Monday, August 6, 2018

अरबों की सिंध विजय और उसके प्रभाव-मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

अरबों की सिंध विजय और उसके प्रभावडा. स्टैनले लेनपूल के अनुसार “यह एक ऐसी विजय थी जिसका कोई परिणाम नहीं निकला.” डा. ए. एल. श्रीवास्तव का विचार है कि “यह समझना गलत है कि अरब विजय ने भारतवासियों को प्रभावित ही नहीं किया, उसने हमारे देश में इस्लाम का बीज बोया.’ अरबवासी ही सर्वप्रथम इस्लाम के प्रचार के लिए भारत आये थे. सम्भवतः बाद में महमूद गजनवी को उन्हीं से इस्लाम प्रसार की प्रेरणा मिली थी.

 

अरबों की सिंध विजय और उसके प्रभाव-मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

 

अरबों ने 150 वर्ष सिन्ध तथा मुल्तान पर किसी न किसी प्रकार अपना अधिकार रखा. उन्होंने यहाँ के निवासियों से (सम्भवतः जो मुसलमान बन गये थे) वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए तथा अब और भारतीय रक्त को मिश्रित कर दिया. भारतीय तथा अब एक-दूसरे को संस्कृति के सम्पर्क में आये परन्तु इस बात के प्रमाण नहीं मिलते कि उनको संस्कृतियों ने एक-दूसरे के सामाजिक जीवन को बहुत प्रभावित किया हो.

उन्होंने भारतीय किसानों से भूमि छीन कर अरब वासियों को दे दी. सिन्ध मुस्लिम व्यापारियों का केन्द्र बन गया. चाचनामा के अनुसार कई मन सोना भारत से लूटा गया. अनेक मन्दिरों, इमारतों व पूजा-स्थलों को तोड़कर मस्जिदों का निर्माण करवाया गया.

अरबों के अरबों की सिंध विजय से लेकर मध्य युग के अन्त तक प्रायः बराबर सिन्ध पर मुसलमानों का प्रभुत्व रहा, चाहे सुदृढ़ राजनीतिक सत्ता उनके पास थोड़े हो समय रही.

अब व्यापारी भारत के विभिन्न भागों में गए और उन्होंने तुर्को को भारत को आन्तरिक दुर्बलता, राष्ट्रीयता की भावना का अभाव, शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार का अभाव एवं भारतीयों की पारस्परिक घृणा जैसो राजनीतिक कमजोरियों की जानकारी देकर भारत पर आक्रमण हेतु प्रोत्साहित किया.

अरबों को सिन्ध पर विजय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण, स्थायी एवं प्रभावशाली परिणाम सांस्कृतिक ही थे. हैदेत (Hayell) के अनुसार “इस्लाम के यौवन-काल में भारतवर्ष उसका गुरु रस, जिसने उसे अनेक विद्याएं सिखाई और साहित्य, कला इत्यादि को विशेष रूप दिया.” इस विजय के बाद अनेक अरब सन्त, विद्वान तथा फकीर आदि ने भारतीयों के निकट सम्पर्क में आकर दर्शन, विज्ञान, ज्योतिष, गणित, औषधि-विज्ञान आदि में बहुत कुछ सीखा.

हिंदसा संख्या का अरबी नामों का मूल स्थान भारत ही है. यह कार्य विशेष रूप से अब्बासी खलीफा अनमंसूर (753-74 ई.) तथा हारुल (786-809 ई.) के कालों में हुआ. भारतीय विद्वान बहला, मनका, आरीकल, बाजीगर, राजा, अनकू, सिंद्धबाद आदि बगदाद में अनुवाद विभाग में नियुक्त किए गए थे और उन्होंने ज्योतिष, चिकित्सा, रसायन, दर्शन आदि से सम्बन्धित अनेक संस्कृत ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद किया.

