Saturday, October 6, 2018

मध्यकालीन भारत प्रान्तीय राजवंश (Medieval India – Provincial Dynasty in Hindi)

मध्यकालीन भारत - प्रान्तीय राजवंश (Medieval India - Provincial Dynasty in Hindi)

प्रान्तीय राजवंश

खान देश

मालिक राजा फारुकी

  • मालिक राजा फारुकी ने ताप्ती नदी (तापी नदी) घाटी क्षेत्र में स्थित खान देश के स्वतंत्र मुस्लिम राज्य की स्थापना सुल्तान फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु के उपरांत 1382 ई. में की.
  • यहाँ सभी सुल्तानों ने खान की उपाधि धारण की इसलिए इसका नाम खान देश पड़ा.
  • खान देश की राजधानी बुरहानपुर तथा सैनिक मुख्यालय आसीरगढ़ था.
  • 29 अप्रैल, 1399 ई. को राजा फारुकी की मृत्यु के बाद खान देश के अन्य शासक थे-
  1. नासिर खान फारुकी (1400-1434),
  2. मीरान आदिल खान फारुकी (1437-1441),
  3. मीरान मुबारक खान फारुकी (1441-1457),
  4. मीरान आदिल खान फारुकी द्वितीय (1457-1501),
  5. दाऊद खान (1501-1508),
  6. गजनी खान (1508),
  7. आजम हुमायूँ आदिल खान तृतीय (1509-1520),
  8. मीरान मुहम्मद खान प्रथम (1520-1535),
  9. मीरान मुबारक शाह फारुकी (1535-1566),
  10. हशन खान फारुकी (1576),
  11. राजा अली खान (1576-1597),
  12. बहादुर खान (1597-1600).
  • मीरान आदिल खान द्वितीय के बाद कमजोर उत्तराधिकारियों के कारण – साम्राज्य दलगत राजनीति से ग्रस्त हो गया.
  • फलतः इसका फायदा उठाकर गुजरात एवं अहमदनगर ने खान देश के मामले में हस्तक्षेप करना आरंभ किया.
  • अंततः 1601 में अकबर ने खान देश के अंतिम शासक को परास्त कर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया.

इस राज्य की कला पर मालवा तथा गुजरात की वास्तुकला शैली का काफी व्यापक प्रभाव पड़ा.

बीबी की मस्जिद

  • इस मस्जिद में पूर्णरूप से गुजराती वास्तुकला का प्रभाव है.
  • इसका निर्माण सुल्तान मुजफ्फरशाह गुजराती की पुत्री ने गुजरात के शिल्पकारों से बुरहानपुर में करवाया.
  • इस मस्जिद के मेहराब एवं गुम्बद पूर्णतः गुजराती शैली के हैं.

जामा मस्जिद

  • आदिल शाह फारुकी चतुर्थ ने 1589 ई. में जामा मस्जिद का निर्माण बुरहानपुर में करवाया.
  • जामा मस्जिद में भी गुजराती शैली का थोड़ा-बहुत प्रभाव है.

बंगाल

  • दूरस्थ प्रांत होने की वजह से बंगाल हमेशा से दिल्ली के सुल्तानों के लिए एक समस्या बना रहा तथा समय-समय पर स्वायत्तता हासिल करने में कामयाब रहा.
  • इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी पहला मुसलमान आक्रमणकारी था, जिसने बिहार और बंगाल के सेन वंश को हराया.
  • बाद में इल्तुतमिश तथा बलबन को बंगाल को दिल्ली सल्तनत में मिलाना पड़ा.
  • बलबन के पुत्र बुगरा खान ने बंगाल को स्वतंत्र घोषित कर लिया.
  • गयासुद्दीन तुगलक ने बंगाल को तीन भागों में बांट दिया.
  1. लखनौती (उत्तरी बंगाल),
  2. सोनारगाँव (पूर्वी बंगाल) तथा
  3. सतगाँव (दक्षिण बंगाल)
  • मुहम्मद तुगलक के अंतिम दिनों में फखरुद्दीन के विद्रोह के कारण बंगाल फिर स्वतंत्र हो गया.

शम्सुद्दीन इलियास शाह

  • 1345 ई. में हाजी इलियास बंगाल के विभाजन को समाप्त कर शम्सुद्दीन इलियास शाह के नाम से बंगाल का शासक बना.
  • 1375 ई. में शम्सुद्दीन इलियास की मृत्यु के बाद सिकन्दर शासक बना.
  • सिकन्दर ने पांडुआ में ‘अदीना मस्जिद’ का निर्माण करवाया.

गयासुद्दीन अजमशाह

  • 1389 में गयासुद्दीन अजमशाह अगला शासक बना.
  • गयासुद्दीन अजमशाह अपनी न्यायप्रियता के लिए जाना जाता है.
  • प्रसिद्ध फारसी कवि ‘हाजिफ शीरजी’ तथा अन्य विद्वानों से उसका सम्पर्क था.
  • गयासुद्दीन अजमशाह ने चीन के लिए एक 1409 में राजदूत भेजा तथा चिटागोंग तट से चीन के साथ अच्छे व्यापार की शुरुआत की.
  • 1410 में उसकी मृत्यु हो गई.
  • गियासुद्दीन के उत्तराधिकारी कमजोर हुए.

जमींदार गणेश

  • उस समय एक ब्राह्मण जमींदार गणेश बहुत प्रभावशाली हो गया तथा उसने 1415 ई. में बंगाल की गद्दी पर अधिकार कर लिया.
  • मुसलमानों के विरोध के कारण उसने अपने नाबालिग पुत्र जादू सेन का धर्म परिवर्तन कराकर उसे मुसलमान बना दिया तथा उसके नाम से शासन करने लगा.
  • फारसी पाण्डुलिपियों में गणेश को ‘केस’ नाम से जाना जाता है.
  • गणेश ने ‘दनुजमर्दन’ की उपाधि धारण की.

जादू सेन

  • 1418 में गणेश की मृत्यु के बाद जादू सेन ने जलाल-उद्-दीन के नाम से 1431 तक शासन किया.
  • इसके पुत्र और उत्तराधिकारी शम्स-उद-दीन अहमदशाह की 1442 में हत्या के बाद गणेश के वंश का अंत हो गया तथा इल्यास शाही राजवंश की फिर से स्थापना हुई. 

अलाउद्दीन हुसैनशाह

  • बंगाल के अमीरों ने 1493 में योग्य सुल्तान अलाउद्दीन हुसैनशाह को बंगाल की गद्दी पर बैठाया.
  • अलाउद्दीन हुसैनशाह ने अपनी राजधानी को पाण्डुआ से गौड़ हस्तांतरित किया.
  • अलाउद्दीन हुसैनशाह एक धर्मनिरपेक्ष शासक था.
  • अलाउद्दीन हुसैनशाहने हिन्दुओं को ऊँचे पदों पर नियुक्त किया.
  • चैतन्य महाप्रभु इसी शासक के समकालीन थे.
  • अलाउद्दीन ने ‘सत्यपीर‘ नामक आंदोलन की शुरुआत की.
  • अलाउद्दीन हुसैनशाह के काल में बंगाली साहित्य ने बहुत उन्नति की.
  • दो विद्वान वैष्णव भाई रूप एवं सनातन उसके प्रमुख अधिकारी थे.
  • हिन्दू उसे (अलाउद्दीन हुसैनशाह को) कृष्ण का अवतार मानते थे.
  • अलाउद्दीन हुसैनशाहने ‘नृपति तिलक’, ‘जगतभूषण’ आदि उपाधियां धारण की.
  • अहोमों के सहयोग से उसने कामता (कामरूप) राजा को नष्ट किया.
  • श्रीकृष्ण विजय‘ की रचना मालधर बसु ने उसी के शासन काल में की.
  • मालधर बसु ने गुणराज खान की उपाधि धारण की.

नुसरतशाह (1519-32)

  • अलाउद्दीन के बाद उसका बेटा नुसरतशाह (1519-32) शासक बना.
  • उसने बाबर के साथ एक संधि की जव बाबर पूर्व की ओर कूच कर रहा था.
  • यह भी बिल्कुल अपने पिता की तरह था.
  • पुर्तगाली सबसे पहले इसी के शासनकाल में बंगाल में प्रविष्ट हुए.
  • इसी के शासनकाल में महाभारत का बंग्ला में अनुवाद कराया गया.
  • इसने गौड़ में बड़ा सोना तथा कदम रसूल मस्जिद का निर्माण करवाया.

गयासुद्दीन महमूदशाह

  • 1533 में नुसरत शाह की मृत्यु के बाद गयासुद्दीन महमूदशाह शासक हुआ.
  • 1538 में शेरशाह ने इसे बंगाल से खदेड़कर पूरे बंगाल पर अधिकार कर लिया.

असम

  • 13वीं सदी के हिन्दू राज्य कामरूप के इतिहास के बारे में बंगाल के मुस्लिम राजाओं द्वारा किए गए छिट-पुट आक्रमणों के अतिरिक्त अन्य जानकारी नगण्य है.
  • 13वीं सदी के अंत में दुलर्भ नारायण ने कामता (कामरूप) पर शासन किया.
  • इस राज्य पर अहोम आक्रमण के फलस्वरूप एक संधि हुई, जिसके पश्चात् दुर्लभ की बेटी का विवाह अहोम राजी सुखंगपा से हुआ.
  • 15वीं सदी के आरंभ में खेन नामक ब्राह्मण आदिवासी जाति ने कामता को एक प्रभावशाली राज्य बनाया.
  • 15वीं सदी के अंत में बंगाल के अलाउद्दीन हुसैन शाह ने उसके राज्य को अपने अधीन कर लिया.
  • कोच आदि जाति के विशासिम्हा ने 1515 ई. में कामता का राज्य संभाला.

उड़ीसा 

अनंद वर्मन छोड़ा गंग (1076-1148)

  • अनंद वर्मन छोड़ा गंग (1076-1148) ने उड़ीसा की सीमाओं का विस्तार बंगाल में गंगा के तट से दक्षिण में गोदावरी तक किया तथा उड़ीसा को एक शक्तिशाली राज्य बनाया.
  • एक महान सैनिक तथा नायक होने के साथ-साथ वह (अनंद वर्मन छोड़ा गंग) संस्कृत तथा तेलुगु साहित्य का महान संरक्षक भी था.
  • अनंद वर्मन छोड़ा गंग ने भुवनेश्वर का मशहूर लिंगराज मंदिर तथा पुरी के जगन्नाथ मंदिर का निर्माण करवाया.

