Thursday, January 10, 2019

कम्पनी और भारतीय रियासतें (THE COMPANY AND THE INDIAN STATES)

कम्पनी और भारतीय रियासतें (THE COMPANY AND THE INDIAN STATES) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

कम्पनी और भारतीय रियासतें (THE COMPANY AND THE INDIAN STATES) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

कम्पनी और भारतीय रियासतें (THE COMPANY AND THE INDIAN STATES)

  • भारतीय रियासतों और ईस्ट इंडिया कम्पनी के मध्य संबंधों के कई चरण देखने को मिलते हैं.
  • इन भारतीय रियासतों की संख्या 562 थी और इनके अधीन लगभग 7,12,508 वर्ग मील का क्षेत्र था.

कम्पनी का साम्राज्य के लिए संघर्ष (The Company’s Struggle for Empire)

  • 1740 से पूर्व कम्पनी एक व्यापारिक कम्पनी थी.
  • 1740 में फ्रांसीसी गवर्नर जनरल डूप्ले ने भारतीय रियासतों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करके भारत में राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का प्रयल किया.
  • फ्रांसीसी गवर्नर जनरल डूप्ले से प्रेरणा लेकर कम्पनी ने भी भारत में अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए प्रयल आरंभ कर दिए.
  • इस प्रकार का पहला प्रयत्न 1751 में अरकाट का घेरा डालना था.
  • 1757 और 1764 में क्रमशः प्लासी और बक्सर के युद्ध के बाद कम्पनी ने बंगाल में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया.
  • 1765 में मुगल सम्राट शाह आलम ने कम्पनी के निरन्तर बढ़ते हुए प्रभाव को देखते हुए बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी उसे दे दी.

मध्य राज्य की नीति, 1765-1813 (The Policy of Buffer State, 1765-1813)

  • कम्पनी ने अपने निरन्तर बढ़ते साम्राज्य की रक्षा के लिए अपने राज्य के चारों ओर मध्य राज्य स्थापित करने की नीति का अनुसरण किया.
  • वारेन हेस्टिज की यह स्पष्ट नीति थी कि अपने पड़ोसी राज्यों की सीमाओं की रक्षा करो ताकि अपनी सीमाएं सुरक्षित रहे.
  • अत: अफगानों और मराठों से अपनी रक्षा के लिए कम्पनी ने अवध की रक्षा का भार अपने ऊपर इस शर्त के तहत लिया कि अवध का नवाब इस रक्षा के व्यय का बोझ उठाए.
  • इस प्रकार कम्पनी ने अवध की रक्षा से अपने बंगाल को सुरक्षित किया.
  • लार्ड वेल्जली ने भारतीय रियासतों को अपनी रक्षार्थ कम्पनी पर निर्भर करने के लिए बाध्य किया.
  • उसने फ्रांसीसीयों से भारतीय प्रदेशों को बचाने के लिए सहायक संधि की प्रणाली आरंभ की.
  • सहायक संधि की प्रणाली के द्वारा उसने हैदराबाद, मैसूर, तंजौर, अवध, पेशवा, बराड़ भोसले, सिंधिया, जोधपुर, जयपुर, मच्छेड़ी, बूंदी और भरतपुर आदि रियासतों और मराठा सरदारों को अपनी सुरक्षा के लिए कम्पनी पर आश्रित कर दिया.

अधीनस्थ अलगाव की नीति, 1813-57 (The Policy of Subordinate Isolation, 183-57)

  • लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने भारत में ब्रिटिश सर्वश्रेष्ठता के सिद्धान्त का विकास किया.
  • उसने भारतीय रियासतों को अपने विदेशी संबंधों के लिए कम्पनी की मध्यस्थता स्वीकार करने पर बाध्य किया.
  • यद्यपि आन्तरिक मामलों में ये रियासतें स्वतंत्र थी परन्तु इन रियासतों में ब्रिटिश रेजिडेन्टों की नियुक्ति की गई.
  • प्रारंभ में रेजिडेन्ट कम्पनी और रियासत के मध्य सम्पर्क का कार्य करते थे किन्तु आगे चलकर उन रेजिडेन्ट ने इन रियासतों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया.
  • 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा कम्पनी का व्यापारिक स्वरूप समाप्त कर उसे राजनीतिक स्वरूप प्रदान किया गया.
  • इस नवीन स्वरूप के अनुसार साम्राज्यवादी गवर्नर जनरलों ने कुप्रशासन और वास्तविक उत्तराधिकारी की आड़ में भारतीय रियासतों पर कब्जा करना प्रारंभ कर दिया.