भारतीय चिकित्सक भंखर (माणिक्य) ने खलीफा हारून रशीद को उसकी बीमारी से ठीक किया तथा उसे बगदाद में शाही अस्पताल का सर्वोच्च अधिकारी नियुक्त किया गया. खलीफा हारुल रशीद ने ही ‘चरक’, सुश्रुत, वाग्भट्ट तथा माधक्कर नामक भारतीय विद्वानों की औषधि-विज्ञान सम्बन्धी पुस्तकों का अरबी में अनुवाद करवाया.

अरबों ने गणित के क्षेत्र में भारतीयों से ही अंक पद्धति, दशमलव पद्धति और शून्य का प्रयोग सीखा. अरब में शून्य का प्रयोग सर्वप्रथम 873 ई. में हुआ. अरबों ने | भारतीयों से शतरंज का खेल सीखा. भारतीय दर्शन’ की रहस्यवादी विचारधारा का प्रभाव सूफी मुसलमानों पर स्पष्ट नजर आता है.

 

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अरबों की विजय के कारण और उनकी शासन व्यवस्था (MEDIEVAL INDIA)

अरबों की विजय के कारण

(1) अरब सैनिकों को नूतन अरब रणनीति का व्यवहारिक प्रशिक्षण प्राप्त था तथा अरबों के पास अच्छी नस्ल के सैनिक-घोड़े थे.

 

अरबों की विजय के कारण और उनकी शासन व्यवस्था

 

(2) मुहम्मद-बिन-कासिम का योग्य सैनिक नेतृत्व.

(3) राजा दाहिर निरकुंश, अयोग्य, धर्मान्ध व अलोकप्रिय था. उसने अरबों को सिन्धु नदी के पार ही रोकने का प्रयत्न नहीं किया.

(4) इतिहासकार अवध बिहारी पाण्डेय के अनुसार मुहम्मद-बिन-कासिम को मकरान के हाकिम से सैनिक सहायता तथा स्थानीय भौगोलिक जानकारी प्राप्त हुई थी, जो उसकी सफलता में सहायक सिद्ध हुई.

(5) जाटों और बौद्धों को इराक के शासक हज्जात से अभयदान प्राप्त हो गया तथा उन्होंने देशद्रोही मार्ग अपना कर अरबों को सहायता दी.

(6) इतिहासकार ए. एल. श्रीवास्तव के अनुसार, “अरबों की प्रेरणा का मुख्य आधार धार्मिक जोश था जिसमें वे अनुभव करने लगे थे कि ईश्वर ने उन्हें विश्व में इस्लाम का प्रचार तथा काफिरों के विनाश के लिए भेजा है.

(7) कुछ विद्वानों के अनुसार उस समय कुछ ज्योतिषियों ने यह भविष्यवाणी की थी कि भारत में यवनों का शासन अवश्यम्भावी होगा. इसलिए जनता के मनोवैज्ञानिक रूप से निष्क्रिय होकर अरबों का सामना करने का प्रयास न किया.

 

अरबों की शासन व्यवस्था

लगभग 150 वर्ष तक सिन्ध तथा मुल्तान के प्रान्त खलीफा के साम्राज्य के अन्तर्गत रहे. उनकी शासन व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार थीं

प्रान्तों में शासन-

उन्होंने हर प्रान्त के लिए सूबेदार और किले के | लिए किलेदार नियुक्त किया तथा उन्हें स्थाई सेनाएं दीं.

आय के चार प्रमुख साधन थे-

खम्स, खराज, जजिया तथा चुंगी.

खम्स -युद्ध में लूट का धन. इसका 20 प्रतिशत या 1/5 भाग खलीफा को भेजकर शेष सैनिकों में बांट दिया जाता था.

खराज-भूमिकर . सिंचित भूमि पर उपज का 2/5 भाग तथा अन्य स्थानों पर 1/4 भाग भूमिकर के रूप में लिया जाता था.

जजिया-जिन लोगों ने इस्लाम धर्म ग्रहण नहीं किया था (स्त्रियों, ब्राह्मणों और बच्चों को छोड़कर) उन सबसे जजिया लिया जाता था. जजिये की तीन दर थीं-48 दिरहम, 24 दिरहम और 12 दिरहम. सामाजिक दशा और कर देने की क्षमता के आधार पर भेद किया जाता था.