नरसिम्हा

  • उड़ीसा का दूसरा महान शासक नरसिम्हा था, जिसने बंगाल का एक हिस्सा मुस्लिम शासकों से छिना .
  • कोणार्क के सूर्य मंदिर का निर्माण भी नरसिम्हा ने करवाया.
  • नरसिम्हा की मृत्यु के साथ ही पूर्वी गंग का वैभव समाप्त हो गया.
  • उड़ीसा के सूर्यवंशी शासकों ने ‘गजपति‘ की उपाधि धारण की.

जौनपुर

मलिक सरवर

  • फिरोजशाह तुगलक ने अपने पूर्वज जौना खाँ (मुहम्मद-बिन-तुगलक) के नाम पर जौनपुर शहर की स्थापना की थी.
  • 1394 ई. में फिरोज तुगलक के पुत्र सुल्तान महमूद ने अपने वजीर ख्वाजा जहाँ को ‘मलिक-उस-शर्क’ (पूर्व का स्वामी) की उपाधि प्रदान की.
  • मलिक सरवर ने दिल्ली पर हुए तैमूर आक्रमण के कारण राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर स्वतंत्र शर्की वंश की नींव डाली.

करनफल मुबारक शाह (1399-1402)

  • 1399 ई. में मलिक सरवर की मृत्यु के बाद इसका पुत्र (दत्तक) करनफल मुबारक शाह (1399-1402) गद्दी पर बैठा.
  • करनफल मुबारक शाह ने सुल्तान की उपाधि धारण की तथा अपने नाम से खुतबे पढ़वाये.

इब्राहिमशाह (1402-1440)

  • मुबारक शाह के बाद उसका छोटा भाई इब्राहिमशाह (1402-1440) गद्दी पर बैठा.
  • वह शर्की राजवंश का सबसे महान शासक था.
  • इब्राहिमशाह ने सांस्कृतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की .

महमूद शाह

  • 1440 में इब्राहिम शाह की मृत्यु के बाद जौनपुर की गद्दी पर उसका पुत्र महमूद शाह बैठा.
  • महमूद शाह ने चुनार को अपने अधीन कर लिया, किन्तु कालपी को अधीन करने की उसकी कोशिस विफल रही.
  • महमूद शाह ने दिल्ली पर भी आक्रमण किया, किन्तु दिल्ली के शासक बहलोल लोदी ने उसे हरा दिया.

हुसैनशाह 

  • महमूदशाह के बाद उसके पुत्र मुहम्मदशाह (1457-58) की हत्या उसके ही छोटे भाई हुसैनशाह (1450-1505) ने कर दी, जो शर्की वंश का अंतिम शासक था.
  • बहलोल लोदी ने 1483-84 में जौनपुर पर कब्जा कर लिया.
  • अंततः सिकन्दर लोदी ने पूर्ण रूप से जौनपुर को दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिया.

कश्मीर

हिन्दू राजवंश

  • 1286 ई. में सिम्हादेव ने, एक पुराने हिन्दू राजवंश के अंतिम शासक को नष्ट कर, नए हिन्दू राजवंश की स्थापना की.
  • सिम्हादेव के उत्तराधिकारी सुहादेव के समय दलूचा के नेतृत्व में (1320 में) मंगोलों का आक्रमण हुआ.
  • सुहादेव अपनी राजधानी इन्द्रकोट से भाग खड़ा हुआ.
  • इस स्थिति का फायदा उठाकर लद्दाखी नायक के पुत्र रिंचन ने सिंहासन पर कब्जा कर लिया.
  • सुहादेव के चचेरे भाई उदयनदेव ने 1323 ई. में रिंचन को पराजित कर 1339 तक कश्मीर पर शासन किया.
  • उदयन देव की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी कोटा ने शासन संभाला, किन्तु उचित अवसर पाकर शाहमीर ने, जिसे रिंचन ने अपनी पत्नी और पुत्र के लिए शिक्षक के तौर पर नियुक्त किया था, कोटा तथा उसके अल्पायु बच्चों को कैद कर सिंहासन पर कब्जा कर लिया.

शाहमीर राजवंश

शाहमीर

  • शाहमीर ने सुल्तान शम्स-उद्दीन के नाम से (1339-42) सिंहासनारुढ़ हुआ.
  • इस राजवंश ने दिल्ली के स्वामित्व को कभी स्वीकार नहीं किया तथा दिल्ली में भी कभी कश्मीर को अधीन करने की कोशिश नहीं की गई.
  • इस राजवंश में 16 अन्य शासक हुए जिनमें सिकन्दर तथा जैन-उल-आबिदीन का विशिष्ट स्थान है.

सिकन्दर (1389-1413)

  • सिकन्दर (1389-1413) को कश्मीर के औरंगजेब के नाम से भी जाना जाता है.
  • उसने हिन्दुओं के उत्पीड़न से कश्मीर और सामाजिक दोनों व्यवस्थाओं में परिवर्तन ला दिया.
  • वह धार्मिक रूप से असहिष्णु था.
  • उसके ‘जजिया’ आरोपित किया तथा मूर्तियों को तोड़ा.
  • उसने, सिकन्दर के साथ आए, मुस्लिमों को काफी संरक्षण दिया.
  • इस कारण उन्होंने कश्मीर पर अपना दबदबा हासिल कर लिया तथा इस्लाम के लिए एक सांस्कृतिक आधार दिया.
  • इसके विषय में इतिहासकार जोनराजा ने लिखा है कि “सुल्तान अपने सुल्तान के कर्तव्यों को भूल गया और दिन-रान उसे मूर्तियों को नष्ट करने (बुतशिकन) में आनन्द आने लगा”.
  • उसने मार्तण्ड, विश्य, इसाना, चक्रव्रत एवं त्रिपुरेश्वर की मूर्तियों को तोड़ दिया.
  • ऐसा कोई शहर, नहर, गाँव या जंगल शेष न रहा जहाँ ‘तुरुष्क सूहा’ (सिकन्दर) ने ईश्वर के मंदिर न तोड़े हों.

आलीशाह

  • सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् आलीशाह सिंहासारुढ़ हुआ.
  • आलीशाह के वजीर साहूभट्ट ने सिकन्दर की धार्मिक कट्टरता को आगे बढ़ाया.

शाही खाँ जैन-उल-आविद्दीन (1420-70)

  • आलीशाह का भाई शाही खाँ जैन-उल-आविद्दीन (1420-70) को कश्मीर के अकबर के नाम से जाना जाता है.
  • उसे ‘बुदशाह’ या महान सुल्तान भी कहा जाता है.
  • यह धार्मिक दृष्टि से सिकन्दर के ठीक विपरीत था.
  • इसने टूटे हुए मंदिरों का पुनर्निर्माण, गायों की सुरक्षा, जजिया तथा शवहाह कर हटाने, नहरें खुदवाने, पुल बनवाने अनेक शहरों का निर्माण कराने, मुसलमान बने हिन्दुओं को पुनः हिन्दू बनने, कश्मीर छोड़कर भाग एग हिन्दुओं को वापस बुलाने, सती प्रथा पर लगे प्रतिबंध को हटाने आदि के आदेश दिए.
  • वह स्वयं संस्कृत, फारसी, तिब्बती तथा कई अन्य भाषाओं का ज्ञाता था.
  • महाभारत तथा रातरंगिणी का फारसी में अनुवाद करवाया.
  • आबिदीन ने वूलर झील में जैना लंका नामक एक कृत्रिम द्वीप का निर्माण करवाया.
  • उसने समरकन्द में कागज बनाने का कार्य आरंभ करवाया.

हाजी खाँ

  • इसके बाद हाजी खाँ ‘हैदर शाह’ की उपाधि के साथ सिंहासन पर बैठा.
  • हाजी खाँ के शासन-काल में इस वंश का अंत हो गया.

चाक वंश 

  • 1540 में चाकों ने कश्मीर पर शासन करना शुरू किया.
  • बाबर का रिश्तेदार मिर्जा हैदर दोगलत (1540 में) गद्दी पर बैठा.
  • चाक आरंभ में शाहमीर वंश के वजीर थे.
  • 1561 में चाक वजीर ने ‘नसीरुद्दीन मुहम्मद गाजी शाह’ खिताब लिया.
  • अंतिम चाक शासक नसीरुद्दीन मु. यूसुफ गाजी को 1586 में अकबर ने पराजित कर कश्मीर को अपने साम्राज्य में मिला लिया.

राजस्थान

मेवाड़

  • मेवाड़ (राजधानी-नगदा) के गहलौत शासक जैत सिंह (1213-61) ने दिल्ली के इल्तुतमिश के आक्रमण को विफल कर दिया, किन्तु नगदा पूरी तरह ध्वस्त हो गया.
  • इसके बाद चित्तौड़ राजधानी बनी.
  • 1303 ई. में रत्नसिंह अलाउद्दीन खिलजी से अपनी राजधानी हार गया.
  • यह गहलौत वंश के काल में हुआ.

राणा हम्मीर

  • इसके पश्चात् राजवंश की एक छोटी शाखा ‘सिसौदिया’ का शासन शुरू हुआ.
  • राणा हम्मीर ने (1314-78) चित्तौड़ को वापस जीत लिया.
  • इसके शासन ने मेवाड़ के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत की.
  • राणा हम्मीर मुहम्मद-बिन-तुगलक का समकालीन था.
  • हम्मीर के बाद उसका पुत्र क्षेत्रसिंह (1378-1405) मेवाड़ की गद्दी पर बैठा.
  • इसके बाद क्रमशः लक्खा सिंह (1405), मोकल (1418) गद्दी पर बैठे.

राणा कुम्भा

  • 1431 में मोकल की मृत्यु के बाद राणा कुम्भा मेवाड़ की गद्दी पर बैठा.
  • राणा कुम्भा के शासन काल में उसका एक रिश्तेदार रानमल शक्तिशाली हो गया.
  • कुछ इष्र्यालु राजपूत सरदारों ने रानमल की हत्या कर दी.
  • राणा कुम्भा ने अपने प्रबल प्रतिद्वंद्वी मालवा के शासक को परास्त कर 1448 ई में चित्तौड़ में एक ‘कीर्ति स्तंभ‘ की स्थापना की.
  • राणा कुम्भा (कुम्भकरण) एक वीर योद्धा, सफल सेनानायक, संस्कृति तथा साहित्य के महान संरक्षण, वेद, उपनिषद्, स्मृति, मीमांसा, व्याकरण, राजनीति तथा साहित्य के ज्ञाता थे.
  • उन्होंने जयदेव की गीतगोविंद पर एक टीका और चंडीसतकम पर एक विवेचना लिखी.
  • सैन्य वास्तुकला में उनकी विशेष रुचि थी.
  • चित्तौड़ की सुरक्षा को मजबूत किया और वहाँ 32 किले बनवाने के साथ कुम्भलगढ़ में एक नए किले की नींव रखी.
  • संस्कृत, प्राकृत तथा तीन अन्य स्थानीय भाषाओं में चार नाटकों के रचयिता कुम्भा की हत्या 1473 ई. में उनके पुत्र ने कर दी.