अधीनस्थ संघ की नीति, 1858-1935 (The Policy of Subordinate Union, 1858-1935)

  • 1858 में ब्रिटिश सम्राट द्वारा सीधे भारत के शासन का उत्तरदायित्व संभाल लेने के बाद भारत सरकार और इन रियासतों के मध्य संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया.
  • सम्राट ने विलय की नीति और व्यपगत के सिंद्धात को त्यागते हुए यह स्पष्ट किया कि वह अपने प्रदेश का विस्तार नहीं करना चाहता.
  • यह नवीन नीति स्पष्ट रूप से उस राजभक्ति का परिणाम थी जो इन रियासतों के राजाओं ने 1857 के विद्रोह के समय प्रदर्शित की थी.
  • इस नवीन नीति के अनुसार शासक को कुशासन के लिए दण्डित किया जाता था या आवश्यकतानुसार गद्दी से उतार दिया जाता था; किन्तु उसके राज्य का विलय नहीं किया जाता था.
  • इस प्रकार यह भी स्पष्ट कर दिया गया था कि गद्दी पर शासक का पैतृक अधिकार नहीं है.
  • भारतीय राजा को राज्य का प्रभुत्व नहीं वरन् उसका प्रशासन चलाने का कार्य सौंपा जाता था.
  • इसके अलावा उसका शासक बना रहना इस बात पर निर्भर था कि वह ब्रिटिश सम्राट के प्रति अपनी राजभक्ति प्रकट करे.
  • भारत सरकार को इन रियासतों की ओर से युद्ध की घोषणा, तटस्थता और शांति सौध करने का पूर्ण अधिकार था.

राजाओं की परिषद् (The Chamber of Princes)

  • 1905 से इन रियासतों के प्रति भारत सरकार की नीति बहुत सौहार्दपूर्ण एवं सहकारिता की रही.
  • वास्तव में भारत में बढ़ती हुई राजनीतिक व्यग्रता के कारण भारत सरकार के लिए यह स्वाभाविक था कि वह अपने हितों और विशेषाधिकारों की सुरक्षा के लिए भारतीय रियासतों के साथ मिलकर एक संयुक्त मोर्चा बनाए.
  • 1876 में लॉर्ड लिटन ने यह सुझाव दिया था कि भारतीय राजाओं की एक अन्तः परिषद् गठित की जाए ताकि ये लोग वायसराय के साथ सामूहिक हितों के मामलों पर विचार-विमर्श कर सके.
  • किन्तु इंग्लैण्ड में यह सुझाव स्वीकृत न हो सका.
  • आगे चलकर चेम्सफोर्ड सुधारों में लिटन के उक्त सुझाव को मान्यता दी गई.
  • लॉर्ड लिटन के सुझावों का क्रियान्वयन “नरेश मंडल” (Chamber of Princes) के गठन के रूप में किया गया.
  • फरवरी, 1921 में नरेश मंडल का विधिवत् उद्घाटन किया गया.
  • नरेश मंडल में प्रतिनिधित्व के लिए रियासतों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बांटा गया
  1. पूर्ण वैधानिक क्षेत्राधिकार रखने वाली 100 रियासतों को मण्डल में सीधा प्रतिनिधित्व दिया गया.
  2. सीमित वैधानिक क्षेत्राधिकार रखने वाली 127 रियासतों के द्वारा चुने हुए 12 प्रतिनिधियों को मण्डल में प्रतिनिधित्व दिया गया.
  3. शेष 826 रियासतों को जागीरों अथवा सामन्तशाही जागीरों के मालिकों की श्रेणी में रखा गया.
  • यह नरेश मण्डल मात्र एक सलाहकारी और परामर्शदायी संस्था थी.
  • इसका किसी रियासत के आन्तरिक मामलों से कोई संबंध नहीं था.

बराबर के संघ की नीति, 1935 -47 (The Policy of Equal Federation, 1935-47)

  • भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध बढ़ते हुए जन आक्रोश को दबाने के लिए अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों के साथ मिलकर एक संघ के निर्माण की योजना बनायी.
  • किन्तु यह संघ केवल तभी अस्तित्व में आ सकता था जब कम से कम आधी जनसंख्या और ये सारी रियासतें संघ में सम्मिलित हो जाती.
  • 1935 के भारतीय शासन अधिनियम के अनुसार प्रस्तावित समस्त भारत के संघ की संघीय विधानसभा में देसी रियासतों को 325 में से 125 स्थान दिए गए.
  • राज्य परिषद् के 260 में से 104 स्थान इन रियासतों को प्रदान किए गए.
  • किन्तु आवश्यक मात्रा में रियासतों ने संघ में सम्मिलित होना स्वीकार नहीं किया.
  • अतएव प्रस्तावित संघ अस्तित्व में नहीं आ सका.
  • 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की.
  • इस सफलता का प्रभाव इन रियासतों पर भी पड़ा.
  • यहां भी उत्तरदायी सरकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए आन्दोलन होने लगे.

