Wednesday, March 27, 2019

स्वतंत्रता की प्राप्ति और विभाजन (Achievement of Independence and Partition)

स्वतंत्रता की प्राप्ति और विभाजन (Achievement of Independence and Partition) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

युद्धोन्तर काल का संघर्ष (Post War Struggle)

  • अप्रैल, 1945 में यूरोप में युद्ध समाप्त होने के साथ ही भारत के स्वाधीनता संघर्ष ने एक नए चरण में प्रवेश किया.
  • 1942 के विद्रोह तथा आजाद हिंद फौज की मिसाल ने भारतीय जनता की बहादुरी और दृढ़ता को स्पष्ट कर दिया था.
  • राष्ट्रीय नेताओं के जेल से रिहा होने के बाद लोगों में नये उत्साह का संचार हुआ और वे स्वतंत्रता के लिए अन्तिम संघर्ष हेतु प्रतिबद्ध हो गये.

स्वतंत्रता की प्राप्ति और विभाजन (Achievement of Independence and Partition) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

आजाद हिंद फौज पर मुकदमा (INA Trial)

  • आजाद हिंद फौज के अधिकारियों और सैनिकों पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमें शुरू कर दिए, जिससे बहुत बड़ा आंदोलन शुरू हो गया.
  • इस मुकदमें के तीन प्रमुख अभियुक्त, (जो कि पूर्व में ब्रिटिश भारतीय आर्मी के अधिकारी भी रह चुके थे) शाह नवाज खान, गुरुदयाल सिंह ढिल्लन और प्रेम सहगल पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया.
  • उन्होंने पहले ब्रिटिश क्राउन के प्रति राज-भक्ति की शपथ खाई थी परन्तु आज ये देश-भक्त आतंकवादी बन चुके थे.
  • साथ ही देश की जनता ने इनका राष्ट्रीय हीरो के रूप में भव्य स्वागत किया.
  • इनके पक्ष में सर तेज बहादुर सप्रू , जवाहरलाल नेहरु, भोला भाई देसाई, के. एन. काटजू ने दलीलें दी, लेकिन फिर भी इन तीनों को फांसी की सजा सुनाई गई.
  • इस निर्णय से देश में कड़ी प्रतिक्रिया हुई. अन्त में लार्ड वेवल ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर इनकी फांसी की सजा को माफ कर दिया.
  • दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में आजाद हिंद फौज के इन तीनों अधिकारियों की सुरक्षा से लोगों में नए उत्साह का संचार हुआ.
  • यद्यपि आजाद हिंद फौज के अधिकारी दोषी पाये गए थे परन्तु उनके पक्ष में दी गई दलीलों के आधार पर उनकी सजा कम कर दी गई.

ब्रिटिश सरकार के दृष्टिकोण में परिवर्तन (Changed Attitude of British Government)

  • इसी बीच विभिन्न कारणों से ब्रिटिश सरकार के दृष्टिकोण में भी भारत के प्रति परिवर्तन हो चुका था.
  • इनमें पहला कारण था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में दो नई महा-शक्तियाँ अमेरिका और सोवियत संघ उभर कर सामने आयी थी.
  • दोनों ही भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में थे.
  • दूसरा कारण , इंग्लैण्ड में कंजरवेटिव पार्टी के स्थान पर लेबर पार्टी ने सरकार का गठन किया.
  • जिसके अधिकांश नेता भारतीय स्वतंत्रता के पक्षधर थे.
  • तीसरा कारण , यद्यपि, ब्रिटेन द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी रहा था, परन्तु लगातार छः साल तक युद्ध में खून बहाने के बाद उसके सैनिक भारत में स्वतंत्रता संघर्ष को रोकने में अब और खून बहाना नहीं चाहते थे.
  • चतुर्थ कारण , ब्रिटिश भारतीय सरकार और लम्बे समय तक भारतीय लोगों के प्रशासनिक कार्यों में विश्वास नहीं कर सकती थी तथा राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने से भारतीय सैनिकों को भी नहीं रोक सकती थी.
  • अन्तिम कारण , उपरोक्त सभी कारणों के अतिरिक्त देशवासी अब और ब्रिटिश शासकों को शासन करते नहीं देखना चाहते थे.
  • 1945-46 के काल में सम्पूर्ण देश में बहुत बड़ी मात्रा में हड़तालें, तनाव, प्रदर्शन, व्याकुलता का माहौल व्याप्त था.
  • पूरे देश में श्रमिक वर्ग में अशान्ति व्याप्त थी.
  • उद्योगों में हड़ताले लगातार जारी थी.
  • जुलाई 1946 में डाक और तार विभाग ने अखिल भारतीय स्तर पर हड़ताल शुरू कर दी.
  • अगस्त, 1946 में दक्षिणी भारत में रेलवे कर्मचारी हड़ताल पर चले गए.
  • इस समय अधिकतर किसान आंदोलनों ने उग्रवाद का रूप ले लिया था.
  • हैदराबाद, मालाबार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में भूमि से संबंधित ऊंचे करों व बहुत से अन्य कारणों से आंदोलन जोरों पर था.

सी. आर. फार्मूला (C. R. Formula)

  • सरकार को यह बात स्पष्ट हो गई थी कि बिना मुस्लिम लीग की सहमति के भारत की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता.
  • राजगोपालाचारी जो कि कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग में समझौते के पूर्ण पक्षधर थे, ने इन दोनों के बीच समझौते के लिए एक योजना प्रस्तुत की.
  • गांधीजी ने जिन्ना को मनाने के अनेक प्रयत्न किए और बम्बई में 1944 में 9 से 13 सितम्बर तक दोनों के बीच लम्बी बातचीत हुई.
  • सी. आर. फार्मूले के अनुसार गांधीजी ने पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर लिया.
  • इस फार्मूले के अनुसार, मुस्लिम लीग भारतीय स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे और अस्थायी सरकार के गठन में कांग्रेस के साथ सहयोग करे.
  • द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर भारत के उत्तर-पश्चिम व पूर्वी भागों में स्थित मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण करने के लिए एक कमीशन नियुक्त किया जाए, फिर वयस्क मताधिकार प्रणाली के आधार पर इन क्षेत्रों के निवासियों की मतगणना करके भारत से उनके सम्बन्ध–विच्छेद के प्रश्न का निर्णय किया जाय.
  • मतगणना से पूर्व सभी राजनीतिक दलों को अपने दृष्टिकोण के प्रचार की पूर्ण स्वतंत्रता हो.
  • देश विभाजन की स्थिति में रक्षा, यातायात या अन्य अनिवार्य विषयों पर आपसी समझौते की व्यवस्था की जाए.
  • जिन्ना ने इस फार्मूले को अस्वीकार कर दिया तथा अपनी बिना किसी समझौते के पाकिस्तान की मांग पर अटल रहे.

