Saturday, November 17, 2018

स्वतंत्र राज्यों का उदय (Rise of Autonomous States) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

स्वतंत्र राज्यों का उदय | (Rise of Autonomous States) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

हैदराबाद

  • 1724 ई. में चिनकिलिच खाँ (निजामउलमुल्क आसफजाह) ने हैदराबाद राज्य की स्थापना की.
  • सैयद बन्धुओं को हटाने में उसने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी.
  • 1720 ई. से 1722 ई. के बीच उसने दक्कन में अपनी स्थिति सुदृढ़ की.

स्वतंत्र राज्यों का उदय (Rise of Autonomous States) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

  • 1722 से 24 तक वह मुगल साम्राज्य का वजीर रहा, किन्तु सम्राट के ढुमुल रवैये से तंग आकर दक्कन वापस जाने का निश्चय कर लिया.
  • उसे दक्कन के वाइसराय का खिताब प्राप्त हुआ था.
  • हैदराबाद राज्य की स्थापना कर उस पर कठोर शासन किया.
  • उसने केन्द्रीय सरकार से अपनी स्वतंत्रता की खुलेआम घोषणा कभी नहीं की, किन्तु उसने व्यवहार में स्वतंत्र शासक की तरह ही काम किया.
  • उसने दिल्ली सरकार से बिना पूछे लड़ाईयाँ लड़ी, सुलह किए, खिताब बांटे तथा जागीरें एवं ओहदे प्रदान किए.
  • उसने हिन्दुओं के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई तथा एक हिन्दू, पूरनचन्द को अपना दीवान बनाया.
  • दक्कन में उसने मुगलों की तर्ज पर जागीरदारी प्रथा चलाकर सुव्यवस्थित प्रशासन की स्थापना की.
  • मराठों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा .
  • राजस्व व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की कोशिश की.
  • इसके पूर्व जुल्फीकार खाँ ने भी दक्कन में स्वतंत्र राज्य की स्थापना का सपना देखा था, जब वह 1708 में दक्कन का वायसराय बना था, किन्तु 1713 ई. में उसकी मृत्यु से यह योजना समाप्त हो गई.
  • निजामुलमुल्क को मराठों के कारण कुछ समय तक कठिनाई रही.
  • बाजीराव के विरुद्ध युद्ध में वह पराजित हुआ.
  • उसने नादिरशाह के विरुद्ध हुए करनाल के युद्ध में साथ दिया था.
  • दिल्ली से लौटने के पूर्व नादिरशाह ने सम्राट को निजामुलमुल्क के विरुद्ध सचेत भी किया कि वह व्यक्ति आवश्यकता से अधिक चालाक और महत्वाकांक्षी है.
  • 1748 ई. में निजाम की मृत्यु के पश्चात् ऐसा कोई योग्य निजाम नहीं था, जो अंग्रेजों से टक्कर ले सकता तथा हैदराबाद भारतीय राज्यों में ऐसा प्रथम राज्य बना जिसने वेलेजली की सहायक संधि स्वीकार कर आश्रित सेना रखना स्वीकार किया.

कर्नाटक

  • कर्नाटक, मुगल दक्कन का एक सूबा था और तरह वह हैदराबाद के निजाम के अधिकार क्षेत्र में आता था.
  • किन्तु, जिस प्रकार व्यवहार में निजाम दिल्ली की सरकार से स्वतंत्र था, उसी प्रकार कर्नाटक का नायब सूबेदार भी, जिसे कर्नाटक का नवाब कहा जाता था, अपने को दक्कन के नवाब से मुक्त कर स्वतंत्र हो चुका था तथा अपने ओहदे को वंशानुगत बना चुका था.
  • वहाँ का नवाब सआदतुल्ला खाँ ने ‘आरकाट’ को अपनी राजधानी बनाया.
  • उसने अपने भतीजे दोस्त अली को हैदराबाद के निजाम की अनुमति के बिना ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया.
  • मराठों ने 1740 ई. में दोस्त अली की हत्या कर दी.
  • दोस्त अली का उत्तराधिकारी सफदर अली बना.
  • यहीं से योग्य उत्तराधिकारियों के अभाव में यूरोपीय कंपनियों को कर्नाटक की राजनीति में हस्तक्षेप करने का मौका मिला.

