रतिशत तक कर दी गई.

 

मुगल शासन प्रणाली (Mughal governance system) मुगल कालीन भारत (India During the Mughals)

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Friday, October 26, 2018

एनिमेशन एक करियर क्षेत्र जो देश को समृद्धि प्रदान करता है (Animation A career area)

एनिमेशन एक करियर क्षेत्र जो देश को समृद्धि प्रदान करता है (Animation A career area that provides prosperity to the country)

एनिमेशन एक करियर क्षेत्र (Animation)

  • एनिमेशन (Animation) क्षेत्र में बहुत अवसर है क्योंकि एनीमेशन दर्शकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है.
  • एनीमेशन सिर्फ एक कार्टून था और यह बेबीकंपनी के लिए मनोरंजन की एक अवधारणा थी; लेकिन आज एनीमेशन निर्माण, विज्ञापन और ऑटोमोबाइल जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आया है.
  • यही कारण है कि एनीमेशन का मतलब है कि बच्चों के लिए कार्टून दृष्टिकोण बदला जा सकता है.
  • यह उद्योग 2005 में भारत में शुरू हुआ और पिछले कुछ सालों मे 2600 करोड़  विदेशी मुद्रा देश में लाया.
  • इसलिए, एनीमेशन को ऐसे कैरियर के रूप में देखा जाना चाहिए जो देश में समृद्धि लाता है.
  • एनीमेशन और गेमिंग क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए दादासाहेब फाल्के चित्रनगरी में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया जाएगा और सीटों को भी उनके लिए आरक्षित किया गया है.

एनिमेशन एक करियर क्षेत्र जो देश को समृद्धि प्रदान करता है Animation A career area that provides prosperity to the country

‘एनीमेशन’ पाठ्यक्रमों में,

  • ‘कोरल ड्रा'(CorelDRAW), ‘फ़ोटोशॉप'(Photoshop), ‘माया’ (Autodesk Maya) कंप्यूटर क्षेत्र में काम करने के लिए उपयोगी हैं.
  • एनीमेशन स्केचिंग और ड्राइंग (animation sketching and drawing) में प्रवीणता हासिल करना आसान बनाता है; लेकिन एनीमेशन एक इंजीनियरिंग है.
  • क्योंकि इसमें कला का दस प्रतिशत और नब्बे प्रतिशत प्रौद्योगिकी है.
  • जो एनीमेशन तकनीक के मंत्र को जानता है वह सबसे अच्छा एनिमेटर होगा.
  • आप वर्तमान में एनीमेशन उद्योग में कई बदलाव देख रहे हैं.
  • गेमिंग, ग्राफिक्स और एनिमेशन में कई प्रयोग दिखाई देते हैं.

एनीमेशन से संबंधित क्षेत्र (Animation related Areas)

गेमिंग विभाग (Gaming)

  • आईटी के बाद आनेवाले समय मे एनीमेशन और गेमिंग का नया करियर है.
  • एनिमेशन (Animation) उद्योग के सभी क्षेत्रों में बड़े अवसर हैं.
  • एनिमेटरों को कंप्यूटर गेम, मोबाइल गेम्स या स्वतंत्र गेम बनाने की भी आवश्यकता होती है.
  • कई बच्चों के खेल युवा बच्चों और युवाओं से बहुत प्रतिक्रिया प्राप्त करते हैं.
  • तो यह क्षेत्र दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है.

प्रेझेंटेशन (presentation)

  • एनीमेशन किसी भी प्रकार की प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

फिल्म लाइन

  • 3 डी (3D) फिल्म एनिमेशन का भी एक हिस्सा है.
  • इस सॉफ्टवेयर के लिए ‘माया’ (Autodesk Maya)का उपयोग किया जाता है.
  • फिल्में बनाने के लिए एनीमेशन की एक बड़ी टीम है.
  • इस टीम को मॉडेलिंग, शेडिंग, टेक्चरिंग, लायटिंग आदि जैसे काम में बांटा गया है.

ऑटोमोबाइल डिजाइन (automobile design)

  • अब लाखों कारें एनीमेशन द्वारा डिजाइन की जा रही हैं.
  • इसलिए, विभिन्न तरह से कार देखना संभव है.

मेडिकल एनीमेशन (medical animation)

  • एनीमेशन ऑपरेशन से पहले ऑपरेशन कैसे किया जाएगा इसकी प्रस्तुति से संभव बनाया गया.
  • एनीमेशन के कारण ऑपरेशन कैसे होता है यह एनीमेशन जो कंप्यूटर पर दिखाया जा सकता है.

आवश्यक गुण

  • उद्योग में एनिमेटर के रूप में काम करने के लिए, पेंटिंग, रंगसंगत और कैमरा का ज्ञान होना जरूरी है.

शैक्षणिक योग्यता

  • छात्र कक्षा X वीं या XII वीं के बाद करियर को आगे बढ़ाने के लिए एनीमेशन चुन सकते हैं.
  • अन्य किसी भी पढ़ाई के साथ एनीमेशन सीख सकते हैं.

नौकरी का अवसर (Job opportunity)

  • एक कमर्शियल कलाकार के रूप में, वे विज्ञापन कंपनियों में काम कर सकते हैं या एक स्वतंत्र व्यवसाय कर सकते हैं.
  • और लघु फिल्मों के लिए मंच प्राप्त करने के लिए दूरदर्शन डीडी भारती या डीडी नेशनल के चैनलों में से एक इस उद्देश्य के लिए आरक्षित होगा.
  • वहां पर मौका मिल सकता है.
  • आर्ट गैलरीओं को अपनी तस्वीरों को प्रदर्शित करके बेचा जा सकता है.
  • छात्र एनीमेशन, सेटिंग, ग्राफिक डिज़ाइनिंग, वेब डिज़ाइनिंग आदि कर सकते हैं.

कई शहरों में सरकारी तथा  निजी कक्षाओं या संगठनों के माध्यम से किया जा सकता है.

एनिमेशन पाठ्यक्रम के लिए प्रमुख संस्थान-

  1. फिल्म इंस्टिट्यूट पुणे
  2. ITI  पवई
  3. अहमदाबाद नॅशनल इन्स्टिट्यूट ऑफ डिझाईन (एन्.आय.डी.)
  4.  C-DAC , मुंबई 
  5. एरीना मल्टीमीडिया, दिल्ली
  6. एरीना मल्टीमीडिया, मुंबई
  7. एरीना मल्टीमीडिया, बंगलुरु
  8. एरीना मल्टीमीडिया, नोएडा
  9. ग्लोबल स्कूल ऑफ एनिमेशन, नई दिल्ली
  10. ग्लोबल स्कूल ऑफ एनिमेशन, चेन्नई
  11. माया एकेडमी ऑफ एडवांस सिनेमैटिक, मुंबई
  12. टेक्नो प्वाइंट मल्टीमीडिया, मुंबई
  13. टेक्नो प्वाइंट मल्टीमीडिया, बंगलुरु

 

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Sunday, October 21, 2018

सिक्ख शक्ति का अभ्युदय (Rise of the Sikh Power in Hindi)

सिक्ख शक्ति का अभ्युदय (Rise of the Sikh Power)

सिक्ख शक्ति का अभ्युदय

सिक्ख गुरु

(1) गुरु नानक (1469-1538)

  • गुरु नानक सिक्ख मत के प्रवर्तक थे.
  • गुरु नानक का जन्म 1469 में पश्चिमी पंजाब के तलवण्डी नामक ग्राम में हुआ था.
  • वर्तमान में इस ग्राम को ननकाना साहब कहा जाता है.
  • इनकी माता का नाम तृप्ता और पिता का नाम कालू मेहता था.
  • सात वर्ष की आयु में गुरु नामक ने अपने ग्राम की पाठशाला में प्रवेश लिया.
  • शुरू से ही ईश्वर के ध्यान में मग्न रहने के कारण हिन्दू या मुसलमान शिक्षक उन्हें कुछ अधिक नहीं पढ़ा सके.
  • व्यापार करने और धन प्राप्त करने के बजाए वह निर्धनों में धन का वितरण कर देते थे.
  • उनके पिता ने अपने पुत्र की परलोक संबंधी प्रवृत्ति को बदलने के लिए सुलक्खनी नाम की कन्या से उनका विवाह कर दिया.
  • इनके दो पुत्र भी हुए, किन्तु विवाह से भी उनके मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा.
  • 1499 में उन्होंने सांसारिक मोहमाया छोड़कर संन्यास ले लिया.