राजमल (1473-1509)

  • राजपूत सरदारों के विरोध के कारण राणा उदय अधिक दिनों तक सत्ता का सुख नहीं भोग सका.
  • उसके बाद उसका भाई राजमल (1473-1509) गद्दी पर बैठा.

राणा संग्राम सिंह (राणा सांगा)

  • 1509 में उसकी मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र राणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) मेवाड़ की गद्दी पर (1509-1598) बैठा.
  • 1527 ई. में खानवा के युद्ध में वह मुगल बादशाह बाबर से हार गया.
  • इसके पश्चात् योग्य शासक के अभाव में जहाँगीर ने अपने साम्राज्य में मिला लिया.
  • इस मेवाड़ की स्थैापना राठौर शासक चुन्द ने की थी.

मारवाड़

  • जोधपुर की स्थापना मेवाड़ के संस्थापक चुन्द के बेटे जोधा ने की तथा उसे मारवाड़ की राजधानी बनाया.
  • मारवाड़ का सबसे महान शासक मालदेव (1539-62) था.
  • जिसके शासन काल में राठौरों की शक्ति अपनी चरम सीमा पर थी.

अन्य राजपूत राज्य

आम्बेर ( आमेर )

  • बाद में जयपुर के नाम से जाना गया.
  • वहाँ के शासक सूर्यवंशी कछवाहा थे तथा अपनी उत्पत्ति भगवान राम से मानते थे.
  • किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से इस राज्य की उत्पत्ति ढंढर राज्य से हुई जिसकी स्थापना दुलह राय ने 10वीं सदी के उत्तरार्द्ध में की थी.
  • इस वंश के शासक भारमल ने अकबर की सत्ता स्वीकार की तथा इसके पुत्र भगवान दास तथा पोता मान सिंह ने मुगल साम्राज्य को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योग दिया.

गुजरात

  • अलाउद्दीन खिलजी ने 1297 में गुजरात के शासक राजा रायकन (कर्ण) को पराजित कर इसे दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिया.

जफर खा (मुजफ्फर शाह)

  • 1391 में मुहम्मद-बिन-तुगलक द्वारा नियुक्त गुजरात के सूबेदार जफर खा ने 1401 में तुगलक वंश के शासकों की कमजोरी का फायदा उठाकर सल्तनत की अधीनता को अस्वीकृत कर दी.
  • 1407 में वह ‘सुल्तान मुजफ्फरशाह’ की उपाधि धारण कर गुजरात का स्वतंत्र सुल्तान बन बैठा.
  • उसने मालवा के शासक हुसंग शाह को पराजित कर उसकी राजधानी धार पर कब्जा कर तिया .

अहमदशाह

  • 1411 ई. में मुजफ्फर शाह की मृत्यु के पश्चात् उसका पोता (तातार खाँ का पुत्र) अहमद ‘अहमदशाह’ की पदवी ग्रहण का सिंहासनारुड़ हुआ.
  • अहमदशाह गुजरात का वास्तविक संस्थापक माना जाता है.
  • अहमदशाह ने मालवा, आसीरगढ़ तथा राजपूताना के अनेक राज्यों पर विजय प्राप्त की.
  • अहमदशाह ने असाचल के नजदीक अहमदनगर नामक एक नगर की स्थापना की.
  • अहमदशाह ने हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया तथा गुजरात में पहली बार जजिया लगाया.
  • अहमदशाह वास्तुशास्त्र का महान संरक्षक था.
  • अहमदशाह ने राजधानी अहिलवड़ा से अहमदनगर परिवर्तित की.

महमूद शाह I बेगड़ा (1458-1511)

  • गुजरात का सबसे महान् शासक महमूद शाह I (1458-1511) था.
  • महमूद शाह I ने दो शक्तिशाली राजपूत गढ़ों (किलों) गिरनार व जूनागढ़ तथा चम्पानेर के किलों को जीता.
  • इसके बाद इसे ‘बेगड़ा’ की उपाधि मिली .
  • गिरनार के समीप मुस्तफाबाद की स्थापना कर अपनी राजधानी बनायी .
  • बेगड़ा ने चम्पानेर के पास महमूदाबाद की स्थापना की.
  • चम्पानेर के निकट उसने एक विशाल ‘बाग-ए-फिदौस’ (स्वर्गिक उपवन) की स्थापना की.
  • संस्कृत विद्वान कवि उदयराज उसका दरबारी कवि था .
  • धार्मिक रूप से असहिष्णु बेगड़ा ने गुजरात के समुद्र तटों पर बढ़ रहे पुर्तगाली प्रभाव को कम करने के लिए मिस्र नौसेना की सहायता लेकर पुर्तगालियों से संघर्ष किया, किन्तु सफलता नहीं मिली .
  • बारबोसा एवं वार्थेमा ने बेगड़ा के विजय की रोचक जानकारी दी है.

खलीलखाँ ( मुजफ्फरशाह )

  • 23 नवम्बर, 1511 को इसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र खलीलखाँ ‘मुजफ्फरशाह ‘ की उपाधि के साथ सिंहासन पर बैठा.
  • मेवाड़ के सांगा से उसका युद्ध हुआ .

बहादुरशाह (1526-37)

  • अप्रैल 1526 में मुजफ्फरशाह की मृत्यु के बाद बहादुरशाह (1526-37) गद्दी पर बैठा .
  • 1531 में उसने मालवा को जीतकर गुजरात में मिला लिया.
  • यह उसकी महान सैनिक उपलब्धि थी.
  • 1534 में उसने चित्तौड़ पर आक्रमण किया.
  • 1535 में मुगल शासक हुमायूँ ने उसे पराजित कर गुजरात से बाहर खदेड़ दिया.
  • 1537 ई. में पुर्तगालियों ने उसकी हत्या कर दी.
  • अकबर ने 1572-73 ई. में गुजरात को मुगल सत्ता के अधीन कर लिया.

मालवा

दिलावर खाँ

  • गुजरात की तरह मालवा भी अंतिम तुगलकों के समय स्वाधीन हो गया.
  • ऐसा 1401 ई. में दिलावर खाँ ने किया, जिसे फिरोज तुगलक ने 1390 ई. में मालवा का सूबेदार बनाया था.
  • इसके पूर्व 1310 ई. में ही अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा को अपने अधीन किया था.

अलप खाँ (हुसंगशाह)

  • 1405 ई. में दिलावर खाँ की मृत्यु तथा तैमूर के भारत से लौटने के पश्चात् दिलावर का पुत्र अलप खाँ ‘हुसंगशाह’ की उपाधि धारण कर मालवा का सुल्तान बना .
  • हुसंगशाह ने अपनी राजधानी को धारा से माण्डू हस्तांतरित किया.
  • नरदेव सोनी (जैन) उसका खजांची था.
  • हुसंगशाह महान विद्वान और रहस्वादी सूफी संत शेख बुरहानुद्दीन का शिष्य था.
  • उसके समय में ललितपुर मंदिर का निर्माण हुआ.

गजनी खाँ मुम्मदशाह

  • 1435 ई. में अलपखाँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गजनी खाँ मुम्मदशाह की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा.

महमूदशाह खिलजी

  • उसकी अयोग्यता के कारण उसके वजीर ने उसे अपदस्थ कर ‘महमूदशाह’ की उपाधि से गद्दी पर बैठा.
  • महमूदशाह ने 1436 ई. में मालवा में खिलजी वंश की नींव डाली.
  • महमूद खाँ एक पराक्रमी शासक था, उसने मेवाड़ के राणा कुम्भा ने अपनी विजय का दावा करते हुए विजय की स्मृति में चित्तौड़ में विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया.
  • महमूदशाह ने माण्डू में सात मंजिलों वाले महल का निर्माण करवाया.
  • निःसन्देह महमूद खिलजी मालवा के मुस्लिम शासकों में सबसे अधिक योग्य था.
  • मिस्त्र के खलीफा ने उसके पद को स्वीकार किया तथा महमूद खिलजी ने सुल्तान अबू सईद के यहाँ से आये एक दूतमंडल का स्वागत किया.
  • फरिश्ता उसके गुणों की प्रशंसा करते हुए उसे न्यायी एवं प्रजाप्रिय सम्राट बताता है.
  • कोई भी ऐसा वर्ष नहीं बीतता था जिसमें वह युद्ध नहीं करता रहा हो .
  • फलस्वरूप उसका खेमा उसका घर बन गया तथा युद्धक्षेत्र उसका विश्राम स्थल .

गयासुद्दीन

  • 1469 ई. में महमूदशाह की मृत्यु के बाद गयासुद्दीन गद्दी पर बैठा.

नासिरुद्दीन शाह

  • 1500 ई. के लगभग गयासुद्दीन को उसके पुत्र ने जहर देकर मार दिया और साथ ही नासिरुद्दीन शाह की उपाधि ग्रहण कर मालवा की गद्दी पर बैठा.
  • बुखार के कारण 1512 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.

आजम हुमायूँ ( महमूदशाह द्वितीय )

  • उसकी मृत्यु के बाद इस वंश का अन्तिम शासक आजम हुमायूँ, महमूदशाह द्वितीय की उपाधि ग्रहण कर सिंहासन पर बैठा.
  • गुजरात के बहादुरशाह ने महमूदशाह द्वितीय को युद्ध में परास्त कर उसकी हत्या कर दी.
  • इसी के साथ मालवा का गुजरात में 1531 ई. में विलय हो गया.

