Friday, July 20, 2018

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना(Foundation of the Indian National Congress)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना Foundation of the Indian National Congress

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना(Foundation of the Indian National Congress)-सन् 1885 का वर्ष भारत के इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण है. क्योंकि इस वर्ष से भारत में एक नए युग का सूत्रपात हुआ. 28 दिसम्बर, 1885 को अखिल भारतीय स्तर के राजनीतिक संगठन ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी जो कि ए.ओ. ह्यूम (A.O. Hume) के नेतृत्व में भारतीयों के एक मंच पर आने की भावनाओं का परिचायक थी.

 

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास को देखने से स्पष्ट होता है कि इसका विकास तीन मुख्य चरणों में हुआ. प्रथम चरण (1885-1905) तक माना जाता है, जिसे ‘उदारवादी राजनीति‘ अथवा ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ का युग कहते हैं. इस युग में कांग्रेस पर समृद्धिशाली मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों का अधिकार था जो कि देश के बड़े-बड़े नगरों से आते थे. इनका सामान्य जनता के साथ कोई सम्बन्ध नहीं था. प्रारम्भिक वर्षों में कांग्रेस अधिवेशनों की कार्यवाही बहुत दबे हुए ढंग से होती थी और इनकी मांगों में चुनौती का स्वर न होकर आग्रह और प्रार्थना का स्वर होता था. 1906-1918 की अवधि को ‘द्वितीय चरण में रखा जाता है.

 

इस अवधि में उदारवादियों के नरम रूख से कोई परिणाम न निकलता देख कांग्रेस में असंतोष व्याप्त हो गया. परिणामस्वरूप क्रान्तिकारी और उग्रवादी प्रवृत्तियों ने जोर पकड़ा. उग्रवादी पूर्ण स्वराज्य के पक्ष में थे जिसे वे आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास से प्राप्त करना चाहते थे. उग्रवाद के साथ-साथ क्रान्तिकारी या आतंकवाद की लहर भी फैली जो कि हिंसात्मक उपायों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पक्ष में थे. तीसरा और अन्तिम चरण (1919-1947) में कांग्रेस का उद्देश्य पूर्ण स्वराज या पूर्ण आजादी था. इस चरण में कांग्रेस गांधी जी के नेतृत्व में अहिंसात्मक और ब्रिटिश सरकार के साथ असहयोग के उपायों द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति में विश्वास रखती थी.

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उत्पत्ति (The Genesis of the Indian National Congress)

 

कांग्रेस की स्थापना के साथ ही भारतीय राजनीतिक इतिहास में 1885 से नए युग का सूत्रपात हुआ. 1907 में ‘सूरत की फूट’ के बाद कांग्रेस की भारतीय राजनीति में भूमिका और भी महत्वपूर्ण बन गई. इस समय कांग्रेस का गरम दल (जिसका नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं विपन चन्द्रपाल कर रहे थे) तथा नरम दल (जिसके नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे) दो भागों में विभाजन हो गया. बाद में इस अखिल भारतीय विस्तृत राजनीतिक संगठन ‘काग्रेस’ को संगठित रूप में जिन्दा रखते हुए गांधी जी तथा अनेक अन्य लोगों ने समय-समय पर अनेक अहिंसात्मक उपाय अपनाते हुए स्वतंत्रता के लिए लगातार महत्वपूर्ण उपलब्ध्यिां प्राप्त की. जिनके सहारे हमें पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो सकी.

 

यह कहना कि इंडियन नेशलन कांग्रेस की स्थापना का समस्त श्रेय ए. ओ. ह्यूम को है या यह एक आकस्मिक घटना थी उचित नहीं है. 1885 में कांग्रेस की स्थापना के लिए आधार तैयार करने में देश के विभिन्न भागों से अनेक राजनीतिक संगठनों, विभिन्न विचारों और लोगों की एक मंच पर इकट्ठा होने की भावनाओं ने मिले-जुले रूप में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था.

 

डब्ल्यू. सी बनर्जी ने अपने बयान में कहा कि इंडियन नेशनल कांग्रेस का विचार डफरिन के मस्तिष्क की उपज था और उसी ने ह्यूम को इसके लिए सुझाव दिया था. डफरिन का विचार था कि जनता की वास्तविक भावनाओं को जानने के लिए इस प्रकार की एक संस्था होनी चाहिए ताकि सरकार जनता की ओर से उठने वाली किसी भी प्रतिक्रिया से सतर्क रह सके. अर्थात् इस संस्था की स्थापना इसलिए हुई थी ताकि यह अंग्रेजी राज्य की रक्षा हेतु अभय कपाट (Safety Valve) के रूप में कार्य कर सके.

 

कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य अंग्रेजी साम्राज्य के लिए ‘अभय कपाट’ (Safety Valve) का कार्य करना था यह कहना ज्यादा सही नहीं है. अब यह बात साफ हो चुकी है कि डफरिन के उद्देश्य कुछ भी रहे हों, ह्युम सच्चे उदारवादी तथा जागरूक साम्राज्यवादी (enlightence imperialist) थे तथा वे एक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता तथा वांछनीयता का अनुभव करते थे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरूआती समय में जिस किसी भारतीय राजनीतिज्ञ ने रूम के साथ सहयोग किया वे सभी चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार को इस बात का बिल्कुल भी शक नहीं होना चाहिए कि भारतीय स्वतंत्रता के लिए भारतीय राष्ट्रवादी कुछ करने का प्रयास कर रहे हैं. इसलिए उन्होंने ह्यूम के साथ पूरी निष्ठा के साथ सहयोग किया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यों का विस्तार किया.

 

कांग्रेस का अधिवेशन (The Congress Session)

 

28 दिसम्बर, 1885 को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज भवन में कांग्रेस का प्रथम सम्मेलन सम्पन्न हुआ. इसकी अध्यक्षता व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने की. इसमें कुल 72 सदस्यों ने भाग लिया. जिनमें प्रमुख थे- दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, दीनशा एदलजी वाचा, काशीनाथ तैलंग, वी. राघवाचार्य, एन. जी. चन्द्रावरकर, एस. सुब्रमण्यम आदि. कांग्रेस के प्रथम सम्मेलन में निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य बताये गए थे- देश हित की दिशा में प्रयत्नशील भारतीयों के बीच परस्पर समन्वय स्थापित कर मित्रता को प्रोत्साहित करना. देश में व्याप्त धर्म, वंश एवं प्रान्त सम्बन्धी विवादों को समाप्त कर राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रोत्साहित करना. एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि शिक्षित वर्ग की सहमति से आवश्यक सामाजिक विषयों पर विचार विमर्श करके भविष्य में भारतीय जनकल्याण के लिए नीति निर्धारित करना.

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन 1886 में कलकत्ता में सम्पन्न हुआ. जिसकी अध्यक्षता दादाभाई नारौजी ने की. इस अधिवेशन में विभिन्न स्थानों से अलग-अलग संगठनों और समूहों द्वारा चुने हुए 436 प्रतिनिधियों ने भाग लिया. इसके बाद कांग्रेस की प्रत्येक वर्ष देश के विभिन्न स्थानों पर बैठकें सम्पन्न हुई. कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त कादम्बिनी गौंगुली ने 1890 में कांग्रेस अधिवेशन को संबोधित किया. यह इस बात का सूचक था कि भारतीय नारी की अतीत में जे उपलब्धियाँ थी वह बीच में लुप्त हो जाने के बाद एक बार फिर से उजागर होने लगी थी.

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