रियासतों का एकीकरण और विलय (Integration and Merger of States)

  • भारतीय रियासतों के भविष्य के संबंध में नीति निर्धारित करना एक कठिन कार्य था.
  • क्रिप्स प्रस्ताव (1942), वेवल योजना (1945), कैबिनेट मिशन (1946), और 20 फरवरी, 1947 की ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली की घोषणा आदि सभी में इन रियासतों के भविष्य पर विचार किया गया था.
  • 20 फरवरी को एटली की घोषणा और 3 जून की लॉर्ड माउण्टबेटन की योजना द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया कि इन रियासतों को यह अधिकार होगा कि वे भारत या पाकिस्तान किसी में भी सम्मिलित हो जाएं.
  • लॉर्ड माउण्टबेटन ने किसी एक रियासत या अनेक रियासतों के संघ को भारत या पाकिस्तान से पृथक एक तीसरी इकाई के रूप में मान्यता देने से इन्कार कर दिया.
  • राष्ट्रीय स्तर पर गठित अंतरिम सरकार में सरदार वल्लभभाई पटेल को रियासती विभाग का मंत्री बनाया गया.
  • सरदार वल्लभभाई पटेल ने इन भारतीय रियासतों की देश भक्ति को ललकारा और इनसे अनुरोध किया कि वे भारतीय संघ में सम्मिलित हो जाएं.
  • उनके कठिन परिश्रम से ये रियासतें भारतीय संघ में सम्मिलित हो गई.

रियासतों का पुनर्गठन (Reorganisation of States)

  • स्वतंत्रता संग्राम के समय कांग्रेस की एक प्रमुख मांग यह थी कि भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाए.
  • स्वतंत्रता के बाद भाषा के आधार पर राज्य पुनर्गठन की मांग ने उग्र रूप धारण कर लिया.
  • 1954 में भारत सरकार ने न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग की नियुक्ति की. आयोग की सिफारिशों के मद्देनजर भारतीय संसद ने 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया.
  • इसके अनुसार 14 राज्य और 6 केन्द्र-शासित प्रदेश बनाए गये.
  • इसके बाद भी समय-समय पर राज्यों एवं संघ-राज्य-क्षेत्रों के स्वरूप में परिवर्तन होता रहा.
  • वर्तमान में भारत में 29 राज्य और 7 केन्द्र शासित प्रदेश हैं.

The post कम्पनी और भारतीय रियासतें (THE COMPANY AND THE INDIAN STATES) appeared first on SRweb.



from SRweb http://bit.ly/2ABjCU7
via IFTTT

उत्तरी-पश्चिमी सीमा (THE NORTH-WEST FRONTIER) आधुनिक भारत

उत्तरी-पश्चिमी सीमा (THE NORTH-WEST FRONTIER) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

उत्तरी-पश्चिमी सीमा (THE NORTH-WEST FRONTIER) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

उत्तरी-पश्चिमी सीमा (THE NORTH-WEST FRONTIER)

  • अफगानिस्तान और सिंध नदी का बंजर प्रदेश भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमा थी.
  • यह सीमा उत्तर में पामीर के पठार से अरब सागर के तट तक फैली थी.
  • इसकी चौड़ाई भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न थी.
  • यह प्रदेश 1200 मील लंबा था.
  • यह क्षेत्र उत्तर-पश्चिम से आए विदेशी आक्रान्ताओं के लिए पांच दरों, यथा-खैबर, कुर्रम, टोची, गोमल और बोलान के मार्ग को छोड़कर एक प्रकार के अभेद्य प्रतिरोध का कार्य करता था.
  • प्रकृति ने इस प्रदेश के साथ बहुत कठोर व्यवहार किया, यहां वर्षा और वनस्पति दोनों ही बहुत थोड़ी होती थी.
  • यहां सर्दी भी बहुत पड़ती थी. जिससे जीवन यापन और कठिन हो जाता था.
  • इस प्रदेश में भिन्न-भिन्न कबीलों के लोग और जनजातियां रहती थी.
  • इनके मध्य आपसी वैमनस्य और वैर प्रायः वंशानुगत आधार पर चलते रहते थे.
  • इस कारण यहां एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना न हो सकी.
  • भारत सरकार ने इस सीमावर्ती क्षेत्र के प्रति कभी भी एक समान और व्यवस्थित नीति का अनुसरण नहीं किया.

प्रारंभिक उत्तर-पश्चिम सीमा नीति (Earlier North West Froritier Policy)

  • सर चार्ल्स नेपियर ने सिंध की 150 मील की सीमा पर बसे बूगली, डोम्बकी, जकरानी एवं बलोची कबाइलियों से रक्षा के लिए स्थान स्थान पर दुर्ग बनाए और इन दुर्गों में सेना भी तैनात की.
  • इसके अलावा उसने इन सीमावासियों को अपनी रक्षा के लिए हथियार भी दिए, किन्तु उसकी यह नीति अधिक सफल सिद्ध न हो सकी.
  • जेकब के काल में यह नीति पूर्णत: परिवर्तित कर दी गई.
  • उसने सभी दुर्ग तुड़वा दिए और सीमावर्ती लोगों को दिए गए हथियार वापस ले लिए.
  • उसने अनियमित घुड़सवारों की दो रेजीमेंट तैयार की.
  • इन रेजिमेन्ट का कार्य इन कबाइलियों पर नियंत्रण रखना था.
  • जेकज की यह व्यवस्था पर्याप्त मात्रा में सफल रही.