मध्यकालीन भारत प्रान्तीय राजवंश (Medieval India – Provincial Dynasty in Hindi)

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बहमनी साम्राज्य पतन के पश्चात् स्वतन्त्र राज्य-बीजापुर,बरार, गोलकुण्डा, अहमदनगर, बीदर

बहमनी साम्राज्य पतन के पश्चात् स्वतन्त्र राज्य-बीजापुर,बरार,गोलकुण्डा,अहमदनगर,बीदर

बहमनी साम्राज्य पतन के पश्चात् स्वतन्त्र राज्य

बीजापुर – युसुफ आदिलशाह

  • 1489 ई. में युसुफ आदिलशाह ने बीजापुर में स्वतन्त्र आदिलशाही वंश की स्थापना की.
  • युसुफ आदिलशाह ने महमूद गवाँ की सेना में उच्च पद प्राप्त किया तथा बहमनी साम्राज्य के पतन के पश्चात् स्वतन्त्र शासक बन गया.
  • युसुफ आदिलशाहने हिन्दुओं के साथ अच्छा व्यवहार किया तथा उन्हें उच्च पदों पर भी नियुक्त किया.
  • इस्माइल, मल्लू, इब्राहिम प्रथम, अली इब्राहिम द्वितीय, मुहम्मद अली द्वितीय आदि इस वंश के अन्य सुल्तान हुए.
  • इस वंश के सुल्तान महमूद आदिलशाह का मुगल सम्राट् शाहजहाँ से संघर्ष हुआ था.
  • 1686 ई. में औरंगजेब ने बीजापुर को मुगल साम्राज्य में विलीन कर दिया.
  • आदिलशाही सुल्तानों ने स्थापत्य कला के क्षेत्र में काफी योगदान दिया.
  • बीजापुर में इन सुल्तानों के काल में खास मस्जिद, गगन महल, इब्राहिम द्वितीय का मकबरा आदि प्रमुख इमारतें हैं.
  • फरिश्ता (मुहम्मद कासिम) ने इन्हीं सुल्तनों के संरक्षण में ऐतिहासिक ग्रन्थ ‘तारीख-ए-फरिश्ता‘ की रचना की.

बरार – फतेहउल्लाह इमादशाह

  • 1490 ई. में फतेहउल्लाह इमादशाह ने बरार में स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया.
  • फतेहउल्लाह इमादशाह ने स्वतन्त्र इमादशाही राज्य की स्थापना की.
  • इमादशाही वंश के शासकों ने 1574 ई. तक बरार पर शासन किया.
  • 1574 ई. में अहमदनगर के सुल्तान ने बरार को अपने राज्य में मिला लिया.
  • 1596 ई. में अकबर ने इस राज्य को विजित करके इसे अपने अधीन एक अलग सूबा बना दिया.

गोलकुण्डा – कुतुबशाही वंश

  • महमूदशाह बहमनी के शासन काल में ही तेलंगाना के एक तुर्की अफसर ने कुतुबशाही वंश की स्थापना की.
  • उसने 1543 ई. तक शासन किया.
  • उसके पश्चात् क्रमशः जमशेद तथा इब्राहिम शासक बने.
  • इब्राहिम ने गोलकुण्डा का शासन बहुत कुशलतापूर्वक चलाया.
  • उसका विजयनगर साम्राज्य से संघर्ष हुआ.
  • 1687 ई. में औरंगजेब ने इस स्वतन्त्र राज्य पर अपना अधिकार कर लिया.

अहमदनगर – मलिक अहमद

  • मलिक अहमद ने 1490 ई. में अहमदनगर की स्थापना की तथा अपने को स्वतन्त्र शासक घोषित करके निजामशाही वंश की स्थापना की (वह बहमनी साम्राज्य में चुनार का सूबेदार था).
  • मलिक अहमद ने अहमदनगर को अपनी राजधानी बनाया तथा 1499 ई. में उसने दौलताबाद पर भी अधिकार कर लिया.
  • मलिक अहमद ने 1508 ई. तक शासन किया.
  • मलिक अहमद के पश्चात् क्रमशः बुरहान निजामशाह तथा हुसैनशाह शासक बने.
  • हुसैनशाह ने विजयनगर के विरुद्ध संघर्ष में भाग लिया.
  • उसके पश्चात् इस वंश के शासक दुर्बल व अयोग्य सिद्ध हुए.
  • 1600 ई. में अकबर ने अहमदनगर पर विजय पाकर उसके शासक को अपना सामन्त बना लिया तथा 1636 ई. में इस राज्य को पूर्णरूप से मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया.

बीदर – अमीर अलीबरीद

  • 1526-27 ई. में अमीर अलीबरीद ने नाममात्र बहमनी सुल्तान को अपदस्थ करके बीदर में स्वतन्त्र बीदरशाही वंश की स्थापना की.
  • विजयनगर के विरुद्ध ‘तालीकोटा के युद्ध‘ में इस वंश के शासक ने भी बीजापुर, गोलकुडा तथा अहमदनगर की संयुक्त सेनाओं की ओर से भाग लिया.
  • 1618-19 ई. में इस राज्य को बीजापुर में मिला लिया गया.

बहमनी साम्राज्य पतन के पश्चात् स्वतन्त्र राज्य-बीजापुर,बरार, गोलकुण्डा, अहमदनगर, बीदर

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बहमनी साम्राज्य (Bahmani Empires in Hindi)हसन गंगू बहामनी

बहमनी साम्राज्य (Bahmani Empires in Hindi)हसन गंगू बहामनी(Hasan Gangu bahmani)-सुल्तान मुहम्मद तुगलक के शासन काल (1325-51 ई.) में दिल्ली सल्तनत के कई अमीरों ने विद्रोह कर दिए थे.बहमनी साम्राज्य (Bahmani Empires in Hindi)

  • दक्षिण में फारस के सुल्तान बहमनदीन इस्कन्दियार का वंशज ‘हसन गंगू ‘ (हसन गंगू बहामनी)1347 ई. में विद्रोह करके स्वतन्त्र हो गया.
  • हसन गंगू  11 अगस्त, 1347 ई. को अब-ए-मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह की उपाधि धारण करके शासक बना.
  • उसने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया तथा समस्त साम्राज्य को चार बड़े प्रान्तों-बरार, बीदर, दौलताबाद तथा गुलबर्गा में विभाजित किया.
  • 11 फरवरी, 1358 ई. को उसकी मृत्यु हो गई.

उसके पश्चात् क्रमशः

  • मुहम्मद प्रथम (11 फरवरी, 1358 से 21 अप्रैल, 1375 ई. तक),
  • दाऊदशाह (16 अप्रैल, 1378 से 21 मई, 1378 ई. तक),
  • मुहम्मद शाह द्वितीय (21 मई, 1378 से 20 अप्रैल, 1397 ई. तक),
  • गयासुद्दीन उर्फ तहमतन (अप्रैल, 1897 में 14 जून, 1397 ई. तक),
  • शम्सुद्दीन दाऊद द्वितीय (14 जून, 1397 से 11 नवम्बर, 1397 ई. तक),
  • ताजुद्दीन फिरोज (11 नवम्बर 1397 से 22 सितम्बर, 1422 ई.),
  • शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम (22 दिसम्बर, 1422 से 14 जुलाई, 1436 ई. तक),
  • अलाउद्दीन अहमद द्वितीय (14 जुलाई, 1436 से 4 मार्च, 1458 ई. तक),
  • हुमायूँ शाह (4 मार्च, 1458 से 1 सितम्बर, 1461 ई. तक),
  • अहमद हसन तथा रीजेन्सी (30 जुलाई, 1463 से 22 मार्च, 1482 ई. तक) आदि थे.

महमूद तृतीय के पश्चात् उसका बारह वर्षीय पुत्र व उत्तराधिकारी महमूद शाह अयोग्य तथा विलासी शासक सिद्ध हुआ. बहमनी वंश का अन्तिम सुल्तान कलीमुल्लाशाह था.

1527 ई. में उसकी मृत्यु के साथ बहमनी राज्य का भी अन्त हो गया और उसके भग्नावशेषों पर पाँच राज्य उठ खड़े हुए. वे राज्य थे—

  1. बीदर का बीदरशाही राज्य,
  2. बीजापुर का आदिलशाही राज्य
  3. अहमद नगर का निजामशाही राज्य,
  4. बरार का इमादशाही राज्य और
  5. गोलकुण्डी का कुतुबशाही राज्य .

बहमनी साम्राज्य (Bahmani Empires in Hindi) हसन गंगू बहामनी Hasan Gangu bahmani , Ala-ud-Din Hasan Bahman Shah

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विजयनगर साम्राज्य सामाजिक दशा,आर्थिक दशा,कला एवं साहित्य

विजयनगर साम्राज्य सामाजिक दशा,आर्थिक दशा,कला एवं साहित्य

सामाजिक दशा

  • विजयनगर समाज वैदिक और शास्त्रीय परम्पराओं के आधार पर कई वर्गों और जातियों में बंटा था.
  • फिर भी प्रमुख वर्ग चार थे–ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य वर्ण (चेट्टी) तथा निम्न वर्ग .

विजयनगर साम्राज्य-सामाजिक दशा,आर्थिक दशा,कला एवं साहित्य

ब्राह्मण

  • ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था.
  • ब्राह्मणों को कठोर दण्ड से मुक्त रखा गया था.
  • ब्राह्मण सम्मानीय जीवन व्यतीय करते थे और माँस आदि का प्रयोग नहीं करते थे.

क्षत्रिय

  • क्षत्रिय वर्ग के विषय में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है.
  • अनुमानतः कहा जा सकता है कि क्षत्रिय वर्ग के लोग राजाओं, प्रान्तीय और केन्द्रीय उच्चाधिकारियों, सेनापतियों आदि के रूप में कार्य करते थे.

वैश्य वर्ण (चेट्टी)

  • वैश्य वर्ण या मध्यम वर्ग के “चेट्टी” नामक विशाल वर्ग का उल्लेख मिलता है.
  • अधिकांश व्यापार वैश्य वर्ग के हाथ में था.
  • यह समूह (वैश्य वर्ग) लिपिक एवं लेखा कार्य में पूर्णतः दक्ष था.

निम्न वर्ग

  • किसान, जुलाहे, नाई, शस्त्रवाहक, लुहार, स्वर्णकार, मूर्तिकार, बढ़ई आदि निम्न वर्ग में आते थे.
  • डोंगर (बाजीगर), मछुआरों और जोगियों को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था.

ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा चेट्टियों का जीवन उच्च-स्तरीय था, जबकि अन्य लोगों का जीवन स्तर बहुत निम्न था.