चुंगी-यह राज्य की आय का चौथा प्रमुख साधन था. सम्भवतः गैर मुस्लिम व्यापारियों के माल पर दोगुनी चुंगी ली जाती थी.

 

न्याय

न्याय का कार्य काजी शरीयत एवं कुरान के नियमों के आधार पर करते थे. ‘गाँवों में पंचायतें’ और ‘प्रान्तों में सूबेदार काजियों की सहायता से’न्याय करते थे. दण्ड कठोर थे.

सेना

सेना में घोड़ों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया. सुरक्षा की दृष्टि से अरबों ने सेना को सदैव सजग और सुदृढ रखा. सम्भवतः भारतीयों को भी सेना में भर्ती किया गया था परन्तु महत्वपूर्ण पदों पर केवल मुस्लिमों को ही नियुक्त किया गया था.

धार्मिक नीति-

आरम्भ में अरबों ने गैर-मुस्लिमों पर अत्याचार किए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने सोच लिया कि धार्मिक कट्टरता की नीति को अपना कर भारत में शासन करना सम्भव नहीं है. अतः उन्होंने धीरे-धीरे सभी को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की और मन्दिरों को अपवित्र न करने का वचन दिया.

 

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अरबों द्वारा सिंध की विजय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

अरबों द्वारा सिंध की विजय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)चीनी यात्री ह्वेनसाँग के समय सिन्ध में शूद्र शासक का राज्य था. शूद्र वंश का अन्तिम शासक साहसी (Sahasi) था. उसके उपरान्त उसुके ब्राह्मण मन्त्री छाछा (Chhachha) ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी विधवा रानी से विवाह कर लिया. छाछा के पश्चात् क्रमशः चन्द्रदाहिर गद्दी पर बैठे. इसी राजा दाहिर ने सिंध में अरबों का सामना किया.

 

अरबों द्वारा सिंध की विजय MEDIEVAL INDIA

 

अरबों ने 637 ई. में फारस (ईरान) को जीत लिया तो उनका ध्यान भारत की ओर गया. भारत की अपार सम्पत्ति, ईरान से इसकी निकटता, इस्लाम प्रसार का अरबों में जोश तथा भारत की दयनीय राजनीतिक एवम् दोषपूर्ण सामाजिक अवस्था, विदेशी व्यापार पर नियन्त्रण की लालसा आदि ने उन्हें ऐसा करने की प्रोत्साहित किया.

खलीफा उमर साहिब के काल (634-44 ई.) में अरबों ने थाना (बम्बई के समीप) भड़ौच और देवले (सिन्ध) को जीतने का प्रयास किया परन्तु उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली. अरबों ने दूसरा प्रयास 663 ई. में किकान (सिन्ध) को जीतने का किया. 663 ई. से 683 ई. तक के 20 वर्षों में उन्होंने किकान पर 6 बार आक्रमण किये. लेकिन मकरान के अतिरिक्त उन्हें कोई प्रदेश नहीं मिला.

708 ई. में श्रीलंका से ईराक जा रहे एक जहाज को देवल (सिन्ध) के बन्दरगाह के निकट कुछ लुटेरों ने लूट लिया तथा अनेक अरबों को कैद कर लिया. ईराक के गवर्नर हजरत ने सिन्ध के राजा को पत्र लिखा कि “वह लूट का माल वापस करे तथा लुटेरों को उचित दण्ड भी दे.” किन्तु सिन्ध के राजा ने उपेक्षापूर्ण उत्तर लिखा कि ‘‘डाकू मेरे नियन्त्रण से बाहर हैं.” इस उत्तर से चिढ़कर खलीफा तथा अरबों के सम्मान की रक्षा के लिए हज्जाज ने क्रमशः तीन सेनापति भेजे. प्रथम दो को दाहिर ने मार भगाया. तीसरे सेनापति मुहम्मद-बिन-कासिम (हज्जाज का भतीजा व दामाद) को 711 ई. में भेजा गया.