सिक्ख शक्ति का अभ्युदय (Rise of the Sikh Power in hindi)

गुरु नानक के उपदेश
  • लगभग 30 वर्ष तक गुरु नानक ज्ञान प्राप्त करते हुए तथा उपदेश देते हुए देश भर का भ्रमण करते रहे.
  • गुरु नानक का मुख्य उपदेश यह था कि एक सच्चे प्रभु में विश्वास करो.
  • उनके अनुसार “प्रभु” एक है.
  • नानक प्रभु के “एकत्व” पर जोर देते थे.
  • उनके अनुसार प्रभु के समान कोई नहीं हो सकता.
  • नानक ने प्रभु को ‘प्रेमिका’ कहा है.
  • उनके मत में ईश्वर सबके हृदय में विराजमान है.
  • वे ‘सतनाम’ की पूजा पर जोर देते थे.
सुधारक या क्रान्तिकारी
  • गुरु नानक के कार्यों के विषय में दो विचारधाराएं प्रचलित हैं.
  • एक विचारधारा के अनुसार नानक हिन्दू धर्म के सुधारक थे.
  • दूसरी विचारधारा के अनुसार नानक क्रान्तिकारी थे.
  • प्रथम विचारधारा के अनुसार, नानक भारतवर्ष में ‘भक्ति मार्ग’ को मानने वालों में से थे.
  • उन्होंने हिन्दू धर्म के आधारभूत नियमों का खण्डन न करके केवल शताब्दियों से उसमें घुस आई कुरीतियों का ही खण्डन किया.
  • वे अवतार-उपासना से अधिक प्रभु-भक्ति पर जोर देते थे.
  • दूसरी विचारधारा के अनुसार, वे एक क्रान्तिकारी थे.
  • उनका ध्येय तत्कालीन समाज में असंतोष पैदा करके, उसके समस्त विधि-विधान को उलट-पलट करके एक नए समाज का निर्माण करना था.
  • गुरु नानक ने हिन्दू धर्म के मुख्य आधार वर्णव्यवस्था का खण्डन किया और वर्णव्यवस्था के नाश के लिए एक ठोस कार्यक्रम बनाया.
  • उन्होंने अपने अनुयायियों को युगों से एकत्रित अज्ञान के अन्धकार से निकाला तथा बौद्धिक उपासना और चारित्रिक श्रेष्ठता की प्रेरणा दी.
  • उनके अनुयायी सिक्ख व शिष्य कहलाते थे “प्रजा” नहीं.

(2) गुरु अंगद (1538-1552)

  • गुरु नानक ने गुरु अंगद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया.
  • गुरु अंगद ने “गुरुमुखी” लिपि का जनसाधारण के मध्य प्रचार किया.
  • कहा जाता है कि हुमायूँ गुरु अंगद से आशीर्वाद लेने आया था.

(3) गुरु अमरदास (1559-1574)

  • गुरु अंगद का उत्तराधिकारी गुरु अमरदास बना.
  • गुरु अमरदास ने गोइन्दावाल में एक बावली खुदवाई.
  • यह बावली बाद में सिक्खों का मुख्य तीर्थ बन गया.
  • उन्होंने लंगर की परिपाटी में सुधार किए और इसे लोकप्रिय बनाया.
  • उन्होंने अपने धार्मिक साम्राज्य को 22 मंत्रियों अथवा भागों में बांटा.
  • उन्होंने सती प्रथा को वर्जित किया और अपने अनुआयियों को मदिरा पीने से मना किया.

(4) गुरु रामदास (1575-1581)

  • गुरु अमरदास का दामाद रामदास उनका उत्तराधिकारी बना.
  • उसकी सम्राट अकबर से बड़ी घनिष्ट मित्रता थी.
  • अकबर ने उन्हें आधुनिक अमृतसर के स्थान पर बहुत सस्ते दाम पर 500 बीघा भूमि प्रदान की.
  • इस स्थान पर गुरु रामदास ने एक नया नगर “चकगुरु” या रामदासपुर नाम से बसाया.
  • यह नगर कालान्तर के अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
  • उन्होंने दो तालाबों-अमृतसर और संतोषसर-की खुदाई भी आरंभ करवाई.
  • गुरु रामदास के काल में सिक्ख पन्थ ने काफी उन्नति की.

(5) गुरु अर्जुनदेव (1581-1606)

  • गुरु अर्जुनदेव लगभग 25 वर्ष तक सिक्ख पन्थ के गुरु रहे.
  • उन्होंने अमृतसर तालाब की खुदाई का कार्य पूर्ण किया.
  • गुरु अर्जुनदेव ने तरनतारन और करतारपुर नाम के नगर बसाए .
  • गुरु अर्जुनदेव का मुख्य कार्य सिक्खों की धार्मिक पुस्तक “आदि ग्रन्थ” को पूरा करवाना था.
  • इस पुस्तक में सिक्खों के पांच गुरुओं और 18 भक्तों तथा कबीर, फरीद, नामदेव और रैदास इत्यादि के उपदेशों का संग्रह था.
  • “ग्रन्थ साहव” (आदि ग्रन्थ) सिक्ख पन्थ की महत्वपृर्ण पुस्तक है.
  • यह ग्रन्थ हिन्दुओं के मन्दिर की मूर्ति या कैथोलिक चर्च के सलीब की भांति नहीं है.
  • गुरु अर्जुनदेव ने “मसन्द प्रथा” का प्रारंभ किया.
  • इस प्रथा के अनुसार सिक्खों को अपनी आय का दसवां भाग गुरु को देना पड़ता था.
  • सम्राट अकबर और गुरु अर्जुनदेव के संबंध भी सौहार्दपूर्ण थे.
  • किन्तु जहांगीर के शासनकाल में इनमें कटुता आ गई .
  • इस कटुता के कारण ही 1606 में गुरु की हत्या करवा दी गई.

(6) गुरु हरगोविन्द (1606-1645)

  • गुरु अर्जुन का पुत्र हरगोविन्द उनका उत्तराधिकारी बना.
  • आरंभ से ही वह मुगलों का कट्टर शत्रु था.
  • उसने अपने अनुयायियों को शस्त्र रखने और मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करने को कहा और स्वयं “सच्चा बादशाह” की उपाधि धारण की.
  • उन्होंने राजोचित चिन्ह-छत्र, शस्त्र और बाज-धारण किए तथा सैनिक पोशाक पहननी आरंभ की.
  • वे दो तलवारें रखा करते थे जिनमें से एक उनकी धार्मिक सत्ता और दूसरी उनकी राज्य-सत्ता की प्रतीक थी.
  • उन्होंने लोहगढ़ की मोर्चाबन्दी की और “अकाल तख्त” या ‘प्रभु का सिंहासन‘ की स्थापना की.
  • मुगल सम्राट जहांगीर गुरु की निरन्तर बढ़ती शक्ति को सहन नहीं कर पाया.
  • उसने गुरु को ग्वालियर के किले में बंदी बना लिया.
  • शाहजहां के शासन काल में भी मुगल-सिक्ख संबंध मधुर नहीं थे.

(7) गुरु हरराय (1645-1661) 

  • गुरु हरगोविन्द का उत्तराधिकारी उनका पौत्र हरराय बना.
  • गुरु हरराय ने शान्तिपूर्ण प्रचार की नीति अपनाई.
  • अतः उनके शासन काल में मुगल-सिक्ख संबंध मधुर रहे.

(8) गुरु हरकिशन (1661-1664)

  • गुरु हरराय का उत्तराधिकारी गुरु हरकिशन बना.
  • गुरु बनने के समय उनकी आयु केवल पांच वर्ष थी.
  • तीन वर्ष बाद ही उसकी चेचक की बीमारी के कारण मृत्यु हो गई.

(9)  गुरु तेगबहादुर (1664-1675)

  • गुरु तेगबहादुर सिक्खों के नौवें गुरु थे.
  • मुगल सम्राट औरंगजेब की शत्रुता उन्हें विरासत में मिली थी.
  • दोनों के मध्य यह शत्रुता बढ़ती ही गई.
  • औरंगजेब ने इन्हें दिल्ली में बन्दी बना लिया तथा इस्लाम धर्म स्वीकार करने या चमत्कार दिखाने को कहा.
  • गुरु ने औरंगजेब की इनमें से किसी भी बात को मानने से इन्कार कर दिया.
  • अतः औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर की हत्या करवा दी.

