Friday, December 7, 2018

सर्वोच्चता के लिए आंग्ल-मराठा संघर्ष (ANGLO-MARATHA STRUGGLE)

सर्वोच्चता के लिए आंग्ल-मराठा संघर्ष  (आंग्ल-मराठा युद्ध) (ANGLO-MARATHA STRUGGLE FOR SUPREMACY) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

सर्वोच्चता के लिए आंग्ल-मराठा संघर्ष (ANGLO-MARATHA STRUGGLE)

  • अपनी-अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए अंग्रेजों और मराठों के मध्य तीन बड़े युद्ध हुए.

सर्वोच्चता के लिए आंग्ल-मराठा संघर्ष (ANGLO-MARATHA STRUGGLE FOR SUPREMACY) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

पहला आंग्ल-मराठा युद्ध, 1775-82 (First Anglo-Maratha war, 1775-82)

  • लार्ड क्लाइव द्वारा बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में स्थापित द्वैध प्रणाली को कम्पनी महाराष्ट्र में भी स्थापित करना चाहती थी.
  • पेशवा माधवराव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नारायण राव पेशवा बना.
  • नारायण राव के चाचा रघुनाथ राव ने नारायण राव के अधिकार को चुनौती दी और स्वयं पेशवा बनने के लिए सूरत की संधि (1775) के द्वारा अंग्रेजों से सहायता प्राप्त की.
  • दोनों पक्षों के मध्य सात वर्ष तक अनिर्णायक युद्ध हुआ.
  • सालबई की संधि (1782) के बाद युद्ध समाप्त हुआ.
  • दोनों पक्षों ने एक दूसरे के विजित प्रदेशों को लौटा दिया.

दूसरा आंग्ल-मराठा युद्ध, 1803-1806 (Second Anglo-Maratha War, 1803-1806)

  • आंग्ल मराठा संघर्ष का दूसरा दौर मुख्य रूप से फ्रांसीसी भय के कारण प्रारंभ हुआ.
  • लार्ड वैल्ज़ली 1798 में भारत आया.
  • उसने यह अनुभव किया कि फ्रांसीसी भय से बचने का एकमात्र उपाय यह है कि समस्त भारतीय राज्यों पर कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित हो जाए.
  • इस उपाय की सफलता हेतु उसने सहायक संधि की प्रणाली का विकास किया.
  • नाना फड़नवीस सहायक संधि के कुपरिणामों को जानते थे.
  • अतः उन्होंने मराठा राज्य को सहायक संधि से दूर रखा.
  • किन्तु 1800 में उनकी मृत्यु के बाद मराठा सरदार अपने आपसी झगड़ों के कारण सहायक संधि की परिधि में आते चले गए.

बसीन की संथि, 1802 (The Treaty of Bassein, 1802)

  1. पेशवा ने अंग्रेजी संरक्षण स्वीकार किया.
  2. भारतीय और अंग्रेज पदातियों की सेना पूना में रख दी गई.
  3. पेशवा ने सूरत नगर कम्पनी को दे दिया.
  4. पेशवा ने निजाम से चौथ प्राप्त करने के अधिकार का त्याग कर दिया.
  5. पेशवा ने निजाम तथा गायकवाड़ के मध्य अपने संबंधों में कम्पनी की मध्यस्थता स्वीकार की.
  6. पेशवा ने ब्रिटिश विरोधी सभी यूरोपीय लोगों को अपनी सेवा से निवृत्त कर दिया.
  7. पेशवा ने अपने विदेशी संबंध भी कम्पनी के अधीन कर दिए.
  • बसीन की संधि के द्वारा पूना में अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो गया.
  • इससे मराठा संघ का एक प्रमुख नेता सहायक संधि के बंधन में फंस गया.
  • इस संधि के द्वारा सहायक सेना मैसूर, हैदराबाद लखनऊ और पूना में तैनात कर दी गई.
  • ये भारत के प्रमुख केन्द्रीय स्थान थे.
  • मराठों के लिए यह घोर राष्ट्रीय अपमान सहना अत्यन्त कठिन था, अतः भोसले, सिंधिया और होल्कर ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी.
  • अंग्रेजों ने शीघ्र ही उन्हें परास्त कर दिया.
  • मराठों की इस पराजय से अंग्रेजों के अधीन मराठों का काफी क्षेत्र आ गया.
  • कुल मिलाकर आंग्ल-मराठा संघर्ष के इस दूसरे दौर से मराठा शक्ति समाप्त तो नहीं हुई किन्तु निर्बल अवश्य हो गई.

तीसरा आंग्ल-मराठा युध्द, 1817-18 (Third Anglo-Maratha war, 1817-18)

  • लार्ड हेस्टिंग्ज के शासन काल में आंग्ल-मराठा संघर्ष का तीसरा चरण आरंभ हुआ.
  • लार्ड हेस्टिंग्ज ने 27 मई, 1816 को नागपुर के राजा अप्पा साहेब को, 13 जून 1817 को पेशवा को तथा 5 नवम्बर, 1817 को सिंधिया को अपमानजनक सहायक संधि स्वीकार करने के लिए बाध्य किया.
  • इन मराठा सरदारों ने विवश होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी.
  • अंग्रेजों ने किक के स्थान पर पेशवा को, सीताबर्डी के स्थान पर भोंसलें को और महीदपर के स्थान पर होल्कर को पराजित कर दिया.
  • पेशवा बाजीराव का समस्त प्रदेश ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया.
  • इसके बाद मराठे कभी सिर न उठा सके.

मराठों की पराजय के कारण (Causes of Defeat of the Marathas)

मराठों की पराजय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे —

अयोग्य नेतृत्व (Inept Leadership)

  • उत्तरवर्ती मराठा सरदारों में कुशल नेतृत्व का पूर्णतः अभाव था.
  • पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अपने निजी स्वार्थों के कारण बसीन की संधि के माध्यम से अपनी स्वखंत्रता गिरवी रख दी.
  • दौलतराव सिंधिया, महादजी सिंधिया का अयोग्य उत्तराधिकारी था.
  • वे मराठा संघ को एक न रख सके.

आर्थिक कारण (Economic Causes) :

  • मराठे एक सुदृढ़ आर्थिक व्यवस्था की स्थापना न कर सके.
  • इस कारण उनकी राजनीतिक व्यवस्था में भी स्थायित्व न रह सका.
  • वास्तव में मराठा अर्थव्यवस्था महाराष्ट्र के साधनों पर नहीं वरन् बलपूर्वक एकत्रित की गई धनराशि पर आधारित थी.
  • मराठा साम्राज्य के उत्कृष्ट सीमा पर पहुंचने से ये साधन समाप्त हो गए.

राजनीतिक व्यवस्था की दुर्बलताएं (weaknesses of Political Set up)

  • मराठा साम्राज्य एक कमजोर संघ था जिसका नेता प्रांरभ में छत्रपतिं और बाद में पेशवा था.
  • पेशवा ने जब छत्रपति की शक्तियों को ग्रहण कर लिया तो उनके अधीनस्थ सरदारों ने पेशवा की शक्तियां प्राप्त कर ली.
  • गायकवाड़, होल्कर सिंधिया और भोंसले जैसे शक्तिशाली सरदारों ने शीघ्र ही अर्धस्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए.
  • इन मराठा सरदारों की पेशवा के प्रति राजभक्ति केवल नाममात्र की ही थी.

सैनिक कारण (Military Causes)

  • मराठा सैन्य संगठन, अस्त्र-शस्त्र, अनुशासन और नेतृत्व की दृष्टि से अंग्रेजी सैन्य संगठन से बहुत पिछड़ा हुआ था.
  • उन्होंने युद्ध की वैज्ञानिक और आधुनिक प्रणाली नहीं अपनाई.
  • वे उत्तम तोपखाना नहीं बना सके.
  • वे एक शक्तिशाली नौसेना का संगठन करने में असमर्थ थे.

ब्रिटिश कूटनीति (British Diplomacy)

  • अंग्रेजों को कूटनीति बहुत उत्तम थी.
  • वे प्रायः युद्ध आरंभ करने से पूर्व शत्रु के मित्रों को अपना मित्र बनाकर अपने शत्रु को अकेला कर देते थे.
  • द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध में उन्होंने सफलतापूर्वक गायकवाड़ और दक्षिण के मराठा जमींदारों को अपनी ओर मिला लिया.
  • उनकी कूटनीति सहायक संधि की प्रणाली में विशेष रूप से देखने को मिली.
  • अपनी कूटनीति से उन्होंने शीघ्र ही भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया.
  • अपनी कूटनीति के द्वारा ही वे फ्रांसीसी चुनौती का सफलतापूर्वक सामना कर सके.

The post सर्वोच्चता के लिए आंग्ल-मराठा संघर्ष (ANGLO-MARATHA STRUGGLE) appeared first on SRweb.



from SRweb https://ift.tt/2BWXNji
via IFTTT

लार्ड हेस्टिंग्ज, 1813-23 (LORD HASTINGS, 1813-23) | आधुनिक भारत

लार्ड हेस्टिंग्ज, 1813-23 (LORD HASTINGS, 1813-23) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लार्ड हेस्टिंग्ज, 1813-23 (LORD HASTINGS, 1813-23)

  • लार्ड हेस्टिाज़ ने भारत में कम्पनी की राजनीतिक सर्वश्रेष्ठता स्थापित की.

लार्ड हेस्टिंग्ज, 1813-23 (LORD HASTINGS, 1813-23) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

आंग्ल-नेपाल युद्ध, 1814-16 (Anglo-Nepal War, 1814-16) 

  • लार्ड हेस्टिंग्ज़ का पहला युद्ध नेपाल से हुआ.
  • 1801 में अंग्रेजों ने गोरखपुर और बस्ती जिलों पर अधिकार कर लिया.
  • नेपालियों ने बस्ती के उत्तर में बटवाल और पूर्व में शिवराज जिलों पर अधिकार कर लिया.
  • अंग्रेजों ने शीघ्र ही इन जिलों को पुनः प्राप्त कर लिया.
  • अंग्रेजों के इस कृत्य से क्रुद्ध होकर नेपाली गोरखों ने मई 1814 में बटवाल जिले की तीन अंग्रेज पुलिस चौकियों पर आक्रमण कर दिया.
  • अंग्रेजों ने इस आक्रमण का सामना किया किंतु वे सफल न हो सके.
  • अप्रैल, 1815 में अंग्रेजों ने अल्मोड़ा नगर पर अधिकार कर लिया.
  • मई, 1815 में मालाओ नगर भी अमर सिंह थापा से छीन लिया गया.
  • इस प्रकार अंग्रेजों ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त किया.
  • 28 फरवरी, 1816 को अंग्रेजों ने मकबनपुर के स्थान पर गोरखों को परास्त कर दिया.

सगौली की संधि , 1866 (The Treaty of Sagauli, 1816)

  • सगौली की संधि नेपाली गोरखों और अंग्रेजों के मध्य हुई.
  • सगौली की संधि के द्वारा गोरखों ने काठमाण्डू में एक अंग्रेज रेजिडेंट रखना स्वीकार किया.
  • सगौली की संधि के बाद कम्पनी को उत्तरी तथा उत्तरी पश्चिमी सीमाएं हिमाचल तक पहुंच गई.
  • अंग्रेजों को शिमला, मंसूरी, रानीखेत, लण्डौर और नैनीताल आदि जिले भी प्राप्त हुए.
  • 10 फरवरी, 1817 को अंग्रेजों ने सिक्किम के राजा चोग्याल से एक संधि की.
  • इस संधि के द्वारा अंग्रेजों को तीस्ता और मेछी नदियों के मध्य का समस्त प्रदेश प्राप्त हो गया.
  • सगौली की संधि का सबसे बड़ा लाभ गोरखों का अंग्रेजी सेना में भर्ती होना था.

पिण्डारी (The Pindaris)

  • लार्ड हेस्टिंग्ज के भारत आगमन का प्रथम उद्देश्य पिण्डारियों का दमन था.
  • पिण्डारी शब्द सम्भवतः मराठी भाषा का शब्द है.
  • इन लोगों के बारे में यह अनुमान लगाया जाता है कि ये पिण्ड (एक प्रकार का आसव या शराब) को पीने वाले लोग थे.
  • 18वीं और 19वीं शताब्दी में ये लोग लूटमार के द्वारा अपनी जीविका चलाते थे.
  • पेशवा बाजीराव प्रथम के काल में ये अवैतनिक रूप से मराठों की ओर से लड़ते थे तथा लूटमार में भाग लेते थे.
  • पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद ये लोग मालवा में बस गए तथा सिंधिया, होल्कर और निजाम के सहायक सैनिक बनकर सिंधिया शाही, होल्कर शाही और निजाम शाही पिण्डारी कहलाने लगे.
  • मराठा शक्ति के क्षीण होते ही इन्होंने मराठा प्रदेशों में भी लूटमार आरंभ कर दी.
  • इन लोगों का कोई धर्म विशेष नहीं था.
  • ये केवल लूटमार के बंधन से बंधे थे.
  • 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में इनके तीन प्रमुख नेता थे चीतू, वालिस मुहम्मद और करीम खां.
  • लार्ड हेस्टिंग्ज़ ने इनके दमन का निश्चय किया. उसने मराठा, राजपूत और भोपाल के नवाब की सहायता से 1824 तक इन पिण्डारियों का पूर्णतः सफाया कर दिया.