बंगाल

  • धर्म परिवर्तन के बाद मुसलमान बने दक्षिण भारत के ब्राह्मण मुर्शीद कुली खाँ ने तथा अलीवर्दी खाँ ने, जो असाधारण योग्यता वाले व्यक्ति थे, बंगाल को स्वतंत्र बना दिया.
  • औरंगजेब ने 1700 ई में मुर्शीद कुली खाँ को बंगाल का दीवान बनाया.
  • 1713 में फर्रुखसियर ने सूबेदार के रूप में उसकी नियुक्ति की तथा 1717 में बंगाल का सूबेदार बना दिया.
  • किन्तु, वह वास्तविक शासक 1700 से ही था जब उसे दीवान बनाया गया था.
  • हालांकि वह बादशाह को नियमित रूप से नजराने की काफी रकम भेजता रहा.

बंगाल के विद्रोह

  • उसके शासन काल के दौरान बंगाल में केवल तीन विद्रोह हुए.
  1. पहला, सीताराम राय, उदय नारायण तथा गुलाम मुहम्मद ने किया.
  2. दूसरा विद्रोह शुजात खाँ ने किया.
  3. तीसरा विद्रोह निजात खाँ ने किया.
  • उन तीनों को हराने के बाद मुर्शीद कुली खाँ ने उनकी जमींदारियाँ अपने कृपा पात्र रामजीवन को सौंप दी.
  • फर्रुखसियर ने उसे 1719 में उड़ीसा की भी सूबेदारी सौंप दी.
  • वह अपनी राजधानी को ढाका से मुर्शिदाबाद ले गया.
  • उसने जागीर भूमि के काफी बड़े हिस्से को खालसा में परिवर्तित कर कर ‘कृषि प्रथा‘ (Revenue farming) की शुरुआत की.
  • हिन्दुओं और मुसलमानों को समान रूप से रोजगार के अवसर प्रदान किए.
  • स्थानीय हिन्दू जमींदारों तथा साहूकारों के कर-कृषकों के रूप में नियुक्ति से बंगाल में एक नए अभिजात वर्ग का उदय हुआ, जो भूमि पर आश्रित थे.
  • उसने भारतीय तथा विदेशी व्यापारियों को बढ़ावा दिया.
  • नियमित थानों एवं चौकियों की व्यवस्था कर सड़कों एवं नदियों की सुरक्षा का इंतजाम किया.
  • उसने 1717 में फर्रुखसियर द्वारा जारी फरमान के दुरुपयोग को रोकने के लिए कदम उठाए.
  • शुजाउद्दीन 1727-39 तक बंगाल का नवाब रहा.
  • वह मुर्शीद कुली खाँ का दामाद था.
  • मुहम्मदशाह ने उसे 1733 में उसे बिहार की सूबेदारी भी सौंप दी.
  • इसके बाद से बंगाल के नवाब बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा पर शासन करने लगे.
  • 1739 ई. में शुजाउद्दीन का बेटा सरफराज खाँ (1739-40) नवाब बना,किन्तु अलीवर्दी खाँ ने घिरिया नामक स्थान पर उसकी हत्या कर दी.
  • गद्दी प्राप्त करने के बाद अलीवर्दी खाँ ने मुगल बादशाह मुहम्मदशाह को दो करोड़ रुपये प्रदान किए तथा उससे फरमान प्राप्त कर अपनी स्थिति को वैध कर लिया.
  • पुनः बादशाह द्वारा धन की मांग करने पर उसने कोई ध्यान नहीं दिया.
  • उसने प्रशासन के सभी प्रमुख पदों पर खुद नियुक्ति की और इसके लिए मुगल दरबार की अनुशंसा लेने की भी कोशश नहीं की.
  • उसने पटना, ढाका और कटक में अपनी पसंद के उप-नवाबों की नियुक्ति की .
  • मुगल दरवार को वार्षिक नजराना बंद कर दिया.
  • इसी के काल से व्यवहारिक रूप से मुगल दरबार से बंगाल का संबंध-विच्छेद प्रारंभ हो गया.
  • 10 अप्रैल, 1756 ई. में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर दरवार के विभिन्न समुदायों के बीच मनमुटाव उत्पन्न हो गया.
  • अलीवर्दी खाँ ने अपने पोते सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी बनाया.
  • 10 अप्रैल 1756 ई. को सिराजुद्दौला ने बंगाल के नवाब का पद संभाला.
  • उसके प्रमुख शत्रुओं में उसका चचेरा भाई शौकत जंग, उसकी माँ घसीटी बेगम तथा उसकी सेना का सर्वोच्च सेनापति मीर जाफर शामिल थे.
  • सिराज-उद्-दौला ने घसीटी बेगम की सारी सम्पत्ति जब्त कर ली तथा मीर जाफर को अपदस्थ करके मीर मर्दान को सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया.
  • अक्टूबर, 1756 ई. में उसने शौकत जंग को पराजित किया व मार डाला.
  • 23 जून, 1757 ई. को ‘प्लासी की लड़ाई‘ में अंग्रेजों की विजय हुई तथा सिराज-उद्-दौला को पकड़ कर उसका वध कर दिया गया.
  • 1757 ई. से 1760 ई. तक मीर जाफर ने नाममात्र का शासन किया तथा असली सत्ता क्लाइव के हाथों में रही.
  • 1760 से 1763 ई. तक मीर कासिम को नवाब बनाया गया किन्तु, 1763 ई. में पुनः मीर जाफर को नवाब बनाया गया तथा वह 1765 ई. तक बंगाल का नवाव रहा.
  • 1765 ई. में मीर जाफर की मृत्यु के बाद उसके दूसरे पुत्र व उत्तराधिकारी नजम-उद्-दीन को गद्दी पर बिठाया, गया परन्तु सारी सत्ता अंग्रेजों के हाथों में रही.
  • 1765 ई. में क्लाइव ने बंगाल में दोहरी सरकार (Dyarchy) व्यवस्था की स्थापना की और वह 1772 ई. तक चली जब अंग्रेजों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने प्रशासन सीधा अपने हाथों में ले लिया.
  • इस प्रकार बंगाल का सूबा सबसे पहले स्वंतत्र हुआ तथा सबसे पहले ब्रिटिश शासन के अधीन हुआ.
  • अलीवर्दी खाँ को मराठों के बार-बार आक्रमण से तंग होकर अंततः उड़ीसा का एक बड़ा भाग देना पड़ा.
  • अलीवर्दी खाँ ने यूरोपियनों के बारे में कहा था कि-