(10) गुरु गोविन्द सिंह (1675-1708)

  • गुरु गोविन्द सिंह सिक्खों के दसवें तथा अंतिम गुरु थे.
  • गुरु बनने के बाद उन्होंने अनुभव किया कि उनके अनुयायियों में मतभेद है तथा उनमें मुगलों से युद्ध करने की न तो सामर्थ्य है और न ही साहस.
  • उन्होंने अपने अनुयायियों को युद्ध की शिक्षा देनी आरंभ की और पठानों को अपनी सेना में भर्ती किया.
  • उनका अनेक पर्वतीय राजाओं से संघर्ष हुआ.
  • इस संघर्ष में भंगानी का युद्ध बहुत प्रसिद्ध है.
  • उन्होंने आनंदपुर को अपना मुख्यालय बनाया.
  • 1699 की बैसाखी के दिन गुरु गोविन्द सिंह ने ” खालसा “ का स्थापना किया.
  • उन्होंने आनंदपुर में सिक्खों का एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया और पांच आदमियों का चुनाव किया.
  • इन पांच आदमियों को “पंच प्यारे” के नाम से पुकारा जाने लगा.
  • गुरु ने यहां “अमृत” पिया.
  • इस प्रकार गुरु नानक के अनुयायी सन्त से सैनिक बन गए .
  • सिक्खों को एक विशेष प्रकार की पोशाक पहननी पड़ती थी.
  • अपने शरीर के साथ सदैव पाँच वस्तुएँ यथा-केश, कृपाण, कच्छा, कंघा और कड़ा रखने पड़ते थे.
  • पर्वतीय प्रदेशों के सामंतों ने गुरु के नेतृत्व में निरन्तर बढ़ती सिक्ख शक्ति पर आक्षेप किया.
  • इसके परिणामस्वरूप 1701 में आनंदपुर का प्रथम युद्ध हुआ.
  • इस युद्ध में पर्वतीय राजा पराजित हुए.
  • आगे चलकर इन पर्वतीय प्रदेशों ने औरंगजेब से सहायता प्राप्त की.
  • इसके फलस्वरूप 1903-04 में आनंदपुर का दूसरा युद्ध हुआ.
  • इस युद्ध में सिक्खों को पराजित होकर आनंदपुर छोड़ना पड़ा.
  • गुरु के दो पुत्र पकड़ लिए गए और उन्हें सरहिन्द में ले जाकर जिन्दा ही दीवार में चिनवा दिया गया.
  • चमकौर में पुनः युद्ध हुआ.
  • इस युद्ध में गुरु के दो और पुत्र शहीद हुए.
  • खिदरना या मुक्तसर के युद्ध के बाद गुरु तलवण्डी साबो या दमदमा में आकर बस गए.
  • 1708 में एक पठान ने छुरा घोंपकर उनकी हत्या कर दी.
  • गुरु गोविन्द सिंह का औरंगजेब के नाम लिखा गया अंतिम पत्र “जफरनामा” के नाम से प्रसिद्ध है.

बन्दा बहादुर (1670-1716)

  • बन्दा बहादुर का जन्म 1670 में हुआ था.
  • वह डोगरा राजपूत था.
  • उसका जन्म का नाम लक्ष्मणदास था और वह शिकार का बड़ा शौकीन था.
  • 1708 में उसकी गुरु गोविन्द सिंह से भेंट हुई.
  • गुरु ने उसे अपना “बन्दा” अर्थात् सेवक बना लिया तथा उसे उत्तर भारत में जाकर खालसा के शत्रुओं से बदला लेने का आदेश दिया.
  • गुरु गोविन्द सिंह ने पंजाब के सिक्खों को बन्दा बहादुर के नेतृत्व में संगठित होने का आदेश भी दिया.
  • बन्दा बहादुर के नेतृत्व में सिक्खों ने काफी शक्ति का संचय कर लिया.
  • उन्होंने कौशल, समाना, शाहबाद, अम्बाला और कपूरी को लूटा.
  • 1710 में सिक्खों ने सरहिन्द पर अधिकार कर लिया.
  • सरहिन्द की विजय के बाद बन्दा बहादुर ने बाजसिंह को सरहिन्द का राज्यपाल नियुक्त किया.
  • 1710 में ही उसने गुरु के नाम से सिक्के भी प्रचलित किए.
  • उसने जमींदारी प्रथा का अन्त किया.
  • उसके नेतृत्व में सिक्खों ने अमृतसर, कसूर, बटाला, कालानौर और पठानकोट आदि को भी जीत लिया.
  • सिक्खों की इन विजयों ने मुगल सम्राट बहादुर शाह को इनका दमन करने के लिए बाध्य कर दिया.
  • सम्राट ने अमीनखाँ के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी.
  • बन्दा बहादुर ने लौहगढ़ के किले का समर्पण कर दिया और स्वयं भाग निकले किन्तु मुगल सेना ने उसका पीछा किया.
  • इस कारण गुरदासपुर नांगल का प्रसिद्ध युद्ध हुआ.
  • इस युद्ध में सिक्खों की घोर पराजय हुई.
  • बन्दा बहादुर को गिरफ्तार कर दिल्ली भेज दिया गया.
  • जून, 1716 में बन्दा बहादुर और उनके साथियों की हत्या करवा दी गई.

बन्दा बहादुर की मृत्यु के बाद सिक्खों की स्थिति

  • 1716 में बन्दा बहादुर की मृत्यु के बाद सिक्ख दो दलों में बंट गए-“बन्दई और “तत खालसा”.
  • “बन्दई” बन्दा बहादुर के अनुयायी थे तथा “तत खालसा” कट्टर सिक्ख पंथी.
  • 1721 में भाई मनीसिंह के प्रयत्नों के फलस्वरूप इन दोनों दलों में एकता स्थापित हो गई.
  • पंजाब के मुगल राज्यपाल जकारिया खान ने सिक्खों का दमन करने के लिए मुसलमानों की धर्मान्धता को भड़काया और ‘हैदरी झण्डा’ लहाराया.
  • सिक्खों ने मुगल शक्ति का सामना करने के लिए अपने को ‘दल खालसा’ में संगठित किया.
  • दल खालसा के दो दल थे-
  1. बुड्ढा दल और
  2. तरुण दल .
  • बुड्ढा दल बड़े आदमियों की सेना थी और तरुण दल नवयुवकों की .
  • ये दोनों दल सरबत खालसा के नेता के नाम से प्रसिद्ध नवाब कपूरसिंह के नेतृत्व में कार्य करते थे.
  • 1746 और 1747 में पंजाब में गृह-युद्ध की आग जलती रही.
  • अंत में मीर मन्नू को पंजाब का राज्यपाल बनाया गया.
  • उसने भी सिक्खों का दमन करने की नीति अपनाई.
  • 1748 में दल खालसा का नेतृत्व कपूरसिंह ने जस्सासिंह आहलुवालिया को सौंप दिया.
  • 1753 में पंजाब के राज्यपाल मीर मन्नू की मृत्यु के बाद उसकी विधवा मुगलानी बेगम ने पंजाब की सत्ता पर कब्जा कर लिया.
  • वह एक चरित्रहीन स्त्री थी, इस कारण सारे पंजाब में अराजकता फैल गई.
  • शीघ्र ही उसे सत्ताच्युत कर अदीनाबेग को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • अदीनाबेग ने सिक्खों के साथ मधुर संबंध स्थापित किए.
  • 1758 में अदीनावेग की मृत्यु हो गई.

सिख मिस्लें

  • मिस्ल शब्द एक अरबी भाषा का शब्द है.
  • इसका अर्थ है-“बराबर” या ‘एक जैसा’ .
  • सिख मिस्लों का प्रादुर्भाव उस समय हुआ जिस समय पंजाब में पूर्ण रूप से अराजकता फैली हुई थी.
  • इस दौरान सिख किसी सुदृढ़ नेतृत्व के अभाव में छोटे-छोटे दलों में बंटे हुए थे.
  • उनकी यह दलबन्दी ‘‘मिस्ल” के नाम से प्रसिद्ध हुई.
  • ये मिस्ले पूर्ण रूप से धार्मिक थी.
  • ये मिस्ले प्रजातंत्रात्मक भी थी, क्योंकि मिस्त के प्रत्येक सैनिक और साधारण सदस्य को सामाजिक और राजनीतिक रूप से समान अधिकार प्राप्त थे.
  • किन्तु मिस्ल के सरदार पर किसी प्रकार का बंधन या रोक न होने के कारण मिस्त पूर्णरूप से सामन्तशाही थी.