स्त्रियों की स्थिति

  • स्त्रियों की स्थिति प्रायः निम्न थी और उन्हें भोग की वस्तु समझा जाता था.
  • कुलीन स्त्रियों को समाज में सम्मानीय स्थान प्राप्त था.
  • वे शिक्षा, नृत्यकला, शस्त्रविद्या आदि में पारंगत होती थीं.
  • अंगरक्षक के रूप में भी स्त्रियों की नियुक्ति की जाती थी.
  • राज-परिवार के लोग स्त्रियों को नौकरानी एवं रखैलों के रूप में रखते थे.
  • वैश्यावृत्ति में स्त्रियों का बहुत बड़ा वर्ग संलग्न था. विधवा स्त्रियों का जीवन बहुत अपमानजनक समझा जाता था.
  • विधवा-विवाह प्रचलित था .
  • पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं था.
  • सम्भवतः सती प्रथा भी प्रचलित थी.

गणिका

  • गणिकाओं का प्रत्येक वर्ण के साथ उल्लेख मिलता है.
  • ये दो प्रकार की होती थीं-
मन्दिरों से सम्बन्धित तथा
स्वतंत्र जीवन-यापन करने वाली

 

विजयनगर साम्राज्य के समाज में अनेक कुप्रथाएं भी प्रचलित थीं, जैसे-

  1. बाल-विवाह,
  2. बहु-विवाह,
  3. सती–प्रथा,
  4. दहेज-प्रथा,
  5. दास-प्रथा आदि .
  • क्रियी दासों को ‘वेसवग’ कहा जाता था.
  • स्त्रियाँ भी दास हुआ करती थीं.
  • नाटक, यक्षगान, शतरंज, पासा खेलना, जुआ खेलना, तलवार बाजी, बाजीगरी, तमाशा दिखाना, मछली पकड़ना, चित्रकारी आदि लोगों के मनोरंजन के साधन थे.
  • लोग माँसाहारी भी थे और शाकाहारी भी .
  • गाय का माँस खाना निषेध था.
  • ब्राह्मण माँस नहीं खाते थे.
  • सूती रेशमी वस्त्रों का प्रचलन था.
  • पुरुष धोती, कुर्ता, टोपी तथा दुपट्टे और स्त्रियाँ धोती एवं चोली पहनती थीं.
  • उच्च वर्ग की स्त्रियाँ पेटीकोट पहनती थीं.
  • केवल धनी व्यक्ति ही जूता पहनते थे.
  • पुरुष एक पैर में कड़ा (गंडपेन्द्र) पहनते थे.
  • जियनगर के राजाओं ने न तो शिक्षा में रुचि ली और न ही विद्यालयों या महाविद्यालयों की स्थापना की.
  • उन्होंने ब्राह्मणों को भूमि दान देकर तथा मन्दिर और मठों को भूमि एवं सम्पत्ति का दान देकर परोक्ष रूप से शिक्षा को बढ़ावा दिया.
  • इस राज्य में चारों वेदों के साथ-साथ पुराणों, इतिहास, नाटक, दर्शन, भाषा, गणित आदि की शिक्षा दी जाती थी.

आर्थिक दशा

  • विभिन्न विदेशी यात्रियों यथा-इटली निवासी निकोली कोण्टी, पुर्तगाल निवासी डोमिंगो पेइज तथा ईरान निवासी अब्दुर्रज्जाक ने विजयनगर साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि की प्रशंसा की है.
  • यहाँ कृषि तथा व्यापार काफी उन्नत स्थिति में थे.
  • कृषि योग्य भूमि व सिंचाई के साधनों की उत्तम व्यवस्था की गई थी.
  • विजयनगर साम्राज्य का व्यापार मुख्यतः मलाया, बर्मा, चीन, अरब, ईरान, अफ्रीका, अबीसीनिया एवं पुर्तगाल से होता था.
  • व्यापार जल तथा स्थल दोनों मार्गों से होता था.
  • अरब, मोती, तांबा, कोयला, पारा, रेशम आदि विदेशों से आयात किया जाता था तथा कपड़ा, चावल, शीरा, चीनी, मसाले, इत्र आदि का यहाँ से निर्यात होता था.
  • उस समय अनेक प्रकार की भूमि अस्तित्व में थी जैसे 

भूमि के प्रकार

कुटगि भूमि

  • भू-स्वामियों द्वारा किसान को पट्टे पर दी गई भूमि .

मठापुर भूमि

  • धार्मिक सेवाओं के बदले ब्राह्मणों, मन्दिरों एवं मठों को दान स्वरूप दी गई भूमि .

उंबलि भूमि

  • गाँव को दी गई लगान मुक्त भूमि.

अमरम भूमि

  • सैनिक तथा असैनिक अधिकारियों को उल्लेखनीय सेवाओं के बदले दी गई भूमि.

रतकोडगे भूमि

  • युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करने वाले को दी गई भूमि.

कला एवं साहित्य

  • विजयनगर के राजाओं ने विभिन्न कलाओं-स्थापत्य कला, नाट्य कला, संगीत कला, चित्रकला आदि को बहुत प्रोत्साहन दिया.
  • कृष्णदेव राय का ‘हजारा मंदिर’ तथा ‘विठ्ठलस्वामी’ का मन्दिर इस काल की स्थापत्य कला के उत्कृष्ठ नमूने हैं.
  • इस काल में नृत्यकला एवं नाट्य कला पर अनेक ग्रन्थों की रचना हुई.
  • राजाओं ने अनेक विद्वानों को संरक्षण दिया.
  • इस काल में संस्कृत, तेलुगु, तमिल तथा कन्नड़ भाषाओं में साहित्य लिखा गया.
  • सायण, माधव, नचन सोम तथा कृष्णदेव राय आदि यहाँ के प्रमुख विद्वान थे.
  • इन्होंने नृत्य कला, व्याकरण, दर्शन, धर्म आदि पर ग्रन्थ लिखे.
  • संक्षेप में विजयनगर राज्य में हिन्दू-धर्म, संस्कृति, प्राचीन दक्षिण भारत की भाषाओं के साहित्य, वास्तुकला, मूर्तिकला तथा संगीत कला को बहुत प्रोत्साहन मिला.

विजयनगर साम्राज्य सामाजिक दशा,आर्थिक दशा,कला एवं साहित्य

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विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन (Administration of Vijayanagara Empires)

विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन (Administration of Vijayanagara Empires)

केन्द्रीय शासन (Central government)

राजा

  • विजयनगर सिद्धान्ततः निरंकुश राजतन्त्र था.
  • राजा ही सम्पूर्ण शक्ति यथा-सैनिक, असैनिक तथा न्यायिक आदि का केन्द्र था.
  • फिर भी राजा की निरंकुशता पर व्यापारिक निगम, धार्मिक संस्थाओं, केन्द्रीय मन्त्री-मण्डल, ग्रामीण संस्थाएं आदि रोक लगाती थीं.
  • धार्मिक दृष्टि से वे सहिष्णु थे.
  • कई बार राजा के चुनाव में मन्त्रियों तथा दरबारियों का बड़ा हाथ होता था.
  • प्रायः राजा प्रजा-हितैषी होता था.

विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन (Administration of Vijayanagara Empires) केन्द्रीय शासन (Central government)

मंत्रिमंडल

  • राजा की शासन कार्यों में सहायता हेतु एक मंत्रिमंडल होता था जिसमें सम्भवतः 20 सदस्य होते थे.
  • मंत्रिमंडल के अध्यक्ष को सभानायक कहा जाता था.
  • शासन कायों को चलाने में मन्त्रिपरिषद् महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी, किन्तु मन्त्रिपरिषद् की सलाह को मानना या न मानना राजा की इच्छा पर निर्भर करता था.
  • ‘दण्डनायक’ अनेक अधिकारियों की विशेष श्रेणी थी, जिसमें सेनापति, न्यायाधीश, गवर्नर अथवा प्रशासकीय अधिकारी आदि शामिल थे.
  • कुछ अन्य अधिकारी कार्यकर्ता कहलाते थे.

केन्द्रीय विभाग और सचिवालय

  • शासकीय कार्यों को अनेक भागों में बाँटा गया था तथा केन्द्र में एक संगठित सचिवालय की व्यवस्था की गई थी.
  • सचिवालय का प्रमुख अधिकारी कर्णिकम या सचिव होता था.
  • केन्द्र में दो कोषागार (छोटा तथा बड़ा) होते थे.
  • छोटे कोषागार में से हर समय व्यय हेतु धन निकाला जा सकता था, किन्तु बड़े कोषागार में बड़ी मात्रा में धन संचित रखा जाता था और बहुत बड़ी जरूरत पड़ने पर ही उससे धन निकाला जाता था.
  • शाही मुद्रा रखने वाला अधिकारी ‘मुद्राकर्ता’ कहलाता था.

राजस्व

  • राजस्व नकदी और जिन्स दोनों रूपों में वसूल किया जाता था.
  1. भूमिकर,
  2. प्रान्तीय गवर्नरों द्वारा भेजे एक वार्षिक कर,
  3. सम्पत्ति कर,
  4. विक्रय कर,
  5. व्यवसाय कर,
  6. विवाह कर,
  7. लाइसेंस शुल्क,
  8. परिवहन कर,
  9. बाजार कर,
  • जुर्माना आदि राज्य की आय के प्रमुख साधन थे.
  • भूमि को कई श्रेणियों में बांटा गया था,

जैसे—

  1. सिंचाई- युक्त भूमि,
  2. सूखी भूमि,
  3. मन्दिरों या ब्राह्मणों की भूमि,
  4. चारागाहों के लिए छोड़ी गई भूमि आदि.
  • भू-राजस्व की मात्रा भूमि की उत्पादकता और उसकी स्थिति को ध्यान में रख कर तय की जाती थी.
  • राज्य की आय को सामान्यतः महल, सेना और धार्मिक मदों पर व्यय किया जाता था.

सैन्य व्यवस्था

  • सेना में मुख्यतया हाथी, घुड़सवार और पैदल सैनिक होते थे.
  • तत्कालीन लेखों के अनुसार तोपखाना तथा जल सेना भी सैनिक संगठन के अंग थे, किन्तु उनके संगठन के विषय में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है.
  • पुर्तगालियों से अच्छे अरबी तथा इरानी घोड़े खरीदे जाते थे.
  • अब्दुर्रजाक के अनुसार,

“इस सेना में सैनिक हर चार महीने पर वेतन पाते थे और किसी भी व्यक्ति को किसी प्रान्त के राजस्व पर हुण्डी के जरिये वेतन भुगतान नहीं किया जाता था.”