वेवेल योजना एवं शिमला सम्मेलन (Wavell Plan and Simla Conference)

  • लार्ड वेवेल जो कि भारत को विभाजित करने का विरोधी था ने भी कांग्रेस और लीग के बीच समझौता कराने की चेष्टा की.
  • उसने यहां तक कहा था कि “तुम भूगोल नहीं बदल सकते.”
  • वेवेल मार्च, 1945 ई. में अंग्रेजी सरकार से सलाह करने इंग्लैण्ड गया और जून में लौट आया.
  • तभी भारत मंत्री ऐमरी ने हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा कि 1942 ई. को जो प्रस्ताव था वह अब भी ज्यों का त्यों है.
  • अपने प्रस्तावों को कार्यरूप में परिवर्तित करने के लिए उसने शिमला में भारत के नेताओं का एक सम्मेलन बुलाया.
  • इसमें जो सुझाव रखे गये थे उनका नाम वेवेल योजना के नाम से जाना गया.
  • वेवेल योजना के अनुसार –
  1. केन्द्र में ऐसी कार्यपालिका बनाना जिसमें अधिकांश व्यक्ति भारतीय रुचि के हों और हिन्दू मुसलमान बराबर संख्या में हों.
  2. वायसराय और प्रधान सेनापति को छोड़ कर उसके शेष सदस्य भारतीय हों.
  3. एक भारतीय विदेशी मामलों की अध्यक्षता करे.
  4. भारत में एक ब्रिटिश हाई कमिश्नर आकर रहे जो ब्रिटेन के व्यापारिक लाभों का ध्यान रख सके.
  • 22 जून, 1945 को शिमला में हुए सर्वदलीय सम्मेलन में कुल 22, प्रतिनिधियों ने भाग लिया.
  • इनमें प्रमुख नेता थे- जवाहरलाल नेहरु, इस्माइल खां, जिन्ना, सरदार पटेल, अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खां तथा तारा सिंह.
  • कांग्रेस का कहना था कि वह एक ऐसी राजनीतिक संस्था है जो सब व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करती है.
  • अतः वह अपनी ओर से कार्यपालिका के लिए दो मुसलमान सदस्य देगी.
  • जिन्ना का कहना था कि सब मुस्लिम सदस्य केवल लीग के ही प्रतिनिधि होने चाहिए.
  • इसी बात पर समझौता न हो सका और सम्मेलन असफल हो गया.

चुनाव, 1945-46 (The Election, 1945-46)

  • 1945-46 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने अधिकतर गैर-मुस्लिम प्रान्तों में सभी सीटें जीत ली तथा सीमा प्रान्त में अधिकांश मुस्लिम भी कांग्रेसी चुने गये.
  • अन्य प्रान्तों में अधिकांश लोग मुस्लिम लीग के चुने गये.
  • बंगाल और सिंध में लीग के मंत्रिमंडल बने पंजाब में मिश्रित और अन्य सभी प्रान्तों में कांग्रेसी मंत्रिमंडल बने.
  • जहां देश में राजनीतिक माहौल तेजी के साथ बदल रहा था वहीं देश के अधिकतर उद्योगों में हड़ताल और निराशा का वातावरण व्याप्त था.
  • ग्रामीण जनता भूमि तथा अत्यधिक ऊंचे करों को कम करने की मांग कर रही थी.
  • पूरा देश असंतोष तथा डर के माहौल से ओत-प्रोत था.
  • पिछले लम्बे समय में मुख्य रूप से 1857, 1919, 1932 तथा 1942 में अंग्रेजों ने निहत्थे भारतीयों पर अनेक अत्याचार किए थे.
  • परन्तु अब आर्थिक रूप से तंग और 6 साल तक लगातार युद्ध में फंसे रहने के कारण ब्रिटेन की भारत में और शासन करने में रुचि कम हो गई थी.
  • 1942 के आंदोलन तथा आजाद हिंद फौज ने शासकों को यह दिखा दिया था कि वे किसी भी तरीके से ब्रिटिश सरकार की राजभक्ति पर निर्भर नहीं हैं.

कैबिनेट मिशन, 1946 (Cabinet Mission, 1946)

  • उस समय ब्रिटिश पार्लियामेण्ट ने यह घोषणा की कि वह भारत की वास्तविक अवस्था जानने के लिए एक कैबिनेट मिशन भारत भेज रहा है.
  • मार्च, 1946 ई. में एक केबिनेट मिशन भारत पहुंचा. जिसमें लार्ड पैथिक लारेन्स, सर स्टेफर्ड क्रिप्स और ए. वी. अलेक्जेण्डर सम्मिलित थे.
  • मिशन ने भारतीय नेताओं से बातचीत कर मई महीने में कांग्रेस व लीग के सदस्यों का एक सम्मेलन बुलाया.
  • परन्तु इसमें भी लीग व कांग्रेस के बीच कोई समझौता नहीं हो सका.
  • अतः 16 मई, 1946 ई. को उन्होंने अपना निश्चय घोषित कर दिया.
  • इसकी मुख्य बातें थी-
  1. एक भारत संघ होगा, जिसमें ब्रिटिश भारत और रियासतें सम्मिलित होंगी.
  2. वह विदेशी कार्य, रक्षा तथा संचार का उत्तरदायित्व लेगा और उसके लिए धन भी एकत्रित करेगा.
  3. प्रांतों को पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी और संघ के विषयों को छोड़कर अवशेष शक्ति प्रान्तों तथा रियासतों के पास रहेगी.
  4. प्रान्त समूह बनाने के लिए स्वतंत्र होंगे तथा प्रत्येक समूह अपने सार्वलौकिक विषय स्वयं निश्चित करेगा.
  5. संघ और समूहों के संविधान में एक ऐसी धारा होगी जिससे कोई भी प्रान्त विधानमण्डल के बहुमत द्वारा निर्बन्धों पर पुनर्विचार करवा सकेगा, जोकि प्रत्येक 10 वर्ष बाद होगा.
  • उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य एक ऐसी संस्था का निर्माण करना है.
  • जिससे भारतीयों द्वारा ही उनका संविधान निश्चित हो सके.
  • कैबिनेट ने पाकिस्तान की मांग को रद्द कर दिया.
  • उनका विश्वास था कि इससे साम्प्रदायिक झगड़े समाप्त नहीं हो सकते.

संविधान सभा और अन्तरिम सरकार (Constitutional Assembly and Interim Government)

  • प्रान्तीय विधानसभाओं द्वारा चुने गये सदस्यों की एक संविधान सभा बना दी गई.
  • कैबिनेट मिशन ने अन्तरिम सरकार बनाने का भी आदेश दिया.
  • वायसराय ने अपनी कार्यपालिका परिषद् को विसर्जित करके 14 सदस्यों की अन्तरिम सरकार बनाने को कहा.
  • लीग ने पहले इसमें सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया, परन्तु बाद में वह सम्मिलित हो गयी.
  • संविधान सभा में कांग्रेस का भारी बहुमत हो गया.
  • परिणामस्वरूप जिन्ना के नेतृत्व में लीग ने पाकिस्तान की मांग पुनः जोरों से शुरू कर दी.
  • फलस्वरूप 16 अगस्त, 1946 को कलकत्ता में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गये और अनेक लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा.
  • धीरे-धीरे साम्प्रदायिक दंगे देश के अन्य भागों में भी शुरू हो अये.
  • लीग ने पाकिस्तान प्राप्ति के पूर्व संविधान सभा में भाग लेने से इन्कार कर दिया.
  • इस तरह लीग के लगातार विरोध से देश में अनिश्चितता व अराजकता की स्थिति व्याप्त रही.
  • संविधान सभा ने 9 सितम्बर, 1946 ई. को कार्य आरम्भ किया.