लार्ड हेस्टिंग्ज और मराठे (Lord Hastings and Marathas)

  • 1802 की बसीन की संधि के माध्यम से पेशवा ने कम्पनी की अधीनता स्वीकार कर ली थी.
  • किन्तु अंग्रेजों का दबाव उस पर निरन्तर बढ़ता जा रहा था.
  • वह भीतर ही भीतर अंग्रेजी नियंत्रण से अपने को स्वतंत्र करने के लिए प्रयत्नशील था.
  • उसके ये प्रयत्न ईस्ट इंडिया कम्पनी को स्वीकार्य नहीं थे.
  • 1815 में पेशवा के प्रधानमंत्री त्रिम्बकजी ने बड़ौदा के गायकवाड़ के एक ब्राह्मण दूत गंगाधर शास्त्री की हत्या करवा दी.
  • वह ब्रिटिश सुरक्षा में पूना गया था.
  • ब्रिटिश रेजीडेन्ट एलफिंस्टन ने पेशवा से त्रिम्बकजी को अंग्रेजों को सौंपने की मांग की.
  • उसने पेशवा को नई सहायक संधि पर हस्ताक्षर के लिए भी बाध्य किया.
  • पेशवा बाजीराव ने अंग्रेजों के इस व्यवहार से खिन्न होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी.
  • 1817 में नागपुर के अप्पा साहेब भोंसले तथा इंदौर के होल्कर ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी.
  • सीताबल्दी के स्थान पर अप्पा साहेब को और माहिदपुर के युद्ध में होल्कर को अंग्रेजी सेना ने पराजित कर दिया.
  • 1819 में अंग्रेजों ने असीरगढ़ पर अधिकार कर लिया.
  • नवम्बर, 1817 में किर्की के युद्ध में पेशवा की पराजय के साथ ही पेशवा के पद का उन्मूलन कर दिया गया.
  • अंग्रेजों ने पेशवा के साथ उदार व्यवहार करते हुए उसे आजीवन 18 लाख रुपये की पेन्शन प्रदान की.
  • सतारा के सिंहासन पर शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह को बिठाया गया.
  • नागपुर से अप्पा साहेब की सत्ता समाप्त कर एक नए राजा को सत्ता सौंपी गई.
  • होल्कर को सहायक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया.
  • इस प्रकार से मराठों की शक्ति को पूर्ण रूप से दबा दिया गया.
  • भविष्य में वे पुनः अंग्रेजों को चुनौती देने की स्थिति में न पहुंच सके.

लार्ड हेस्टिंग्ज़ और राजपूत रियासते (Lord Hastings and IRajput States)

  • राजपूत रियासतों के संबंध में लार्ड हेस्टिंग्ज की यह योजना थी कि ये रियासतें अपने आपसी संबंधों के लिए कम्पनी पर आश्रित हों तथा इनके सैनिक साधन भी कम्पनी के अधीन हों.
  • इस योजना के तहत जनवरी, 1818 में जोधपुर के राजपूत राजा से संधि की गई.
  • इस संधि का आधार शाश्वत मित्रता, रक्षात्मक संधि, संरक्षण और अधीनस्थ सहयोग था.
  • किन्तु इस संधि के अनुसार राज्य को 1500 घुड़सवारों की एक सेना कम्पनी को देनी पड़ी.
  • यह भी तय किया गया कि आवश्यकता पड़ने पर समस्त सेना भी दी जा सकेगी.
  • इसके अलावा यह भी निश्चित किया गया कि रियासत कम्पनी को एक लाख आठ हजार रुपये वार्षिक कर के रूप में देगी.
  • जनवरी, 1818 में उदयपुर के महाराणा से भी संधि हो गयी.
  • इस संधि के अनुसार यद्यपि महाराणा को कोई सेना नहीं देनी पड़ी तथापि उसे अपनी आय का एक-चौथाई भाग आगामी पांच वर्षों तक कम्पनी को देना पड़ा.
  • उसने यह भी स्वीकार किया कि वह कालान्तर में अपनी आय का 3/8 भाग कम्पनी को देगा.
  • 2 अप्रैल, 1818 को हेस्टिंग्ज़ जयपुर के महाराजा से भी संधि करने में सफल हो गया.
  • लार्ड हेस्टिंग्ज द्वारा राजपूत रियासतों से की गई उक्त संधियां बहुत कठोर थी.
  • लार्ड हेस्टिंग्ज के थोड़े से प्रयत्न से ही इन राजपूत रियासतों की स्वतंत्रता ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन आ गई.

लार्ड हेस्टिंग्ज और मुगल सम्राट (Lord Hastings and Mughal Emperor)

  • लार्ड हेस्टिंग्ज़ के शासन काल तक यद्यपि कम्पनी भारत में सर्वश्रेष्ठ शक्ति बन गई थी तथापि बाह्य आडम्बर और सम्मान मुगल सम्राट का ही था.
  • शासन के समस्त कार्य मुगल सम्राट के नाम पर ही किए जाते थे.
  • लार्ड हेस्टिंग्ज़ ने इस परम्परा को तोड़ने के लिए उस समय तक सम्राट से मिलने से इन्कार कर दिया जब तक कि यह परम्परागत शिष्टाचार समाप्त न किया जाए तथा दोनों समानता की अवस्था में न मिलें.
  • लार्ड हेस्टिंग्ज़ के इस प्रतिवाद के फलस्वरूप उसके उत्तराधिकारी एमहर्ट को 1827 में मुगल सम्राट से बराबरी का सम्मान मिला.

लार्ड हेस्टिंग्ज़ के प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms)

  • लार्ड हेस्टिंग्ज़ के शासन काल में कुछ महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार भी हुए.
  • उसे सर जॉन मेल्कम, सर टॉमस मनरो, माउंट स्टुअर्ट एल्फिंस्टन और चार्ल्स मेटकाफ़ जैसे प्रतिभाशाली प्रशासकों का सहयोग प्राप्त हुआ.
  • 1820 में टामस मनरो मद्रास का गवर्नर बना.

रैयतवाड़ी कर व्यवस्था

  • उसने मालाबार, कोयम्बटूर, मदुरै और डिंडीगुल में रैयतवाड़ी कर व्यवस्था लागू की.
  • रैयतवाड़ी कर व्यवस्था के तहत किसानों को भूमि का स्वामी माना गया .
  • उनके और सरकार के मध्य स्थित जमींदारों या बिचौलियों को समाप्त कर दिया.

भूमि कर व्यवस्था

  • एल्फिन्स्टन ने मराठा प्रदेशों में महलवाड़ी और रैयतवाड़ी व्यवस्था के सम्मिश्रण को भूमि कर व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया.
  • इस मिश्रित व्यवस्था में कृषक के अधिकार एक सर्वेक्षण के बाद निश्चित कर दिए गए.
  • कर संग्रह का कार्य कुछ वर्षों के लिए पाटिलों को सौंप दिया गया.

बंगाल काश्तकारी अधिनियम

  • 1822 में बंगाल में रैयत के अधिकारों की सुरक्षा हेतु बंगाल काश्तकारी अधिनियम पारित किया गया.
  • बंगाल काश्तकारी अधिनियम में यह व्यवस्था थी कि यदि रैयत अपना निश्चित किराया देती रहे तो उसे विस्थापित नहीं किया जाएगा साथ ही विशेष परिस्थितियों को छोड़कर किराया भी नहीं बढ़ाया जाएगा.

 

  • लार्ड हेस्टिंग्ज़ ने न्याय व्यवस्था में सुधार हेतु बंगाल में न्यायाधीशों और दण्डनायकों (Magistrates) की पृथकता समाप्त कर दी.
  • कलक्टरों को दण्डनायक का कार्य करने की भी अनुमति दी गई.
  • लार्ड हेस्टिग्ज़ ने प्रेस पर से भी नियंत्रण उठा लिया साथ ही समाचार पत्रों के मार्ग दर्शन हेतु कुछ नियम बना दिए गए ताकि लोकहित के विरुद्ध समाचार पत्र कुछ प्रकाशित न कर सके.

मूल्यांकन (Evaluation)

  • भारत आगमन के समय लार्ड हेस्टिग्ज की आयु 60 वर्ष थी.
  • इसके बावजूद उसने एक कुशल सेनापति के रूप में अपनी सेना का नेतृत्व किया.
  • उसने भारत में कम्पनी की सर्वश्रेष्ठता स्थापित की.
  • उसने अनेक प्रशासनिक और न्यायिक सुधार भी किए.

The post लार्ड हेस्टिंग्ज, 1813-23 (LORD HASTINGS, 1813-23) | आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb https://ift.tt/2QApsyz
via IFTTT

Tuesday, December 4, 2018

मैसूर का उदयः हैदर अली और टीपू सुल्तान (RISE OF MYSORE: HYDER ALI & TIPU SULTAN)

मैसूर का उदयः हैदर अली और टीपू सुल्तान (RISE OF MYSORE: HYDER ALI AND TIPU SULTAN) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

मैसूर का उदयः हैदर अली और टीपू सुल्तान

  • प्रारंभ में मैसूर के सरदार विजयनगर साम्राज्य के अधीन थे.
  • 1565 के तालीकोटा के ऐतिहासिक युद्ध के बाद विजयनगर साम्राज्य का ह्रास हो गया.
  • 1612 में विजयनगर के राजा बैंकट द्वितीय ने राजा वडियार (‘राजा’ शब्द उसकी उपाधि नहीं वरन् उसके नाम का भाग था) को मैसूर की सत्ता सौंप दी.
  • 17वीं शताब्दी में वडियार वंश ने अपने राज्य का काफी विस्तार किया.

मैसूर का उदयः हैदर अली और टीपू सुल्तान (RISE OF MYSORE: HYDER ALI AND TIPU SULTAN) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

  • 1732 में राजा वडियार चिक कृष्णराज के काल में मैसूर में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया आरंभ हुई.
  • 1731-1734 के मध्य देवराज (मुख्य सेनापति) और नजराज (राजस्व और वित्त का अधीक्षक) नामक दो भाइयों ने राज्य की समस्त शक्ति अपने हाथ में केन्द्रित कर ली.
  • दक्षिण में निजाम, मराठों, अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य हुए संघर्ष से मैसूर धी अप्रभावित न रह सका.
  • 1753, 1754, 1757 और 1759 में मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किए.
  • देबराज और नजज इन आक्रमणकारियों का सामना करने में असफल रहे.
  • इस स्थिति में हैदर अली (जन्म  1727) सामने आया.
  • उसने अपना जीवन एक घुड़सवार के रूप में आरंभ किया था किन्तु 1761 में वह मैसूर का वास्तविक शासक बन बैठा.
  • सत्ता प्राप्ति के साथ ही उसने एक शक्तिशाली सेना के संगठन हेतु प्रयास आरंभ कर दिए.
  • उसने फ्रांसीसियों की सहायता से डिंडीगुल में एक शस्त्रागार स्थापित किया.
  • 1763 तक उसने होजकोट, दोड़नेल्लापुर और बेदनूर आदि स्थानों तथा दक्षिण के पालिगारों (जमींदारों) पर अधिकार कर लिया.
  • पानीपत के तीसरे युद्ध की पराजय के बाद पेशवा माधवराव के नेतृत्व में मराठा पुनः शक्तिशाली हो गये.
  • 1764, 1766 और 1771 में मैसूर पर आक्रमण कर उन्होंने हैदर अली को हराया और उसे धन और कुछ प्रदेश देने के लिए बाध्य किया.
  • किन्तु 1772 में माधवराव की मृत्यु के बाद पैदा हुई अव्यवस्था की स्थिति का लाभ उठाकर हैदर अली ने 1774 से 1776 के मध्य न केवल अपने खोए हुए प्रदेशों को पुन: प्राप्त किया बल्कि कृष्णा-तुंगभद्रा घाटी के प्रमुख प्रदेश, बेल्लारी, कुड्डपा, गूरी और करनूल के प्रदेश भी प्राप्त किए.

पहला आंग्ल-मैसूर युद्ध, 1767-69 (First Anglo-Mysore War, 1767-69)

  • 1766 में अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम अली से एक संधि की.
  • इस संधि के द्वारा अंग्रेजों ने निजाम को हैदरअली के विरुद्ध सहायता देने का वचन दिया.
  • शीघ्र ही हैदर अली के विरुद्ध निजाम, मराठों तथा कर्नाटक के नवाब का एक संयुक्त मोर्चा बन गया.
  • हैदर अली ने इस संकट का बड़ी ही चतुराई से सामना किया.
  • उसने मराठों को धन देकर तथा निजाम को कुछ प्रदेश देकर अपनी ओर मिला लिया.
  • तत्पश्चात् उसने कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया.
  • यह युद्ध अनिर्णायक रहा.
  • कुछ ही समय बाद हैदर अली ने मद्रास को घेर कर अंग्रेजों को 4 अप्रैल, 1779 को तिरस्कार पूर्ण संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया.
  • इस संधि के द्वारा अंग्रेजों ने हैदर अली को सहायता का वचन दिया.

दुसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध, 1780-84 (Second Anglo-Mysore War, 1780-84)

  • 1771 में मराठा आक्रमण के समय हैदर अली के समक्ष यह स्पष्ट हो गया कि 1769 की आंग्ल-मैसूर संधि एक संधि न होकर केवल युद्ध विराम का एक समझौता मात्र थी.
  • अतएव अंग्रेजों से निराश होकर हैदर अली ने फ्रांसीसी सहायता प्राप्त करने के सफल प्रयल किए.
  • उसने कम्पनी के विरुद्ध निज़ाम तथा मराठों से मिलकर एक संयुक्त मोर्चा तैयार किया.
  • जुलाई, 1780 में हैदर अली ने अंग्रेजी कर्नल बेली को हराकर कर्नाटक की राजधानी अरकाट पर अधिकार कर लिया.
  • कुछ ही समय बाद अंग्रेजों ने निजाम तथा मराठों को अपने साथ मिलाकर नवम्बर, 1781 में पोर्टो नोवा के स्थान पर हैदर अली को परास्त कर दिया.
  • 1782 में हैदर अली ने पुनः कर्नल ब्रेथवेट के अधीन अंग्रेजी सेना को परास्त कर दिया.
  • किन्तु 7 दिसम्बर, 1782 को हैदर अली की मृत्यु हो गई.
  • उसके बाद युद्ध का संचालन उसके पुत्र टीपू सुल्तान के हाथ में आ गया.
  • यह युद्ध भी अनिर्णायक रहा. मार्च, 1784 में मंगलौर की संधि के द्वारा दोनों पक्षों ने एक दूसरे के विजित प्रान्त वापस कर दिए.

तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध, 1790-92 (Third Anglo-Mysore War, 1790-92)

  • 1790 में लार्ड कॉर्नवालिस ने निजाम तथा मराठों से मिलकर टीपू सुल्तान के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाया.
  • टीपू सुल्तान ने इस मोर्चे के विरुद्ध तुर्की से सहायता प्राप्त करने का प्रयल किया.
  • अप्रैल 1790 में टीपू सुल्तान ने त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया.
  • इस आक्रमण का मुख्य कारण टीपू सुल्तान के क्षेत्राधीन कोचीन रियासत पर त्रावणकोर के महाराजा द्वारा अपना अधिकार जताना था.
  • कॉर्नवालिस ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए त्रावणकोर के महाराजा का पक्ष लिया और टीपू सुल्तान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी.
  • शीघ्र ही कॉर्नवालिस वैल्लौर तथा अम्बूर से होता हुआ बंगलोर पर मार्च 1791 में अधिकार कर श्रीरंगपट्टम तक पहुंच गया.
  • टीपू ने कॉर्नवालिस का दृढ़ता से सामना किया किन्तु शीघ्र ही अपने आप को असमर्थ पाकर उसने मार्च, 1792 में श्रीरंगपट्टम की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए.
  • इस संधि के अनुसार उसे अपने राज्य का लगभग आधा भाग अंग्रेजों और उनके मित्रों को देना पड़ा.

चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध, 1799 (Fourth Anglo-Mysore War, 1799)

  • 1798 में लार्ड वैल्जली का आगमन हुआ.
  • लार्ड वेल्जली एक साम्राज्यवादी गवर्नर-जनरल था.
  • वह टीपू सुल्तान के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई लड़ना चाहता था.
  • उसने टीपू के समक्ष सहायक संधि स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा.
  • टीपू के द्वारा इस प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने पर फरवरी, 1799 में टीपू और अंग्रेजों के मध्य युद्ध छिड़ गया.
  • 4 मई, 1794 को श्रीरंगपट्टम का दुर्ग जीत लिया गया.
  • टीपू सुल्तान ने लड़ते-लड़ते वीर गति प्राप्त की.
  • मैसूर की सत्ता मैसूर के प्राचीन हिन्दू राजवंश को सौंप दी गई.
  • मैसूर पर सहायक संधि थोप दी गई.

टीपू सुल्तान की शासन व्यवस्था (Tipu’s Administration)

  • टीपू सुल्तान का प्रशासन केन्द्रोन्मुखी प्रशासन था.
  • सुल्तान ही समस्त सैनिक, असैनिक और राजनीतिक शक्ति का केन्द्र था.
  • सुल्तान स्वयं ही अफ्ना विदेश मंत्री, मुख्य सेनापति और न्यायाधीश था.

केन्द्रीय प्रशासन (Cerntral Attrmirnistration)

  • टीपू के प्रशासन में प्रधानमंत्री या वजीर का पद नहीं था.
  • केन्द्रीय प्रशासन के रूप में सात विभाग या बोर्ड थे.
  • ये विभाग मीर आसिफ के अधीन होते थे.
  • मीर आसिफ सुल्तान के प्रति उत्तरदायी होता था.
  • ये सात विभाग थे–
  1. राजस्व तथा वित्त (भीर आसिफ कचहरी के अधीन),
  2. सेना विभाग (मीरां आसिफ कचहरी के अधीन),
  3. जुमरा विभाग (एक अन्य मीर मीरा कचहरी के अधीन),
  4. तोपखाना तथा दुर्ग रक्षा विभाग (मीर सदर कचहरी के अधीन),
  5. वाणिज्य विभाग (मलिक-उत्तज्जाऱ के अधीन),
  6. नाविक विभाग (मीर याम कचहरी के अधीन),
  7. कोष और टंकन विभाग (मीर खजाना कचहरी के अधीन).
  • इन सात विभागों के अतिरिक्त तीन अन्य छोटे विभाग भी थे–
  1. डाक तथा गुप्तचर विभाग,
  2. लोक निर्माण विभाग,
  3. पशु विभाग.

प्रान्तीय तथा स्थानीय प्रशासन (Provincial and Local Administration)

  • टीपू सुल्तान ने 1784 के बाद अपने साम्राज्य को सात प्रान्तों में बांट दिया.
  • आगे चलकर इन प्रान्तों की संख्या 17 हो गई.
  • प्रान्तों में मुख्य अधिकारी आसिफ (असैनिक गवर्नर) और फौजदार (सैनिक गवर्नर) होते थे.
  • ये दोनों पदाधिकारी एक दूसरे पर नियंत्रण भी रखते थे.
  • प्रान्तों को जिलों और जिलों को गांवों में बांटा हुआ था.
  • पंचायतें स्थानीय प्रशासन का प्रबन्ध करती थी.

भूमि कर व्यवस्था (Land Revene System)

  • टीपू सुल्तान ने जागीरदारी प्रथा को समाप्त कर कृषक और सरकार के मध्य सीधा संपर्क कर स्थापित कर दिया.
  • उसने ईनाम में दी गई कर मुक्त भूमि पर पुनः अधिकार कर लिया.
  • पॉलिगारों (जमींदारों) के पैतृक अधिकार भी जब्त कर लिए गए.
  • टीपू ने “प्रेरणा संलग्न अनुरोध” (Inducement-Cum-Compulsion) की व्यवस्था द्वारा अधिकाधिक भूमि को जोत में लाने का प्रयास किया.
  • भूमिका प्रायः 1/3 से 1/2 भाग लिया जाता था.
  • यह कर भूमि की उर्वरता तथा सिंचाई की सुविधाओं पर निर्भर होता था.

वाणिज्य और व्यापार (Trade and Commerce)

  • टीपू सुल्तान ने राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का विकास किया.
  • उसने अपने गुमाश्ते मस्कट आर्भुज, जेद्दाह और अदन आदि नारों में नियुक्त किए.
  • उसने पीगू (बर्मा) और चीन से भी व्यापार संबंध स्थापित करने का प्रयास किया.
  • उसने एक वाणिज्य बोर्ड की भी स्थापना की.
  • टीपू ने चन्दन, सुपारी, काली मिर्च, मोटी इलाइची, सोने तथा चांदी का व्यापार और हाथियों के निर्यात आदि पर सरकार का एकाधिकार स्थापित किया.
  • इसके अलावा उसने कुछ कारखानों की भी स्थापना की.
  • इन कारखानों में युद्ध के लिए गोला बारूद, कागज, चीनी, रेशमी कपड़ा और अन्य सजावटी वस्तुएं बनाई जाती धौ .

सैनिक प्रशासन (Military Administration)

  • टीपू ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया.
  • उपने अपनी पदाति सेना का गठन यूरोपीय नमूने पर किया.
  • उसने फांसीसी कमाण्डरों द्वारा अपनी सेना के प्रशिक्षण का प्रबन्ध किया.
  • टीपू के सैनिकों की संख्या उसको सैनिक आवश्यकताओं और साधनों के अनुसार बदलती रहती थी.
  • हैदर अली और टीपू सुल्तान दोनों ने नौसेना के महत्व को समझा था.
  • उन्होंने एक शक्तिशाली नौसेना का गठन भी किया.
  • किन्तु नौसेना ईस्ट इंडिया कम्पनी के स्तर को कभी प्राप्त न कर सकी.
  • 1796 में टीपू सुल्तान ने नौसेना के विकास हेतु नौसेना बोर्ड का गठन किया.

मूल्यांकन (Evaluation)

  • 20 नवम्बर, 1750 को हैदर अली और उसकी पली फातिमा के घर बहुत प्रार्थना के बाद पुत्ररत्न के रूप में टीपू सुल्तान का जन्म हुआ था.
  • टीपू को एक मुस्लिम राजकुमार के समान शिक्षा-दीक्षा प्राप्त हुई.
  • वह अरबी, फारसी, कन्नड़ और उर्दू का अच्छा ज्ञाता था.
  • उसने मैसूर में एक सुदृढ़ प्रशासन की नींव डाली.
  • 1787 में टोपू ने बादशाह की उपाधि ग्रहण की.
  • उसने अपने नाम के सिक्के चलवाए.
  • उसने वर्ष तथा माह के हिन्दू नामों के स्थान पर अरबी नामों का प्रयोग किया.
  • उसने नए पंचाग का प्रारंभ किया.
  • टीपू सुल्तान की आलोचना करते हुए विल्स ने कहा है कि – “हैदर अली का जन्म राज्य को बनाने के लिए हुआ तथा टीपू का जन्म राज्य को खोने के लिए.”

The post मैसूर का उदयः हैदर अली और टीपू सुल्तान (RISE OF MYSORE: HYDER ALI & TIPU SULTAN) appeared first on SRweb.



from SRweb https://ift.tt/2KSiMq5
via IFTTT

Monday, December 3, 2018

लार्ड वेल्जली (LORD WELLESLEY) | सहायक संधि | आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लार्ड वेल्जली (LORD WELLESLEY) सहायक संधि आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लार्ड वेल्जली (LORD WELLESLEY)

  • 1798 में सर जान शोर के पश्चात् रिचर्ड कॉले  वेल्जली भारत का गवर्नर जनरल बना.
  • उसका प्रमुख उद्देश्य ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनाना था.
  • वह कम्पनी के प्रदेशों का अभूतपूर्व विस्तार करना चाहता था.
  • तथा भारत के सभी राज्यों पर कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था.

लार्ड वैल्ज़ली (LORD WELLESLEY) सहायक संधि आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

सहायक संधि व्यवस्था (Subsidiary Alliance System in Hindi)

  • लार्ड वेल्जली अपनी सहायक संधि की प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है.
  • उसने इस संधि का प्रयोग भारतीय राज्यों को कम्पनी के राजनीतिक प्रभुत्व में लाने के लिए किया.
  • इस संधि के द्वारा कम्पनी ने अपने मित्रों के राज्यों की सीमाओं की रक्षा का भार अपने ऊपर लिया.
  • इस उद्देश्य से अपनी एक सहायक सेना संबंधित राज्य में रख दी.
  • कम्पनी के भारतीय मित्रों को इस सहायता के बदले कम्पनी को धन नहीं वरन् अपने प्रदेश का एक भाग देना होता था.
  • सहायक संधि की इस प्रणाली का अस्तित्व वैल्जली के आगमन से पूर्व भी था.
  • सम्भवतः फ्रांसीसी गवर्नर जनरल डूप्ले प्रथम यूरोपीय था जिसने उक्त प्रणाली के अनुसार अपनी सेनाएं किराए पर भारतीय राजाओं को दी.
  • प्रथम सहायक संधि 1765 में कम्पनी ने अवध के नवाब से की थी.
  • वैल्जली के समय में इस प्रणाली का विकास अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया.
  • इस प्रणाली के द्वारा लार्ड वैल्जली ने भारत के एक विस्तृत भू-भाग पर कब्जा कर लिया.

यह सहायक संधि प्राय: निम्नलिखित शर्तों के आधार पर की जाती थी.–

  1. भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कम्पनी के माध्यम से संचालित होंगे.
  2. बड़े राज्यों को अंग्रेजी अधिकारियों के प्रभुत्व वाली एक सेना अपने प्रदेश में रखनी होती थी. इस सेना का उद्देश्य सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखना था. इस सेना के लिए राजा को एक “पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न प्रदेश” कम्पनी को देना होता था. छोटे राज्यों को इसके बदले नकद धन का भुगतान करना पड़ता था.
  3. राज्य की राजधानी में एक अंग्रेजी रेजीडेन्ट को रखना आवश्यक होता था.
  4. राज्य कम्पनी की पूर्व अनुमति के बिना किसी यूरोपीय व्यक्ति को अपनी सेवा में नहीं रख सकते थे.
  5. कम्पनी राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वचन देती थी.
  6. कम्पनी राज्य की प्रत्येक प्रकार के शत्रुओं से रक्षा करती थी.