मिस्ल का संगठन

  • प्रत्येक मिस्ल का सरदार या मिस्तदार, मिस्ल का मुखिया होता था.
  • सरदार को मिस्ल के मामलों में पूर्ण अधिकार प्राप्त था, किन्तु वह अपने अनुयायियों के दैनिक जीवन में बाधा नहीं पहुंचाता था.
  • मिस्लों का शासन मूलतः ग्राम्य शासन था.
  • प्रत्येक ग्राम एक छोटा-सा गणतंत्र था.
  • प्रत्येक ग्राम में एक पंचायत होती थी.
  • मुखियों की सभा या पंचायत शक्तिशालियों को नियंत्रण में रखती थी तथा निर्वलों की सुरक्षा करती थी.
  • ग्राम दो प्रकार के होते थे-
  1. वे ग्राम जो सीधे मिस्ल के शासन में होते थे और
  2. मिस्ल द्वारा रक्षित ग्राम, जिन्हें “राखी” कहा जाता था.
  • पहले प्रकार के ग्रामों से उपज का पांचवाँ भाग लगान के रूप में लिया जाता था.
  • ‘राखी’ ग्रामों से भी इतनी ही मात्रा में लगान लिया जाता था.
  • उल्लेखनीय है कि सिक्खों की ‘राखी’ प्रथा मराठों की ‘चौथ’ के समतुल्य थी.
  • मिस्लों की सैन्य शक्ति का मेरुदण्ड घुड़सवार सेना थी.
  • सैनिकों की नियमबद्ध शिक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं था.
  • इन मिस्लों के सैनिकों का विश्वास जमकर लड़ने की अपेक्षा छापामार युद्ध पर अधिक था.

गुरमता

  • गुरमता ‘ को शाब्दिक अर्थ “धर्मगुरु का आदेश” है.
  • “गुरमता” मिस्लों की केन्द्रीय संस्था थी.
  • यह माना जाता है कि सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोविन्द सिंह की मृत्यु के पश्चात् सिक्ख दिवाली, दशहरा या वैशाखी के दिन अमृतसर में ‘अदि ग्रन्थ’ के सम्मुख एकत्रित होते थे और “अकाल तख्त” पर सामूहिक कार्यवाही के अपने कार्यक्रम पर विचार करते थे.
  • इस विचार-विमर्श के उपरान्त किए गए निर्णय को प्रस्तावों या ‘गुरमता’ के रूप में लिख लिया जाता था.
  • 1805 में अंतिम ‘गुरमता’ लिखा गया.

बारह मिस्लें

  • साधारणतः 12 सिक्ख मिस्लों का उल्लेख मिलता है.
  • ये बारह मिस्लें निम्नलिखित हैं–

(1) सिंहपुरिया या फैजलपुरिया मिस्ल

  • इस मिस्ल का संस्थापक नवाब कपूरसिंह था.
  • यह खालसा का सर्वमाय नेता था.
  • 1753 में इसकी मृत्यु के पश्चात् खुशहाल सिंह उसका उत्तराधिकारी बना.
  • 1796 में खुशहाल सिंह का उत्तराधिकार बुधसिंह ने सम्भाला.
  • इस मिस्त का अधिकृत क्षेत्र सतलुज के पूर्व और पश्चिम की ओर फैला था.
  • जालंधर और पट्टी इस मिस्त के महत्वपूर्ण स्थान थे.
  • 1836 में रणजीतसिंह ने इस मिस्त को अपने राज्य में मिला लिया.

(2) आहलुवालिया मिस्ल 

  • इस मिस्ल का संस्थापक जस्सा सिंह आहलुवालिया था.
  • 1738 में यह मिस्ल प्रसिद्धि में आई.
  • 1748 में जस्सा सिंह ‘दल खालसा‘ का नेता चुना गया.
  • 1753 में कपूर सिंह की मृत्यु के पश्चात् जस्सा सिंह समस्त सिक्ख जाति का नेता बन गया तथा “सुलतान-उल-कौम कहलाया जाने लगा.
  • 1783 में जस्मा सिंह की मृत्यु के बाद भाग सिंह उसका उत्तराधिकारी बना.
  • 1801 में फतह सिंह ने भाग सिंह का उत्तराधिकार सम्भाला.
  • 1837 में निहाल सिंह ने फतह सिंह का स्थान लिया.
  • निहाल सिंह के वंशज कपूरथला रियासत के पैप्सू राज्य में मिलाये जाने तक वहां राज्य करते रहे.

(3) भंगी मिस्ल 

  • सरदार हरि सिंह ने भंगी मिस्ल की स्थापना की.
  • यह मिस्ल क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ी थी.
  • हरि सिंह के बाद झण्डा सिंह इस मिस्ल का सरदार बना.
  • 1774 में उसकी हत्या के बाद उसके भाई गंडा सिंह ने उसका उत्तराधिकार संभाला.
  • 1782 में उसकी मृत्यु के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने इस मिस्ल को अपने राज्य में मिला लिया.

(4) रामगढ़िया मिस्ल

  • इस मिस्ल की स्थापना जस्सा सिंह इच्छोगिलिया ने की थी.
  • 1803 में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र जोध सिंह उसका उत्तराधिकारी बना.
  • 1814 में जोध सिंह की मृत्यु के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने इस मिस्ल को अपने राज्य में मिला लिया.

(5) कन्हिया मिस्ल

  • इस मिस्ल की स्थापना जय सिंह ने की.
  • उसकी मृत्यु के पश्चात् इसकी सत्ता सदाकौर ने संभाली.
  • कालान्तर में महाराजा रणजीत सिंह ने इस मिस्ल को भी अपने राज्य में मिला लिया.

(6) सुकरचकिया मिस्ल

  • चरत सिंह इस मिस्ल का संस्थापक था.
  • 1774 में उसकी मृत्यु के बाद महा सिंह उसका उत्तराधिकारी बना.
  • 1798 में उसकी मृत्यु के बाद रणजीत सिंह उसका उत्तराधिकारी बना.
  • कालान्तर में रणजीत सिंह ने ही पंजाब में सतलुज के दूसरे पार के सब सरदारों को हराकर एक शक्तिशाली सिक्ख राज्य की नींव डाली.

(7) फुलकियाँ मिस्ल

  • इस मिस्ल की स्थापना चौधरी फूल ने की.
  • 1696 से 1765 के काल में बाबा आला सिंह के नेतृत्व में इस मिस्ल का यश और शक्ति बहुत बढ़ गयी.
  • 1765 में अहमदशाह अब्दाली ने आला सिंह को “नगाड़ा और निशान (ध्वज)” राज्योचित चिन्ह प्रदान किए.
  • 1765 में आला सिंह की मृत्यु के बाद अमर सिंह ने उसका उत्तराधिकार सम्भाला .
  • उसने इतनी शक्ति अर्जित की कि अहमदशाह अब्दाली ने उसे “राज, राजगान बहादुर” की पदवी प्रदान की.
  • अमरसिंह का उत्तराधिकारी साहिब सिंह बना .
  • कालान्तर में इस मिस्ल ने ईस्ट इंडिया की कम्पनी का संरक्षण स्वीकार किया.

(8) डल्लेवालिया मिस्ल

  • गुलाब सिंह ने इस मिस्ल की स्थापना की थी.
  • इस मिस्ल का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति तारा सिंह घेबा था.
  • उसकी मृत्यु के बाद रणजीत सिंह ने इस मिस्त को अपने राज्य में मिला लिया .

(9) निशानवालिया मिस्ल

  • इस मिस्ल को संगत सिंह और मोहर सिंह ने स्थापित किया था.
  • यह एक छोटी सी मिस्ल थी .
  • अम्बाला और शाहावाद इसके महत्वपूर्ण क्षेत्र थे.
  • कालान्तर में यह मिस्ल ईस्ट इंडिया कम्पनी के संरक्षण में चली गई.