पंजाब की सीमा समस्या (The Frontier Problem of Purnjab)

  • पंजाब की सीमा समस्या अधिक जटिल थी.
  • जेकब की प्रणाली द्वारा इस सीमा की रक्षा नहीं की जा सकती थी.
  • इस सीमा का प्रशासन पंजाब सरकार के अधीन था.
  • पंजाब सरकार का एकमात्र उद्देश्य इस सीमा पर शान्ति बनाए रखना था.
  • इस कारण लगभग 25 वर्ष तक किसी अंग्रेज अधिकारी ने सीमा पार करके कबाइली प्रदेश में प्रवेश नहीं किया.
  • पंजाब की सीमा समस्या का दूसरा दौर इन कबाइलियों को सभ्य बनाने के प्रयत्नों से आरंभ हुआ.
  • इन प्रयत्नों के तहत इस प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाई गई, भूमिहीनों को कृषि योग्य भूमि उपलब्ध करवाई गई.
  • इस क्षेत्र में व्यापार के अवसर पैदा किए गए तथा इन कबाइलियों को सेना और पुलिस में सेवा प्रदान करने के अवसर प्रदान किए गए.
  • दूसरी ओर अपराधिक और हिंसक प्रवृत्ति वाले कबाइलियों के विरुद्ध वधिक और वज्र (Butcher and Bolt) की नीति अपनाई गई.
  • इस नीति के तहत दोषी कबाइलियों की फसलें नष्ट कर दी जाती थी.
  • ग्राम जला दिए जाते थे और उनके रक्षात्मक दुर्ग तोड़ दिए जाते थे.
  • किन्तु कबाइलियों को सभ्य बनाने का यह प्रयत्न सफल नहीं हुआ और ये कबाइली पूर्व की तरह उपद्रवी बने रहे .
  • 1876 में लार्ड लिटन के आने के बाद इन कबाइली प्रदेशों में ब्रिटिश हस्तक्षेप प्रारंभ हो गया और शीघ्र ही सामरिक महत्व के अनेक प्रदेशों पर अधिकार कर लिया गया.
  • मेजर सन्टेमन की बलोचिस्तान में गवर्नर अनरल के एजेन्ट के रूप में नियुक्ति के साथ ही बलोचिस्तान के संबंध में ‘समझौते वाले हस्तक्षेप’ (Conciliatory Intervention) की नीति गई.
  • 1876 में क्वेटा पर अधिकार कर लिया गया.
  • लार्ड लैंसडाउन (1888-93) ने लॉर्ड लिटन की नीति को आगे बढ़ाते हुए कश्मीर, बोरी और जाब तक अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया.
  • 1892 में कुर्रम में और 1895-96 में मालाकन्द, टोची और गोमल में ब्रिटिश एजेंसियां स्थापित कर दी गई.

ड्यूरेंट समझौता (The Durand Agreement)

  • ब्रिटिश सरकार की विस्तारवादी नीतियों से अफगान शासक अब्दुरहमान को ब्रिटिश इरादों पर सन्देह होने लगा.
  • लार्ड लेन्सडाउन ने उसके सन्देह का निराकरण करने के लिए 1891 में सर मॉर्टिमर ड्ररेण्ड की अध्यक्षता में एक शिष्टमंडल काबुल भेजा.
  • 1893 में डुरेन्ड ने काबुल की सरकार से एक समझौता किया.
  • इस समझौते के अनुसार अमीर को सहायता के रूप में दी जाने वाली सहायता राशि 12 लाख वार्षिक से बढ़ाकर 18 लाख वार्षिक कर दी गई.
  • उसे अपनी इच्छानुसार विदेशों से हथियार मंगाने की अनुमति भी दी गई.
  • इसके बदले अमीर ने यह वचन दिया कि वह खैबर में रहने वाले अफरीदी, वीजीरी, स्वात, बजौर, दीर और चितराल में रहने वाले कबाइलियों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा.
  • इसी वर्ष भारत सरकार ने गिलगित और चितराल की सीमा को अपने संरक्षण में ले लिया.
  • डुरेण्ड समझौते से आंग्ल-अफगान मैत्री संबंध तो स्थापित हो गए किन्तु उत्तर पश्चिम सीमा पर शान्ति स्थापित न हो सकी.