मुहम्मद-बिन-कासिम सिराज व मकरान होता हुआ 712 ई. की बसंत ऋतु में देवल (सिन्ध) के बन्दरगाह पर पहुंचा. राजा दाहिर के भतीजे ने उसका सामना किया किन्तु पराजित हुआ. 3 दिन तक देवल में जन-संहार होता रहा. विजेता को बहुत धन-राशि तथा बुद्ध की शरण में रहने वाली 700 कन्याएं आदि लूट में प्राप्त हुई. यहाँ के मन्दिरों को तोड़ा गया तथा उनके स्थान पर मस्जिदें बनाई गईं. लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया. इसके पश्चात् नीरुन (Nerun) नगर (जो बौद्ध भिक्षुओं के हाथ में था) पर अधिकार कर लिया गया.

सेहवान (Sehwan) में दाहिर के चचेरे भाई बजहरा (Bajhra) ने थोड़े से विरोध के पश्चात् उसकी अधीनता स्वीकार कर ली. उसके पश्चात् अरबों ने जाटों की राजधानी शीसम पर अधिकार कर लिया. इसके पश्चात् मुहम्म्द-बिन-कासिम ने एक देशद्रोही सरदार मोकाह की सहायता से सिन्धु नदी को पार किया और राजा दाहिर पर आक्रमण कर दिया. रावोर के किले के समीप दाहिर ने डटकर उसका सामना किया किन्तु वीरगति को प्राप्त हुआ. दाहिर की विधवा रानाबाई ने 1500 सैनिकों के साथ बड़ी वीरता से रावोर के किले की रक्षा की, किन्तु असफल होने पर उसने जौहर की प्रथा द्वारा अपने सम्मान की रक्षा की.

इसके पश्चात् मुहम्मद-बिन-कासिम ने द्राह्मणाबाद पर आक्रमण किया. दाहिर का छोटा बेटा जयसिंह पराजित होकर चित्तौड़ भाग गया. इसके पश्चात् दाहिर के एक अन्य पुत्र को पराजित करके मुहम्मद-बिन-कासिम ने अरोर (Aror) पर अधिकार किया और इस प्रकार सिन्ध की विजय पूर्ण हुई.

इसके पश्चात् मुल्तान को भी विजय कर लिया गया. कहा जाता है कि एक देशद्रोही एवं भेदिए ने कासिम को मुल्तान के किले में उस जलधारा का पता दे दिया, जहाँ से दुर्ग के लोगों को जल प्राप्त होता था. कासिम ने तुरन्त पानी को रोक दिया और किले के अन्दर के सैनिकों ने तुरन्त आत्म-समर्पण कर दिया. मुल्तान में कासिम को अपार सम्पत्ति मिली. 715 ई. में मुहम्मद-बिन-कासिम की खलीफा सुलेमान ने (किसी बात पर रुष्ठ होकर) हत्या करवा दी.

मुहम्मद-बिन-कासिम की मृत्यु से सिन्ध की विजय अधूरी रह गई. 750 ई. में दमिश्क में एक क्रांति हुई और 761 ई. में उमैय्यदों के स्थान पर अबासिद खलीफा बने. 781 ई. लगभग सिन्ध पर खलीफा का अधिकार नाममात्र भी न रहा. अरब सरदारों ने दो स्वतंत्र राज्य–एक अरोर, मनसूराह अथवा सिन्ध में सिन्धु नदी के तट पर और दूसरा मुल्तान में स्थापित किया .

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इस्लाम का उदय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

इस्लाम का उदय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगम्बर मुहम्मद साहब थे. कुर्रेश जनजाति के हाशिम के पुत्र अब्दुल्ला के यहाँ मुहम्मद साहब का जन्म लगभग 570 ई. में अरब के मक्का नामक स्थान पर हुआ.

 

इस्लाम का उदय MEDIEVAL INDIA

 

उनके जन्म से पूर्व उनके पिता का और उनकी छह वर्ष की आयु में उनकी माता अमीना का देहान्त हो गया था. उनका पालन-पोषण उनके चाचा अबू तालिब ने किया. 25 वर्ष की आयु में उन्होंने 40 वर्षीया धनी महिला खत्रीदा से विवाह किया.