स्वतंत्रता और विभाजन (Independence and Partition)

  • ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने 20 फरवरी, 1947 को हाउस ऑफ कामन्स में घोषणा की कि उनकी सरकार की यह निश्चित इच्छा है कि जून, 1948 ई. तक भारत को स्वायत्त शासन अवश्य दे देंगे.
  • इस ऐतिहासिक निर्णय से पूरे देश में हर्ष और उल्लास का नया वातावरण पैदा हो गया.
  • इसी समय लार्ड वेवेल को वापस बुला लिया गया तथा लार्ड. माउण्टबेटन मार्च, 1947 में भारत का अन्तिम गवर्नर जनरल नियुक्त हुआ.
  • उसने आते ही परिस्थिति का निरीक्षण किया तथा कांग्रेस व लीग से लम्बी-लम्बी बातचीतें की.
  • अन्त में देश के विभाजन का निर्णय लिया गया.
  • राष्ट्रवादी नेताओं ने भी मजबूरन भारत विभाजन का निर्णय स्वीकार कर लिया.
  • क्योंकि पिछले 70 वर्षों के दौरान हिंदू और मुस्लिम साम्प्रदायिकता का विकास इस प्रकार हुआ था कि विभाजन न होता तो शायद साम्प्रदायिकता की बाढ़ में हजारों-लाखों लोगों को बहना पड़ता.
  • सबसे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह थी कि साम्प्रदायिक दंगे देश के किसी एक वर्ग तक सीमित न होकर सम्पूर्ण देश में हो रहे थे.
  • जिनमें हिंदू व मुसलमान दोनों की सक्रिय भागेदारी थी तथा तत्कानीन ब्रिटिश सरकार ने भी दंगों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया था.
  • 3 जून, 1947 को भारत और पाकिस्तान दोनों के स्वाधीन होने की घोषणा की गई.
  • रजवाड़ों को इस बात की छूट दी गई कि वे जिस राज्य में चाहें सम्मिलित हो सकते हैं.
  • अत: अधिकतर रजवाड़े भारतीय राज्य में सम्मिलित हो गए.
  • 15 अगस्त, 1947 को भारत ने हर्षोल्लास के साथ अपना पहला स्वाधीनता-दिवस मनाया.
  • यह हर्षोल्लास जिसे असीम और अबाध होना चाहिए था दु:ख और दर्द से भरा हुआ था.
  • सदियों के बाद प्राप्त हुए स्वतंत्रता के इस क्षण में साम्प्रदायिकता का दानव जहां नर संहार में व्यस्त था वहीं अपनी जन्मभूमि से नाता तोड़कर लाखों शरणार्थी हर रोज इन दोनों राज्यों में पहुंच रहे थे.
  • गांधीजी जिन्होंने भारतीय जनता को अहिंसा-सत्य-प्रेम-साहस तथा शूरवीरता का संदेश दिया था और जो भारतीय संस्कृति के उत्कृष्टतम तत्वों के प्रतीक थे खुशी के इन दिनों में भी बंगाल के गांवों में चक्कर लगा रहे थे तथा साम्प्रदायिक दंगों से पीड़ित लोगों को सहायता पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे.
  • 30 जनवरी, 1948 में एक धर्मान्ध की गोली से गांधीजी की जीवनलीला हमेशा के लिए समाप्त हो गई.
  • शीघ्र ही नवीन भारत का संविधान बनकर तैयार हो गया और 26 जनवरी, 1950 से इस नवीन संविधान के अनुसार देश का शासन संचालन होने लगा.

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Tuesday, March 26, 2019

आजाद हिंद फौज (Indian National Army) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

आजाद हिंद फौज (Indian National Army) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

आजाद हिंद फौज (Indian National Army) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

  • 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ होने पर ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चन्द्र बोस को कलकत्ता में उनके निवास स्थान पर नजरबन्द कर दिया.
  • उचित अवसर पाकर 26 जनवरी, 1941 को चमत्कारी ढंग से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस घर से गायब हो गये और वे अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुंचे.
  • जहां नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने हिटलर से मुलाकात की.
  • जर्मनी में सुभाष चन्द्र बोस ने जर्मनी व इटली में बन्दी के रूप में रह रहे भारतीय सैनिकों को एकत्र कर् ‘मुक्ति सेना’ का गठन किया.
  • इसका प्रधान कार्यालय ड्रेसडेन (जर्मनी) में था.
  • जापान में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने टोकियो में आयोजित एक सम्मेलन में ‘आजाद हिंद फौज’ एवं भारतीय स्वतंत्रता लीग की घोषणा की.
  • इस सेना में जापान में बंदी 60,000 भारतीय सैनिकों को शामिल किया गया.
  • 20 जून, 1943 को सुभाष चन्द्र बोस को जर्मनी से टोकियो बुलाकर इस सेना की जिम्मेदारी सौंपी गयी.
  • 21 अक्टूबर, 1943 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार का गठन किया.
  • रंगून में सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज के सम्मुख अपने ऐतिहासिके भाषण में कहा कि “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा.”
  • जापानी सेना के साथ मिलकर आजाद हिंद फौज ने 1944 में भारत के कुछ पूर्वी प्रदेशों- कोहिमा, पलेल, तिद्दिभ तथा रामू आदि पर अधिकार कर लिया.
  • परन्तु इसी बीच जापान के दो शहरों हिरोशिमा तथा नागासाकी में अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिरा देने से जापान को द्वितीय विश्व युद्ध में हार का सामना करना पड़ा.
  • परिणामस्वरूप आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को भी अंग्रेजी सेना के सामने आत्म समर्पण करना पड़ा.
  • 22 अगस्त, 1945 में टोकियो जाते समय सुभाष चन्द्र बोस की हवाई दुर्घटना में आकस्मिक मृत्यु हो गई.
  • यद्यपि अधिकांश राष्ट्रवादी नेताओं ने उनकी इस रणनीति को आलोचना की कि फांसीवादी ताकतों के साथ सहयोग करके स्वाधीनता प्राप्त की जाए, परन्तु फिर भी आजाद हिंद फौज की स्थापना करके उन्होंने देशभक्ति का एक प्रेरणादायक उदाहरण भारतीय जनता और भारतीय सेना के सामने रखा.

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मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की मांग (Muslim League and the Demand of Pakistan)

मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की मांग (Muslim League and the Demand of Pakistan) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की मांग (Muslim League and the Demand of Pakistan) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

  • मुस्लिम लीग की स्थापना लार्ड मिन्टों के समय सन् 1906 में हो चुकी थी.
  • इसे विधान मण्डलों में अपनी संख्या से कहीं अधिकं स्थान मिल चुका था.
  • 1937 तक राजनीतिक दृष्टि से मुस्लिम लीग का कोई स्थान नहीं था.
  • अत: नये अधिनियम के अनुसार जो इस वर्ष चुनाव हुए थे उसमें कांग्रेस ने लीग के अभ्यर्थियों का समर्थन किया.
  • चुनाव में लीग को आशा के अनुरूप सफलता नहीं मिल सकी.
  • इसलिए जिन्ना जो कि लीग के उस समय प्रधान नेता थे कांग्रेस के विरोधी हो गये और उसे हिन्दू संस्था के नाम से पुकारने लगे.
  • 1939 में लीग ने एक वर्किंग कमेटी का गठन इसलिए किया ताकि जो वैधानिक सुधार सामने आये हैं उनकी परीक्षा करे.
  • परन्तु इसका परिणाम 1940 में पाकिस्तान की मांग के रूप में सामने आया.
  • जिन्ना के नेतृत्व में ‘पाकिस्तान की मांग’ उत्तरोत्तर बहुत तेजी से होने लगी.
  • 12 मई, 1946 ई. को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन को जो ज्ञापन दिया था उसमें उसने 6 प्रांतों (सीमा प्रान्त, पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, बंगाल तथा आसाम) की मांग की थी.