“यदि इन्हें न छेड़ा जाय तो शहद देंगी और यदि छोड़ा जाए काट-काट कर मार डालेंगी.”

अवध

  • सआदत खाँ बुरहान-उल-मुल्क अवध के स्वायत्त राज्य का संस्थापक था.
  • उसे 1722 में अवध का सूबेदार बनाया गया था.
  • वह निडर, तेज, दृढ़ प्रतिज्ञ तथा कर्मठ व्यक्ति था.
  • इसके पूर्व वह 1720-22 ई. तक वह आगरा का सूबेदार था.
  • उसके बगावती जमींदारों को अनुशासित किया तथा अपनी वित्तीय संसाधनों को बढ़ाया.
  • सआदत खाँ ने 1723 ई. में नया राजस्व बन्दोबस्त किया.
  • बंगाल के नवाबों की तरह उसने भी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कोई भेद नहीं किया.
  • उसने जागीरदारी प्रथा को जारी रखा.
  • 1739 ई. में मुगल बादशाह मुहम्मदशाह ने उसे नादिरशाह के विरुद्ध लड़ने के लिए दिल्ली बुलाया.
  • सआदत खाँ ने ही नादिरशाह को दिल्ली आक्रमण के लिए प्रेरित किया था तथा उसे 20 करोड़ की आशा दिलाई थी.
  • नादिरशाह से किए गए अपने इस वादे को पूरा न कर पाने के कारण ही 1739 ई. में उसने आत्महत्या कर ली.