विवाह के पश्चात् भी वे धार्मिक खोजों में लीन रहे. 40 वर्ष की आयु में उन्हें फरिश्ता जिबराईल ने ईश्वर का सन्देश दिया कि वह एक ‘नबी‘ (सिद्धपुरुष) और ‘रसूल‘ (देवदूत) हैं तथा उन्हें संसार में अल्लाह का प्रचार करने के लिए भेजा गया है.

उन्होंने शेष जीवन अल्लाह के संदेश का प्रचार करने के लिए व्यतीत किया. उन्होंने अरबों से प्रचलित अंधविश्वासों व मूर्तिपूजा की घोर निन्दा की. मूर्तिपूजा के समर्थकों ने उनका विरोध किया. फलस्वरूप उन्हें 28 जून, 622 ई. को मक्का छोड़ना पड़ा.

इस घटना को ‘हिजिरा‘ कहा जाता है तथा तभी (जुलाई, 622 ई.) से ‘हिजरी संवत्’ का आरम्भ हुआ.  मक्का छोड़ कर पैगम्बर मुहम्मद साहब मदीना पहुंचे जहाँ उन्होंने एक मस्जिद बनवाई. धीरे-धीरे उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई.

अपने व्यक्तित्व और शान्तिपूर्ण विजयों के कारण मुहम्मद साहब लोकप्रिय होते गए. उन्होंने इस्लाम के विरोधियों के न केवल मदीना पर हुए तीन आक्रमणों को विफल किया, बल्कि शांतिपूर्ण मक्का पर अधिकार भी कर लिया. धीरे-धीरे सभी अरबवासी इस्लाम के अनुयायी बन गए.

इस्लाम के प्रचार से प्रतिद्वंद्वी कबीलों में एकता स्थापित हुई तथा एक बड़े साम्राज्य की स्थापना हुई. अरब साम्राज्य 750 ई. में स्पेन, उत्तरी अफ्रीका, मिस्त्र, लाल सागर के तटवर्ती क्षेत्र से भारत के सिंध एवं अरब सागर के तट तक विस्तृत हो गया. लोग मूर्तिपूजा छोड़ कर ईश्वर की एकता में विश्वास करने लगे.

मुहम्मद साहब ने शुद्ध, पवित्र तथा धार्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए निम्न सिद्धान्त प्रस्तुत किए–एकेश्वरवाद, दिन में पांच बार नमाज पढ़ना, अपनी आय का 1/10 भाग जकात (दान) देना, रमजान के महीने रोजे रखना, जीवन में एक बार हज (मक्का की तीर्थ यात्रा) करना, मूर्तिपूजा का निषेध, मद्य तथा सूअर का मांस निषेध, ब्याज पर रुपये उधार न देना, विवाह व तलाक के लिए निर्धारित नियमों का पालन करना, मानव मात्र में समानता (भाईचारा) तथा नैतिकता में विश्वास आदि.

632 ई. में पैगम्बर मुहम्मद साहब की मृत्यु के पश्चात् उनका कार्य उमैय्यद खलीफाओं क्रमशः

अबुब्रक (632-34 ई.),

उमर साहिब (634-44 ई.),

उस्मान (644-56 ई.) तथा

अली (656-61 ई.) ने सम्भाला.

सीरिया के गवर्नर मुआविया ने चौथे खलीफा के विरुद्ध विद्रोह किया तथा 25 जनवरी, 661 ई. को चौथा खलीफा अली मारा गया. अली के ज्येष्ठ पुत्र हसन ने मुआविया के पक्ष में गद्दी त्याग दी तथा 26 जुलाई, 661 ई. को मुआविया नए खलीफा वने.

पैगम्बर की मृत्यु के 100 वर्षों के अन्दर मुसलमानों ने दो शक्तिशाली साम्राज्यों (ससानिद और बाईजेण्टाइन) को पराजित किया. मुसलमानों का साम्राज्य इतना विशाल हो गया कि खलीफाओं को अपनी राजधानी मदीना से हटाकर दमिश्क बनानी पड़ी.