(10) करोड़ सिंधिया मिस्ल

  • इस मिसल का नाम “पंचगढ़िया” मिस्ल भी था.
  • बधेल सिंह के नेतृत्व में इस मिस्ल ने ख्याति प्राप्त की.

(11) शहीद मिस्त

  • इसे निहंग मिस्त भी कहते थे.
  • यह मिस्ल उन सिक्खों द्वारा स्थापित की गई थी जिन्हें मुसलमानों ने धार्मिक मतान्धता के कारण मरवा डाला था.
  • सरदार करमसिंह और गुरबख्श सिंह इस मिस्ल के अन्य नेता थे.

(12) नक्कई मिस्ल 

  • सरदार हीरा सिंह इस मिस्ल के संस्थापक थे.
  • 1766 में नाहर सिंह ने हीरा सिंह का उत्तराधिकार सम्भाला.
  • 1769 में नाहर सिंह की आकस्मिक मृत्यु के बाद राम सिंह ने उसका उत्तराधिकार सम्भाला.
  • 1807 में महाराजा रणजीत सिंह ने इस मिस्ल को अपने राज्य में मिला लिया.

इन मिस्तों के संबंध में यह बात विशेष महत्व रखती है कि इनमें से अधिंकाश मिस्लों को महाराजा रणजीत सिंह ने अपने राज्य में मिलाया तथा शेष बची हुई मिस्लें ईस्ट इंडिया कम्पनी के संरक्षण में चली गई.

 

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Tuesday, October 16, 2018

मराठा शक्ति का अभ्युदय छत्रपति शिवाजी महाराजा (Rise of The Great Marathas)

मराठा शक्ति का अभ्युदय छत्रपति शिवाजी महाराजा (Rise of The Great Marathas)

मराठा शक्ति – छत्रपति शिवाजी

  • 17वीं शताब्दी में मराठा शक्ति का उदय एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी.
  • इस शक्ति ने दक्षिण में मुगल सम्राट औरंगजेब के प्रसार पर रोक लगाई.
  • इस शक्ति में विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद हिन्दू साम्राज्य की पुर्नस्थापना के प्रयत्न की अंतिम झलक भी दिखाई पड़ी.
  • यद्यपि मराठा शक्ति के उदय और विकास का अधिकांश श्रेय छत्रपति शिवाजी महाराजा को दिया जाता है तथापि इस संबंध में अनेक भौगोलिक, धार्मिक एवं साहित्यिक कारकों का भी विशेष महत्व है.

मराठा शक्ति का अभ्युदय छत्रपति शिवाजी महाराजा (Rise of The Great Marathas)

संक्षेप में ये कारक निम्नलिखित

भौगोलिक कारक

  • मराठा शक्ति के उदय के लिए महाराष्ट्र की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति मुख्य रूप से उत्तरदायी थी.
  • इस प्रदेश के उत्तर से दक्षिण तक सहयाद्रि पर्वतमालाएं और पूर्व से पश्चिम तक सतपुड़ा एवं विंध्य पर्वत श्रेणियां विस्तृत हैं.
  • ये पर्वतमालाएं मराठों की बाह्य आक्रमणों से रक्षा करती थी.
  • इस कारण मराठा लोग एक निर्भीक और साहसी सैनिक बन सके.
  • महाराष्ट्र प्रदेश में वर्षा की कमी और जीवन यापन की कठिनाइयों ने मराठों को कठोर परिश्रमी और आत्मविश्वासी बना दिया.
  • पर्वतीय प्रदेश के कारण ही मराठे छापामार युद्ध नीति सफलता से अपना सके.
  • इसके अलावा बीच-बीच से टूटी हुई पर्वत श्रृंखलाएं उनके लिए सुगम प्राकृतिक दुर्गों का काम करती थी.

भक्ति आन्दोलन

  • ज्ञानेश्वर हेमाद्रि और चक्रधर से लेकर एकनाथ, तुकाराम और रामदास तक, महाराष्ट्र के सभी संतों और दार्शनिकों ने इस बात पर बल दिया कि सभी मनुष्य परमपिता ईश्वर की संतान हैं और इस कारण समान हैं.
  • इन संतों ने जाति प्रथा का विरोध किया और समाज की एकता पर बल दिया.
  • ये संत स्थानीय मराठी भाषा में ही उपदेश देते थे.
  • इससे इस भाषा को अपेक्षित गौरव प्राप्त हुआ तथा इस भाषा के साहित्य को भी प्रोत्साहन मिला.
  • अतएव भक्ति आन्दोलन से एक विशिष्ट मराठा पहचान उभर कर सामने आयी जिसने यहां के लोगों को एकता एवं लक्ष्य की भावना से प्रेरित किया.

साहित्य और भाषा

  • मराठी साहित्य और भाषा ने भी मराठो के संगठन में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
  • सन्त तुकाराम के पद बिना भेदभाव के सब श्रेणी के लोगों द्वारा गाए जाते थे.
  • इस प्रकार धार्मिक साहित्य ने लोगों के मध्य परोक्ष रूप से एकता स्थापित की.
  • सर यदुनाथ सरकार के मत में –

“छत्रपति शिवाजी द्वारा किए गए राजनीतिक संगठन से पूर्व ही महाराष्ट्र में एक भाषा, एक रीति-रिवाज और एक ही प्रकार के समाज का निर्माण हो चुका था. इसमें जो कमी रह गई थी वह शिवाजी और उनके पुत्रों के दिल्ली के आक्रमणकारियों से संघर्ष, पेशावाओं के अन्र्तगत मराठा साम्राज्य की उन्नति और एक राष्ट्रीय समाज की स्थापना ने पूरी कर दी.”

शासन एवं युद्ध कला का पूर्व अनुभव

  • छत्रपति शिवाजी के प्रादुर्भाव से पहले ही मराठे शासन कला और युद्ध कला में शिक्षा पा चुके थे.
  • यह महत्वपूर्ण शिक्षा मराठों को दक्षिण के मुस्लिम राज्यों से प्राप्त हुई.
  • मराठे इन राज्यों के राजस्व विभाग में सेवारत थे.
  • शाहजी भोसले, मुशर राव, मदन पंडित और “राज-राय'” परिवार के कितने ही सदस्यों ने इन मुस्लिम राज्यों में सूबेदार, मंत्री और शासन में जो शिक्षा मराठों ने प्राप्त की उसने मराठों को शिक्षित, धनवान और शक्तिशाली बनाया.
  • यथार्थ में गोलकुण्डा, बीदर और बीजापुर के नाममात्र के मुसलमान शासक अपने सैनिक और असैनिक दोनों ही विभागों की कुशलता के लिए मराठा सरदारों पर निर्भर थे.

छत्रपति शिवाजी महाराजा

  • मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी का जन्म सन् 1627 में हुआ.
  • छत्रपति शिवाजी के पिता का नाम शाहजी भोसले तथा माता का नाम जीजाबाई था.
  • शाहजी भोसले का अहमदनगर और बीजापुर से राजनीतिक संघर्ष में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान था.
  • जीजाबाई देवगिरि के महान् जागीरदार यादवराव की पुत्री थी.
  • स्वभाव से वे बड़ी ही धार्मिक थीं.
  • अपने पुत्र शिवाजी के चरित्र निर्माण में उनका बड़ा ही महत्वपूर्ण हाथ था.
  • जीजाबाई अपने पुत्र को बाल्यकाल से ही रामायण, महाभारत तथा अन्य प्राचीन काल के हिन्दू वीरों की कथा और कहानियाँ सुनाया करती थीं.
  • माता जीजाबाई ने अपने जीवन और शिक्षा के द्वारा अपने पुत्र शिवाजी को हिन्दुओं की तीन परम पवित्र वस्तुओं यथा-ब्राह्मण, गाय और नारी जाति की रक्षा के लिए प्रेरित किया.
  • माता जीजाबाई के अलावा दादोजी कोण्ड़देव का भी शिवाजी के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा.
  • दादोजी कोण्डदेव शिवाजी के पिता शाहजी भोसले की पूना की जागीर के प्रशासक थे.
  • उन्होंने शिवाजी को अपने पुत्र के समान स्नेह और शिक्षा दी.
  • उन्होंने शिवाजी को घुड़सवारी और तलवार चलाना सिखाया.
  • दादोजी कोण्डदेव ने ही शिवाजी को शासन-कला में भी निपुण किया.
  • धार्मिक संत गुरु रामदास और संत तुकाराम का भी छत्रपति शिवाजी के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा.
  • अतएव छत्रपति शिवाजी ने उच्च एवं विशिष्ट शिक्षा-दीक्षा के बाद अपने व्यवहारिक जीवन में पदार्पण किया.