सहायक संधि के कम्पनी को लाभ(Advantages of Subsidiary Alliance to the Company)

सहायक संधि से कम्पनी को निम्नलिखित लाभ हुए-

  1. इसके माध्यम से कम्पनी भारतीय राज्यों को प्रभावी रूप से अपने संरक्षण में ले आई इस संधि के बाद भारतीय राज्य मुख्य रूप से अंग्रेजों के विरुद्ध कोई संघ न बना सके.
  2. इस संधि के माध्यम से कम्पनी को एक ऐसी विशाल और शक्तिशाली सेना मिल गई जिसका सम्पूर्ण व्यय भारतीय राज्यों पर भारित था.
  3. इस संधि के माध्यम से कम्पनी भारतीय राज्यों के व्यय से निर्मित सेना का भारतीय राज्यों के विरुद्ध प्रयोग कर सकी.
  4. इसके माध्यम से कम्पनी भारत के एक विशाल भू-भाग पर कब्जा करने में सफल रही.
  5. इस प्रणाली के माध्यम से कम्पनी ने भारत में फ्रांसीसी योजनाओं को सफलतापूर्वक विफल कर दिया क्योंकि इस संधि की व्यवस्थाओं के अनुसार सहायक संधि करने वाला कोई भी राज्य कम्पनी की अनुमति के बिना किसी भी यूरोपीय नागरिक को अपनी सेवा में नहीं रख सकता था.
  6. इस संधि के द्वारा कम्पनी भारतीय राज्यों के आपसी विवादों एवं संबंधों में मध्यस्थता की भूमिका अदा करने लगी.
  7. राज्य की राजधानी में स्थित अंग्रेज रेजीडेट काफी प्रभावशाली हो गए और आगे चलकर उन्होंने राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रांरभ कर दिया.
  8. इस संधि के माध्यम से कम्पनी पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न प्रदेशों के एक बड़े भाग की स्वामी बन गई.

सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य थे-

  • हैदराबाद (सितम्बर, 1798 और 1800),
  • मैसूर (1799),
  • तंजोर (अक्टूबर, 1799),
  • अवध (नवम्बर, 1801),
  • पेशवा (दिसम्बर, 1801),
  • बराड़ के भोंसले (दिसम्बर, 1803),
  • सिंधिया (फरवरी, 1804)
  • तथा जोधपुर, जयपुर, मच्छेड़ी, बूंदी और भरतपुर .

भारतीय राज्यों को हानियां (Disadvantages to the Indian States)

यह संधि निम्नलिखित प्रकार से भारतीय राज्यों के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हुई

  1.  इस संधि के द्वारा अपने विदेशी संबंधों को कम्पनी के सुपुर्द कर भारतीय राजाओं ने अपनी स्वतंत्रता खो दी. 
  2. राज्य की राजधानी में स्थित अंग्रेज रेजीडेन्ट के माध्यम से कम्पनी ने इन राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया.
  3. अंग्रेजी सेना की उपस्थिति के कारण भारतीय जनता अपने निर्बल और उत्पीड़क राजा के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर सकती थी.
  4. इस संधि के द्वारा कम्पनी ने राज्य की आय का एक-तिहाई भाग आर्थिक सहायता के रूप में प्राप्त करना आरंभ कर दिया. इतनी बड़ी राशि को अदा करते-करते भारतीय राजा शीघ्र ही दीवालिया हो गए.
  5. धन न देने की स्थिति में प्रदेश देने पड़ते थे. कई बार तो 40 लाख रुपयों के बदले कम्पनी ने 62 लाख रुपये वार्षिक कर वाले प्रदेश पर कब्जा कर लिया.

अत: कुल मिलाकर यह संधि भारतीय राजाओं के लिए हानिकारक रही.

लार्ड वैल्जली और फ्रांसीसी भय (Lord Wellesley and the French Menace)

  • 1797 में लार्ड वेल्जली का भारत में आगमन हुआ.
  • लगभग इसी समय फ्रांस के विरुद्ध यूरोपीय शक्तियों का बना हुआ मोर्चा खंडित हो चुका था.
  • नैपोलियन मिस्र और सीरिया को हस्तगत कर भारत पर आक्रमण करने की योजना बना रहा था.
  • वह सिकन्दर महान की भांति एलेग्जेन्ड्रिया से भारत पर हमला करना चाहता था.
  • 1801 में नैपोलियन ने रूस के ज़ार पॉल से सन्धि की.
  • इस संधि (पॉल से सन्धि) के द्वारा वह भारत पर आक्रमण के लिए रूसी सैन्य सहयोग को प्राप्त करने में सफल हो गया.
  • इस संधि के द्वारा यह भी तय किया गया कि हरात फरहि और कन्धार के मार्ग से भारत पर आक्रमण किया जाएगा.
  • अंग्रेजों को भी उस समय तक स्थल पर नैपोलियन की अदम्य शक्ति का आभास मिल चुका था.
  • लार्ड वैल्जली यह जानता था कि कम्पनी का पुराना शत्रु मैसूर का टीपू सुल्तान नैपोलियन से पत्राचार के द्वारा भारत से अग्रेजों को निकालने को योजना बना रहा है.
  • टीपू सुल्तान फ्रासोसियों से एक कम एवं रक्षात्मक संधि करने में भी सफल हो गया था.
  • 1795 में खारड़ा के स्थान पर मराठों के द्वारा निजाम को पराजय के बाद अंग्रेजों ने उसका साथ छोड़ दिया था.
  • अतः अंग्रेजों से निराश होकर निजाम ने फ्रांसीसियों के सहयोग से एक बड़ी सेना तैयार कर ली.
  • निजाम ने फ्रांसीसी कमाण्डर मंस्यूर रेमण्ड (Monsieur Raymond) को अपने यहां नियुक्त कर लिया.
  • निजाम के इन कार्यों से वैल्जली भली-भांति परिचित था.
  • वैल्जली को यह भी ज्ञात था कि मराठा सरदार महादजी सिन्धिया ने भी फ्रांसीसियों के सहयोग से एक विशाल सेना तैयार कर ली है.
  • निश्चय ही इस सेना का प्रयोग नैपोलियन के माध्यम से अंग्रेजों के विरुद्ध किया जाना था.
  • इसके अलावा महाराजा रणजीत सिंह भी अपनी सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए फ्रांसीसी ऊमाण्डरों का दौरा कर रहा था.
  • काबुल का जमान शाह भी भारत पर आक्रमण की योजना बना रहा था.
  • इस प्रकार भारत में फ्रांसीसियों की बढ़ती शक्ति से लार्ड वैल्जली को ब्रिटिश साम्राज्य के भविष्य की चिंता होने लगी.
  • उसने शीघ्र ही अपने चातुर्य से उक्त फ्रांसीसी भय को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित प्रयत्न किए-
  1. सर्वप्रथम उसने बंगाल से युद्ध कोष के लिए विशाल धनराशि एकत्र कर इंग्लैण्ड भेजी.
  2. 1798 में वैल्जली ने निजाम को युद्ध अथवा सहायक संधि में से किसी एक को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया. ब्रिटिश सेना का मुकाबला करने में असमर्थ निजाम ने सहायक संधि स्वीकार कर ली. उसने फ्रांसीसी सैनिकों तथा अफसरों को युद्ध बन्दी बनाकर कलकत्ता भेज दिया इस प्रकार हैदराबाद में फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त हो गया.
  3. टीपू सुल्तान द्वारा सहायक संधि अस्वीकार किए जाने पर फरवरी, 1799 में टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के मध्य युद्ध प्रारंभ हो गया. 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टम का दुर्ग जीत लिया गया. टीपू सुल्तान ने लड़ते-लड़ते वीर गति प्राप्त की. मैसूर की सत्ता मैसूर के प्राचीन हिन्दू राजवंश को सौंप दी गई.
  4. फ्रांसीसी आक्रमण की योजनाओं को निष्फल करने के लिए वैल्जली नै अवध को सहायक संधि स्वीकार करने के लिए बाध्य किया. अवध के नवाब ने संधि स्वीकार कर ली और रूहेलखण्ड तथा दोआब के उत्तरी किले सहायक सेना के व्यय हेतु प्रदान किए.
  5. 1802 में मराठा सरदार महादजी सिंधिया को भी सहायक संधि स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया. सिंधिया और भोंसले ने इसका तीव्र विरोध किया किन्तु अन्ततः उन्हें सहायक संधि स्वीकार करनी पड़ी. पूना में सहायक सेना तैनात कर दी गई. इस प्रकार मराठी प्रदेश से भी फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त हो गया.
  6. गोआ को फ्रांसीसियों से रक्षा करने के लिए पुर्तगालियों की अनुमति से गोवा में अंग्रेजी सेना तैनात कर दी गई.
  7. 1800 वैल्जली ईरान के शाह से संधि करने में सफल हो गया. इस संधि के द्वारा शाह ने फ्रांसीसियों को अपने देश में आने की अनुमति न देने का वचन दिया.
  • इस प्रकार लार्ड वैल्जली अपनी कुटनीति, सैन्य शक्ति तथा सुनियोजित नीति के बाल से न केवल फ्रांसीसियों से भारत को बचाने में सफल रहाअपितु उसने ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार भी किया.

मूल्यांकन (Evaluation)

  • लार्ड वैल्जली (लार्ड वेल्जली) की उपलब्धियों का मूल्यांकन करते हुए यह कहा जा सकता है कि उसके आगमन से पूर्व ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत की अनेक शक्तियों में से एक थी किन्तु वैल्जली के शासन काल में कम्पनी भारत की एक सर्वोच्च शक्ति बन गई.
  • वैल्जली के बाद समस्त भारत की रक्षा का उत्तरदायित्व कम्पनी ने अपने ऊपर से लिया.
  • 1805 में कलकत्त-मद्रास और मद्रास-बम्बई के मध्य सीधा सम्पर्क स्थापित हो गया.
  • अब इस सम्पर्क में बाधा डालने के लिए स्वतंत्र भारतीय राज्य उपस्थित नहीं थे.
  • दिल्ली, आगरा और उसके आस-पास के क्षेत्र तथा यमुना नदी के दोनों ओर के क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन आ चुके थे.
  • इनके अलावा रुहेलखण्ड, बुन्देल खण्ड, कटक और गुजरात के महत्वपूर्ण प्रदेश तथा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तटवर्ती प्रदेश-सूरत, तंजोर, कर्नाटक और निजाम के कुछ प्रदेश प्री कम्पनी के अधीन आ गए थे.
  • वैल्जली ने सुनियोजित नीति के द्वारा शीघ्र ही ब्रिटिश साम्राज्य को फ्रांसीसियों से मुक्त कर लिया.
  • किन्तु वैलजली के संबंध में यह निश्चित मत है कि उसके तौर-तरीके उन तरीकों से कहीं ज्यादा उद्धत और तानाशाही पूर्ण थे जिनके लिए 12 वर्ष पूर्व वॉरेन हेस्टिंग्ज पर महाभियोग लगाया गया था.

 

लार्ड वेल्जली (LORD WELLESLEY) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

The post लार्ड वेल्जली (LORD WELLESLEY) | सहायक संधि | आधुनिक भारत (MODERN INDIA) appeared first on SRweb.



from SRweb https://ift.tt/2EcFVTN
via IFTTT

सर जान शोर, 1793-98 (Sir John Shore in Hindi 1793-1798) आधुनिक भारत

सर जान शोर, 1793-1798 (Sir John Shore in Hindi, 1793-1798) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

सर जान शोर, 1793-98 (Sir John Shore, 1793-98) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

 

  • 1793 में लार्ड कार्नवालिस के भारत से विदा होने के बाद उसके स्थान पर सर जान शोर ने कार्यभार सम्भाला.
  • कार्नवालिस के समय में वह सर्वोच्च कोंसिल का वरिष्ठ सदस्य तथा भूमि सुधार के सम्बन्ध में उससे घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित था.
  • सर जान शोर ने अपने कार्यकाल में पिट के भारतीय कानून में निर्दिष्ट तटस्थता की नीति का दृढ़ता के साथ पालन किया जिससे अंग्रेज कम्पनी के सम्मान को भारत में ठेस पहुंची.
  • सर जान शोर के समय सबसे महत्वपूर्ण घटना मराठों का निजाम पर आक्रमण तथा 1795 में खारदा के युद्ध में निजाम की पराजय थी.
  • यद्यपि निजाम ने सर जान शोर से सहायता मांगी परन्तु सर जान शोर ने उसको सहायता देने से इन्कार कर दिया.
  • मराठों को आपसी फूट के कारण निजाम ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति पुनः सुदृढ़ कर ली.
  • सर जान शोर ने अवध के मामलों में हस्तक्षेप किया.
  • नवाब की 1797 में मृत्यु होने के बाद उसके भाई को गद्दी पर बिठाया गया.
  • उसने नवाब के साथ एक सन्धि की जिसके अनुसार अवध की सुरक्षा का भार कम्पनी के ऊपर था तथा उसके बदले उसे कम्पनी को 76 लाख की वार्षिक रकम देनी थी.
  • इलाहाबाद का किला भी उसने अंग्रेज कम्पनी को दिया.
  • नवाब ने यह वचन भी दिया कि वह विदेशी राज्य के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेगा.
  • 1795 में बंगाल के यूरोपीय अफसरों ने भयानक विद्रोह कर दिया क्योंकि वे शासन पर अधिकार करना चाहते थे.
  • परिणामस्वरूप सर जान शोर को विद्रोहियों के साथ अनेक रियायतें करनी पड़ी.
  • स्थिति को सम्भालने में असफल होने के कारण सर जान शोर को 1798 में वापिस बुला लिया गया और लार्ड वैल्जली को नया गवर्नर जनरल बनाया गया.

The post सर जान शोर, 1793-98 (Sir John Shore in Hindi 1793-1798) आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb https://ift.tt/2Pi5mUW
via IFTTT

लार्ड कार्नवालिस 1786-1793 (Lord Cornwallis in Hindi, 1786-1793)

लार्ड कार्नवालिस 1786-1793 (Lord Cornwallis in Hindi, 1786-1793) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

लार्ड कार्नवालिस 1786-1793 (Lord Cornwallis, 1786-1793)

  • 1786 में लार्ड कॉर्नवालिस को भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया.
  • उसके समक्ष प्रमुख कार्य एक संतोषजनक भूमि कर व्यवस्था स्थापित करना, एक कार्यक्षम न्याय व्यवस्था स्थापित करना और कम्पनी के व्यापार विभाग का पुनर्गठन करना था.
  • उसने जिस शासन व्यवस्था का गठन किया वह 1858 तक चलती रही.