लार्ड कर्जन की सीमा नीति (Frontier Policy of Lord CurZon)

  • 1899 में लॉर्ड कर्जन भारत का गवर्नर जनरल बना.
  • उसने कबाइलियों के प्रति पूर्व की समस्त नीतियों को त्याग कर एक वास्तविक और व्यवहारिक नीति का अनुसरण किया.
  • उसने सैन्य विकेन्द्रीयकरण के स्थान पर केन्द्रीयकरण और कबाइली-उत्तेजना के स्थान पर उनसे समझौते की नीति अपनाई.
  • लार्ड कर्जन ने नियमित अंग्रेजी सेन्र को खैबर, कुर्रम और वजीरी के प्रदेशों से हटा लिया.
  • किन्तु साम्राज्यिक उद्देश्यों के कारण चितराल से सेना नहीं हटाई गई और गिलगित की सुरक्षा को भी परोक्ष रूप से अपने अधीन रखा गया.
  • उसने कबाइली प्रदेश की रक्षा अंग्रेज अधिकारियों द्वारा प्रशिक्षित कबाइली सेना को सौंप दी .
  • इसके अलावा कर्जन ने अपनी नीति के समर्थन के लिए सीमा के पीछे के प्रदेशों में संचार साधनों का विकास भी किया.
  • 1849 से उत्तर-पश्चिम सीमा का प्रशासन पंजाब सरकार चला रहीं थी.
  • किन्तु यह प्रशासनिक व्यवस्था अधिक व्यवहार कुशल नहीं समझी गई.
  • अत: लार्ड कर्जन ने 1901 में उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती जिलों अर्थात् हजारा, पेशावर, कोहाट, बन्नू और डेरा व कुछ अन्य प्रदेशों को मिलाकर उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त का गठन किया और इस प्रान्त को एक मुख्य आयुक्त के अधीन कर दिया.
  • यह आयुक्त सीधे भारत सरकार के नियंत्रण और निरीक्षण में था.
  • 1932 में इस प्रान्त को गवर्नर के प्राप्त की स्थिति प्रदान की गई.
  • परन्तु लार्ड कर्जन की उक्त सीमा नीति को भी पूर्णतया संतोषजनक नहीं माना गया.
  • अग्रेज अधिकारियों द्वारा प्रशिक्षित कबाइली सेना वह भूमिका नहीं निभा सकी जो अंग्रेजी सेना निभाती.
  • 1908-09 में अफरीदी, मोहम्मद और सूद इत्यादि कबीलों ने अफगानओ के उकसाने घर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया.

The post उत्तरी-पश्चिमी सीमा (THE NORTH-WEST FRONTIER) आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb http://bit.ly/2M2G7Gh
via IFTTT

आंग्ल-अफगान संबंध (ANGLO-AFGHAN RELATIONS) आधुनिक भारत

आंग्ल-अफगान संबंध (ANGLO-AFGHAN RELATIONS) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

आंग्ल-अफगान संबंध (ANGLO-AFGHAN RELATIONS) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

आंग्ल-अफगान संबंध (ANGLO-AFGHAN RELATIONS)

  • ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा तथा पश्चिमोत्तर की ओर एक वैज्ञानिक सीमा की समस्या ने अंग्रेजों को अफगानों से सम्बन्ध स्थापित करने या युद्ध करने पर बाध्य किया .

आंग्ल-अफगान संबंधों का पहला दौर

  • 1836 में ऑकलैण्ड को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया.
  • सितम्बर, 1837 में ऑकलैण्ड ने कैप्टिन एलेक्जैण्डर बर्न्स को काबुल की व्यापारिक यात्रा पर भेजा.
  • वास्तव में एलेक्जैण्डर बर्न्स को काबुल की राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करने के लिए काबुल भेजा गया था.
  • काबुल के अमीर दोस्त मुहम्मद ने अंग्रेजों से प्रार्थना की कि वे उसे महाराजा रणजीत सिंह से पेशावर वापस दिलवा दें.
  • ऑकलैण्ड ने दोस्त मुहम्मद की इस प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया.
  • दोस्त मुहम्मद ने निराश होकर रूस से सहायता प्राप्त की.
  • इस प्रकार एलेक्जैण्डर बर्न्स अपनी योजनाओं में असफल होकर 26 अप्रैल, 1838 को भारत वापस आ गया.
  • बर्न्स की असफलता के बाद ऑकलैण्ड ने रणजीत सिंह और शाहशुजा के साथ मिलकर जून, 1838 में एक त्रिदलीय संधि पर हस्ताक्षर किए.
  • इस संधि के अनुसार शाहशुजा को ऑकलैण्ड ने अपनी सैनिक सहायता से 1840 में काबुल की गद्दी पर बैठा दिया.
  • इसके बदले शाहशुजा ने यह वचन दिया कि वह अपने विदेश संबंध सिख और अंग्रेजों की सलाह से संचालित करेगा.
  • किन्तु स्थानीय जनता ने शाहशुजा को स्वीकार नहीं किया.
  • शीघ्र की अफगानों ने विद्रोह कर दिया और शाहशुजा की सत्ता को समाप्त कर दिया.
  • फरवरी, 1842 तक समस्त अंग्रेजी सेना अफगानिस्तान से वापस आ गई.