छत्रपति शिवाजी की विजयें

  • छत्रपति शिवाजी का विजय और प्रगति का जीवन 19 वर्ष की अल्पायु से ही आरंभ हो गया.
  • 1646 में उन्होंने बीजापुर रियासत में फैली अव्यवस्था का लाभ उठाकर तोरण के किले पर अधिकार कर लिया.
  • इसके बाद छत्रपति शिवाजी ने रायगढ़ के किले को जीतकर उसका जीर्णोद्धार किया.
  • उन्होंने अपने चाचा सम्भाजी मोहते से सूपा का किला जीता.
  • दादोजी कोण्ड़देव के देहान्त के बाद शिवाजी ने अपने पिता शाहजी भोसले की सारी जागीर पर अधिकार कर लिया.
  • छत्रपति शिवाजी की निरन्तर बढ़ती शक्ति से शंकित होकर बीजापुर के नवाब ने शिवाजी का दमन करने की एक योजना तैयार की.
  • इसी बीच छत्रपति शिवाजी ने कोंकण के मुख्य प्रदेश कल्याण पर अधिकार कर लिया.
  • शिवाजी के इस कृत्य ने बीजापुर के नवाब को और अधिक रुष्ट कर दिया.
  • नवाब ने शिवाजी की चुनौती का प्रत्युत्तर देते हुए उनके पिता शाहजी भोसले को बीजापुर दरबार से अपमानित कर पदच्युत कर दिया और उनकी जागीरें जब्त कर लीं .
  • इस घटना के बाद शिवाजी के छापामार युद्ध कुछ समय तक बन्द रहे.

बीजापुर से संघर्ष, (1657-62 ई.)

  • 1656 में बीजापुर के नवाब मोहम्मद आदिलशाह की मृत्यु के बाद उसका 18 वर्षीय पुत्र गद्दी पर बैठा.
  • दक्षिणी के तत्कालीन राज्यपाल औरंगजेब ने इस अवसर का लाभ उठाकर 1657 में मीर जुमला की सहायता से बीदर, कल्याणी और पुरन्दर के किलों पर अधिकार कर लिया.
  • किन्तु इसी समय शाहजहां की बीमारी की सूचना पाकर औरंगजेब तत्काल उत्तर की ओर रवाना हो गया.
  • औरंगजेब के वापस चले जाने के कारण बीजापुर को मुगलों का भय नहीं रहा.
  • अब उनका मुख्य शत्रु शिवाजी था.
  • अतएव अफजलखाँ के नेतृत्व में एक बड़ी सेना का संगठन किया गया.
  • इस सेना को शिवाजी को जीवित या मृत पेश करने की आज्ञा दी गई.
  • अफजलखाँ ने बहुत ही चालाकी से शिवाजी की हत्या की योजना बनाई किन्तु वह उसमें सफल न हो सका.
  • छत्रपति शिवाजी ने बहुत चतुराई से अफजलखाँ की हत्या कर दी.
  • अफजलखाँ की हत्या के तुरंत बाद पहले से ही तैयार खड़ी मराठा सेना मुसलमान सेना पर टूट पड़ी और बड़ी ही निर्दयता से उसका संहार कर दिया.
  • अफजलखाँ की शक्ति को कुचल कर शिवाजी ने पन्हाला के दक्षिण के प्रदेश पर अधिकार कर लिया.
  • इसके बाद बीजापुर के नवाब ने शिवाजी की शक्ति को कुचलने के लिए अनेक बार सेना भेजी तथा अंतिम बार स्वयं सेना का नेतृत्व किया और एक अनिर्णायक युद्ध लड़ा.

छत्रपति शिवाजी और मुगल

  • मुगल सम्राट औरंगजेब ने 1660 में शाइस्ताखाँ को दक्षिण का राज्यपाल नियुक्त किया.
  • शाइस्ताखाँ ने छत्रपति शिवाजी का दमन करने के लिए अनेक असफल प्रयास किए और आखिर में तंग आकर विश्राम हेतु कुछ समय पूना में व्यतीत करने का फैसला किया.
  • अप्रैल, 1663 में शिवाजी ने धोखे से पूना में शास्ताखाँ के निवास स्थान पर आक्रमण कर दिया.
  • शाइस्ताखाँ को इस हमले का आभास न था.
  • छत्रपति शिवाजी ने शाइस्ताखाँ पर वार किया जिससे उसका अंगूठा कट गया.
  • शाइस्ताखाँ के पुत्र की हत्या कर दी गई.
  • दिसम्बर, 1663 में शाइस्ताखाँ को दक्षिण से बंगाल में स्थानांतरित कर दिया गया.

सूरत पर आक्रमण (1664)

  • 1664 में छत्रपति शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण किया और भयंकर लूट-पाट की.
  • अंग्रेजी और डच कम्पनियां अपनी रक्षा करते हुए लूट से बच गए.

राजा जयसिंह और शिवाजी

  • औरंगजेब ने मार्च, 1665 में राजा जयसिंह को दक्षिण की बागडोर सौंपी.
  • राजा जयसिंह ने छत्रपति शिवाजी को चारों ओर से घेर लिया.
  • छत्रपति शिवाजी को राजधानी रायगढ़ भी संकट में पड़ गई.
  • अतएव शिवाजी ने राजा जयसिंह से संधि करने में अपनी भलाई सोची.
  • इस प्रकार जून, 1665 में पुरन्दर की संधि अस्तित्व में आई.
  • इस संधि के अनुसार शिवाजी ने 23 किले मुगलों को देकर मात्र 12 किले अपने अधिकार में रखे.
  • शिवाजी के पुत्र सम्भाजी को मुगल दरबार में “पांचहजारी मनसब” बनाकर एक जगीर दे दी गई.
  • इसके अलावा शिवाजी ने यह भी स्वीकार किया कि दक्षिण के युद्धों में वे औरंगजेब का साथ देंगे, किन्तु शिवाजी किसी भी स्थिति में मुगल दरवार में हाजिर होने के लिए तैयार न थे.
  • राजा जयसिंह ने बहुत चतुराई से शिवाजी को मुगल दरबार में हाजिर होने के लिए तैयार कर लिया.

छत्रपति शिवाजी की आगरा भेट 

  • छत्रपति शिवाजी और उनका पुत्र सम्भाजी मई, 1666 में आगरा पहुंचे.
  • किन्तु मुगल सम्राट से जिस स्वागत की उन्हें आशा थी, वह उन्हें नहीं मिला.
  • शिवाजी का स्वागत करने के बजाए उन्हें बंदी बना लिया गया.
  • लेकिन शिवाजी ने धैर्य नहीं छोड़ा.
  • वे आगरा से भाग निकलने का उपाय सोचने लगे.
  • उन्होंने बीमारी का बहाना बनाया और गरीब लोगों में बांटने के लिए मिठाई और फलों के टोकरे भेजने शुरू कर दिए.
  • एक दिन मौका देखकर वे इन टोकरों में स्वयं बैठकर आगरा से भाग गए और शीघ्र ही पुनः महाराष्ट्र पहुंच गए.

छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक 

  • मुगलों में अब इतनी शक्ति न रही कि वे छत्रपति शिवाजी का दमन कर सके.
  • 1668 से 1669 तक का समय शिवाजी ने अपने आन्तरिक प्रशासन को सुगठित करने में व्यतीत किया.
  • 1670 में शिवाजी ने दूसरी बार सूरत में भारी लूट-पाट की.
  • 1672 में मराठों ने सूरत से चौथ वसूल की.
  • 1674 तक मराठों ने दक्षिण में मुगलों की सत्ता को पूर्णतया समाप्त कर दिया.
  • 1674 में शिवाजी ने रायगढ़ में वैदिक रीति के अनुसार अपना राज्याभिषेक करवाया.
  • उन्हें सारे महाराष्ट्र का एकमात्र छात्राधिपति घोषित किया गया.
  • इसी समय एक नया संवत् भी चलाया गया.
  • 1680 तक शिवाजी ने जिंजी, वेलूर और अन्य महत्वपूर्ण किलों पर भी अधिकार कर लिया.