पुलिस व्यवस्था

  • विजयनगर साम्राज्य में पुलिस व्यवस्था अच्छी थी और स्थानीय चोरी और अपराधों की जिम्मेदारी उसी प्रकार पुलिस अधिकारियों पर थी जैसे शेरशाह सूरी के काल में थी.
  • शहरों में रात को सड़कों पर नियमित रूप से पुलिस का पहरा और गश्त की व्यवस्था थी .

न्याय विभाग

  • सर्वोच्च न्यायिक शक्ति राजा में निहित थी .
  • अपील के लिए सर्वोच्च संस्था सम्राट की सभा होती थी.
  • प्रायः छोटे-छोटे अपराधों के मामले ग्राम-पंचायतें व जातीय संगठन सुलझा लेते थे.
  • अपराध सिद्ध करने के लिए ऑडियल प्रथा (Ordeal System) (अग्नि परीक्षा आदि) भी प्रचलित थी.

प्रान्तीय शासन

  • साम्राज्य कई प्रान्तों, राज्यों या मण्डला में विभक्त था.
  • सामान्यतः राज परिवार का सदस्य या कोई राजकुमार ही प्रान्त के मुखिया होता था.
  • कुछ प्रान्तों में कुशल और अनुभवी दण्डनायकों को भी शासक नियुक्त किया जाता था.
  • ये गवर्नर या प्रान्तपति नए कर लगाने, पुराने को समाप्त करने या भूमि दान करने, कानून व्यवस्था रखने, राज्य कर वसूल करने, केन्द्र के लिए निर्धारित अंश दान हर वर्ष भेजना आदि कार्य करते थे.
  • प्रान्तीय गवर्नरों को व्यापक अधिकार प्राप्त थे.
  • प्रान्तों में बहुत से क्षेत्र ऐसे भी थे जो अधीनस्थ शासकों द्वारा शासित थे.

नायंकर व्यवस्था

  • इस व्यवस्था में कुछ विशेषताएं दिल्ली सल्तनत कालीन इक्तादार या राजपूत कालीन भू-सामन्त या मध्य कालीन व्यवस्था यूरोपीय सामंत व्यवस्था जैसी होती थी.
  • संभवतः ये अपनी सेना रखते थे और एक निश्चित भू-खण्ड से कर प्राप्त करने का इन्हें अधिकार था.
  • प्रायः इनका एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थनान्तरण नहीं होता था.

आयंगर व्यवस्था

  • प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में बारह प्रशासकीय अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी.
  • इसको सामुहिक रूप से आयंगर कहा जाता था.
  • इन्हें राज्य की ओर से वेतन नहीं दिया जाता था.
  • इनकी सेवाओं के बदले में इन्हें राज्य के करों से पूर्णतः मुक्त रखा जाता था.
  • इनके पद पैतृक थे तथा ये किसी के पास अपने पद को बेचने अथवा गिरवी रखने के लिए स्वतन्त्र होते थे.

स्थानीय शासन

  • प्रान्तों को मण्डलों तथा मण्डलों को जिलों में बांटा गया था.
  • जिले को ‘कोटम’ या ‘वलनाडु’ कहते थे.
  • जिले को ‘परगनों या ‘ताल्लुकों में बांटा गया था जिन्हें ‘नाडु’ कहते थे .
  • प्रत्येक नाडु में पचास-पचास गाव होते थे, जिसे मेलागाँव कहते थे.
  • प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘उर’ कहलाती थी.
  • गाँव को मोहल्लों में बांटा गया था.
  • गाँव के अधिकारियों के पद पैतृक होते थे.
  • ये अधिकारी थे-‘सेन्टेयव’ (गाँव की आय-व्यय की देखभाल करने वाला, “तलस’ (चौकीदार), ‘बेगरा’ (बेगार अथवा मजदूरी की देखभाल करने वाला) आदि .
  • नाडु के सदस्यों को ‘नातवर’ कहा जाता था. इनका अधिकार क्षेत्र अत्यन्त ही विस्तृत था.

विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन (Administration of Vijayanagara Empires)

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Wednesday, October 3, 2018

विजयनगर साम्राज्य (The Vijayanagara Empires)संगम राजवंश,सालुव वंश,तुलुव वंश

विजयनगर साम्राज्य (The Vijayanagara Empires)संगम राजवंश,सालुव वंश,तुलुव वंश-सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल (1324-51 ई.) के अन्तिम समय में मुहम्मद बिन तुगलक की गलत नीतियों के कारण सारे साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गई तथा अनेक प्रदेशों ने स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी.

विजयनगर साम्राज्य (The Vijayanagara Empires)संगम राजवंश,सालुव वंश,तुलुव वंश

 

1336 ई. में पाँच भाईयों (हरिहर, कम्पा प्रथम, बुक्का प्रथम, मारप्पा तथा मदुप्पा के परिवार के दो सदस्यों हरिहर और बुक्का ने दक्षिण में स्वतन्त्र विजयनगर साम्राज्य की नींव डाली .

यहाँ 1336 ई. से 1565 ई. तक तीन राजवंशों-

  • संगम वंश (1336-1485 ई.),
  • सालुव वंश (1485-1506 ई.) तथा
  • तुलुव वंश (1506-1565 ई.) ने शासन किया.

प्रथम दो राजवंश बहमनी साम्राज्य के समकालीन थे, जबकि तीसरा राजवंश बहमनी साम्राज्य के विघटन से बनी पाँच मुस्लिम रियासतों (बीदर, वरार, बीजापुर, अहमदनगर तथा गोलकुण्डा) का समकालीन था. विजयनगर साम्राज्य के मुख्य वंश निम्न हैं-

संगम राजवंश (1336-1485 ई.) Sangama dynasty

हरिहर प्रथम 1336-56 ई. Harihara I (1336–1356 CE) 

  • हरिहर ‘संगम’ का पुत्र था.
  • उसने अपने भाई बुक्का (प्रथम) के साथ मिलकर तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर स्थित अणेगोण्डी के आमने-सामने दो नगर ‘विजय नगर और विद्या नगर’ बसाए.
  • हरिहर ने 18 अप्रैल, 1336 ई. को हिन्दू रीति से अपना राज्याभिषेक किया.
  • उसके द्वारा स्थापित राज्य को आरम्भ में मदुरई और मैसूर के शासकों का सामना करना पड़ा.
  • हरिहर ने बदामी, उदयगिरी एवं गूटी में स्थित दुर्गों को शक्तिशाली बनाया.
  • उसने मदुरा पर विजय पाई तथा होयसल राज्य को भी अपने राज्य में मिलाया. बहमनी राज्य (1346; ई. में स्थापित) से भी उसका संपर्ष हुआ.
  • 1956 ई. में हरिहर की मृत्यु हो गई.

बुक्का प्रथम (Bukka Raya I)

  • हरिहर का उत्तराधिकारी उसका भाई बुक्का प्रथम बना.
  • बुक्का प्रथम (Bukka pratham) ने 1377 ई. तक शासन किया.
  • बुक्का प्रथम ने मदुरा को आपने राज्य में मिलाया.
  • बुक्का प्रथमके शासन काल में विजयनगर और बहमनी राज्यों के मध्य तीन युद्ध (1360, 1365 तथा 1367 ई. में) हुए.
  • बुक्का प्रथम ने ‘वेदमार्ग प्रतिष्ठापक की उपाधि धारण की.
  • बुक्का प्रथमने अपने राज्य की सीमों में और अधिक वृद्धि की.
  • बुक्का प्रथमके साम्राज्य की सीमाओं के अन्तर्गत दक्षिण भारत, रामेश्वरम्, तमिल व चेर प्रदेश भी आ गए थे.

हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई.)Harihara II ಹರಿಹರ ೨ (1377–1404 CE)

  • बुक्का प्रथम के उत्तराधिकारी हरिहर द्वितीय ने ‘महाराजाधिराज’ और ‘राजपरमेश्वर’ की उपाधियाँ धारण की .
  • वह एक महान् विजेता था. उसने कनारा, मैसूर, कांची, त्रिचनापल्ली और चिंगलपट आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की.
  • 1300 ई. में बहमनी राजा फिरोजशाह को पराजित होकर सन्धि के फलस्वरूप विजयनगर साम्राज्य को काफी हर्जाना देना पड़ा.
  • 1404 ई. में उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्रों में हुए उत्तराधिकार हेतु संघर्ष में उसका तीसरा पुत्र देवराय प्रथम सफल रहा.
  • किन्तु कुछ ही समय पश्चात् बुक्का द्वितीय (हरिहर द्वितीय का पुत्र) ने गद्दी छीन ली व 1406 ई. तक शासन किया.

देवराय प्रथम (140G-99 ई.) Deva Raya I 

  • 5 नवम्बर, 1406 ई. को देवराय प्रथम राजा बना.
  • देवराय प्रथम बहमनी शासकों से अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा.
  • देवराय प्रथमने तुंगभद्रा नदी पर सिंचाई की सुविधा हेतु नहरें निकलवाई.
  • देवराय प्रथमके शासन काल में इटली का यात्री निकोलो कोटी विजयनगर की यात्रा पर आया.
  • 1492 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
  • देवराय प्रथमके पश्चात् कुछ महीनों के लिए उसके पुत्र क्रमशः रामचन्द्र तथा वीर विजय राय गद्दी पर बैठे.
  • डॉ. के.ए, नीलकण्ड शास्त्री का मत है कि, “मोटे तौर पर माना जा सकता है कि उसका(वीर विजय राय का) शासन काल पाँच वर्षों (1429-26 ई.) का था.
  • संभवतः वह बहमनी शासक अहमदशाह से पराजित हुआ और उसे बहुत बड़ी रकम हर्जाने के रूप में देनी पड़ी.

देवराय द्वितीय (1426-46 ई.) Deva Raya II 

  • देवराय द्वितीयने 1498 ई. में कोदविंद देश पर विजय प्राप्त की तथा केरल पर भी हमला करके इन्हें अपने साम्राज्य में मिलाया.
  • महान् विजेता होने के साथ देवराय द्वितीय एक अच्छा प्रवन्धक और कला तथा साहित्य का संरक्षक भी था.
  • देवराय द्वितीयने अपनी सेना में मुसलमानों को भर्ती किया, अच्छे अरबी घोड़ों का आयात किया व सैनिकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की.
  • जहाँ सेना में सुधार हुआ वहाँ राज्य की अर्थव्यवस्था पर बोझ भी पड़ा.
  • धार्मिक दृष्टि से वह उदार शासक था.
  • उसने कवियों व साहित्यकारों को भी सरंक्षण दिया .
  • तेलगू कवि श्रीनाथ विजयनगर के राजकवि थे.
  • उसके शासन काल में फारस का प्रसिद्ध यात्री अब्दुरज्जाक विजयनगर आया था.
  • 1446 ई. में इस महान शासक की मृत्यु हो गई.