आंग्ल-अफगान संबंधों का दूसरा दौर

  • आंग्ल-अफगान संबंधों का दूसरा दौर लॉर्ड एलनबरो से लेकर लॉर्ड नार्थब्रुक के शासन काल तक चलता रहा.
  • आंग्ल-अफगान संबंधों का यह दूसरा दौर जॉन लॉरेन्स की कुशल अकर्मण्यता (Mastery Inativity) की नीति के लिए प्रसिद्ध है.
  • जॉन लारेन्स अफगान मामलों के प्रति उदासीन और रूस की मध्य एशियाई आकांक्षाओं से भली-भांति परिचित था किन्तु वह अफगानिस्तान के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था.
  • उसका यह विश्वास था कि अफगानिस्तान पर पहला आक्रमणकारी चाहे वह अंग्रेज हो या रूसी शत्रु समझा जाएगा तथा दूसरा मित्र.
  • अतः उसने यह नीति निर्धारित की कि सीमाओं पर सेना तैयार रखे ताकि किसी भी परिस्थिति से निबटा जा सके.
  • 1863 में अफगानिस्तान के अमीर दोस्त मुहम्मद की मृत्यु के बाद वहां सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष प्रारंभ हो गया.
  • सितम्बर, 1868 तक दोस्त मुहम्मद का पुत्र शेर अली पूर्णरूप से सत्ता प्राप्त करने में सफल हो गया.
  • उत्तराधिकार के इस संघर्ष में गवर्नर जनरल जॉन लोरेन्स ने न तो किसी का पक्ष लिया और न ही किसी की सहायता की.
  • जब 1868 में शेर अली अमीर बनने में सफल हो गया तो लारेन्स ने उसे प्रचुर आर्थिक और सैनिक सहायता देने का प्रस्ताव किया.
  • लार्ड मेयो और नार्थब्रुक ने लौरेन्स की नीति में कोई खास परिवर्तन नहीं किया.

आंग्ल-अफगान संबंधों का तीसरा दौर

  • आंग्ल-अफगान संबंधों का तीसरा दौर लार्ड लिटन के शासन-काल से प्रारंभ होता है.
  • लार्ड लिटन 1876 में भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया.
  • उसने अफगानिस्तान के अमीर शेर अली को निम्नलिखित संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया.
  1. अमीर अंग्रेजों के साथ एक स्थायी संधि पर हस्ताक्षर करे,
  2. अमीर एक नियमित सहायता राशि अंग्रेजों को प्रदान करे,
  3. अमौर रूस के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करे
  4. शेर अली के छोटे पुत्र अब्दुल्लाजा को शेर अली का उत्तराधिकारी स्वीकार किया जाए
  5. काबुल में एक ब्रिटिश रेजिडेन्ट रखना स्वीकार किया जाए.
  • शेर अली ने इस संधि पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया.
  • लार्ड लिटन ने इसे अपनी अपमानजनक उपेक्षा माना और अफगानिस्तान के विरुद्ध धमकाने की नीति का अनुसरण प्रारंभ कर दिया.
  • कुछ ही समय बाद उसने अफगानिस्तान के विरुद्ध आक्रमण की तैयारी भी शुरू कर दी.
  • नवम्बर, 1878 में आंग्ल-अफगान युद्ध आरंभ हो गया.
  • शीघ्र ही अंग्रेजी सेना ने अफ़गान प्रतिरोध को समाप्त कर दिया.
  • शेर अली भाग कर रूसी तुर्किस्तान पहुंच गया.
  • 21 फरवरी, 1879 को उसकी मृत्यु हो गई.
  • शेर अली के बाद उसके पुत्र याकूब खां को एक अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया.
  • इस संधि के अनुसार याकूब खां को अफगानिस्तान का अमीर स्वीकार किया गया.
  • अमीर ने छह लाख रुपया वार्षिक कम्पनी को देना स्वीकार किया और अपने विदेशी संबंधों में भारत सरकार की मध्यस्थता स्वीकार की.
  • अंग्रेजों की यह विजय स्थायी न रह सकी और 3 सितम्बर, 1879 को काबुल में ब्रिटिश रेजिडेन्ट मेजर केवेगनरी की हत्या कर दी गई.
  • किन्तु अंग्रेजी सेना ने पुनः अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया तथा काबुल, कंधार पर अधिकार कर लिया.
  • अप्रैल, 1880 में ग्लैडस्टन ने ब्रिटेन में उदारवादी दल की सरकार बनाई.
  • लार्ड लिटन ने त्यागपत्र दे दिया और लार्ड रिपन भारत का गवर्नर जनरल बना.
  • इसी बीच शेर अली का भतीजा अब्दुर्रहमान काबुल पहुंच गया.
  • लार्ड रिपन ने उसे काबुल का अमीर स्वीकार कर लिया.
  • अफगानिस्तान को खण्डित करने की लार्ड लिटन की योजनाओं को तिलांजलि दे दी गई.