 

  • सआदत खाँ की मृत्यु के बाद उसका दामाद तथा भतीजा सफदरजंग अवध का नवाब बना.
  • 1748 ई. में वह साम्राज्य (मुगल साम्राज्य) का वजीर भी बन गया.
  • इसके अतिरिक्त उसे इलाहाबाद का प्रान्त भी दिया गया.
  • उसने रूहेलों और बंगश पठानों के खिलाफ लड़ाइयाँ छेड़ीं.
  • 1750-51 में बंगश पठानों के खिलाफ लड़ाई में उसे मराठों और जाटों का समर्थन प्राप्त हुआ.
  • इसके लिए उसने मराठों को प्रतिदिन 25,000 रुपये तथा जाटों को प्रतिदिन 15,000 रुपये देने पड़े.
  • पेशवा के साथ एक करार के अनुसार पेशवा ने मुगल साम्राज्य को अब्दाली के खिलाफ मदद देने और उसे भारतीय पठानों तथा राजपूत राजाओं जैसे अंदरूनी विद्रोहियों से बचाने का वचन दिया, बदले में पेशवा को 50 लाख रुपये तथा पंजाब, सिंध और उत्तर भारत के कई जिलों का चौथ प्रदान करना था.
  • इसके अतिरिक्त पेशवा को अजमेर और आगरा का सूबेदार बनाया जाना था.
  • किन्तु पेशवा सफदरजंग के दुश्मनों से जा मिला, जिन्होंने उसे अवध और इलाहाबाद का सूबेदार बनाने का वचन दिया था.
  • लखनऊ बहुत पहले से ही अवध का एक महत्वपूर्ण शहर था.
  • 1775 ई. के बाद वह अवध के नवाबों का निवास स्थान बन गया.
  • सफदरजंग ने महाराज नवाब राय को अपनी सरकार में उच्च पद प्रदान किया.
  • 1754 ई. में सफदरजंग की मृत्यु के बाद शुजाउद्दौला अवध का नवाब और मुगल साम्राज्य का वजीर बना.
  • उसने बक्सर युद्ध में हिस्सा लिया तथा 1774 में रूहेलों को परास्त कर रूहेलखण्ड पर अधिकार कर लिया.
  • 1775 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
  • उसके बाद आसफउद्दौला नवाब बना.
  • इसके अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ हस्तांतरित किया.
  • 1819 ई. में इस वंश के सातवें शासक सआदत खाँ ने राजा की उपाधि धारण की.
  • अवध के स्वतंत्र शासकों की श्रृंखला में अंतिम शासक वाजिद अली शाह था.
  • 1856 ई. में लार्ड डलहौजी ने अवध को ब्रिटिश शासन के अधीन कर लिया.

मैसूर

  • दक्षिण भारत में हैदराबाद के पास हैदरअली के अधीन मैसूर का उदय हुआ.
  • 18वीं सदी के आरंभ में नंजराज (सर्वाधिकारी) तथा देवराज (दुलनई) नाम के दो मंत्रियों ने मैसूर की शक्ति अपने हाथ में ले रखी थी, इस प्रकार वहां के राजा चिक्का कृष्णराज कठपुतली मात्र रह गया था.
  • 1721 ई. में जन्मे हैदरअली के बड़े सुनियोजित ढंग से मैसूर पर अधिकार कर लिया.
  • उसने अपना जीवन मसूर ने सेना में एक साधारण अधिकारी से शुरू किया था.
  • 1755 ई. में वह डिंडिगुल का सूबेदार बना तथा 1761 ई. में मैसूर की सत्ता पर (नंजराज को हटाकर) कब्जा कर लिया.
  • 1763 ई. में उसने बेडमोर पर अधिकार कर लिया तथा अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टम (एरिंगापट्टनम) में स्थापित की.
  • 1755 ई. में उसने डिंडिगुल में एक आधुनिक शस्त्रगार स्थापित किया.
  • इसमें उसने फ्रांसीसी विशेषज्ञों की मदद ली.
  • उसने सुंदा, सेदा, कन्नड़ और मालाबार के इलाकों को जीत लिया.
  • वह धार्मिक सहिष्णुता की नीति पर चला.
  • उसने 1769 ई. में अंग्रेजी फौजों को हराया.
  • 1782 ई. में द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान मर गया.