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भारत छोड़ो आंदोलन, 1942 (Quit India Movement, 1942) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

भारत छोड़ो आंदोलन, 1942 (Quit India Movement, 1942) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

भारत छोड़ो आंदोलन, 1942 (Quit India Movement, 1942) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

  • युद्ध की स्थिति से उत्पन्न संकट तथा क्रिप्स मिशन की असफलता आदि विभिन्न कारणों से जनता रुष्ट हो गई.
  • अप्रैल-अगस्त 1942 के काल में तनाव लगातार बढ़ता गया.
  • अत: कांग्रेस ने अब फैसला किया कि अंग्रेजों से भारतीय स्वाधीनता की मांग मनवाने के लिए सक्रिय उपाय किए जाएं, क्योंकि युद्धकाल में भारत स्वतंत्र हुए बिना अपनी रक्षा नहीं कर सकता.
  • अत: 8 अगस्त, 1942 को बम्बई में कांग्रेस ने “भारत छोड़ों” प्रस्ताव स्वीकार किया तथा इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए गांधीजी के नेतृत्व में एक अहिंसक जनसंघर्ष चलाने का फैसला किया गया.
  • कांग्रेस तेजी से आंदोलन चला सके, इसके पहले ही 9 अगस्त को तड़के ही गांधीजी समेत तमाम कांग्रेसी नेता बन्दी बना लिए गए तथा कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया.
  • इन गिरफ्तारियों ने देश को सकते में डाल दिया और हर जगह विरोध में एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन उठ खड़ा हुआ.
  • पूरे देश में कारखानों, स्कूलों और कालेजों में हड़तालें और कामबन्दी हुई तथा जगह-जगह प्रदर्शन हुए, जिन पर लाठी चार्ज तथा गोली-बारी भी हुई.
  • बार-बार गोलीबारी और निर्दय दमन से क्रुद्ध होकर जनता ने अनेक जगहों पर हिंसक कार्यवाहियां भी की.
  • जनता ने रेल की पटरियां उखाड़ फेंकी तार काट दिए तथा सरकारी इमारतें नष्ट कर दीं.
  • सरकार ने इसका दमन करने के लिए सेना का प्रयोग किया.
  • लाखों आंदोलनकारी जेल में डाल दिए गए और अनेकों गोलीबारी के शिकार हुए.
  • 1942 के अन्त तक भारत छोड़ो आंदोलन हल्का पड़ गया.
  • 1945 में युद्ध की समाप्ति तक देश में राजनीतिक गतिविधियां लगभग ठप रहीं.
  • राष्ट्रीय आंदोलन (भारत छोड़ो आंदोलन) के सर्वमान्य नेता जेलों में बन्द थे और कोई नया नेता उनकी जगह नहीं ले सका था.
  • 1943 में बंगाल में आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा अकाल पड़ा.
  • कुछ ही महीनों में 30 लाख से अधिक लोग भूख से मर गए.
  • सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया न होने के कारण लोगों में सरकार के प्रति जबरदस्त रोष व्याप्त हो गया था.

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क्रिप्स मिशन, 1942 (The Cripps Mission, 1942) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

क्रिप्स मिशन, 1942 (The Cripps Mission, 1942) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

क्रिप्स मिशन, 1942 (The Cripps Mission, 1942)

  • अब ब्रिटिश सरकार को युद्ध प्रयासों में भारतीयों के सक्रिय सहयोग की बुरी तरह आवश्यकता थी.
  • ऐसी स्थिति में 11 मार्च, 1942 को चर्चिल ने घोषणा की कि उनके युद्ध-मंत्रिमण्डल ने भारत संबंधी नीति निर्धारित कर ली है.
  • अत: उन्होंने एक कैबिनेट मंत्री सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में मार्च, 1942 में एक मिशन भारत भेजा.
  • क्रिप्स मिशन ने सरकारी अधिकारियों, राजनीतिक दलों तथा रियासतों के प्रतिनिधियों से बातचीत की.
  • क्रिप्स मिशन की प्रमुख बातें थी –
  1. युद्ध समाप्त होते ही भारत का संविधान बनाने के लिए एक निर्वाचित संस्था स्थापित की जायेगी.
  2. भारत एक डोमिनियन स्टेटस बना दिया जायेगा.
  3.  यदि भारत का कोई अंश (जैसे कोई रियासत या अल्पमत) यह चाहेगा कि वह अलग रहे तो उसे सम्पूर्ण प्रभुत्व का राज्य बना दिया जायेगा.
  • कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया.
  • ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस की यह बात मानने से इन्कार कर दिया कि वास्तविक शक्ति तत्काल भारतीयों को सौंपी जाए.
  • भारतीय नेता इस बात से भी संतुष्ट नहीं हुए कि उनके भविष्य के लिए केवल वादे किए जाएं और फिलहाल वायसराय के हाथों में निरंकुश शक्तियां बनी रहें.

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Sunday, March 10, 2019

अगस्त ऑफर, 1940 (August Offer, 1940) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

अगस्त ऑफर, 1940 (August Offer, 1940) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

अगस्त ऑफर, 1940 (August Offer, 1940) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

  • विश्वयुद्ध बड़ी शीघ्रता से बढ़ता गया और अप्रैल, 1940 में हालैण्ड, बेल्जियम तथा फ्रांस का पतन हो गया.
  • ब्रिटेन को भय हो गया कि कहीं उसके भाग्य का निपटारा भी इसी प्रकार न हो.
  • मई के महीने में चेम्बरलिन के स्थान पर चर्चिल प्रधानमंत्री बने और लार्ड जेटलैण्ड के स्थान पर एल. एस. ऐमरी भारत मंत्री बने.
  • ऐसी अवस्था में ब्रिटिश सरकार ने अगस्त, 1940 ई. में भारत संबंधी एक घोषणा की जिसे ‘अगस्त ऑफर’ कहा जाता है.
  • इसका उद्देश्य यह था कि इस प्रस्ताव के अनुसार भारतीय युद्ध समाप्ति के बाद कुछ रक्षा, अल्पमत के अधिकार, रियासतों आदि सुरक्षाओं के साथ अपना संविधान स्वयं बनावें.
  • इसमें अल्पमत वालों को बढ़ावा दिया गया और कहा गया कि उनकी अनुमति के बिना संविधान नहीं बनेगा.
  • इस ऑफर को कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया. क्योंकि इससे और अधिक असंतोष फैलने की संभावना थी.
  • इसके बाद ही भाषण की स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया गया.
  • फलस्वरूप बहुत से नेता बन्दी बना लिए गये.
  • महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को सार्वजनिक रूप नहीं देना चाहा क्योंकि वह युद्ध की विपत्ति के समय अंग्रेजी सरकार को बहुत अधिक परेशान नहीं करना चाहते थे.
  • 1941 में विश्व की राजनीति में दो महत्वपूर्ण परिवर्तन आए.
  • पश्चिमी यूरोप तथा अधिकांश पूर्वी यूरोप में पोलैण्ड, बेल्जियम, हालैण्ड, नार्वे और फ्रांस पर अधिकार कर चुनने के बाद नाजी जर्मनी ने 22 जून, 1941 को सोवियत संघ पर हमला बोल दिया.
  • जापान जर्मनी और इटली की ओर से युद्ध में शामिल हो गया.
  • उसने तेजी से फिलीपीन, हिंदचीन, इंडोनेशिया, मलाया और बर्मा पर अधिकार कर लिया.
  • मार्च, 1942 में रंगून पर उसका अधिकार हो गया.
  • इससे युद्ध भारत की सीमाओं पर आ पहुंचा.
  • कांग्रेस को विश्वास था कि स्वतंत्र भारत स्वयं अपनी रक्षा कर सकता है.
  • अतः उसने फिर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की और कहा कि इसके बाद भारत ब्रिटेन व उसके सहयोगी राष्ट्रों के हितों के लिए सहयोग करने को तैयार है.