आंग्ल-अफगान संबंधों का चौथा दौर

  • रूस द्वारा साम्राज्य विस्तार की भावना द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध के बाद भी चलती रही.
  • 1889 में रूस ने पर्व (अफगानिस्तान) पर अधिकार कर लिया.
  • मार्च, 1885 में रूस ने एक अन्य अफगान प्रदेश पंजदेह पर अधिकार कर लिया.
  • रूस की इन विस्तारवादी योजनाओं को समाप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने रूस के विरुद्ध युद्ध की तैयारी आरंभ कर दी.
  • किन्तु रूस ने शीघ्र ही ब्रिटिश सेनाओं के भय से विजित प्रदेश पुनः अफगानिस्तान को लौटा दिए और इस प्रकार संकट टल गया.
  • किन्तु रूस ने दक्षिण और पूर्व की ओर अपना प्रसार जारी रखा और 1895 में पामीर पर अधिकार कर लिया.
  • किंतु ब्रिटिश भय के कारण 1895 के अंत में उसने ऑक्सस नदी को अपनी दक्षिणी सीमा स्वीकार कर लिया.
  • 1907 में आंग्ल-रूस समझौता हुआ.
  • इससे यह निश्चित हुआ की अफगानिस्तान रूस के प्रभाव क्षेत्र से बाहर है.
  • रूस ने यह वचन दीया की वह काबुल में अपने ऐजेन्ट नहीं भेजेगा.
  • काबुल के साथ अपने संबंधों में इंग्लैण्ड की मध्यस्थता स्वीकार करेगा.
  • दूसरी तरफ इलैंड ने बी अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति में कोई परिवर्तन न करने व अपने प्रभाव का रूस के विरुद्ध प्रयोग न करने का वचन दिया.
  • किन्तु अफगानिस्तान का अमीर हबीबुल्लाह इस समझौते से सहमत न था.
  • अतः आंग्ल-अफगान संबंध पुनः टुटने की स्थिति में पहुंच गए.
  • प्रथम महायुद्ध में जर्मनी की घेरा से अमीर ने भारत पर आक्रमण कर दिया.
  • किन्तु वह शीघ्र ही परास्त कर दिया गया.
  • 1921 में एक शांति संधि पर हस्ताक्षर हुए.
  • इस संधि के द्वारा अफगानिस्तान को विदेशी संबंधों के क्षेत्र में पुनः स्वाधीनता प्रदान की गई.
  • 1922 में काबुल और इंग्लैण्ड के मध्य राजनयिक संबंध स्थापित हुए.

The post आंग्ल-अफगान संबंध (ANGLO-AFGHAN RELATIONS) आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb http://bit.ly/2H4priS
via IFTTT

Monday, January 7, 2019

लॉर्ड माउंटबेटन, मार्च 1947-जून 1948 (Lord Mountbatten) आधुनिक भारत

लॉर्ड माउंटबेटन, मार्च 1947-जून 1948 (Lord Mountbatten March 1947-June 1948) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लॉर्ड माउंटबेटन, मार्च 1947-जून 1948 (Lord Mountbatten March 1947-June 1948) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लॉर्ड माउंटबेटन, (Lord Mountbatten)

  • इस समय देश में दंगे हो रहे थे तथा विभाजन की मांग बढ़ रही थी.
  • लॉर्ड माउंटबेटन ने 3 जून, 1947 को घोषणा की कि भारत की समस्या का एकमात्र हल भारत का विभाजन है और यह अनुभव भी किया गया कि भारतीयों के हाथों में शक्ति को हस्तांतरित करने के कार्य को कम-से-कम समय में पूर्ण किया जाय.
  • मई, 1947 में माउंटबेटन ब्रिटिश सरकार के साथ विचार के लिए लन्दन गया. इस प्रकार 15 अगस्त, 1947 को देश विभाजन के साथ स्वतंत्र हो गया.

The post लॉर्ड माउंटबेटन, मार्च 1947-जून 1948 (Lord Mountbatten) आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb http://bit.ly/2TBiuHr
via IFTTT

लॉर्ड वेवल, 1944-1947 (Lord Wavel , 1944-1947) आधुनिक भारत

लॉर्ड वेवल, 1944-1947 (Lord Wavel , 1944-1947) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लॉर्ड वेवल, 1944-1947 (Lord Wavel , 1944-1947) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लॉर्ड वेवल, 1944-1947 (Lord Wavel)

  • 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति हो गई.
  • लॉर्ड वेवल ने जून, 1945 में भारत के मुख्य राजनैतिक दलों के साथ समझौते हेतु शिमला सम्मेलन बुलाया, परन्तु मुस्लिम लीग की मनोवृत्ति के कारण यह असफल रहा.
  • 1945 में इंग्लैंड के चुनावों में मजदूर दल विजयी रहा.
  • मजदूर दलीय सरकार ने 1946 में एक ‘मंत्रिमंडल मिशन’ भारत भेजा.
  • उसने एक अन्तरिम सरकार और संविधान सभा बनाने का सुझाव दिया.
  • संविधान सभा के चुनाव होने के बाद मुस्लिम लीग ने मंत्रिमंडलीय मिशन के प्रस्ताव को मानने से इन्कार कर दिया.
  • अगस्त, 1946 में कलकत्ता में दंगे हुए.
  • 2 सितम्बर, 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अन्तरिम सरकार बनाई.
  • मुस्लिम लीग इसमें देर में शामिल हुई परन्तु बाद में इससे अलग भी हो गई.
  • ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्री एटली ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि उनकी सरकार जून, 1948 से पहले ही भारतीय शासन की बागडोर भारतीयों को सौंप देगी.