छत्रपति शिवाजी की मृत्यु

  • 1680 में छत्रपति शिवाजी की मृत्यु हो गई.
  • उनकी मृत्यु के समय मराठा साम्राज्य पश्चिमी घाट से लेकर कल्याण और गोआ के बीच के कोंकण प्रदेश और पर्वतीय प्रदेश के कुछ पूर्वी जिलों तक फैला हुआ था.
  • दक्षिण में कर्नाटक के पश्चिम में बेलगाँव से तुंगभद्रा के तट तक मद्रास प्रेजीडेन्सी के विलारी जिले तक फैला हुआ था.

छत्रपति शिवाजी की शासन व्यवस्था

  • शिवाजी भी अपने समकालीन शासकों की भांति एक स्वेच्छाचारी शासक थे.
  • वे जो कहते थे कर सकते थे, परन्तु उन्हें सलाह देने के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद् थी.
  • यह परिषद् “अष्टप्रधान” के नाम से प्रसिद्ध थी.
  • इस परिषद् के आठ मंत्री निम्नलिखित थे–

अष्टप्रधान

(1) पेशवा अथवा प्रधानमंत्री

  • इसका कार्य सारे राज्य की देखभाल और उन्नति का ध्यान रखना था.

(2) अमात्य अथवा वित्त मंत्री

  • इसका कार्य सारे राज्य और मुख्य-मुख्य जिलों के हिसाब-किताब की पड़ताल करना और उसे सही करना था.

(3) मंत्री अथवा इतिहासकार 

  • इसका कार्य दरबार की ओर राज्य की दैनिक कार्यवाही को लिखना था.
  • इसे “वाकयानवीस’ भी कहा जाता था.

(4) सामंत या दबीर

  • इसे विदेशमंत्री भी कहा जाता था.
  • इसका कार्य विदेशी राज्यों के विषय में तथा युद्ध और शांति के सब मामलों में राजा को सलाह देना था.

(5) सचिव अथवा शरु-नवीस

  • इसे गृहमंत्री भी कहा जाता था.
  • इसका कार्य राजा के पत्र-व्यवहार को संभालना था.

(6) पण्डित राव

  • इसे दानाध्यक्ष, सदर मोहतासिब अथवा धर्माधिकारी के नाम से संबोधित किया जाता था.
  • इसका कार्य धार्मिक संस्कारों की तिथि नियत करना, अफवाह फैलाने वाले को दण्ड देना और ब्राह्मणों में दान का वितरण करना था.

(7) न्यायाधीश

  • इसका कार्य नागरिक और सैनिक मामलों के संबंध में न्याय करना था.

(8) सेनापति अथवा सरे-नौबत

  • इसका काम सैनिकों की भर्ती, सेना का प्रबन्ध और अनुशासन बनाए रखना था.

इन आठों मंत्रियों के संबंध में यह उल्लेखनीय है कि न्यायाधीश और पंडित राव को छोड़कर सभी मंत्रियों को सैनिक कार्यों और आक्रमणों में भाग लेना होता था.

प्रान्तीय शासन

  • शिवाजी ने अपने राज्य को सूबों में बांटा हुआ था.
  • प्रत्येक सूबे के लिए अलग-अलग राज्यपाल नियुक्त किए गए थे.
  • इन सूबों को अनेक जिलों में बांटा गया था.
  • जागीर प्रदान करने की प्रथा समाप्त कर दी गई.
  • पारितोषिक के रूप में नकद धन राशि दी जाने लगी.
  • कोई भी पद वंशाधिकार की प्रथा के अनुसार स्थापित नहीं था.

सैनिक प्रशासन

  • शिवाजी ने एक सुसंगठित और शक्तिशाली सेना तैयार की.
  • मराठों में यह परम्परा थी कि वे वर्ष का आधा समय तो खेतीबाड़ी करने में लगाते और आधा समय युद्ध में.
  • किन्तु शिवाजी ने इस प्रथा को समाप्त कर सदा तैयार रहने वाली सेना का संगठन किया.
  • सैनिकों को पूरे वर्ष नकद वेतन दिया जाता था.
  • शिवाजी का सैन्य संगठन इस प्रकार था घुड़सवार सेना में 25 हवलदारों का एक “घट’ होता था.
  • 25 पैदल सैनिकों पर एक हवलदार होता था.
  • पांच हवलदारों पर एक जुमलादार होता था.
  • दस जुमलादारों पर एक हजारी होता था.
  • अन्य उच्च पद पांच हजारी और घुड़सवार सेना का सरे-नौबत या सेनापति होता था.
  • प्रत्येक 25 पैदल सैनिकों के लिए एक रसोईया और एक पनिहारा होता था.
  • सवार सेना दो भागों में बंटी हुई थी-बरगीर और सिलेदार.
  • हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही बिना भेदभाव के सेना में भर्ती किए जाते थे.
  • सैन्य व्यवस्था में दुर्गों का महत्वपूर्ण स्थान था.
  • प्रत्येक किले (दुर्ग) में एक ही स्तर के तीन अधिकारी रखे जाते थे.
  • ये अधिकारी थे-हवलदार, सबनीस और सरे-नौबत.
  • शिवाजी ने एक महत्वपूर्ण समुद्री बेड़े का निर्माण करवाया था जो कोलाबा में रहा करता था.
  • स्त्रियों को सेना के साथ जाने की आज्ञा नहीं थी.
  • शत्रुओं की स्त्रियों और बच्चों की रक्षा करने का आदेश दिया गया था.

राजस्व व्यवस्था

  • शिवाजी ने गोंवों के हिसाब से कर लगाने की प्रथा को समाप्त कर दिया.
  • राजस्व-वसूली के सन्दर्भ में सरकार और किसानों का प्रत्यक्ष सम्बन्ध था.
  • समस्त उपजाऊ भूमि की “काठी’ (मापने वाली लठ) से अच्छी तरह नाम-तौल करवाई जाती थी.
  • पैदावार में राज्य को भाग 30 प्रतिशत था.
  • अन्य करों को हटाए जाने के पश्चात् यह भाग 40 प्रतिशत कर दिया गया.
  • किसान राजस्व को अपनी इच्छानुसार नकद अथवा अनाज के रूप में दे सकता था.
  • राज्य की ओर से कृषि को प्रोत्साहन भी दिया जाता था.
  • शिवाजी ने “चौथ’’ और ‘सरदेशमुखी‘ की प्रणाली भी लागू की.
  • डा. सेन का मत है कि-

“चौथ वह धन था जिसे सेनापति सिंचित प्रदेशों से वसूल करते थे. तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार इस प्रकार की वसूली उपयुक्त भी थी.”

  • सिद्धांत रूप से चौथ मराठों द्वारा जीते गए प्रदेश की कुल आय का चौथाई भाग था.
  • सरदेशमुख बहुत से देखमुखों अथवा देसाइयों के ऊपर का अधिकारी होता था.
  • उसको सेवा के रूप में दिया जाने वाला धन ‘सरदेशमुखी कहलाता था.

न्याय प्रशासन

  • प्राचीन कालीन न्याय व्यवस्था प्रचलित थी.
  • कोई सामान्य नियम अथवा न्यायालय नहीं थे.
  • ग्रामों में पंचायतें ही झगड़ों का निपटारा करती थीं .
  • फौजदारी के मुकदमें पटेल सुना करता था.
  • फौजदारी और दीवानी दोनों प्रकार के मुकदमों में “स्मृतियों” (मनुस्मृति आदि) के आधार पर न्याय किया जाता था.
  • हाजिरे मजलिस अपील का अंतिम न्यायालय था.

छत्रपति शिवाजी का मूल्यांकन

  • छत्रपति शिवाजी एक महान् और कर्मठ व्यक्ति थे.
  • वे एक मुसलमान राज्य के छोटे से जागीरदार के पुत्र के स्थान से छत्रपति के सिंहासन पर बैठे.
  • उन्होंने घोर संकटों का सामना करते हुए मराठों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित किया.
  • वे राजनीति और शासन-विज्ञान में अनुपमेय थे.
  • वे यद्यपि बड़े ही धार्मिक मनोवृत्ति के पुरुष थे, तथापि मतान्ध नहीं थे.
  • उनका नागरिक और सामारिक शासन कुशलता की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ था.
  • शिवाजी न केवल मराठा जाति के निर्माणकर्ता थे, अपितु वे मध्यकालीन भारत के निर्माणकर्ता भी थे.