मल्लिकार्जुन या प्रौढ़ देवराय (1446-66 ई.)

  • देवराय के बाद पहले विजयराय द्वितीय नामक व्यक्ति सिंहासन पर बैठा और उसके शीघ्र ही बाद मई, 1447 ई. में उसका अपना पुत्र मल्लिकार्जुन राजा बना.
  • मल्लिकार्जुन के काल में विजयनगर साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया.
  • मल्लिकार्जुन उड़ीसा के गजपतियों और बहमनी सुल्तानों के आक्रमणों को नहीं रोक सका तथा उसे कई अपमानजनक सन्धियों पर हस्ताक्षर करने पड़े.
  • सम्भवतः जुलाई, 1465 ई. में उसकी मृत्यु हुई.
  • सैनिक दृष्टि से चाहे वह अयोग्य व असफल सिद्ध हुआ किन्तु उसने हिन्दू संस्कृति के प्रति अपने वंश के शासकों का प्रेम बनाए रखा.
  • उसने मन्दिरों तथा ब्राह्मणों को अनुदान दिए .

वीरूपाक्ष द्वितीय (1465-85 ई.)

  • वीरूपाक्ष द्वितीय को संगम वंश का अन्तिम शासक कहा जाता है.
  • वह अत्यन्त विलासी शासक था और उसके शासन काल में विजयनगर साम्राज्य में आंतरिक विद्रोह और ब्राह्य आक्रमण दोनों तीव्र हो गए.
  • ऐसी परिस्थितियों में चन्द्रगिरी के गवर्नर (सामन्त) सालुव नरसिंह ने विजयनगर साम्राज्य की रक्षा की.
  • 1485 ई. में वीरूपाक्ष की उसके पुत्र ने हत्या कर दी.
  • परिस्थतियों का लाभ उठाकर सालुव नरसिंह के सेनानायक नरसा नायक ने राजमहल पर कब्जा करके सालुव नरसिंह को सिंहासन पर बैठने हेतु निमन्त्रण दिया.
  • इस घटना को विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में प्रथम बलापहार कहा जाता है.
  • इसी के साथ संगम वंश का अन्त व सालव वंश का सिंहासन पर अधिकार हो गया.

 

सालुव वंश (1486-1505 ई.) Saluva dynasty

सालुव नरसिंह (1486-99 ई.) Saluva Narasimha

  • सालुव नरसिंह ने विजयनगर साम्राज्य को संभावित विनाश से बचाया.
  • सालुव नरसिंह आंतरिक शत्रुओं पर अधिकार कर सका, किन्तु उड़ीसा के पुरुषोत्तम गजपति से पराजित हुआ व बन्दी बनाया गया.
  • फलस्वरूप उसे उदयगिरी का किला और आस-पास के क्षेत्र पुरुषोत्तम को सौंपने पड़े.
  • सालुव नरसिंह ने अरबी घोड़ों का आयात पुनः आरंभ किया.
  • उसे तुलुप्रदेश होनावर बट्टकुल, बाकनुर तथा मंगलोर के बन्दरगाहों को जीतने में सफलता मिली.
  • 1491 ई. में सालुव नरसिंहकी मृत्यु हो गई.
  • उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र इम्माड़ि नरसिंह राजा बना.

इम्माड़ि नरसिंह

  • इम्माड़ि नरसिंह अल्पायु का था अतः सेनापति नरसा नायक ने उसका संरक्षक बनकर सारी शक्ति अपने हाथों में एकत्र कर ली.
  • कालान्तर में उसने इममड़ि नरसिंह को पेनुकोंडा के किले में कैद कर लिया.
  • नरसा नायक ने राचूर दोआव के अनेक किलों पर अपना अधिकार कर लिया तथा चोर, पाण्डुय व चेर राज्यों पर आक्रमण करके इन्हें अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु बाध्य किया.
  • 1503 ई. में रीजेंट नरसा नायक का देहांत हुअ .
  • वीर नरसिंह ने सालुव नरसिंह के अयोग्य पुत्र को पदच्युत करके राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया व तुलुव वंश की स्थापना की.
  • इस घटना को विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में ‘द्वितीय अपहरण‘ कहते हैं.

तुलुव वंश (1505-65 ई.) Tuluva dynasty

वीर नरसिंह 1505-09 ई.

  • तुलुव वंश के संस्थापक वीर नरसिंह का समस्त शासन-काल आन्तरिक विद्रोहों व बाह्य आक्रमणों से प्रभावित था.
  • 1509 ई. में उसकी मृत्यु हो गई तथा उसका चचेरा भाई कृष्णदेव राय राजा बना.

कृष्णदेव राय 1509-30 ई.(विजयनगर साम्राज्य) Krishnadevaraya 

  • इसे (कृष्णदेव राय) तुलुव वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है तथा कृष्णदेव रायकी गणना विजयनगर साम्राज्य के सर्वश्रेष्ठ राजाओं में की जाती है.
  • 1513 ई. में उसने उड़ीसा के राजा गजपति प्रतापरुद्र को पराजित किया व 1514 ई. में उदयगिरी के किले पर अधिकार किया.
  • फिर उसने कोडविन्दु और कोडपल्ली पर अधिकार किया तथा 1520 ई. में बीजापुर को जीता और गोलकुण्डा के दुर्ग को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया.
  • इस प्रकार विजयनगर का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण दक्षिण के राज्यों में सर्वोच्च हो गया.
  • कृष्णदेव राय ने पुर्तगाली शासक अलबुकर्क के अनुरोध पर उसे भट्टकल में दुर्ग के निर्माण की आज्ञा दे दी.
  • पुर्तगाली यात्री डोमिंगोस पाइस (Domingos Paes) ने उसके व्यक्तित्व की भूरि-भूरि प्रशंसा की है.
  • 1529 ई. में कृष्णदेव राय की मृत्यु हो गई.
  • कृष्णदेव राय एक महान योद्धा व कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक तथा कला का संरक्षक भी था.
  • कृष्णदेव राय एक महान् विद्वान और कवि भी था.
  • कृष्णदेव राय ने तेलुगू में ‘आमुक्तमाल्यद’ नामक कविता लिखी.
  • अल्लसानी पेडना उसका राजकवि था.
  • कृष्णदेव राय ने गौपुर टावर का निर्माण करवाया.
  • कृष्णदेव राय ने नागलापुर नामक नगर बसाया तथा सिंचाई और पानी की व्यवस्था के लिए अनेक तालाब बनवाए.
  • कृष्णदेव राय के प्रसिद्ध दरवारी तेनालीराम कृष्ण ने “पाँडुरंग महात्म्य‘ की रचना की.
  • ‘पॉडुरंग महात्म्य’ की गणना पाँच महाकाव्यों में की जाती है.
  • कृष्णदेव राय की मृत्यु के पश्चात् विजयनगर साम्राज्य का विघटन आरम्भ हो गया.

अच्युतदेव राय 1529-42 ई.

  • कृष्णदेव राय के पश्चात् उसका भाई अच्युतदेव राय राजा बना.
  • अच्युतदेव राय अत्यन्त दुर्बल व अयोग्य शासक था.
  • फलस्वरूप केन्द्रीय सत्ता कमजोर हो गई और अनेक प्रतिद्वंद्वी दल अस्तित्व में आ गए.
  • 1542 ई. में अच्युतदेव राय की मृत्यु हो गयी तथा उसका नाबालिक पुत्र वेंकेट प्रथम राजा बना तथा उसका मामा तिरूमल उसका संरक्षक बना.
  • थोड़े ही समय में अच्युतदेव के भतीजे सदाशिव, बीजापुर के शासक आदिलशाह और तिरूमल की सांठ-गाँठ के परिणामस्वरूप सदाशिव को विजयनगर का सिंहासन प्राप्त हुआ.

सदाशिव राय 1549-67 ई.

  • सदाशिव राय के शासन काल में शासन की वास्तविक सत्ता रामराय के हाथों में रही.
  • सदाशिव रायने अपनी कूटनीति तथा शक्ति द्वारा अहमदनगर तथा बीजापुर में फूट उत्पन्न कर दी और 1552 ई. का रायचूर और मुद्गल दोनों पर अधिकार कर लिया.
  • 1560 ई. तक विजयनगर दक्षिण की सर्वोच्च शक्ति बन गया.
  • 1543 ई. में राम राय ने बीजापुर के विरुद्ध अहमदनगर और गोलकुण्डा से सन्धि की कालान्तर में उसने अहमदनगर के विरुद्ध बीजापुर तथा गोलकुण्ड एवं बीजापुर को सहयोग दिया, किन्तु उसकी यह नीति असफल रहीं.

तालीकोट का युद्ध

  • बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा तथा बीदर के संयुक्त मोर्चे ने 25 जनवरी 1565 ई. को विजयनगर पर आक्रमण कर दिया.
  • तालीकोट युद्ध को ‘तालीकोटा का युद्ध’, ‘राक्षसी तंगड़ी का युद्ध‘ अथवा ‘बन्नहट्टी का युद्ध‘ के नाम से भी जाना जाता है.
  • तालीकोट युद्ध में संयुक्त मार्च को विजय प्राप्त हुई तथा इसी पराजय के साथ विजयनगर साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया तथा दक्षिण में हिन्दू सर्वोच्चता का अन्त हो गया.
  • युद्ध के परिणामों के प्रतिकूल होने पर भी विजयनगर साम्राज्य लगभग सौ वर्ष तक अस्तित्व में रहा.
  • तिरूमल के सहयोग से सदाशिव ने पेनुकोंडा को राजधानी बनाकर शासन करना शुरू कर दिया तथा 1570 ई. के लगभग यहीं पर तिरूमल ने सदाशिव को अपदस्थ करके आरविडु वंश की स्थापना की.

आरवीडु वंश अथवा अराविदु वंश के प्रमुख शासक थे-

  • तिरूमल राय (1568-72 ई.),
  • श्री रंगा द्वितीय (1614-17 ई.),
  • रामदेव राय (1630-42 ई.) और
  • श्री रंग तृतीय (1642-49 ई.).

1649 ई. में इस राज्य को बीजापुर के सामने आत्म समर्पण करना पड़ा. 1672 ई. में श्री रंगा तृतीय की मैसूर में मृत्यु हो गई. इसी के साथ विजयनगर साम्राज्य का अन्त हो गया.