लॉर्ड इर्विन, 1926-1931 (Lord Irwin, 1926-1931) आधुनिक भारत 

The post लॉर्ड वेवल, 1944-1947 (Lord Wavel , 1944-1947) आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb http://bit.ly/2CU01Al
via IFTTT

लॉर्ड लिनलिथगो, 1936-1944 (Lord Linlithgow, 1936-1944) आधुनिक भारत

लॉर्ड लिनलिथगो, 1936-1944 (Lord Linlithgow, 1936-1944) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लॉर्ड लिनलिथगो, 1936-1944 (Lord Linlithgow, 1936-1944) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लॉर्ड लिनलिथगो, 1936-1944 (Lord Linlithgow)

  • लॉर्ड लिनलिथगो गवर्नर जनरल बनने से पूर्व भारतीय कृषि के राजकीय आयोग तथा भारतीय वैधानिक सुधारों की संयुक्त प्रवर समिति का प्रधान था.
  • 1935 के भारत सरकार अधिनियम की रूपरेखा तैयार करने में इसका भी सहयोग था.
  • इस अधिनियम के केवल प्रान्तीय भाग को ही लागू किया गया.
  • इसके तहत 1937 में प्रान्तों की एसेम्बलियों के लिए चुनाव हुए.
  • कांग्रेस को इस चुनाव में भारी सफलता प्राप्त हुई.
  • सितम्बर, 1939 में द्वितीय महायुद्ध प्रारम्भ हो गया.
  • सरकार ने सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव कौंसिल की राय के बिना भारत को ब्रिटेन के सहयोगी के रूप में युद्ध में शामिल घोषित कर दिया.
  • विरोधस्वरूप अक्टूबर-नवम्बर 1939 में कांग्रेस की प्रान्तीय सरकारों ने त्यागपत्र दे दिया.
  • 1940 में मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान की मांग पेश की.
  • इसी बीच सुभाषचन्द्र बोस ने गांधीजी के साथ मतभेदों के कारण कांग्रेस छोड़ दी और फारवर्ड ब्लाक की स्थापना की.
  • देश में सत्याग्रह जोरों से चल रहा था.
  • ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से बातचीत व समस्या के समाधान के लिए 1942 में क्रिप्स मिशन भारत भेजा, परन्तु कांग्रेस के साथ इसका कोई समझौता न हो पाने के कारण यह असफल रहा.
  • अगस्त, 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव स्वीकार किया.
  • परिणामस्वरूप नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.

The post लॉर्ड लिनलिथगो, 1936-1944 (Lord Linlithgow, 1936-1944) आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb http://bit.ly/2RbzRBM
via IFTTT

लॉर्ड विलिंगडन, 1931-1936 (Lord Willingdon, 1931-1936) आधुनिक भारत

लॉर्ड विलिंगडन, 1931-1936 (Lord Willingdon, 1931-1936) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लॉर्ड विलिंगडन, 1931-1936 (Lord Willingdon, 1931-1936) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लॉर्ड विलिंगडन, 1931-1936 (Lord Willingdon)

  • लॉर्ड विलिंगडन के काल में मुख्य रूप से संवैधानिक सुधार और राजनैतिक आंदोलन के मुद्दे छाये रहे.
  • संवैधानिक सुधारों के लिए दूसरा गोलमेज सम्मेलन सितम्बर 1931 में प्रारम्भ होकर दिसम्बर में खत्म हुआ.
  • इसमें कांग्रेस की ओर से एकमात्र प्रतिनिधि महात्मा गांधीजी ने भाग लिया, लेकिन विधान सभाओं में साम्प्रदायिक विषय पर मतभेद होने के कारण सम्मेलन में कोई निर्णय नहीं हो सका.
  • अतः अगस्त, 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर अपने फैसले की घोषणा की, जिसे ‘साम्प्रदायिक निर्णय‘ कहते हैं.
  • इसके विरोध में महात्मा गांधीजी आमरण अनशन पर बैठ गये.
  • ऐसी स्थिति में महात्मा गांधी और डॉक्टर बी. आर. अंबेडकर के बीच पूना समझौता हुआ और साम्प्रदायिक निर्णय पर संशोधन किया गया.
  • तीसरा गोलमेज सम्मेलन 1932 में लंदन में शुरू हुआ.
  • इसमें लिए गये निर्णयों के आधार पर ही भारत शासन अधिनियम, 1935 बनाया गया.
  • विलिंगडन अपनी दमनपूर्ण नीतियों के कारण एक घृणित गवर्नर जनरल था.

The post लॉर्ड विलिंगडन, 1931-1936 (Lord Willingdon, 1931-1936) आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb http://bit.ly/2C4dnsc
via IFTTT