छत्रपति शिवाजी और हिन्दू साम्राज्य

  • सरदेसाई का मत है कि छत्रपति शिवाजी का लक्ष्य केवल महाराष्ट्र के हिन्दुओं को ही स्वतंत्र करवाना नहीं था, अपितु सारे देश के विभिन्न कोनों में रहने वाले हिन्दुओं को मुक्त करवाना था.
  • छत्रपति शिवाजी के देहान्त के बाद मराठों ने उनके आदर्शों और आकांक्षाओं का यही अर्थ लगाया.
  • छत्रपति शिवाजी द्वारा चौथ और सरदेशमुखी लगाना भी इसी योजना का विस्तार मात्र समझा गया.
  • किन्तु अन्य इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं हैं.
  • उनके मत में शिवाजी ने छत्रसाल बुन्देला की सहायता स्वीकार न करके यह सिद्ध किया कि वे सम्पूर्ण भारत में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना का प्रयास नहीं कर रहे थे.

छत्रपति शिवाजी के शासन प्रबन्ध की कमजोरी

  • शिवाजी द्वारा भरसक प्रयत्न करने के बावजूद उनका साम्राज्य दीर्घजीवी नहीं हुआ.
  • वास्तव में उनका साम्राज्य अलाउद्दीन खिलजी और रणजीत सिंह की भांति एक सैनिक संगठन था, जो उनकी मृत्यु के थोड़े समय बाद ही नष्ट हो गया.
  • बाबर की भांति शिवाजी का राज्यकाल बहुत ही थोड़ा रहा और यह सारा समये युद्ध करते बीता.
  • अतः वे अपनी शक्ति को संचित नहीं कर पाए.
  • इसके अलावा महाराष्ट्र निवासियों को शिक्षित करने और उनका सैनिक उत्थान करने का कोई दूरदर्शितापूर्ण प्रयास नहीं किया गया.
  • जनसाधारण का अज्ञान मराठा जाति की उन्नति में एक बड़ी भारी बाधा थी.

छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारी

सम्भाजी (1680-89)

  • शिवाजी की मृत्यु के पश्चात् उनका ????? और ?????? पुत्र सम्भाजी सिंहसन पर बैठा. 
  • उसमें शासन करने की योग्यता का नितांत अभाव था. (SRweb इतिहासकारों के इन कथनो का खंडन करता है और निवेदन करता है की इन तथ्यो पर पुनर्विचार करे )
  • औरंगजेब ने उसकी इस स्थिति का लाभ उठाकर बीजापुर और गोलकुण्डा को जीत मराठों का दमन करने का निश्चय किया.
  • मुगल सेनापति मुकर्रब खाँ ने संगमेश्वर से सम्भाजी व उनके सम्बन्धियों को बंदी बना लिया.
  • मार्च, 1689 में उनकी हत्या कर दी गई.
  • किन्तु उनकी गिरफ्तारी और हत्या का मराठों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा.
  • वे मुगालों के विरुद्ध पुनः संगठित हो गए.

राजाराम (1689-1700)

  • राजाराम में भी अपने पिता शिवाजी के जैसी नेतृत्व शक्ति और साहस का नितांत अभाव था.
  • किन्तु सौभाग्यवश रामचंद्र पंत और प्रह्लाद मीरा जी जैसे असाधारण योग्य पुरुष उसके सलाहकार थे.
  • राजाराम को अफीम खाने की लत थी और वह निराशावादी भी था, किन्तु उसमें योग्य मंत्री चुनने की प्रतिभा थी और वह उन पर विश्वास भी करता था.
  • यही उसकी सफलता का मूलमंत्र था.
  • 1698 में मराठों ने जिंजी के महत्वपूर्ण किले पर अधिकार कर लिया.

ताराबाई (1700-1707)

  • राजाराम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कर्ण सिंहासन पर बैठा, किन्तु उसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गई.
  • राजाराम की पत्नी ताराबाई अपने दूसरे पुत्र शिवाजी द्वितीय की गद्दी पर बैठाकर स्वयं उसकी संरक्षक बन गई.
  • ताराबाई की राजकाज में बड़ी रुचि थी और सैन्य संगठन के विषय में भी उसे पर्याप्त ज्ञान था.
  • उसके शासनकाल में मराठों की शक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती गई.
  • ताराबाई को राजकार्य में परशुराम त्रम्बल, धनजी यादव और शंकरजी नारयण सहायता करते थे.
  • मराठों ने दक्षिण के छह सूबों को आपस में बांट लिया और उनमें मुगल प्रणाली के अनुसार राज्यपाल (सूबेदार), कमाईशदार (राजस्व एकत्र करने वाला) और राहदार (चुंगी लेने वाला) इत्यादि नियुक्त किए.
  • औरंगजेब अपने सम्पूर्ण प्रयत्नों के बावजूद मराठों के अदम्य उत्साह और भावनाओं को नष्ट नहीं कर पाया.

साहू (1707-1749)

  • औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगलों ने मराठों में फूट डालने का प्रयत्न किया.
  • 1707 में साहू को मुगल कैद से मुक्त कर दिया गया.
  • साहू ने मुक्त होकर ताराबाई से मराठा राज्य की मांग की, किन्तु ताराबाई ने यह घोषणा की कि राज्य उसके पति राजाराम ने स्थापित किया था.
  • अतः शिवाजी द्वितीय ही उसका असली उत्तराधिकारी है.
  • ताराबाई की इस घोषणा से मराठों के दो दल हो गए और उनमें संघर्ष आरंभ हो गया.
  • ताराबाई ने धन्नाजी के सेनापतित्व में साहू की शक्ति को कुचलने के लिए एक सेना भेजी.
  • इस सेना और साहू के मध्य 1709 में खेड़ का युद्ध हुआ.
  • इस युद्ध में ताराबाई पराजित होकर कोल्हापुर चली गई.
  • 1712 में शिवाजी द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका सौतेला भाई सम्भाजी कोल्हापुर की गद्दी पर बैठा.
  • उधर साहू ने सतारा की गद्दी सम्भाली.

1731 में बरणा में साहू और सम्भाजी की संधि हुई.

  • इस संधि के अनुसार दोनों ने आपस में कुछ प्रदेशों का बंटवारा किया तथा यह तय किया कि वे एक दूसरे के शत्रु को समाप्त करके समूचे मराठा राज्य की उन्नति के लिए कार्य करेंगे.
  • 1749 में साहू की मृत्यु हो गई.

रामराजा (1749-1777)

  • साहू का उत्तराधिकारी रामराजा बना.
  • शीघ्र ही ताराबाई और पेशवा बालाजी बाजीराव के मध्य सत्ता हथियाने के लिए होड़ प्रारंभ हो गई.
  • 24 नवम्बर, 1750 को ताराबाई ने रामराजा को कैद कर लिया.
  • 1763 में ताराबाई की मृत्यु के बाद ही रामराजा मुक्त हो सका.

साहू द्वितीय (1777-1808)

  • रामराजा की मृत्यु के बाद उसका दत्तक पुत्र साहू द्वितीय गद्दी पर बैठा.
  • नाना फड़नवीस ने उसको दिया जाने वाला भत्ता कम कर दिया तथा उसपर और उसके सम्बन्धियों पर बहुत से प्रतिबन्ध लगा दिए.
  • साहू द्वितीय नाममात्र का छत्रपति था.
  • उसका कार्य केवल यह रह गया था कि जब कोई नया पेशवा नियुक्त हो वह उसे शाही पोशाक बख्शे.

प्रतापसिंह (1808-1839)

  • 1808 में साहू द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र प्रतापसिंह गद्दी पर बैठा.
  • छत्रपति और पेशवा के संबंध इस समय तक इतने बिगड़ गए कि अनेक वार छत्रपति प्रतापसिंह को पेशवा के विरुद्ध अंग्रेजी सहायता प्राप्त करनी पड़ी.
  • 1818 में पेशवा के पतन के बाद अंग्रेजों ने प्रतापसिंह को पदासीन किया.
  • 25 सितम्बर, 1819 की संधि के बाद छत्रपति ने अपने राज्य की सम्प्रभुता अंग्रेजों के पास गिरवी रख दी.
  • कालान्तर में संबंध बिगड़ जाने के कारण 4 सितम्बर, 1839 को प्रतापसिंह को गद्दी से उतार दिया गया.

 

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