लार्ड कार्नवालिस 1786-1793 (Lord Cornwallis in Hindi, 1786-1793) आधुनिक भारत (MODERN INDIA) लार्ड कार्नवालिस 1786-1793 (Lord Cornwallis, 1786-1793) 1786 में लार्ड कॉर्नवालिस को भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया. उसके समक्ष प्रमुख कार्य एक संतोषजनक भूमि कर व्यवस्था स्थापित करना, एक कार्यक्षम न्याय व्यवस्था स्थापित करना और कम्पनी के व्यापार विभाग का पुनर्गठन करना था. उसने जिस शासन व्यवस्था का गठन किया वह 1858 तक चलती रही. कॉर्नवालिस के न्यायिक सुधार (Judicial Reforms of Cornwallis) कॉर्नवालिस का सर्वप्रथम कार्य जिले की समस्त शक्तियों को कलक्टरों के हाथों में केन्द्रित करना था. 1787 में उसने जिलों में कार्यवाहक कलैक्टरों को दीवानी न्यायालयों का न्यायाधीश भी नियुक्त कर दिया. इसके अलावा उन्हें कुछ फौजदारी अधिकार और सीमित मामलों में फौजदारी न्याय करने की भी शक्ति प्रदान की गई. भारतीय न्यायाधीशों वाली जिला फौजदारी अदालतें समाप्त कर दी गई. इन अदालतों के स्थान पर चार (3 बंगाल के लिए और 1 बिहार के लिए) भ्रमण करने वाले न्यायालय स्थापित किए गए. इन ,न्यायालयों के अध्यक्ष यूरोपीय लोग होते थे. काजी और मुफ्ती इनकी सहायता करते थे. ये न्यायालय जिलों का दौरा करने के साथ-साथ नगर दण्डनायकों (Magistrates) के द्वारा निर्देशित फौजदारी मामलों को भी निपटाते थे. मुर्शिदाबाद में स्थित सदर निजामत न्यायालय के स्थान पर एक ऐसा ही न्यायालय कलकत्ता में स्थापित किया गया. यह न्यायालय गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् से मिलकर बनता था. इनकी सहायता के लिए मुख्य काजी तथा मुख्य मुफ्ती होते थे. कॉर्नवालिस संहिता, 1793 (Cornwallis Code, 1793) 1793 में कार्नवालिस ने अपने न्यायिक सुधारों को अंतिम रूप देते हुए एक "संहिता" (कॉर्नवालिस संहिता) के रूप में प्रस्तुत किया. कॉर्नवालिस के न्यायिक सुधार "शक्ति-पृथक्करण" (Separation of Powers) के प्रसिद्ध सिद्धांत पर आधारित थे. कॉर्नवालिस ने कर तथा न्याय प्रशासन को पृथक किया. कॉर्नवालिस का यह अनुभव था कि कलक्टर के रूप में किए गए अन्याय का निर्णय कलक्टर स्वयं न्यायाधीश के रूप में कैसे कर सकता है? इस न्याय व्यवस्था पर जमींदारों और कृषकों का विश्वास न रहेगा. अतः कॉर्नवालिस ने अपनी उक्त संहिता के द्वारा कलक्टर की न्यायिक तथा फौजदारी शक्तियाँ ले ली. अब कलक्टर के पास केवल कर संबंधी शक्तियाँ ही रह गई. जिला दीवानी न्यायालयों में कार्य के लिए जिला न्यायाधीशों (District Judges) की एक नई श्रेणी गठित की गई. इस श्रेणी को फौजदारी तथा पुलिस के कार्य भी दे दिए गए. कर तथा दीवानी मामलों का अंतर समाप्त कर दीवानी न्यायालयों को समस्त दीवानी मामलों को सुनने का अधिकार दे दिया गया. मुंसिफ की अदालत का अध्यक्ष एक भारतीय अधिकारी होता था. इस अदालत को 50 (पचास) रुपये तक के मामले सुनने का अधिकार था. इसके ऊपर रजिस्ट्रार का न्यायालय था. इस न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश कोई यूरोपीय व्यक्ति होता था. इसे 200 रुपये तक के मामले सुनने का अधिकार होता था. इन दोनों न्यायालयों से अपील नगर अथवा जिला न्यायाधीश के न्यायालय में हो सकती थी. जिला न्यायाधीश सभी दीवानी मामले सुन सकता था. उसकी सहायता के लिए भारतीय विधिवेत्ता होते थे. जिला के अंतर अपील न्यायालयों के ऊपर चार प्रान्तीय न्यायालय थे. ये प्रान्तीय न्यायालय कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, ढाका और पटना में स्थित थे. इन न्यायालयों में जिला न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील हो सकती थी. ये न्यायालय जिला न्यायालयों के कार्य का निरीक्षण भी करते थे. इनके परामर्श पर सदर दीवानी न्यायालय किसी जिला न्यायाधीश को निलम्बित भी कर सकता था. कुछ मामलों में यह न्यायालय आरम्भिक आधिकारिता (Original Jurisdiction) का भी प्रयोग करता था. इस न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश भी कोई यूरोपीय व्यक्ति ही होता था. यह न्यायालय 1000 रुपये तक के मामले सुन सकता था. इसके ऊपर सदर दीवानी न्यायालय था. यह न्यायालय कलकत्ता में स्थित था. 5000/- रुपये से अधिक के मामले की अपील सपरिषद् सम्राट के समक्ष हो सकती थी. इसके सदस्य गवर्नर जनरल और उसके पार्षद होते थे. उपरोक्त न्यायालयों के संबंध में कार्यविधि के नियम बना दिए गए थे . इन न्यायालयों से सम्बन्धित भारतीय अधिकारियों की योग्यताएं भी निर्धारित कर दी गई थी. इन न्यायालयों में हिन्दुओं पर हिन्दू तथा मुसलमानों पर मुस्लिम विधि लागू होती थी. इन जिलों में रहने वाले यूरोपीय लोग भी इन दीवानी न्यायालयों की अधिकारिता के अधीन कर दिए गए. इसी प्रकार सरकारी अधिकारी भी अपने सरकारी कार्यों के लिए इन न्यायालयों के प्रति उत्तरदायी थे. इस प्रकार लार्ड कॉर्नवालिस ने भारत में प्रथम बार "कानून की सर्वोच्चता" के सिद्धांत को स्थापित किया. दाण्डिक कानून में सुथार (Reforms in Criminal Law) लार्ड कॉर्नवालिस ने फौजदारी न्याय व्यवस्था में भी अनेक सुधार कार्य किये. जिला फौजदारी न्यायालय को समाप्त कर दिया. प्रान्तीय भ्रमण करने वाली अदालतें (Circuit Courts) दीवानी अदालतों के साथ-साथ फौजदारी अदालतों के रूप में भी कार्य करने लगी. इनकी सहायता के लिए भारतीय काजी तथा मुफ्ती होते थे. ये न्यायालय मृत्युदंड भी दे सकते थे किन्तु इस संबंध में सदन निज़ामत न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती थी . सदर निजामत न्यायालय फौजदारी मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के रूप में कार्य करता था. गवर्नर जनरल को क्षमादान या दंड के लघुकरण की अनुमति थी. इनके अलावा भी कॉर्नवालिस ने फौजदारी कानून में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किये, जिन्हें 1797 में ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम के द्वारा प्रमाणित किया. दिसम्बर, 1790 में मुसलमान न्यायाधिकारियों के मार्गदर्शन के लिए एक नियम बनाया गया. इस नियम के अनुसार हत्या के मामले में हत्यारे की भावना पर अधिक बल दिया गया न कि हत्या के अस्त्र एवं ढंग पर. इसी प्रकार मृतक के अभिभावकों की इच्छा से क्षमादान या हर्जाना आदि निर्धारित करना बंद कर दिया गया. 1793 में यह तय किया गया कि साक्षी के "धर्म विशेष" का मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं होगा. मुस्लिम कानून के अनुसार किसी मुस्लिम व्यक्ति की हत्या से सम्बन्ध में अन्य धर्म के व्यक्ति साक्ष्य नहीं दे सकते थे. पुलिस प्रशासन में सुधार (Reforms in Police Administration) लार्ड कॉर्नवालिस ने अपने न्यायिक सुधारों की सफलता हेतु पुलिस प्रशासन में भी महत्वपूर्ण सुधार किए. कलकत्ता में कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब थी. पुलिस अधीक्षक भ्रष्ट हो चुके थे. पुलिस कर्मिकों में तत्परता एवं ईमानदारी लाने के लिए उनके वेतन में वृद्धि की गई. अपराधियों को पकड़ने पर पुरस्कार आदि भी दिए जाने लगे. इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों के पुलिस अधिकारों का उन्मूलन कर दिया गया. अब जमींदार अपने क्षेत्रों में डकैती और हत्या आदि अपराधों के लिए उत्तरदायी न रहे. जिले की पुलिस का भार अंग्रेज दण्डनायको (Magistrates) पर डाला गया. समस्त जिलों को 400 वर्ग मील के क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया. प्रत्येक क्षेत्र में एक दरोगा तथा उसकी सहायता के लिए अन्य पुलिस कर्मचारी नियुक्त किए गए. कर व्यवस्था में सुधार (Reforms in Revenue System) लार्ड कॉर्नवालिस ने कर व्यवस्था में सुधार हेतु अनेक कदम उठाए. 1787 में प्रान्त को राजस्व क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया. प्रत्येक क्षेत्र में एक-एक कलक्टर की नियुक्ति कर दी गई. राजस्व बोर्ड को कलक्टरों के कार्य का निरीक्षण करने का भार भी सौंपा गया. 1790 में कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्ज की अनुमति से कॉर्नवालिस ने जमींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया. इसके लिए जमींदारों ने एक निश्चित राशि वार्षिक कर के रूप में कम्पनी को देनी स्वीकार की. 1793 में यह व्यवस्था स्थाई बना दी गई. व्यापार में सुथार (Reforms in Trade) लार्ड कार्नवालिस ने देखा कि कम्पनी के व्यापार विभाग में भ्रष्टाचार फैला हुआ है. अधिकार की मिलीभगत से यूरोपीय तथा भारतीय ठेकेदार घटिया माल उँची दरों पर कम्पनी को देते थे. 1773 में गठित व्यापार बोर्ड के सदस्य भी अपनी कमीशन और रिश्वत के कारण इन अनियमितताओं को रोकना नहीं चाहते थे. कॉर्नवालिस ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए व्यापार बोर्ड के सदस्यों की संख्या 11 से घटाकर 5 कर दी तथा ठेकेदारों के स्थान पर गुमाश्तों तथा व्यापारिक प्रतिनिधियों के द्वारा माल लेने की व्यवस्था को स्थापित किया. यह व्यवस्था कम्पनी के व्यापार के अंतिम दिनों तक चलती रही. प्रशासन का यूरोपीयकरण (Europeanisation of Administration) लार्ड कॉर्नवालिस स्वभाव से ही भारतीयों का विरोधी था. वह भारतीयों को बहुत हीन दृष्टि से देखता था. अपने इस दृष्टिकोण के कारण उसने प्रशासन एवं सेना में समस्त उच्च पदों पर यूरोपीय लोगों को नियुक्त किया. उसकी नीति भारतीयों को केवल वही पद देने की थी जिसके लिए अंग्रेज उपलब्ध न हों. बंगाल का स्थाई बन्दोबस्त (Permanent Settlement of Bengal) मुख्य रूप से कॉर्नवालिस को भारत में एक ऐसी भूमि कर व्यवस्था को खोजने के लिए भेजा गया था. जिससे कम्पनी और कृषक दोनों का लाभ हो. कॉर्नवालिस ने बहुत सोच-विचार और गंभीर अध्ययन के बाद बंगाल के लिए एक स्थाई भूमि कर व्यवस्था की स्थापना की. इस व्यवस्था के अनुसार जमींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया गया. जमींदारों के लिए यह आवश्यक कर दिया गया कि वे 1790-91 की कर संग्रह की दर से (अर्थात 226,00,000 रुपये वार्षिक) कम्पनी को भूमिकर अदा करें. भूमि के लगान का 8/9 भाग कम्पनी को देना था तथा 1/9 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था. 1790 में यह व्यवस्था 10 वर्ष के लिए की गई थी किन्तु 1793 में इसे स्थाई कर दिया गया. व्यवस्था के लाभ (Advantages of System) बंगाल की स्थाई भूमि कर व्यवस्था से कम्पनी को निम्नलिखित लाभ-- इससे राज्य की आय निश्चित हो गई सरकार समय-समय पर नई कर व्यवस्था और कर निर्धारण के जटिल कार्य से बच गई. यह माना गया कि इससे कृषि व्यवसाय को बढ़ावा मिलेगा. जमींदार अधिकाधिक उपज के लिए कृषकों को प्रोत्साहित करेंगे. इससे कृषकों को भी लाभ होगा. राजनीतिक रूप से यह माना गया कि इससे राजभक्त जमींदारों का एक संगठित समूह तैयार हो जाएगा. यह समूह कम्पनी के हितों की हर प्रकार से रक्षा करेगा. क्योंकि कम्पनी ने उनके अधिकारों को सुरक्षित किया है. सामाजिक रूप से यह माना गया कि जमींदार कृषकों के प्राकृतिक नेता के रूप में कार्य करेंगे. व्यवस्था के दोष (Disadvantages of System) व्यवस्था के लागू होने के कुछ ही समय बाद इसके दोष सामने आने शुरू हो गए. इसके प्रमुख दोष थे-- इस व्यवस्था से समाज में उच्च स्तर पर सामन्त वर्ग और निम्न स्तर पर दास वर्ग की उत्पत्ति हुई. भूमि कर का स्थाई बन्दोबस्त करते समय भुमि तथा उत्पादन की भावी मूल्य वृद्धि की ओर ध्यान न दिया गया. इससे कृषि योग्य भूमि तथा उत्पादन के मूल्य में जब कई गुणा वृद्धि हो गई तब भी सरकार को कोई अतिरिक्त धन प्राप्त न हो सका. अधिकतर जमींदारों ने अपनी सामन्तवादी प्रवृत्ति के कारण कृषकों के शोषण पर ध्यान दिया कृषि के विकास या कृषकों की समृद्धि पर नहीं. इस व्यवस्था के द्वारा यद्यपि अंग्रेजों को राजभक्तों का एक समूह प्राप्त हो गया किन्तु इसने समाज के एक बड़े वर्ग को अंग्रेजों का विरोधी बना दिया. मूल्यांकन (Evaluation) कॉर्नवालिस के सुधारों का आधार वॉरेन हेस्टिग्ज ने तैयार किया था. उसने इन आधारों को लेकर एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जो लम्बे समय तक यथावत् जारी रही. उसके शासन काल को कॉर्नवालिस प्रणाली "या" 1793 की प्रणाली के नाम से संबोधित किया जाता है. उसने भूमि के पट्टे, न्यायिक तथा पुलिस प्रबन्ध जैसे अंग्रेजी सिद्धांत और संस्थाएं भारत में लागू की. उसका भारतीयों के प्रति बड़ा नकारात्मक दृष्टिकोण था. उसके द्वारा प्रारंभ की गई उच्च सरकारी पदों पर यूरोपीयों की नियुक्ति की व्यवस्था ब्रिटिश साम्राज्य के अंतिम दिनों तक चलती रही. वह प्रथम गवर्नर जनरल था जिसने भारत में "कानून की सर्वोच्चता' के सिद्धांत को स्थापित किया.