 

  • उसके पश्चात् उसका बेटा टीपू गद्दी पर बैठा.
  • उसने नए कैलेंडर को लागू किया तथा सिक्का ढलाई की नई प्रणाली को लागू किया.
  • उसने फ्रांसीसी क्रांति में गहरी दिलचस्पी ली.
  • श्रीरंगपट्टम में उसने ‘स्वतंत्रता-वृक्ष’ (फ्रांस-मैसूर मैत्री का प्रतीक) लगाया तथा एक जैकोबिन क्लब का सदस्य बन गया.
  • वह पैदावार का एक-तिहाई भाग भू-राजस्व के रूप में लेता था.
  • 1796 ई. में उसने एक नौसेना खड़ी की तथा नौकाघाट बनवाए.
  • नौकाघाट का निर्माण मंगलौर, मोलीदाबाद तथा दाजिदाबाद में किया गया.
  • टीपू ने विदेश व्यापार के विकास के लिए फ्रांस, तुर्की, ईरान और पेगू में दूत भेजे.
  • चीन के साथ भी उसने व्यापार किया.
  • देशी तथा अन्तर्देशी व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अपने गुमाश्तों की नियुक्ति व्यापारिक केन्द्र मस्कट, ओर्भुज जद्दाह तथा अदन में किया.

 

  • टीपू ने शृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य के सम्मान में मंदिरों के पुनर्निर्माण हेतु धन दान किया.
  • उसके सिक्कों पर हिन्दू देवी देवताओं के चित्र तथा हिन्दू संवत् की आकृतियाँ अंकित थी.
  • 4 मई, 1799 को श्रीरंगपट्टनम में अंग्रेजों से लड़ता हुआ मारा गया.

केरल

  • 18वीं सदी के आरंभ में केरल के चार प्रमुख राज्य थे-
  1. कालीकट,
  2. चिरक्कल,
  3. कोचिन तथा
  4. त्रावणकोर.
  • इनमें से त्रावणकोर को 1799 ई. में राजा मातंड वर्मा के नेतृत्व में प्रमुखता मिली.
  • मार्तडवर्मा में विलक्षण दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, साहस तथा निर्भिकता का सामंजस्य था.
  • उसके क्विनोन तथा इलायादाम को जीत लिया और डच लोगों को हराकर केरल में उनकी राजनीतिक सत्ता खत्म कर दी.
  • उसने सिंचाई एवं संचार की व्यवस्था की तथा विदेशी व्यापार को सक्रिय प्रोत्साहन दिया.
  • इस सदी के राजाओ ने मलयालम साहित्य को भरपूर संरक्षण दिया.
  • 18वीं शती के उत्तरार्द्ध में त्रावणकोर की राजधानी त्रिवेंद्रम, संस्कृत विद्या का एक प्रसिद्ध केन्द्र बन गया.
  • मार्तण्ड वर्मा का उत्तराधिकारी रामवर्मा एक उत्कृष्ट कवि, विज्ञान, संगीतज्ञ, अभिनेता तथा सुसंस्कृत व्यक्ति था.
  • उसने यूरोपीय मामलों में गहरी दिलचस्पी ली.
  • वह लंदन, कलकत्ता तथा मद्रास से निकलने वाले अखबारों और पत्रिकाओं को नियमित रूप से पढ़ता था.
  • वह अंग्रेजी में धाराप्रवाह बातचीत करता था.

राजपूत राज्य

  • मुगलों की कमजोरी का फायदा उठाकर प्रमुख राजपूत राज्यों ने अपने को केन्द्रीय सत्ता से स्वतंत्र कर लिया.
  • फर्रुखसियर और मुहम्मदशाह के काल में आमेर और मारवाड़ के शासकों को आगरा, गुजरात और मालवा जैसे महत्वपूर्ण प्रान्तों का सूबेदार बनाया गया.
  • अधिकतर बड़े राज्य निरंतर छोटे झगड़ों और गृह युद्धों में फंसे रहे.