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Saturday, March 9, 2019

द्वितीय विश्वयुद्ध और राष्ट्रीय आंदोलन (Second World War and the National Movement)

द्वितीय विश्वयुद्ध और राष्ट्रीय आंदोलन (Second World War and the National Movement) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

द्वितीय विश्वयुद्ध और राष्ट्रीय आंदोलन (Second World War and the National Movement) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

  • द्वितीय विश्व युद्ध 3 सितम्बर, 1939 को आरंभ हुआ था, जब जर्मन प्रसारवाद की हिटलर की नीति के अनुसार नाजी जर्मनी ने पौलैंड पर आक्रमण कर दिया.
  • इससे पूर्व वह मार्च, 1938 में आस्ट्रिया और मार्च, 1939 में चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार कर चुका था.
  • ब्रिटेन और फ्रांस ने हिटलर को खुश रखने के लिए बहुत कुछ किया था मगर अब वे पोलैंड की सहायता करने को बाध्य हो गए.
  • भारत सरकार राष्ट्रीय कांग्रेस व केन्द्रीय धारा सभा के चुने हुए सदस्यों से परामर्श किए बिना तुरन्त युद्ध में शामिल हो गई.
  • कांग्रेस फांसीवादी आक्रमण के विरुद्ध संघर्ष में लोकतांत्रिक शक्तियों की सहायता करने को तैयार थी, परन्तु एक गुलाम राष्ट्र दूसरों की सहायता किस प्रकार कर सकता था, यह महत्वपूर्ण प्रश्न था.
  • अतः कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की मांग की.
  • ब्रिटिश सरकार ने इस मांग को मानने से इन्कार कर दिया, बल्कि उल्टा धार्मिक अल्पसंख्यकों और राजा-महाराजाओं को कांग्रेस के खिलाफ खड़ा करने का प्रयास किया.
  • इसलिए कांग्रेस ने अपने मंत्रिमंडलों को त्यागपत्र देने का आदेश दिया.
  • वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने 10 जनवरी, 1940 को बम्बई में ब्रिटिश सरकार की नीति बताई और कहा कि युद्ध के बाद भारत को ‘डोमीनियम स्टेट’ बना दिया जाएगा.
  • वायसराय ने यह भी कहा कि वह अपनी कार्यपालिका परिषद् में अन्य दलों के नेताओं को नियुक्त करके उनकी संख्या बढ़ा देगा.
  • महात्मा गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि भारत को अपना संविधान स्वयं बनाने का अधिकार होना चाहिए.
  • अक्टूबर, 1940 में गांधीजी ने कुछ चुने हुए व्यक्तियों को साथ लेकर सीमित पैमाने पर सत्याग्रह चलाने का निर्णय किया.
  • सत्याग्रह को सीमित इसलिए रखा गया कि देश में व्यापक उथल-पुथल न हो और ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों में बाधा न पड़े.
  • गांधीजी ने इस आंदोलन के उद्देश्यों की व्याख्या वायसराय के नाम लिखे पत्र में इस प्रकार की, –

“कांग्रेस नाजीवाद की विजय की उतनी ही विरोधी है जितना कि कोई अंग्रेज हो सकता है. लेकिन उसकी आपत्ति को युद्ध में उसकी भागीदारी की सीमा तक नहीं खींचा जा सकता और चूंकि आपने तथा भारत सचिव महोदय ने घोषणा की है कि पूरा भारत स्वेच्छा से युद्ध प्रयास में सहायता कर रहा है, इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है कि भारत की जनता का विशाल बहुमत इसमें कोई दिलचस्पी नहीं रखता. वह नाजीवाद तथा भारत पर शासन कर रही दोहरी निरंकुशता में कोई अंतर नहीं करता.”

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Friday, March 8, 2019

राष्ट्रीय राजनीति, 1935-39 (National Politics, 1935-39) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

राष्ट्रीय राजनीति, 1935-39 (National Politics, 1935-39) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

राष्ट्रीय राजनीति, 1935-39 (National Politics, 1935-39) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

भारत सरकार अधिनियम, 1935 (Govt. of India Act, 1935)

  • लंदन में 1932 में हुए तीसरे गोलमेज सम्मेलन में लिए गए निर्णयों के परिणामस्वरूप ‘भारत सरकार अधिनियम, 1935′ बनाया गया.
  • तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भी कांग्रेस ने भागीदारी नहीं की थी.
  • इस अधिनियम में एक नए अखिल भारतीय संघ की स्थापना तथा प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता के आधार पर एक नई शासन प्रणाली की व्यवस्था थी.
  • केन्द्र में दो सदनों वाली एक संघीय विधायिका की व्यवस्था थी, जिसमें रजवाड़ों को चिन्न-भिन्न प्रतिनिधित्व दिया गया था.
  • परन्तु रजवाड़ों के प्रतिनिधियों का चुनाव जनता द्वारा न होकर उन्हें वहां के शासक मनोनीत करते थे.
  • गवर्नर-जनरल और गवर्नरों की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार करती थी तथा वे उसी के प्रति उत्तरदायी थे.
  • प्रांतों को अधिक स्थानीय अधिकार दिए गए थे.
  • प्रान्तीय विधान सभाओं के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों का प्रांतीय प्रशासन के हर विभाग पर नियंत्रण था.
  • यह कानून राष्ट्रवादियों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका.
  • क्योंकि आर्थिक और राजनीतिक शक्ति अभी भी ब्रिटिश सरकार के हाथों में केन्द्रित थी.
  • कांग्रेस ने ‘पूरी तरह निराशाजनक’ कह कर इस कानून की निंदा की.
  • इस अधिनियम का कड़ा विरोध करने के बावजूद कांग्रेस ने इसके अन्तर्गत होने वाले चुनावों में भाग लेने का निर्णय किया, ताकि इस कानून की अलोकप्रियता को सिद्ध किया जा सके.
  • फरवरी, 1937 में हुए चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता प्राप्त हुई.
  • 11 में से सात प्रांतों में कांग्रेसी मंत्रिमंडल बने तथा दो प्रान्तों में कांग्रेस ने साझी सरकारें बनाई.
  • केवल बंगाल और पंजाब में गैर-कांग्रेसी मंत्रीमंडल बने.

चुनाव और कांग्रेसी मत्रिमंडल (The Elections and Congress Triumph)

  • 1935 के अधिनियम के तहत मंत्रिमंडल को जो सीमित अधिकार प्राप्त थे उनके सहारे उन्होंने जनता की दशा सुधारने के हर सम्भव प्रयास किए.
  • मंत्रियों ने नागरिक स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया, प्रैस और अतिवादी संगठनों पर लगे प्रतिबन्ध हटाये, मजदूर संघों और किसान सभाओं को उन्होंने अपने ढंग से काम करने की छूट प्रदान की, पुलिस के अधिकारों में कटौती की तथा क्रान्तिकारी आतंकवादियों समेत राजनीतिक कैदियों को बढ़ी संख्या में रिहा किया.
  • इस प्रकार कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने लोगों को सामाजिक आर्थिक दशा सुधारने आदि के लिए अनेक कदम उठाये.
  • कांग्रेसी मंत्रिमंडलों के निर्माण से देश में एक आत्म-विश्वास पैदा हुआ.
  • अंग्रेजों को एक करारा प्रत्युत्तर मिला कि कांग्रेस केवल अडंगा लगाना ही नहीं जानती है वरन् वह सक्रिय रूप से देश का प्रशासन चलाने में भी कुशल है.