कॉर्नवालिस के न्यायिक सुधार (Judicial Reforms of Cornwallis)

  • कॉर्नवालिस का सर्वप्रथम कार्य जिले की समस्त शक्तियों को कलक्टरों के हाथों में केन्द्रित करना था.
  • 1787 में उसने जिलों में कार्यवाहक कलैक्टरों को दीवानी न्यायालयों का न्यायाधीश भी नियुक्त कर दिया.
  • इसके अलावा उन्हें कुछ फौजदारी अधिकार और सीमित मामलों में फौजदारी न्याय करने की भी शक्ति प्रदान की गई.
  • भारतीय न्यायाधीशों वाली जिला फौजदारी अदालतें समाप्त कर दी गई.
  • इन अदालतों के स्थान पर चार (3 बंगाल के लिए और 1 बिहार के लिए) भ्रमण करने वाले न्यायालय स्थापित किए गए.
  • इन ,न्यायालयों के अध्यक्ष यूरोपीय लोग होते थे.
  • काजी और मुफ्ती इनकी सहायता करते थे.
  • ये न्यायालय जिलों का दौरा करने के साथ-साथ नगर दण्डनायकों (Magistrates) के द्वारा निर्देशित फौजदारी मामलों को भी निपटाते थे.
  • मुर्शिदाबाद में स्थित सदर निजामत न्यायालय के स्थान पर एक ऐसा ही न्यायालय कलकत्ता में स्थापित किया गया.
  • यह न्यायालय गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् से मिलकर बनता था.
  • इनकी सहायता के लिए मुख्य काजी तथा मुख्य मुफ्ती होते थे.

कॉर्नवालिस संहिता, 1793 (Cornwallis Code, 1793)

  • 1793 में कार्नवालिस ने अपने न्यायिक सुधारों को अंतिम रूप देते हुए एक संहिता” (कॉर्नवालिस संहिता) के रूप में प्रस्तुत किया.
  • कॉर्नवालिस के न्यायिक सुधार “शक्ति-पृथक्करण” (Separation of Powers) के प्रसिद्ध सिद्धांत पर आधारित थे.
  • कॉर्नवालिस ने कर तथा न्याय प्रशासन को पृथक किया.
  • कॉर्नवालिस का यह अनुभव था कि कलक्टर के रूप में किए गए अन्याय का निर्णय कलक्टर स्वयं न्यायाधीश के रूप में कैसे कर सकता है?
  • इस न्याय व्यवस्था पर जमींदारों और कृषकों का विश्वास न रहेगा.
  • अतः कॉर्नवालिस ने अपनी उक्त संहिता के द्वारा कलक्टर की न्यायिक तथा फौजदारी शक्तियाँ ले ली.
  • अब कलक्टर के पास केवल कर संबंधी शक्तियाँ ही रह गई.
  • जिला दीवानी न्यायालयों में कार्य के लिए जिला न्यायाधीशों (District Judges) की एक नई श्रेणी गठित की गई.
  • इस श्रेणी को फौजदारी तथा पुलिस के कार्य भी दे दिए गए.

 

  • कर तथा दीवानी मामलों का अंतर समाप्त कर दीवानी न्यायालयों को समस्त दीवानी मामलों को सुनने का अधिकार दे दिया गया.
  • मुंसिफ की अदालत का अध्यक्ष एक भारतीय अधिकारी होता था.
  • इस अदालत को 50 (पचास) रुपये तक के मामले सुनने का अधिकार था.
  • इसके ऊपर रजिस्ट्रार का न्यायालय था.
  • इस न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश कोई यूरोपीय व्यक्ति होता था.
  • इसे 200 रुपये तक के मामले सुनने का अधिकार होता था.
  • इन दोनों न्यायालयों से अपील नगर अथवा जिला न्यायाधीश के न्यायालय में हो सकती थी.
  • जिला न्यायाधीश सभी दीवानी मामले सुन सकता था.
  • उसकी सहायता के लिए भारतीय विधिवेत्ता होते थे.
  • जिला के अंतर अपील न्यायालयों के ऊपर चार प्रान्तीय न्यायालय थे.
  • ये प्रान्तीय न्यायालय कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, ढाका और पटना में स्थित थे.
  • इन न्यायालयों में जिला न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील हो सकती थी.
  • ये न्यायालय जिला न्यायालयों के कार्य का निरीक्षण भी करते थे.
  • इनके परामर्श पर सदर दीवानी न्यायालय किसी जिला न्यायाधीश को निलम्बित भी कर सकता था.
  • कुछ मामलों में यह न्यायालय आरम्भिक आधिकारिता (Original Jurisdiction) का भी प्रयोग करता था.
  • इस न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश भी कोई यूरोपीय व्यक्ति ही होता था.
  • यह न्यायालय 1000 रुपये तक के मामले सुन सकता था.
  • इसके ऊपर सदर दीवानी न्यायालय था.
  • यह न्यायालय कलकत्ता में स्थित था.
  • 5000/- रुपये से अधिक के मामले की अपील सपरिषद् सम्राट के समक्ष हो सकती थी.
  • इसके सदस्य गवर्नर जनरल और उसके पार्षद होते थे.
  • उपरोक्त न्यायालयों के संबंध में कार्यविधि के नियम बना दिए गए थे .
  • इन न्यायालयों से सम्बन्धित भारतीय अधिकारियों की योग्यताएं भी निर्धारित कर दी गई थी.
  • इन न्यायालयों में हिन्दुओं पर हिन्दू तथा मुसलमानों पर मुस्लिम विधि लागू होती थी.
  • इन जिलों में रहने वाले यूरोपीय लोग भी इन दीवानी न्यायालयों की अधिकारिता के अधीन कर दिए गए.
  • इसी प्रकार सरकारी अधिकारी भी अपने सरकारी कार्यों के लिए इन न्यायालयों के प्रति उत्तरदायी थे.
  • इस प्रकार लार्ड कॉर्नवालिस ने भारत में प्रथम बार “कानून की सर्वोच्चता” के सिद्धांत को स्थापित किया.

दाण्डिक कानून में सुथार (Reforms in Criminal Law)

  • लार्ड कॉर्नवालिस ने फौजदारी न्याय व्यवस्था में भी अनेक सुधार कार्य किये.
  • जिला फौजदारी न्यायालय को समाप्त कर दिया.
  • प्रान्तीय भ्रमण करने वाली अदालतें (Circuit Courts) दीवानी अदालतों के साथ-साथ फौजदारी अदालतों के रूप में भी कार्य करने लगी.
  • इनकी सहायता के लिए भारतीय काजी तथा मुफ्ती होते थे.
  • ये न्यायालय मृत्युदंड भी दे सकते थे किन्तु इस संबंध में सदन निज़ामत न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती थी .
  • सदर निजामत न्यायालय फौजदारी मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के रूप में कार्य करता था.
  • गवर्नर जनरल को क्षमादान या दंड के लघुकरण की अनुमति थी.
  • इनके अलावा भी कॉर्नवालिस ने फौजदारी कानून में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किये, जिन्हें 1797 में ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम के द्वारा प्रमाणित किया.
  • दिसम्बर, 1790 में मुसलमान न्यायाधिकारियों के मार्गदर्शन के लिए एक नियम बनाया गया.
  • इस नियम के अनुसार हत्या के मामले में हत्यारे की भावना पर अधिक बल दिया गया न कि हत्या के अस्त्र एवं ढंग पर.
  • इसी प्रकार मृतक के अभिभावकों की इच्छा से क्षमादान या हर्जाना आदि निर्धारित करना बंद कर दिया गया.
  • 1793 में यह तय किया गया कि साक्षी के “धर्म विशेष” का मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं होगा.
  • मुस्लिम कानून के अनुसार किसी मुस्लिम व्यक्ति की हत्या से सम्बन्ध में अन्य धर्म के व्यक्ति साक्ष्य नहीं दे सकते थे.

पुलिस प्रशासन में सुधार (Reforms in Police Administration)

  • लार्ड कॉर्नवालिस ने अपने न्यायिक सुधारों की सफलता हेतु पुलिस प्रशासन में भी महत्वपूर्ण सुधार किए.
  • कलकत्ता में कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब थी.
  • पुलिस अधीक्षक भ्रष्ट हो चुके थे.
  • पुलिस कर्मिकों में तत्परता एवं ईमानदारी लाने के लिए उनके वेतन में वृद्धि की गई.
  • अपराधियों को पकड़ने पर पुरस्कार आदि भी दिए जाने लगे.
  • इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों के पुलिस अधिकारों का उन्मूलन कर दिया गया.
  • अब जमींदार अपने क्षेत्रों में डकैती और हत्या आदि अपराधों के लिए उत्तरदायी न रहे.
  • जिले की पुलिस का भार अंग्रेज दण्डनायको (Magistrates) पर डाला गया.
  • समस्त जिलों को 400 वर्ग मील के क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया.
  • प्रत्येक क्षेत्र में एक दरोगा तथा उसकी सहायता के लिए अन्य पुलिस कर्मचारी नियुक्त किए गए.

कर व्यवस्था में सुधार (Reforms in Revenue System)

  • लार्ड कॉर्नवालिस ने कर व्यवस्था में सुधार हेतु अनेक कदम उठाए.
  • 1787 में प्रान्त को राजस्व क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया.
  • प्रत्येक क्षेत्र में एक-एक कलक्टर की नियुक्ति कर दी गई.
  • राजस्व बोर्ड को कलक्टरों के कार्य का निरीक्षण करने का भार भी सौंपा गया.
  • 1790 में कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्ज की अनुमति से कॉर्नवालिस ने जमींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया.
  • इसके लिए जमींदारों ने एक निश्चित राशि वार्षिक कर के रूप में कम्पनी को देनी स्वीकार की.
  • 1793 में यह व्यवस्था स्थाई बना दी गई.

व्यापार में सुथार (Reforms in Trade)

  • लार्ड कार्नवालिस ने देखा कि कम्पनी के व्यापार विभाग में भ्रष्टाचार फैला हुआ है.
  • अधिकार की मिलीभगत से यूरोपीय तथा भारतीय ठेकेदार घटिया माल उँची दरों पर कम्पनी को देते थे.
  • 1773 में गठित व्यापार बोर्ड के सदस्य भी अपनी कमीशन और रिश्वत के कारण इन अनियमितताओं को रोकना नहीं चाहते थे.
  • कॉर्नवालिस ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए व्यापार बोर्ड के सदस्यों की संख्या 11 से घटाकर 5 कर दी तथा ठेकेदारों के स्थान पर गुमाश्तों तथा व्यापारिक प्रतिनिधियों के द्वारा माल लेने की व्यवस्था को स्थापित किया.
  • यह व्यवस्था कम्पनी के व्यापार के अंतिम दिनों तक चलती रही.

प्रशासन का यूरोपीयकरण (Europeanisation of Administration)

  • लार्ड कॉर्नवालिस स्वभाव से ही भारतीयों का विरोधी था.
  • वह भारतीयों को बहुत हीन दृष्टि से देखता था.
  • अपने इस दृष्टिकोण के कारण उसने प्रशासन एवं सेना में समस्त उच्च पदों पर यूरोपीय लोगों को नियुक्त किया.
  • उसकी नीति भारतीयों को केवल वही पद देने की थी जिसके लिए अंग्रेज उपलब्ध न हों.