सवाई जयसिंह (1681-1743)

  • 18वीं सदी का सबसे श्रेष्ठ राजपूत शासक आमेर का सवाई जयसिंह (1681-1743) था.
  • वह एक विख्यात, राजनेता, कानून-निर्माता और सुधारक था.
  • इन सबसे अधिक वह विज्ञान-प्रेमी के रूप में प्रसिद्ध है.
  • उसने जाटों से लिए गए इलाके में जयपुर शहर की स्थापना की और उसे विज्ञान और कला का महान् केन्द्र बना दिया.
  • इस शहर का निमाण एक नियमित योजना के तहत किया गया.

जयसिंह एक खगोलशास्त्री

  • जयसिंह एक महान् खगोलशास्त्री भी था.
  • उसने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन तथा मथुरा में बिल्कुल सही और आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित पर्यवेक्षणशालाएँ बनाई.
  • उसने जिजमुहम्मदशाही तैयार किया.
  • जिजमुहम्मदशाही सारणियों का एक सेट था, जिससे लोगों को खगोल शास्त्र संबंधी पर्यवेक्षण करने में सहायता मिलती थी.
  • उसने युक्लिड की ‘रेखागणित के तत्व‘ का संस्कृत में अनुवाद कराया.
  • नेपियर की रचना का भी संस्कृत में अनुवाद कराया, जिससे त्रिकोणमिति की बहुत सारी कृतियों और लघुगणकों को बनाने तथा उसके इस्तेमाल में सहायता मिली.
  • उसने एक कानून लागू करने की कोशिश की, जिससे लड़की की शादी में किसी राजपूत को अधिक खर्च करने के लिए एजबूर न होना पड़े.
  • वह एक महान समाज सुधारक था.

औरंगजेब को धार्मिक कट्टरता और अत्याचारों से तंग आकर राजपूत मुगल साम्राज्य के शत्रु बन गए.

  • मुगल शासकों की दुर्बलता का लाभ उठाकर राजपूतों ने अपनी पुरानी सत्ता पुनः स्थापित कर थी.
  • बहादुरशाह के शासन काल में मारवाड़ (जोधपुर) और बीकानेर के राठौर तथा आंबेर (जयपुर) के कछवाहा राजपूतों ने मुगल बादशाह के सम्मुख प्रमुख चुनौती पेश की.
  • मुगल सम्राट बहादुरशाह ने इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए 1708 ई. में जोधपुर पर आक्रमण कर दिया.
  • इस आक्रमण में राजपूतों को पराजय का सामना करना पड़ा.
  • बहादुरशाह की मृत्यु के बाद फैली अराजकता का लाभ उठाकर राजपूत राजा अजीत सिंह ने शाही अफसरों को जोधपुर से बाहर निकाल दिया और अपनी शक्ति में वृद्धि करने लगा.
  • 1714 ई. में अजीत सिंह की शक्ति को कुचलने के लिए मुगल सेनापति हुसैन अली ने जोधपुर पर आक्रमण कर दिया.
  • इस आक्रमण का अजीत सिंह सामना न कर सका और उसे अपनी पुत्री का विवाह मुगल सम्राट फर्रुखसियर से करके शांति-संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े.
  • दिल्ली में हुए फर्रुखसियर-सैयद बंधु विवाद में जोधपुर और जयपुर के राजपूत राजाओं ने अपने हितों को ध्यान में रखते हुए तटस्थता की नीति अपनाई.
  • फर्रुखसियर गुट ने जयपुर के राजपूत राजा जयसिंह द्वितीय को 1721 ई. में आगरे का सूबेदार नियुक्त कर दिया.
  • आगरे के सूबेदार के रूप में उसने अपनी शक्ति और प्रभाव का उपयोग अपनी खानदानी रियासत का विस्तार करने और उसे शक्तिशाली बनाने के लिए किया.
  • सैय्यद बंधुओं ने जोधपुर के राजपूत राजा अजीत सिंह को अपनी ओर मिलाने के लिए उसे अजमेर तथा गुजरात की सूबेदारी प्रदान की.
  • इस प्रकार एक समय ऐसा था जब दिल्ली के पश्चिम में 100 मील से लेकर भारत के पश्चिमी तट पर स्थित सूरत तक का समस्त क्षेत्र राजपूतों के अधीन था.
  • परन्तु ये राजपूत शासक अपने आन्तरिक मतभेदों और परस्पर फूट के कारण अपनी सत्ता को अधिक समय तक कायम न रख सके तथा मराठों के हस्तक्षेप का शिकार बन गए.