सन् 750 ई. में अबुल अब्बास के अनुयायियों (अबासिदों) ने एक क्रान्ति का नेतृत्व किया. अब्बुल अब्बास ने खलीफाओं के एक नए वंश की स्थापना की तथा प्रत्येक उमैय्यद वंशी को कारावास में डाला और उनकी हत्या कर दी.

762 ई. में अब्बासियों ने अपनी राजधानी दमिश्क से हटा कर बगदाद बनाई. उल्लेखनीय है कि उमैय्यद लोग सुन्नी शाखा तथा अबासिद लोग शिया शाखा के थे. उमैय्यदों की ध्वजा का रंग श्वेत और अबासिदों की ध्वजा का रंग काला था. अलमंसूर वे हारुन-उर-रशीद अबासिद खलीफाओं में मुख्य थे.

 

इस्लाम का उदय मध्यकालीन भारत (MEDIEVAL INDIA)

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Thursday, August 2, 2018

स्वराजवादी (Swarajists)स्वराज पार्टी की स्थापना (Swaraj Party)

स्वराजवादी (Swarajists)स्वराज पार्टी की स्थापना (Swaraj Party)-असहयोग आन्दोलन और खिलाफत आन्दोलन की समाप्ति के उपरान्त 1922-28 के बीच देश की राजनीति में अनेक घटनाएं घटित हुई. नेताओं के बीच आन्दोलन के बाढ़ की निष्क्रियता से बचने के लिए उठाये जाने वाले कदमों के बारे में गहरे मतभेद थे.

 

स्वराजवादी Swarajists स्वराज पार्टी की स्थापना Swaraj Party

 

एक ओर जहां पंडित मोतीलाल नेहरु और चित्तरंजन दास आदि ने बदली हुई परिस्थितियों में एक नए प्रकार की राजनीतिक गतिविधि का सुझाव देते हुए विधान मंडलों का बहिष्कार समाप्त करके उनमें भाग लेने का सुझाव दिया, ताकि उन्हें राजनीतिक संघर्ष के लिए प्रयुक्त किया जा सके.

दूसरी ओर सरदार पटेल, डा. अंसारी, बाबू राजेन्द्र प्रसाद आदि ने विधान मंडलों में जाने का विरोध किया. इनका मानना था कि इससे जनता के बीच काम की उपेक्षा होगी तथा नेताओं के बीच प्रतिद्वंद्विता पैदा होगी. अत: इन्होंने आम जनता के बीच रचनात्मक कार्यक्रमों पर जोर दिया.

चित्तरंजन दासपंडित मोतीलाल नेहरु ने दिसंबर, 1922 में स्वराज पार्टी की स्थापना (Swaraj Party)की. इसने कौंसिल चुनावों में भाग लेने के अतिरिक्त कांग्रेसी कार्यक्रमों को ही स्वीकार किया. इस कारण स्वराज्यवादियों और अपरिवर्तनवादियों के बीच तीव्र राजनीतिक विवाद उठा खड़ा हुआ.

5 फरवरी, 1924 को स्वास्थ्य खराब हो जाने के कारण गांधीजी जेल से रिहा कर दिए गए. परन्तु वह भी इनके मतभेद दूर करने में असफल रहे. दोनों ही पक्ष 1907 के विभाजन की पुनरावृत्ति से भी बचना चाहते थे. अत: महात्मा गांधीजी की सलाह पर दोनों समूहों ने कांग्रेस के अन्दर रहकर ही अलग-अलग ढंग से काम करने का फैसला किया.

नवम्बर, 1923 के चुनावों में केन्द्रीय धारा-सभा की चुनाव से भरी जाने वाली 101 सीटों में से 42 में स्वराज्यवादियों को विजय प्राप्त हुई. अपने विभिन्न कार्यक्रमों से इन्होंने सरकार के खोखलेपन को उजागर किया तथा जिस समय राष्ट्रीय आन्दोलन फिर से शक्ति जुटाने में लगा रहा, ऐसे समय में उन्होंने राजनीतिक शून्य को भरा. परन्तु वे निरंकुश सरकार की नीतियां बदलवाने में असफल रहे. अतः मार्च, 1926 व जनवरी, 1930 में उन्हें केन्द्रीय धारा-सभा का बहिष्कार करना पड़ा.