बंगाल का स्थाई बन्दोबस्त (Permanent Settlement of Bengal)

  • मुख्य रूप से कॉर्नवालिस को भारत में एक ऐसी भूमि कर व्यवस्था को खोजने के लिए भेजा गया था.
  • जिससे कम्पनी और कृषक दोनों का लाभ हो.
  • कॉर्नवालिस ने बहुत सोच-विचार और गंभीर अध्ययन के बाद बंगाल के लिए एक स्थाई भूमि कर व्यवस्था की स्थापना की.
  • इस व्यवस्था के अनुसार जमींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया गया.
  • जमींदारों के लिए यह आवश्यक कर दिया गया कि वे 1790-91 की कर संग्रह की दर से (अर्थात 226,00,000 रुपये वार्षिक) कम्पनी को भूमिकर अदा करें.
  • भूमि के लगान का 8/9 भाग कम्पनी को देना था तथा 1/9 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था.
  • 1790 में यह व्यवस्था 10 वर्ष के लिए की गई थी किन्तु 1793 में इसे स्थाई कर दिया गया.

व्यवस्था के लाभ (Advantages of System)

  • बंगाल की स्थाई भूमि कर व्यवस्था से कम्पनी को निम्नलिखित लाभ–
  1. इससे राज्य की आय निश्चित हो गई सरकार समय-समय पर नई कर व्यवस्था और कर निर्धारण के जटिल कार्य से बच गई.
  2. यह माना गया कि इससे कृषि व्यवसाय को बढ़ावा मिलेगा. जमींदार अधिकाधिक उपज के लिए कृषकों को प्रोत्साहित करेंगे. इससे कृषकों को भी लाभ होगा.
  3. राजनीतिक रूप से यह माना गया कि इससे राजभक्त जमींदारों का एक संगठित समूह तैयार हो जाएगा. यह समूह कम्पनी के हितों की हर प्रकार से रक्षा करेगा. क्योंकि कम्पनी ने उनके अधिकारों को सुरक्षित किया है.
  4. सामाजिक रूप से यह माना गया कि जमींदार कृषकों के प्राकृतिक नेता के रूप में कार्य करेंगे.

व्यवस्था के दोष (Disadvantages of System)

  • व्यवस्था के लागू होने के कुछ ही समय बाद इसके दोष सामने आने शुरू हो गए.
  • इसके प्रमुख दोष थे–
  1. इस व्यवस्था से समाज में उच्च स्तर पर सामन्त वर्ग और निम्न स्तर पर दास वर्ग की उत्पत्ति हुई.
  2. भूमि कर का स्थाई बन्दोबस्त करते समय भुमि तथा उत्पादन की भावी मूल्य वृद्धि की ओर ध्यान न दिया गया. इससे कृषि योग्य भूमि तथा उत्पादन के मूल्य में जब कई गुणा वृद्धि हो गई तब भी सरकार को कोई अतिरिक्त धन प्राप्त न हो सका.
  3. अधिकतर जमींदारों ने अपनी सामन्तवादी प्रवृत्ति के कारण कृषकों के शोषण पर ध्यान दिया कृषि के विकास या कृषकों की समृद्धि पर नहीं.
  4. इस व्यवस्था के द्वारा यद्यपि अंग्रेजों को राजभक्तों का एक समूह प्राप्त हो गया किन्तु इसने समाज के एक बड़े वर्ग को अंग्रेजों का विरोधी बना दिया.

मूल्यांकन (Evaluation)

  • कॉर्नवालिस के सुधारों का आधार वॉरेन हेस्टिग्ज ने तैयार किया था.
  • उसने इन आधारों को लेकर एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जो लम्बे समय तक यथावत् जारी रही.
  • उसके शासन काल को कॉर्नवालिस प्रणाली “या” 1793 की प्रणाली के नाम से संबोधित किया जाता है.
  • उसने भूमि के पट्टे, न्यायिक तथा पुलिस प्रबन्ध जैसे अंग्रेजी सिद्धांत और संस्थाएं भारत में लागू की.
  • उसका भारतीयों के प्रति बड़ा नकारात्मक दृष्टिकोण था.
  • उसके द्वारा प्रारंभ की गई उच्च सरकारी पदों पर यूरोपीयों की नियुक्ति की व्यवस्था ब्रिटिश साम्राज्य के अंतिम दिनों तक चलती रही.
  • वह प्रथम गवर्नर जनरल था जिसने भारत में “कानून की सर्वोच्चता’ के सिद्धांत को स्थापित किया.

The post लार्ड कार्नवालिस 1786-1793 (Lord Cornwallis in Hindi, 1786-1793) appeared first on SRweb.



from SRweb https://ift.tt/2KPTKYJ
via IFTTT

Wednesday, November 28, 2018

वॉरेन हेस्टिंग्ज़, (WARREN HASTINGS, 1772-1785)  रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 | आधुनिक भारत

वॉरेन हेस्टिंग्ज़, (WARREN HASTINGS, 1772-1785)  रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

वॉरेन हेस्टिंग्ज़, 1772-1785

  • 1772 में ब्रिटिश सरकार ने वॉरेन हेस्टिंग्ज़ को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया.
  • अपनी नियुक्ति के बाद वॉरेन हेस्जिग्ज़ ने कम्पनी की आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने तथा उसके व्यापार को बढ़ाने के लिए अनेक प्रयत्न किए.
  • उसने बंगाल में एक सुदृढ़ प्रशासन की भी व्यवस्था की.
  • वॉरेन हेस्टिग्ज़ द्वारा प्रस्तुत प्रमुख सुधारों को निम्नलिखित शीर्षकों के अधीन भली-भांति समझा जा सकता है

वॉरेन हेस्टिंग्ज़, (WARREN HASTINGS, 1772-1785)  रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms)

  • 1772 में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्ज ने क्लाइव द्वारा प्रस्तुत द्वैध प्रणाली को बंद करने का आदेश दिया.
  • कलकत्ता परिषद् और उसके प्रधान को यह निर्देश दिया गया कि वे स्वयं दिवान बने तथा बंगाल, बिहार और उड़ीसा का प्रबन्ध भी संभालें.
  • इस प्रकार परिषद् और उसके प्रधान को मिलाकर एक राजस्व बोर्ड (Boad of Revenue) का गठन किया गया.
  • बोर्ड ने अपने कर संग्राहक नियुक्त किए.
  • इन संग्राहकों का कार्य कर व्यवस्था करना था.
  • कोष को मुर्शिदाबाद से कलकत्ता लाया गया.
  • प्रशासन का समस्त कार्यभार कम्पनी के कार्यकर्ताओं पर डाला गया.
  • इससे प्रशासन के संबंध में नवाब के अधिकार और कम हो गए.
  • नवाब के निजी गृह-प्रबन्ध का पुनर्गठन किया गया तथा मीर जाफर की विधवा मुन्नी बेगम को अल्पवयस्क नवाब मुबारिकुद्दौला की संरक्षक के रूप में नियुक्त किया गया.
  • नवाब का भत्ता 16 लाख रुपये कर दिया गया जबकि पहले यह 32 लाख रुपये था.
  • मुगल सम्राट से इलाहाबाद तथा कारा के जिले वापस ले लिए गए.
  • इन जिलों को 50 लाख रुपये में अवध के नवाब को बेच दिया गया.

रेग्युलेटिंग एक्ट 1773, और प्रशासनिक सुधार (Regulating Act 1773, and Administrative Reforms)

  • इस एक्ट के द्वारा भारत में शासन का भार गवर्नर जनरल तथा उसकी चार सदस्यीय परिषद् पर डाला गया.
  • परिषद् का अध्यक्ष गवर्नर जनरल होता था.
  • परिषद् में निर्णय बहुमत से किए जाते थे.
  • मत बराबर होने की स्थिति में गवर्नर जनरल को निर्णायक मत देने का अधिकार होता था.
  • इस एक्ट में परिषद् के पांचों (गवर्नर जनरल समेत) सदस्यों के नाम दिए गए थे.
  • इनमें से वॉरेन हेस्टिग्ज़ (गवर्नर जनरल) और बारवैल तो भारत में ही थे, शेष तीन सदस्य क्रमशः क्लेवरिंग, फ्रांसीस और मॉनसन अक्टूबर, 1774 में इंग्लैण्ड से भारत पहुंचे.
  • गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् के मध्य प्राय: झगड़े होते रहते थे.

भूमिकर सुधार (Land Revenue Reforms )

  • वॉरेन हेस्टिंग्ज का यह दृढ़ मत था कि शासक ही सम्पूर्ण भूमि का मालिक है.
  • वह जमींदारों को केवल कर संग्रहकर्ता ही मानता था.
  • उसके मत में जमींदारी का कार्य केवल कृषकों से कर संग्रह करना तथा इसके बदले में अपनी आढ़त (Commission) प्राप्त करना था.
  • वॉरेन हेस्टिंग्ज़ ने एक संतोषजनक राजस्व व्यवस्था स्थापित करने के लिए प्रसिद्ध “परीक्षण तथा अशुद्धि” (Trial and Error) का नियम अपनाया.
  • वह जमींदारों को भूमि का स्वामी नहीं मानता था.
  • अतः 1772 में उसने कर संग्रहण के अधिकार को ऊंची बोली देने वाले को पांच वर्ष के लिए नीलाम कर दिया.
  • उसने इस संबंध में जमींदारों के श्रेष्ठता संबंधी किसी दावे पर विचार नहीं किया.
  • 1773 में उसने कर-संग्रह की व्यवस्था में अनेक सुधार किए.
  • इन सुधारों के तहत उसने जिलों में भ्रष्ट तथा निजी व्यापार में लगे कलक्टरों के स्थान पर भारतीय दीवानों को नियुक्त किया.
  • इनके कार्यों का निरीक्षण करने के लिए उसने छह प्रान्तीय परिषदें भी नियुक्त की.
  • ये परिषदें कलकत्ता स्थित राजस्व बोर्ड के अधीन होती थी.
  • 1776 में अनेक दोषों से ग्रस्त होने के कारण पंचवर्षीय कर-संग्रहण के ठेके की उक्त व्यवस्था समाप्त कर दी गई.
  • अब पुनः एक वर्षीय प्रणाली को अपनाया गया.
  • इसके अलावा अब जमींदारों को कर-संग्रहण के संबंध में अधिक श्रेष्ठ माना गया.
  • 1781 में पुन: इस व्यवस्था में सुधार किया गया.
  • अब प्रान्तीय परिषदें समाप्त कर दी गई.
  • जिलों में पुनः कलक्टरों की नियुक्ति की गई.
  • किन्तु इस बार इन्हें कर निश्चित करने का अधिकार नहीं दिया गया.
  • कानूनगो भी पुनः नियुक्त किए गए.
  • सर्वोपरि निरीक्षण की शक्ति अब भी कलकत्ता स्थित राजस्व बोर्ड के हाथ में थी.

न्यायिक सुधार (Judicial Reforms)

  • न्यायिक सुधार के संबंध में वॉरेन हेस्टिंग्ज ने अधिक सफलता अर्जित की.
  • उससे पूर्व बंगाल में जमींदार ही दीवानी और फौजदारी मुकदमों का निपटारा करते थे.
  • मध्यस्थता का बहुत प्रचलन था.
  • न्याय के क्षेत्र में धन का प्रभाव अधिक था.
  • वॉरेन हेस्टिंग्ज़ ने इस व्यवस्था में सुधार हेतु मुगलों की न्याय प्रणाली को अपनाने का प्रयास किया.
  • 1772 में उसने प्रत्येक जिले में एक दीवानी तथा एक फौजदारी न्यायालय की स्थापना करवाई.
  • दीवानी न्यायालय कलक्टरों के अधीन होता था.
  • हिन्दुओं पर हिन्दू विधि तथा मुसलमानों पर मुस्लिम विधि लागू होती थी.
  • इस न्यायलय में 500 रुपये तक के मामले सुने जा सकते थे.
  • इससे ऊपर सदर दीवानी अदालत में अपील की जा सकती थी.
  • सदर दीवानी अदालत में कलकत्ता परिषद् का प्रधान और दो अन्य सदस्य होते थे.
  • इनकी सहायता के लिए भारतीय अधिकारी होते थे.
  • जिला फौजदारी (निजामत) न्यायालय एक भारतीय अधिकारी के अधीन होता था.
  • इसकी सहायता के लिए एक मुफ्ती और एक काजी होता था.
  • इस न्यायालय में मुस्लिम कानून लागू होता था.
  • मृत्यु दण्ड तथा सम्पत्ति की जब्ती का दंड सदर निजामत न्यायालय द्वारा प्रमाणित किया जाना आवश्यक था.
  • जिला निजामत न्यायालय से सदर निज़ामत न्यायालय में अपील हो सकती थी.
  • सदर निज़ामत न्यायालय का अध्यक्ष उपनिजाम होता था.
  • उसकी सहायता के लिए एक मुख्य काजी एक मुख्य मुफ्ती और तीन मौलवियों की व्यवस्था थी.
  • कलकत्ता परिषद और उसके प्रधान को सदर निजामत न्यायलय के कार्यों का निरीक्षण करने का अधिकार था.

रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773 और न्यायिक सुधार (Regulating Act, 1773 and Judicial Reforms)

  • इस एक्ट के द्वारा कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई.
  • इसके अधिकार क्षेत्र में कलकत्ता में रहने वाले सभी भारतीय तथा अंग्रेज थे.
  • कलकत्ता से बाहर के भारतीयों के झगड़ों को यह न्यायालय तभी सुन सकता था जब दोनों पक्ष इस संबंध में अपनी स्वीकृति दें.
  • इस न्यायालय में अंग्रेजी कानून लागू होता था.
  • जबकि सदर निजामत और सदर दीवानी न्यायालयों में हिन्दू तथा मुस्लिम कानून लागू होते थे.
  • आगे चलकर इन न्यायालयों, विशेषत: सर्वोच्च न्यायालय और सदर न्यायालयों का कार्यक्षेत्र आपस में टकराने लगा.
  • 1780 में वॉरेन हेस्टिंग्ज़ ने इस टकराव को कम करने के लिए रम्पे (सुप्रीम कोर्ट का तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश) को सदर दीवानी न्यायालय का 5,000 रुपये मासिक पर अधीक्षक नियुक्त किया.
  • किन्तु डाइरेक्टरों ने इस समाधान को अस्वीकार कर दिया.
  • इस प्रकार न्याय प्रणाली में उक्त द्वैधता चलती रही.

वाणिज्य संबंधी सुधार (Commercial Reforms)

  • वॉरेन हेस्टिंग्ज़ ने आन्तरिक व्यापार के क्षेत्र में उपस्थित व्यवधानों को दूर करने का प्रयास किया.
  • इन प्रयासों के तहत जमींदारों के क्षेत्रों में स्थित शुल्क गृह बन्द कर दिए गए.
  • अब केवल कलकत्ता, हुगली, मुर्शिदाबाद, ढाका और पटना में ही शुल्क गृह रह गए.
  • शुल्क अब ढाई प्रतिशत रह गया.
  • इसकी अदायगी सबके लिए अनिवार्य कर दी गई.
  • कम्पनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार पर भी अंकुश कड़ा कर दिया गया.
  • कम्पनी के गुमाश्तों द्वारा जुलाहों का शोषण भी बंद करवा दिया गया.
  • तिब्बत और भूटान से व्यापार बढ़ाने का प्रयास किया गया.

वॉरेन हेस्टिंग्ज तथा शाह आलम द्वितीय (Warren Hastings and Shah Alarm II)

  • वॉरेन हेस्टिंग्ज ने मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की स्थिति को और कमजोर कर दिया.
  • उसने बंगाल, बिहार, उड़ीसा की दीवानी के बदले 26 लाख रुपये वार्षिक की सम्राट को दी जाने वाली राशि बन्द कर दी.
  • इस कृत्य के पीछे तर्क यह दिया गया कि यह दीवानी उन्हें सम्राट की कृपा से नहीं वरन् अपनी शक्ति से प्राप्त हुई है.
  • हेस्टिंग्ज़ ने नवाब से इलाहाबाद और कारा के जिले भी वापस ले लिए.

वॉरेन हेस्टिंग्ज तथा अवध (Warren Hastings and Avadh)

  • वॉरेन हेस्टिंग्ज़ ने अवध के संबंध में क्लाइव द्वारा अपनाई गई मध्यवर्ती राज्य (Buffer State) की नीति को अपनाया.
  • मराठों के भय के कारण उसने अवध के साथ अपने संबंधों को अच्छा बनाने की सोची.
  • 1773 में उसने अवध के नवाब से बनारस की संधि की, इलाहाबाद तथा कारा के जिले नवाब को 50 लाख रुपये में दे दिये.
  • साथ ही यह भी निश्चय किया गया कि आवश्यकता पड़ने पर कम्पनी धन के बदले नवाब को सैनिक सहायता भी प्रदान करेगी.

रुहेलों का युद्ध (The Rohilla’s War)

  • रुहेला सरदार हाफिज रहमत खां ने मराठा आक्रमण के भय के कारण अवध के नवाब से 17 जून, 1772 को एक संधि की.
  • इस संधि के द्वारा उसने मराठों के विरुद्ध नवाब से सहायता मांगी तथा सहायता के बदले 40 लाख रुपये देने की पेशकश की.
  • जब कम्पनी तथा नवाब की संयुक्त सेना के प्रयास से रुहेला सरदार पर से मराठों का संकट टल गया तो रुहेला सरदार 40 लाख रुपये देने के अपने वचन से मुकर गया.
  • अतः फरवरी, 1774 में नवाब ने कम्पनी की सेना की सहायता से मीरपुर कटरा के युद्ध में रुहेलों की सेना को परास्त कर उनके सरदार हाफिज रहमत खां की हत्या कर दी.
  • इस प्रकार रुहेलखण्ड अवध में सम्मिलित कर लिया गया.

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (The First Anglo-Maratha War, 1776-82)

  • 1772 में पेशवा माधव राव की मृत्यु तथा पेशवा नारायण राव की हत्या के बाद महाराष्ट्र में उत्तराधिकार का संघर्ष प्रारंभ हो गया.
  • पेशवा नारायण राव के चाचा रघुनाथ राव ने नारायण राव के मरणोपरांत जन्मे पुत्र माधवराव नारायण के अधिकार को चुनौती दी.
  • किन्तु राज्य के एक प्रभावशाली नेता नाना फड़नवीस के समक्ष अपने को असमर्थ पाकर उसने ईस्ट इंडिया कम्पनी से सहायता की याचना की.
  • बम्बई सरकार ने इस याचना को स्वीकार कर रघुनाथ राव के साथ सूरत की संधि (1775) की.
  • सूरत की संधि के अनुसार कम्पनी ने रघुनाथ राव को पेशवा बनाने का वचन दिया.
  • इसके बदले रघुनाथ राव ने कम्पनी को सालसेट बसीन नगर देने का वादा किया.
  • इस प्रकार कम्पनी की सहायता प्राप्त कर रघुनाथ राव ने मई, 1775 में अर्शस नामक स्थान पर एक अनिर्णायक युद्ध लड़ा.
  • सूरत की संधि गवर्नर जनरल की जानकारी के बिना की गई थी.
  • अतः जब गवर्नर जनरल को पता चला तो उसने तथा उसकी परिषद् ने इस संधि को अस्वीकार कर दिया.
  • 1776 में पुरन्धर की संधि के नाम से एक और संधि की गई.
  • इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा हथियाए हुए सारे प्रदेश जिनमें, बसीन भी था, पेशवाओं को लौटा देने थे.
  • परन्तु इंग्लैण्ड स्थित डाइरेक्टरों ने सूरत की संधि को स्वीकार किया तथा पुरन्धर की संधि को अस्वीकृत कर दिया.
  • बड़गांव के स्थान पर वॉरेन हेस्टिंग्ज के द्वारा बम्बई से भेजी गई सेना को पेशवाओं की सेना ने परास्त कर दिया.
  • जनवरी, 1779 में बड़गांव की संधि हुई.
  • यह संधि अंग्रेजों के लिए बहुत अपमानजनक थी क्योंकि इसके अनुसार अंग्रेजों ने 1773 के बाद जीते गए सभी मराठा प्रदेशों को लौटाने का वचन दिया.
  • किन्तु शीघ्र ही अंग्रेजों ने अगस्त, 1780 में ग्वालियर के दुर्ग पर कब्जा कर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर लिया.
  • मई, 1782 में अंग्रेजों और मराठों के मध्य सालाबाई के स्थान पर एक संधि हुई इस संधि के बाद केवल सालसेट तथा एलीफेंटा के द्वीप अंग्रेजों के पास रहे.
  • अब अंग्रेजों ने रघुनाथ राव का साथ छोड़कर माधवराव नारायण को पेशवा स्वीकार कर लिया.
  • कुल मिलाकर इन घटनाओं के बाद कम्पनी को मराठों की शक्ति का एहसास हो गया.
  • इस कारण आगामी 20 वर्षों तक दोनों के मध्य शान्ति रही.

दूसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध (Second Anglo-Mysore War, 1780-84)

  • वॉरेन हेस्टिंग्ज को यह सन्देह था कि मालाबार तट पर स्थित माही के द्वारा हैदर अली को फ्रांसीसी सहायता मिलती है.
  • अतः उसने माहो पर कब्जा कर लिया.
  • हैदर अली ने इसका प्रत्युत्तर देने के लिए मराठों तथा निजाम के साथ एक समझौता करके तथा फ्रांसीसी सहायता का वचन लेकर जुलाई, 1780 में कर्नाटक पर आक्रमण करके अरकाट पर कब्जा कर लिया.
  • हैदर अली ने सर हेक्टर मनरो की सेना को भी परास्त कर दिया.
  • परन्तु वॉरेन हेस्टिंग्ज़ ने स्थिति को संभालते हुए सर आयर कूट के नेतृत्व में कलकत्ता से एक सेना भेजी.
  • इस सेना ने हैदर अली को पोर्टेनोवो, पोलिलूर तथा सोलिंगपुर के स्थानों पर जून, 1781 से सितम्बर 1781 तक की अवधि के भीतर परास्त कर दिया.
  • शीघ्र ही हैदर अली की सहायता के लिए फ्रांसीसी एडमिरल सफ़रिन अपनी सेना के साथ आ गया.
  • किन्तु ह्यूज के अधीन अंग्रेजी सेना ने उसकी एक न चलने दी.
  • दिसम्बर, 1782 में हैदर अली की मृत्यु हो गई.
  • उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा.
  • अन्ततः मार्च, 1784 में हुई मंगलौर की संधि के बाद युद्ध समाप्त हो गया तथा विजित प्रदेश लौटा दिए गए.

वॉरेन हेस्टिंग्ज़ और राजा चेतसिंह (Warren Hastings and King Chait Singh) 

  • बनारस का राजा बलवन्त सिंह अवध के नवाब का आश्रित था.
  • बलवन्तसिंह के बाद उसका पुत्र चेत सिंह गद्दी पर बैठा.
  • 1775 में अवध के नवाब ने बनारस को कम्पनी को सौंप दिया.
  • अतः चेतसिंह अब कम्पनी के प्रभुत्व में आ गया.
  • चेतसिंह प्रति वर्ष कम्पनी को लगान देता था, स्थिति ऐसी थी कि इस लगान में वृद्धि नहीं की जा सकती थी, 1778 में वॉरेन हेस्टिंग्ज ने चेतसिंह से पांच लाख रुपये की मांग की.
  • यह राशि प्रदान कर दी गई किन्तु हेस्टिंग्ज द्वारा धन की मांग निरन्तर को जाती रही.
  • जब चेतसिंह धन की आपूर्ति करवाने में असमर्थ हो गया तो हेस्टिग्ज ने इसे कम्पनी की अवमानना की संज्ञा दी तथा चेतसिंह पर 50 लाख रुपया जुर्माना कर दिया.
  • इस जुमनि को वसूलने के लिए उसने स्वयं बनारस की ओर प्रस्थान किया.
  • चेतसिंह बनारस छोड़कर भाग गया.
  • हेस्टिग्ज़ ने बनारस पर कब्जा कर लिया और चेतसिंह के भतीजे महीप नारायण को बनारस का कठपुतली शासक बना दिया गया.
  • चेतसिंह के संबंध में वॉरेन हेस्टिंग्ज़ की उक्त कार्यवाही की व्यापक आलोचना की गई.

वॉरेन हेस्टिंग्ज़ और अवध की बेगमें (Warren Hastings and Begums of Avadh)

  • अवध के नवाब आसफउद्दौला पर कम्पनी का 15 लाख रुपया बकाया था.
  • इस राशि को लौटाने में नवाब असमर्थ था.
  • जब वॉरेन हेस्टिंग्ज ने नवाब पर इस राशि के भुगतान हेतु दबाव डाला तो उसने कम्पनी से यह आज्ञा मांगी की उसे अपनी विमाताओं (अपने पिताकी विधवाओं ये अवध की बेगमें कहलाती थी) के कोष पर अधिकार करने की अनुमति दी जाए.
  • वॉरेन हेस्टिंग्ज़ ने तुरंत अपनी अनुमति दे दी.
  • हेस्टिंग्ज ने नवाब की सहायता के लिए अंग्रेज रेजिडेंट मिस्टर मिडलटन को यह आदेश दिया कि वह अवध की बेगमों को अपनी सेना के माध्यम से इस प्रकार विवश कर दे कि वे नवाब की इच्छा के अनुसार कार्य करें.
  • इस प्रकार बेगमों को लगभग 105 लाख रुपया देने के लिए बाध्य किया गया.
  • वॉरेन हेस्टिंग्ज़ के इस कृत्य की भी कटु आलोचना की गई.

मूल्यांकन (Evaluation)

  • वॉरेन हेस्टिंग्ज के संबंध में यह कहा जाता है कि उसने बलपूर्वक भारत को लूटा और शासन किया.
  • उसने ब्रिटिश शासन के आक्रान्ता पक्ष को प्रस्तुत किया.
  • उसकी पंचवर्षीय कर-संग्रहण की व्यवस्था से कृषकों को अपार कष्ट हुआ.
  • उसके द्वारा प्रस्तुत न्याय की द्वैध प्रणाली में सदैव टकराव की स्थिति बनी रही.
  • चेतसिंह और अवध की बेगमों के साथ उसके किए गए व्यवहार की बहुत आलोचना हुई.
  • 1788 से 1795 तक उस पर महाभियोग का मुकदमा चलता रहा.
  • संक्षेप में उसके अन्यायपूर्ण तथा निरंकुश कार्यों से अंग्रेज अंतरात्मा को ठेस पहुँची.

The post वॉरेन हेस्टिंग्ज़, (WARREN HASTINGS, 1772-1785)  रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 | आधुनिक भारत appeared first on SRweb.



from SRweb https://ift.tt/2Q309Wf
via IFTTT