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Tuesday, October 2, 2018

द्रव्य व उसके गुण (Matter and Its Properties) भौतिक विज्ञान (Physics)

द्रव्य व उसके गुण (Matter and Its Properties) भौतिक विज्ञान (Physics)

  • द्रव्य क्या है? (What is Matter) ?
  • द्रव्य का गतिज सिद्धान्त ( Kinetic theory of Matter )

द्रव्य के गुण (Properties of Matter)

  • आयतन (Volume)
  • घनत्व (Density)
  • विसरण (Diffusion)
  • वाष्पीकरण (Vapourisation)
  • वाष्पीकरण की ऊष्मा (Heat of Vapourisation)

द्रव्य व उसके गुण (Matter and Its Properties) भौतिक विज्ञान (Physics)

द्रव्य क्या है? (What is Matter) 

“Matter has been defined as anything that has mass and occupies Space”

  • ऐसी कोई भी वस्तु जो स्थान घेरती है व जिसमें भार होता है, द्रव्य (Matter) कहलाती है.
  • जैसे लकड़ी, लोहा, हवा, पानी, दूध आदि .
  • ये वस्तु में स्थान घेरती हैं .
  • इन में भार होता है अत: ये द्रव्य हैं .

डाल्टन ने अपने परमाणु-सिद्धान्त के अनुसार बताया कि द्रव्य छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना है तथा इन्हें रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाला अविभाज्य कण बनाते हुए परमाणु (Atom) की संज्ञा दी.

ऐवेग्रादो ने परमाणु (Atom) तथा अणु (Molecule) का अन्तर करते हुए बताया कि एक या अधिक परमाणुओं से मिलकर बनने वाला अणु वह सूक्ष्मतम कण है जो स्वतन्त्र अवस्था में रह सकता है. तथा रासायनिक क्रिया में भाग नहीं लेता, जबकि परमाणु रासायनिक क्रिया में भाग लेता है तथा स्वतन्त्र अवस्था में नहीं रह सकता है.

द्रव्य का गतिज सिद्धान्त ( Kinetic theory of Matter )

द्रव्यों के गतिक सिद्धान्त में निम्नलिखित धारणाएँ हैं. क्योंकि सभी धारणाएँ परमाणुओं तथा अणुओं से संबंधित है जो देखे नहीं जा सकते, इसलिए गतिक सिद्धान्त को गैसों का सूक्ष्मदर्शी माडल कहते हैं. फिर भी गणनायें तथा प्रागुक्तियां जो गतिक सिद्धान्त पर आधारित हैं, प्रयोगात्मक प्रेक्षणों से पूर्णतया मिलती हैं. जिससे इस माडल का सही होना स्थापित होता है.

 

  1. एक गैस में अनन्त संख्या में कण (परमाणु तथा अणु ) होते हैं . जो अत्यंत छोटे तथा एक दूसरे से पर्याप्त दूरी (औसत तौर पर) पर होते हैं जिससे अणुओं का वास्तविक आयतन उनके बीच के रिक्त रथान की तुलना में नगण्य होता है. यह कल्पना गैसों की अधिक संपीड़यता को सरलता से स्पष्ट करती है .
  2. कणों के बीच में कोई आकर्षण शक्ति नहीं होती है इसलिए कण  स्वतंत्रता पूर्वक गति करते हैं . गैसों का फेल कर पूरे स्थान को ग्रहण कर लेने का प्रेक्षण इस धारणा की पुष्टि करता है .
  3. गैस के कण एक स्थान पर नहीं रहते, बल्कि लगातार गति करते रहते हैं. यदि का एक ही स्थान पर रहते तो गैस का निश्चित आकार होता जो हम नहीं पाते हैं .
  4. कण सीधी रेखा में यादृच्छिक गति करते हैं . एक दूसरे से संघट्ट  तथा पात्र की दीवारों से संघट्ट कणों को घुमने की दिशा को परिवर्तित कर देते हैं. इन संघट्टों में यह मान लिया जाता है कि गतिज ऊर्जा में कोई परिणामी कमी नहीं होती यद्यपि  संघट्ट करने वाले कणों में ऊर्जा का स्थानांतरण हो सकता है . (संघट्ट जिनमें कुल गतिज ऊर्जा स्थिर रहती है उन्हें प्रत्यास्थ संघट्ट (Elastic Collision) कहते हैं) यह कल्पना इसलिए की जाती है, क्यो कि यदि गतिज ऊर्जा में कमी होती है तो कणों की गति अन्त में रुक जायेगी. इससे गैस का निपात होगा, जो प्रेक्षित तथ्यों के विपरीत है.
  5. गैस का दाब कणों के पात्र की दीवारों से संघट्टता के कारण होता है.
  6. किसी विशेष समय पर, गैस के विभिन्न कणों की गति भिन्न-भिन्न होती है इसलिए इनकी गतिज ऊर्जा भी विभिन्न होती है. यह कल्पना तर्क संगत है क्यों कि कणों की संख्या अधिक होने से उनमें अधिक संघट्ट होगें . जब कण संघट्ट करते हैं तो उनकी गति में परिवर्तन होता है. यदि सब कणों की प्रारंभिक गति समान होती तो भी आण्विक संघट्टों से यह एक समानता समाप्त हो जाती है . परिणामस्वरूप भिन्न कणों की गति भिन्न होती है, यह लगातार परिवर्तित होती रहती है. फिर भी यह दिखाना संभव है कि यद्यपि अलग-अलग कणों की गति परिवर्तित होती रहती है, फिर भी एक विशेष ताप पर गति का वितरण नियत रहता है. इस वितरण को मैक्सवेल वोल्टजमेन वितरण कहते हैं . ऐसा उस वैज्ञानिक को सम्मान देने के लिए किया गया जिसने इसे सर्वप्रथम खोजा .

द्रव्य के गुण (Properties of Matter)

आयतन (Volume)

  • द्रवों तथा ठोसो का, गैसों के विपरीत निश्चित आयतन होता है.
  • पात्र का आकार तथा माप कुछ भी हो वे अपना आयतन निश्चित रखते हैं .

(The amount of space occupied by a body is called its volume).

घनत्व (Density)

  • द्रव अवस्था में अणुओं का पास होना इस तथ्य का भी स्पष्टीकरण है कि द्रवों का घनत्व तुलनात्मक परिस्थितियों में गैसों के घनत्व से लगभग 1000 गुना अधिक होता है.
  • उदाहरणार्थ 100°C ताप तथा 1atm. दाब पर पानी के घनत्व (0.958 g/cm) की तुलना जल वाष्प के इसी ताप तथा दाब पर घनत्व (0.000588  g/cm) से करते हैं .

विसरण (Diffusion)

  • विसरण  में अणु एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करते हैं .
  • द्रव अवस्था में अणु पास वाले अणुओं से टक्कर करते हैं .
  • गैसों में गति करने वाले अणुओं को कम बाधा पड़ती है .
  • क्यों कि गति के लिए अधिक रिक्त स्थान उपलब्ध है.
  • जब कुछ बूंदे स्याही की पानी में सावधानी से छोड़ी जाती हैं तो स्याही के धब्बों की पानी में स्पष्ट सीमा मिलती है. कुछ समय के पश्चात् रंग पूरे पानी में फैल जाता है. ऐसा होने में समय लगता है.
  • जब ब्रोमीन की एक बूंद को एक पात्र के पेंदे में रखते हैं तो यह तुरन्त वाष्प में परिवर्तित होकर पूरे पात्र में फैल जाता है.
  • गैसीय अवस्था में विसरण अत्यंत शीघ्र होता है.

वाष्पीकरण (Vapourisation)

  • हम जानते हैं कि जब द्रव को खुले पात्र में रखते हैं तो यह धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है क्योंकि द्रव वाष्प में परिवर्तित हो जाता है.
  • इस प्रक्रिया को वाष्पीकरण (Vapourisation) कहते हैं .
  • वाष्पन कैसे होता है? अणु द्रव् की सतह से निकलकर ऊपर के स्थान में चले जाते हैं .
  • द्रव के अणुओं के बीच प्रबल आकर्षण बल होते हुए भी ऐसा होता है.
  • यह समझने के लिए कि अणु कैसे द्रव में से निकल जाते हैं यह ध्यान रखना चाहिए कि द्रव में अणु लगातार गति में हैं तथा उनमें गतिज ऊर्जा होती है .
  • यद्यपि द्रव का ताप एक समान है तथा अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा स्तिर है परन्तु सब अणुओं की गतिज ऊर्जा समान नहीं है.
  • द्रवों में गैसो की भांति गतिज ऊर्जा का वितरण अत्यंत कम से अत्यंत अधिक मान तक होता है.
  • इसके फलस्वरूप सतह पर अणुओं की गतिज ऊर्जा आकर्षण शक्ति से अधिक हो जाती है जिसे अणु द्रव की सतह से ऊपर निकल जाते हैं.
  • यदि ताप को स्थिर रखा जाए तो बचे हुए द्रव में आण्विक ऊर्जाओं का वितरण वही रहेगा तथा अधिक ऊजात्मक अंश द्रव से निकल कर वाष्प अवस्था में जाता रहेगा.
  • यदि द्रव खुले बर्तन में है तो वाष्पीकरण शीघ्र होगा.
  • सतह से निकलने वाले अणुओं की संख्या अंतरा अणुक बल पर निर्भर करती है.
  • जब ये शक्तियां प्रबल होती हैं तो कम अणु निकलते है.
  • वाष्पित होने की प्रवृत्ति अथवा द्रव की वाष्पशीलता द्रव में अंतरआण्विक बल की प्रबलता को बताता हे .

वाष्पीकरण की ऊष्मा (Heat of Vapourisation)

  • किसी द्रव को स्थिर ताप पर वाष्पीकरण के लिए ऊष्मा की जितनी मात्रा चाहिये उसे वाष्पीकरण की ऊष्मा अथवा वाष्पन ऊष्मा कहते है .
  • द्रव में अणुओं के बीच आकर्षण बल की प्रबलता पर इस ऊष्मा की मात्रा निर्भर करती है.
  • पानी की आपेक्षिक वाष्पन ऊष्मा अधिक होती है, क्योंकि इसमें प्रबल आकर्षण बल होता है.
  • जब पानी के एक मोल को पूर्णतया 25°C पर वाष्पीकृत करते हैं तो यह 44,180 जूल (Joule) ऊर्जा अपने बाह्य माध्यम से शोषित करता है.

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