अपरिवर्तनवादी इस बीच शांति के साथ रचनात्मक कार्यों में लगे रहे तथा उन्होंने आम जनता को राष्ट्रीय आन्दोलन में जोड़ने के लिए अनेक कार्यक्रम प्रारम्भ किए. इन दोनों के बीच कोई बुनियादी मतभेद नहीं थे तथा बाद में नए राष्ट्रीय संघर्ष के लिए ये दोनों आसानी से एकजुट हो गए.

 

स्वराजवादी (Swarajists)स्वराज पार्टी की स्थापना (Swaraj Party)

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खिलाफत आन्दोलन में बाधा (Suspension of the Khilafat Movement)

खिलाफत आन्दोलन में बाधा (Suspension of the Khilafat Movement)असहयोग आन्दोलन में रुकावट के बाद खिलाफत आन्दोलन भी अप्रासंगिक बन गया. तुर्की की जनता मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में उठ खड़ी हुई और उसने नवंबर, 1922 में सुल्तान को सत्ता से वंचित कर दिया.

 

खिलाफत आन्दोलन में बाधा Suspension of the Khilafat Movement

मुस्तफा कमाल पाशा(Mustafa kemal Pasha) ने तुर्की के आधुनिकीकरण के लिए अनेक कदम उठाये तथा खलीफा का पद समाप्त कर दिया. उसने शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किया, स्त्रियों को व्यापक अधिकार दिए तथा खेती के विकास व आधुनिक उद्योग धन्धों की स्थापना के लिए कदम उठाये.

खिलाफत आन्दोलन अपने आप में अत्यधिक महत्वपूर्ण था. इसके कारण ही मुसलमान राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हुए और इस तरह देश में उन दिनों राष्ट्रीय उत्साह तथा उल्लास का जो वातावरण था उसे बनाने में इसकी भूमिका अग्रणी थी. मुस्तफा कमाल पाशा ने 1924 में खिलाफत को समाप्त कर दिया.

असहयोग आन्दोलन की राष्ट्रीय आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही. इसने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन आन्दोलन का रूप प्रदान किया. प्रोफ़ेसर कूपलैण्ड के अनुसार,-

“महात्मा गांधीजी ने वह काम किया जो तिलक नहीं कर सके थे.”

उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक क्रान्तिकारी आन्दोलन के रूप में परिवर्तित कर दिया. आन्दोलन ने देश को स्वतंत्रता के लक्ष्य की ओर अग्रसर किया.

वैधानिक साधनों द्वारा नहीं या वाद-विवाद और समझौते के द्वारा नहीं, अपितु अहिंसा की शक्ति के द्वारा. महात्मा गांधीजी ने आन्दोलन को क्रान्तिकारी बनाने के साथ लोकप्रिय भी बना दिया. अभी तक आन्दोलन नगरों तक ही सीमित था, परन्तु अब वह ग्रामीण जनता तक पहुंच गया…. महात्मा गांधीजी के व्यक्तित्व ने भारतीय ग्रामों में जागृति उत्पन्न कर दी थी.

आन्दोलन ने लोगों में निर्भीकता व उत्साह का संचार किया. इस दौरान कांग्रेस अनेकों रचनात्मक कार्य करवाने में भी सफल रही. इस प्रकार जनता को अपनी वास्तविक शक्ति का आभास हो गया. आगे चलकर ऐसे ही तरीकों से स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकी.

खिलाफत आन्दोलन में बाधा(Suspension of the Khilafat Movement)

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चौरी-चौरा काण्ड और आंदोलन की वापसी (Chauri-Chaura Incident)

चौरी-चौरा काण्ड और आंदोलन की वापसी (Chauri-Chaura Incident and Retreat of the Movement)-5 फरवरी, 1922 को संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले में चौरी-चौरा नामक स्थान पर एक कांग्रेसी जुलूस पर पुलिस ने गोली चलाई. जिस कारण भीड़ क्रुद्ध और उत्तेजित हो उठी.