सामाजवादी विचारों का उदय (Rise of Socialistic Ideas)

  • 1930 के आसपास अधिकतर विश्व घोर आर्थिक मंदी की चपेट में था.
  • परन्तु इसी समय सोवियत संघ की आर्थिक स्थिति इसके ठीक विपरीत थी.
  • 1929 से 1936 के बीच सोवियत औद्योगिक उत्पादन चार गुना से भी अधिक हो गया.
  • इस प्रकार पूंजीवादी प्रणाली के स्थान पर समाजवादी प्रणाली के विचारों का तेजी से प्रसार हुआ.
  • जिसका प्रभाव कांग्रेस के अन्दर भी तेजी के साथ हुआ.
  • राष्ट्रीय आंदोलन के अंदर और देश के पैमाने पर एक समाजवादी भारत की तस्वीर को लोकप्रिय बनाने में जवाहरलाल नेहरु ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
  • इनका विचार था कि राजनीतिक स्वाधीनता का अर्थ जनता की आर्थिक शक्ति, खासकारै मेहनती किसानों की सामंती शोषण से मुक्ति होनी चाहिए.
  • समाजवादी प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप ही 1935 के बाद पी. सी. जोशी के नेतृत्व में कम्युनिष्ट पार्टी का प्रसार हुआ.
  • इसी बीच आचार्य नरेन्द्र देव तथा जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई.
  • कांग्रेस के अन्दर वामपंथी प्रवृत्ति के मजबूत होने का प्रमाण यह था कि 1929, 1936 और 1937 में पं. जवाहरलाल नेहरु तथा 1938 तथा 1939 में सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिय चुने गए.
  • पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1936 के लखनऊ अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था से मूलगामी अर्थ में भिन्न एक नई सभ्यता का विकास करना होगा.
  • उनका कहना था कि,-

“मेरा विश्वास है कि विश्व की समस्याओं और भारत की समस्याओं का एकमात्र समाधान समाजवाद है और जब मैं इस शब्द का उपयोग करता हैं तो इसे अस्पष्ट मानवतावादी नहीं बल्कि वैज्ञानिक, आर्थिक अर्थ में करता हैं… इसका मतलब है हमारे राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में व्यापक तथा क्रान्तिकारी परिवर्तन, कृषि और उद्योग के निहित स्वार्थों का उन्मूलन तथा भारत के सामंती और निरंकुश रजवाड़ों की प्रणाली की समाप्ति. इसका अर्थ है कि एक संकुचित अर्थ को छोड़कर निजी सम्पत्ति का उन्मूलन तथा वर्तमान मुनाफा प्रणाली की जगह सहकारी सेवा के उच्चतर आदर्श की स्थापना. अंतत: इसका अर्थ है हमारी सहज प्रवृत्तियों, आदतों और इच्छाओं में परिवर्तन.”

  • इस प्रकार देश में मूलगामी शक्तियों के प्रसार का प्रमाण जल्द ही कांग्रेस के कार्यक्रमों तथा नीतियों में देखने को मिला.
  • 1938 में जब कांग्रेस के अध्यक्ष सुभाषचन्द्र बोस थे इस समय कांग्रेस ने आर्थिक योजना का विचार अपनाया और जवाहरलाल नेहरु की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय योजना समिति बनाई.
  • चौथे दशक की महत्वपूर्ण घटना यह थी कि गांधीजी ने भी अधिकतर मूलगामी आर्थिक नीतियों को स्वीकार कर लिया.

किसान और मजदूर आंदोलन (Peasants and Workers Movement)

  • 1930 की आर्थिक मंदी ने भारतीय किसानों व मजदूरों की स्थिति भी बिगाड़ दी थी.
  • 1932 के अन्त तक खेतिहर पैदावार की कीमतें 50 प्रतिशत से अधिक गिर चुकी थी.
  • पूरे देश में किसान भूमि सुधारों मालगुजारी और लगान में कमी तथा कर्ज से राहत की मांग करने लगे थे.
  • कारखानों और बागानों के मजदूर भी अब काम की बेहतर परिस्थितियों तथा ट्रेड यूनियन अधिकार दिए जाने की बढ़-चढ़कर मांग कर रहे थे.
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन, वामपंथी पार्टियों तथा गुटों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक ऐसी नई पीढ़ी पैदा की जो किसानों और मजदूरों के संगठन के लिए समर्पित थी.
  • परिणामस्वरूप शहरों में ट्रेड यूनियनों का देश के अधिकतर भागों में, मुख्य रूप से संयुक्त प्रांत, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और पंजाब में किसान सभाओं का तेजी से प्रसार हुआ.
  • 1936 में पहला अखिल भारतीय किसान संगठन स्वामी सहजानंद सरस्वती की अध्यक्षता में बना, जिसका नाम ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ रखा गया.
  • किसानों और मजदूरों ने अब सक्रिय रूप से राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेना भी शुरू कर दिया.

विश्व की घटनाओं में दिलचस्पी (Interest in World Affairs)

  • 1930 के दशक के मध्यान्तर में कांग्रेसी नेता विश्व की घटनाओं तथा उनके प्रभावों व परिणामों के बारे में जानने के लिए बढ़-चढ़कर दिलचस्पी लेने लगे थे.
  • पूर्व में ही कांग्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटेन के हितों की रक्षा करने के लिए मुख्य रूप से एशिया व अफ्रीका में भारतीय सेना और भारतीय संसाधनों का प्रयोग न किया जाए.
  • कांग्रेस ने धीरे-धीरे स्वयं ही साम्राज्यवादी प्रसार के विरोध पर आधारित एक विदेश नीति विकसित कर ली थी.
  • फरवरी, 1927 में कांग्रेस की ओर से जवाहरलाल नेहरू ने ब्रुसेल्स में आयोजित उत्पीडित जातीयताओं के सम्मेलन में भाग लिया.
  • चौथे दशक में कांग्रेस ने विश्व के किसी भी स्थान पर जारी साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक कड़ा रुख अपनाया और एशिया तथा अफ्रीका के राष्ट्रीय आंदोलनों को समर्थन दिया.
  • इस समय इटली, जर्मनी और जापान में उभरते फांसीवाद को भी कांग्रेस ने कटु आलोचना की.
  • यह साम्राज्यवाद तथा नस्लवाद का सबसे भयानक रूप था.
  • कांग्रेस ने इथियोपिया, स्पेन, चेकोस्लोवाकिया तथा चीन पर फांसीवादी ताकतों के हमले के खिलाफ संघर्ष में वहां की जनता का पूरा समर्थन किया.
  • 1937 में जब जापान ने चीन पर हमला किया तो कांग्रेस ने एक प्रस्ताव द्वारा भारतीय जनता से आग्रह किया कि वे “चीन की जनता के प्रति अपनी सहानुभूति जताने के लिए जापानी वस्तुओं के प्रयोग से बचें.”
  • अगले वर्ष 1938 में कांग्रेस ने डा. एम. अटल के नेतृत्व में डाक्टरों का एक दल भी चीनी सेनाओं के साथ काम करने के लिए भेजा.
  • कांग्रेस का यह विश्वास था कि भारत का भविष्य फांसीवाद तथा स्वाधीनता, समाजवाद और जनतंत्र की शक्तियों के बीच छिड़ने वाले युद्ध से सीधा जुड़ा हुआ है.
  • सभी भारतीय नेताओं की इस सम्बन्ध में एक समान विचारधारा थी.
  • कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरु ने विश्व को प्रगतिशील शक्तियों के प्रति स्वाधीनता के लिए तथा राजनीतिक और सामाजिक बंधन तोड़ने के लिए लड़ने वालों के प्रति पूरे सहयोग का वचन दिया.