 

Chauri-Chaura Incident and Retreat of the Movement चौरी-चौरा काण्ड और आंदोलन की वापसी

कुद्ध भीड़ ने पुलिस थाने पर हमला करके उसमें आग लगा दी. जिस में एक थानेदार समेत 21 सिपाहियों को जिन्दा जला दिया गया. इसके पहले भी देश के विभिन्न भागों में भीड़ द्वारा हिंसा की अनेक घटनाएं हो चुकी थी.

परन्तु इस हिंसक घटना से गांधीजी को बहुत दुःख हुआ तथा उन्हें भय था कि जन उत्साह और जोश के इस वातावरण में आंदोलन आसानी से एक हिंसक मोड़ ले सकता है. गांधीजी ने 12 फरवरी को बाराडोली में कांग्रेस कार्य समिति को एक बैठक बुलाई, जिसमें चौरी-चौरा काण्ड (Chauri-Chaura Incident) के कारण सामूहिक सत्याग्रह व असहयोग आंदोलन स्थगित करने का प्रस्ताव पारित कराया.

प्रस्ताव में रचनात्मक कार्यक्रमों पर जोर दिया गया. जिसमें कांग्रेस के लिए एक करोड़ सदस्य भर्ती कराना, चर्खे का प्रचार, राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना, मादक द्रव्य निषेध, पंचायतें संगठित करना आदि कार्यक्रम सम्मिलित थे.

इस प्रकार गांधीजी द्वारा आंदोलन को अचानक स्थगित कर देने से राष्ट्रवादियों में इसकी मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई. कुछ को गांधीजी में श्रद्धा थी और उन्हें विश्वास था कि आंदोलन पर यह रोक संघर्ष की गांधीवादी रणनीति का ही एक भाग है. दूसरी और अनेक राष्ट्रवादियों ने आंदोलन रोके जाने के निर्णय का कड़ा विरोध किया. लाला लाजपत राय जो कि इस समय जेल में थे. लाला लाजपत राय ने कहा कि –

“किसी एक स्थान के पाप के कारण सारे देश को दण्डित करता कहां तक न्याय संगत है?”

तत्कालीन लोकफ्रिय युवक नेता सुभाषचन्द्र बोस ने लिखा कि-

“ऐसे अवसर पर जबकि जनता का हौसला बहुत ऊंचा था, तब पीछे लौटने का आदेश देना राष्ट्रीय संकट से कम नहीं था”.

पंडित जवाहर लाल नेहरु, सी. आर. दास आदि अनेक नेताओं ने भी ऐसी ही तीखी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की. परन्तु जनता और नेतागण दोनों को गांधीजी में आस्था थी और वे सार्वजनिक रूप से उनके आदेश का उल्लंघन नहीं करना चाहते थे.

अतः गांधीजी के फैसले को थोड़ी-बहुत प्रतिक्रिया के बाद सभी ने स्वीकार कर लिया. इस तरह पहला असहयोग और नागरिक अवज्ञा आंदोलन समाप्त हो गया.

स्थिति का लाभ उठाते हुए सरकार ने कड़े कदम उठाने का निश्चय किया. 10 मार्च, 1922 को चौरी-चौरा काण्ड (Chauri-Chaura Incident) का कारन बताते हुवे महात्मा गाँधी को गिरफ्तार कर उन पर सरकार के प्रति असंतोष भड़काने का आरोप लगाया और उन्हें छः वर्षों की कैद की सजा सुनाई गई. गांधीजी ने ब्रिटिश शासन को कटु आलोचना करते हुए कहा कि-

“अनिच्छापूर्वक मैं इस निष्कर्ष पर पहुचा कि राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भारत पहले जितना असहाय था उससे उसे कहीं अधिक असहाय ब्रिटेन के साथ संबंध ने बना दिया है. निहत्थे भारत के पास किसी भी आक्रमण के प्रतिरोध की शक्ति नहीं है.”

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