रजवाड़ों की जनता का संघर्ष (State People’s Struggle)

  • 1930 के दशक की एक महत्वपूर्ण घटना यह थी कि राष्ट्रीय आंदोलन का प्रसार रजवाड़ों तक भी फैल गया.
  • अधिकांश रजवाड़ों में आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियाँ नरक से भी बद्त्तर थी.
  • रजवाड़ों की आय का बहुत बड़ा भाग राजा और उसके परिवार के भोग-विलास पर खर्च होता था.
  • पूर्व के इतिहास में आंतरिक विद्रोह या बाहरी आक्रमण की चुनौतियां इन भ्रष्ट और पतित राजा-महाराजाओं की मनमानी पर कुछ हद तक नियंत्रण रखती थीं.
  • परन्तु ब्रिटिश शासन ने राजाओं को इन दोनों खतरों से सुरक्षित बना दिया और वे अब खुलकर अपने शासन का दुरुपयोग करने लगे.
  • ब्रिटिश अधिकारी भी अब राष्ट्रीय एकता के विकास में बाधा डालने तथा उदीयमान राष्ट्रीय आंदोलन का मुकाबला करने के लिए राजाओं का इस्तेमाल करने लगे.
  • देशी राजा भी किसी जन-विद्रोह के आगे अपनी सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सत्ता पर निर्भर थे और उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति दुश्मनी का रवैया अपनाया.
  • 1921 में चेंबर ऑफ प्रिंसेज की स्थापना इसलिए की गई ताकि महाराजे आपस में मिल-बैठ कर ब्रिटिश मार्गदर्शन में अपने साझे हित के विषयों पर विचार कर सकें.
  • भारत सरकार कानून, 1935 में भी प्रस्तावित संघीय ढांचे की योजना इस प्रकार रखी गई थी कि राष्ट्रवादी शक्तियों का नियंत्रण बना रहे.
  • इसमें यह व्यवस्था भी थी कि निचले सदन में कुल सीटों के 1/3 भाग तथा ऊपरी सदन में कुल सीटों के 2/5 भाग पर रजवाड़ों का प्रतिनिधित्व रहेगा.
  • अनेक रजवाड़ों की जनता अब जनतांत्रिक अधिकारों तथा लोकप्रिय सरकारों की मांग को लेकर आंदोलन करने लगी.
  • विभिन्न रजवाड़ों में राजनीतिक गतिविधियों के तालमेल के लिए दिसम्बर, 1927 में ही ‘आल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कांफ्रेस’ की स्थापना हो चुकी थी.
  • दूसरे असहयोग आंदोलन ने भी रजवाड़ों की जनता पर काफी गहरा प्रभाव डाला और उन्हें राजनीतिक गतिविधियों के लिए प्रेरित किया.
  • अनेक रजवाड़ों में जनसंघर्ष चलाए गए. राजाओं ने इन संघर्षों का सामना निर्दयतापूर्वक किया इनमें से कुछ ने साम्प्रदायिकता का सहारा भी लिया.
  • हैदराबाद के निजाम ने जन आंदोलन को मुस्लिम-विरोधी और कश्मीर के महाराजा ने उसे हिंदू विरोधी घोषित किया.
  • राष्ट्रीय कांग्रेस ने रजवाड़ों की जनता के संघर्ष का समर्थन किया और राजाओं से अग्रह किया कि वे जनतांत्रिक प्रतिनिधि सरकार स्थापित करें. और जनता को मूलभूत नागरिक अधिकार दें.
  • 1938 में जब कांग्रेस ने अपने स्वाधीनता के लक्ष्य को परिभाषित किया तो इसमें रजवाड़ों की स्वाधीनता को भी शामिल किया.
  • ब्रिटिश भारत तथा रजवाड़ों के राजनीतिक संघर्षों के राष्ट्रीय लक्ष्यों को सामने रखने के लिए जवाहर लाल नेहरु को 1939 में आल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कांफ्रेस का अध्यक्ष चुना गया.
  • इस प्रकार भारत में राष्ट्रीय चेतना को और अधिक बल मिला.

मुस्लिम लीग और सांप्रदायिकता का विकास (Muslim League and Growth of Communalism)

  • 1937 में हुए चुनावों के परिणामों से मुस्लिम लीग और विशेषकर मुहम्मद अली जिन्ना को काफी निराशा हुई.
  • मुस्लिम लीग किसी भी प्रान्त में बहुमत प्राप्त नहीं कर पायी.
  • यहां तक कि मुस्लिम-बहुलता वाले प्रान्त पंजाब और बंगाल में भी इसे बहमत नहीं मिल सका.
  • 1928 से ही मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस के साथ सहयोग करना बन्द कर दिया. और लन्दन आकर 1932 में वकालत शुरू कर दी.
  • 1935 में वापस लौटने के बाद मुख्यतः चुनावी परिणामों को देखते हुए जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग कांग्रेस की घोर विरोधी हो गई.
  • उसने प्रचार शुरू कर दिया कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बहुसंख्यक हिंदुओं में समा जाने का खतरा है.
  • एक ओर कांग्रेस ने मूलगामी कृषि कार्यक्रम अपना लिया था, दूसरी ओर जगह-जगह कृषक आंदोलन शुरू हो रहे थे.
  • इस कारण जमींदार और सूदखोर अपने हितों की रक्षा के लिए साम्प्रदायिक पार्टियों को अपना समर्थन देने लगे.
  • 1940 में मुस्लिम लीग ने एक प्रस्ताव पारित करके मांग की कि स्वाधीनता के बाद देश के दो भाग कर दिए जाएं.
  • हिन्दू महासभा का यह वक्तव्य कि, हिंदू एक अलग राष्ट्र है और भारत हिंदुओं का देश है के कारण भी मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग अधिक तेजी के साथ उठी.
  • यहां एक उल्लेखनीय बात यह रही कि हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद की बात करने वाले किसी भी सम्प्रदाय या संगठन ने विदेशी शासन विरोधी संघर्ष में कभी भी कोई सक्रिय भाग नहीं लिया.
  • राष्ट्रीय आंदोलन ने सांप्रदायिक ताक़तों का हमेशा दृढ़ता से विरोध किया और धर्म निरपेक्षता से उसकी प्रतिबद्धता हमेशा गहरी और संपूर्ण रही. फिर भी वह सांप्रदायिक चुनौतियों का सामना करने में पूरी तरह सफल न हो सका.
  • अंत में साम्प्रदायिकता देश का विभाजन कराने में सफल रही.
  • 1947 में विभाजन के पहले और बाद में हुए दंगों तथा सांप्रदायिक शक्तियों के पुनरुत्थान के बावजूद स्वतंत्रता के बाद भारत एक धर्म निरपेक्ष संविधान बनाने में तथा मूलरूप से एक धर्म निरपेक्ष राजनीतिक व्यवस्था और समाज खड़ा कर सकने में सफल रहा.

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साम्प्रदायिक निर्णय तथा पूना समझौता (Communal Award and Poona Pact)

साम्प्रदायिक निर्णय तथा पूना समझौता (Communal Award and Poona Pact) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

साम्प्रदायिक निर्णय तथा पूना समझौता (Communal Award and Poona Pact) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

  • ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत 18 अगस्त, 1932 को साम्प्रदायिक निर्णय प्रस्तुत किया गया.
  • साम्प्रदायिक निर्णय अंग्रेजों के इस मत पर आधारित था कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, बल्कि अनेक जातियों, धार्मिक व सांस्कृतिक गुटों आदि का समूह है.
  • इसके तहत मुसलमानों, दलित जातियों, पिछड़ी हुई जातियों, भारतीय इसाईयों, यूरोपियनों, एग्लो-इण्डियनों, सिक्खों आदि अल्पसंख्यक जातियों के लिए स्थान निश्चित कर दिए गए और प्रत्येक के लिए पृथक-पृथक निर्वाचन मण्डल बना दिए गए.
  • कांग्रेस ने मुस्लिमों, सिक्खों और इसाईयों के लिए पृथक निर्वाचन का विरोध किया क्योंकि इससे देश के सामान्य ढांचे में दरार आने का खतरा था.
  • परन्तु मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन को बहुत पहले 1916 में मुस्लिम लीग के साथ हुए समझौते के तहत स्वीकार किया जा चुका था.
  • परिणामतः साम्प्रदायिक निर्णय के बारे में यह मुश्किल पैदा हो गई थी कि इसे न तो स्वीकार किया जा सकता था और न ही आसनी से अस्वीकार किया जा सकता था.
  • गांधीजी इस समय जेल में थे.
  • अतः उन्होंने जेल से प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इसका विरोध किया और आमरण अनशन पर बैठ गए.
  • विभिन्न पार्टियों और सम्प्रदायों के नेता जिनमें- मदन मोहन मालवीय, राजगोपालाचारी, डा. राजेन्द्र प्रसाद, एम. सी. दास और बी. आर. अंबेडकर आदि सम्मिलित थे, तुरन्त सक्रिय हो गए और विभिन्न साम्प्रदायिक प्रतिनिधियों के बीच 26 सितम्बर, 1932 को एक समझौता हुआ जिसे ‘पूना समझौता’ के नाम से जाना गया.
  • इस समझौते में अंबेडकर ने हरिजनों के पृथक प्रतिनिधि की मांग को वापस ले लिया.
  • संयुक्त निर्वाचन सिद्धांत को ही स्वीकारा गया.
  • हरिजनों के लिए सुरक्षित 75 स्थानों को बढ़ाकर 148 कर दिया गया.

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सविनय-अवज्ञा आंदोलन की पुनरावृत्ति (Revival of the Civil Disobedience)

सविनय-अवज्ञा आंदोलन की पुनरावृत्ति (Revival of the Civil Disobedience) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

सविनय-अवज्ञा आंदोलन की पुनरावृत्ति (Revival of the Civil Disobedience) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

  • जब गांधीजी इंग्लैण्ड में थे ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को बुरी तरह दबाने की कोशिश की थी.
  • इस बीच देश के अनेक भागों में किसानों में असंतोष की लहर फैल चुकी थी.
  • विश्वव्यापी मंदी के कारण खेतिहर पैदावारों के दाम गिर गये थे और लगान तथा मालगुजारी का बोझ उनके लिए असहनीय हो चला था.
  • दिसम्बर, 1930 में कांग्रेस ने “न लगान, न टैक्स” का अभियान चलाया.
  • फलस्वरूप 26 दिसम्बर, 1930 को जवाहर लाल नेहरु को गिरफ्तार कर लिया गया.
  • पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त में सरकार की मालगुजारी संबंधी नीति के खिलाफ खुदाई खिदमतगार किसान आंदोलन चला रहे थे.
  • 24 दिसम्बर को इनके नेता खान अब्दुल गफ्फार खान भी गिरफ्तार कर लिए गए.
  • किसान आंदोलन पूरे देश में तेजी के साथ फैल रहा था.
  • अतः वापस लौटने पर गांधीजी के सामने नागरिक अवज्ञा आंदोलन को दोबारा आरंभ करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा.
  • सरकार के नए वायसराय लार्ड वेलिंगडन का मानना था कि कांग्रेस के साथ समझौता करके बहुत बड़ी गलती की गई थी.
  • उनकी सरकार कांग्रेस को कुचलने के लिए आमादा और तैयार थी.
  • सरकार ने कांग्रेस को अवैध घोषित कर गांधीजी एवं सरदार पटेल सहित लगभग एक लाख बीस हजार लोगों को जेल में भर दिया.
  • राष्ट्रवादी साहित्य प्रतिबंधित कर दिया गया तथा राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर पुनः सेंसरशिप लागू कर दी गयी.
  • वास्तव में सरकारी दमन काफी हद तक सफल रहा और इसे भारतीय नेताओं के बीच साम्प्रदायिक तथा दूसरे मुद्दों पर मतभेद पैदा करने में सफलता मिली.
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन बिखर गया.
  • अत: गांधीजी ने मई, 1934 में इसे वापस ले लिया.
  • इस समय भी अनेक नेताओं ने गांधीजी की कटु आलोचना की.

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द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference)

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement)

  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के समय ब्रिटेन के सर्वदलीय मंत्रिमण्डल में अनुदारवादियों का बहुमत था.
  • अनुदारवादियों ने सेमुअल हाक को भारत मंत्री एवं लार्ड विलिंग्टन को भारत का वायसराय बनाया.
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 7 सितम्बर, 1931 को शुरू हुआ.
  • गांधीजी 12 सितम्बर को इंग्लैण्ड पहुंचे जो कि कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि थे.
  • ऐनीबेसेन्ट एवं मदनमोहन मालवीय व्यक्तिगत रूप से इंग्लेण्ड गये थे.
  • एनीबेसेन्ट ने सम्मेलन में शामिल होकर भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया.
  • इस सम्मेलन में साम्प्रदायिक समस्या देखने को मिली.
  • मुस्लिमों एवं सिक्खों के साथ-साथ अनुसूचित जाति के लोगों के लिए डा. अंबेडकर ने भी सम्मेलन में भाग लिया और पृथक निर्वाचन की मांग की.
  • गांधीजी इन बातों से बड़े दुःखी हुए. सम्मेलन में भारतीय संघ की रूप-रेखा पर विचार विमर्श हुआ.
  • भारत में एक संघीय न्यायालय की स्थापना की बात की गयी.
  • तथा अनेक प्रतिनिधियों ने केन्द्र में वैध शासन अपनाने की बात की.
  • साम्प्रदायिक समस्या के समाधान पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका.
  • गांधीजी ने डोमिनियन स्टेट्स के लिए जोरदार वकालत की लेकिन सरकार ने स्वतंत्रता की इस बुनियादी राष्ट्रवादी मांग को मानने से इन्कार कर दिया.
  • 1 दिसम्बर, 1931 को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन बिना किसी ठोस निर्णय के समाप्त हो गया.
  • 28 दिसम्बर को वापस लौटने पर गांधी जी ने अपने स्वागत में आयी हुई भीड़ को संबोधित करते हुए कहा- “मैं खाली हाथ लौटा हूं, परन्तु अपने देश की इज़्ज़त को मैंने बट्टा नहीं लगने दिया.”

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