फर्रुखाबाद

  • एक अन्य अफगान शूरवीर मुहम्मद खाँ बंगश ने मुगल सम्राट फर्रुखसियर और मुहम्मदशाह के शासन काल में (1713 ई. से लेकर 1748 ई. तक) अलीगढ़ और कानपुर के मध्य स्थित फर्रुखाबाद की जागीर को एक स्वतन्त्र राज्य में बदल दिया.
  • आगे चलकर इस अफगान शूरवीर ने बुन्देलखण्ड और इलाहाबाद के प्रदेशों पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया.
  • 1743 ई. में मुहम्मद खाँ बंगश की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कायम खाँ उसका उत्तराधिकारी बना.

 रुहेलखण्ड

  • 18वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तर भारत में अफगानों का प्रभाव बढ़ने लगा.
  • मुख्यतः पश्चिम में दिल्ली और आगरा के मध्य तथा पूर्व में अवध और इलााबाद के मध्य के क्षेत्रों में इन अफगानियों के सुदृढ़ गढ़ स्थापित हो गए.
  • इस क्षेत्र में मुख्य रूप से रुहेले रहते थे.
  • इन रुहेलों को एक अफगान वीर दाउद का प्रभावशाली नेतृत्व प्राप्त हुआ.
  • 1721 ई. में दाउद की मृत्यु के बाद उसके दत्तक पुत्र अली मुहम्मद खाँ को उसका उत्तराधिकार प्राप्त हुआ.
  • इसके बाद अली मुहम्मद खाँ ने दाउद द्वारा स्थापित रुहेलखण्ड राज्य की सीमा विस्तार का कार्यभार अपने ऊपर लिया.
  • 1737 ई. में उसने मुगल बादशाह से नवाब का खिताब प्राप्त किया.
  • नादिरशाह के आक्रमणों के दौरान मुगल सम्राट की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर अली मोहम्मद खाँ ने अपनी सत्ता सम्पूर्ण बरेली और मुरादाबाद तथा हरदोई और बदायूं के कुछ क्षेत्रों तक विस्तृत कर ली.
  • आगे चलकर पीलीभीत, बिजनौर तथा कुमायूं पर भी उसका कब्जा हो गया.
  • 1745 ई. में मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने अली मुहम्म्द खाँ के निरंतर बढ़ते प्रभुत्व को कुचलने के लिए अपने वजीर सफदरजंग के नेतृत्व में सेना भेजी.
  • किन्तु शीघ्र ही मुगल सेना को अपनी सीमाओं का एहसास हो गया और बहुत कठिन परिश्रम के बाद बादशाह को अली मोहम्मद खाँ से समझौता करने पर राजी कर लिया गया.
  • इस समझौते के अनुसार अली अहमद खाँ बनगढ़ की किलेबंदियों को तोड़ने तथा अपनी जागीरों को मुगल बादशाह को सौंपने के लिए राजी हो गया.
  • इसके बदले में बादशाह ने उसे 4,000 का मनसबदार बना दिया और सरहिन्द का मुगल फौजदार बनाकर वहां भेज दिया.
  • 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली की आक्रामक योजनाओं की सूचना पाते ही उसने शीघ्र ही सरहिंद का अपना पद त्याग कर अफगानों की अपनी पूरी टुकड़ी के साथ वापस रुहेलखण्ड की ओर कूच किया.
  • अप्रैल 1748 ई. तक उसने पुनः रुहेलखण्ड में मुगल शासन का अंत कर अपनी सत्ता स्थापित की.
  • 15 सितम्बर, 1748 ई. को अली मुहम्मद खाँ की मृत्यु के बाद हाफिज रहमत खाँ उसके मुख्य उत्तराधिकारी के रूप में सामने आया.
  • मुगल वजीर सफदरजंग ने रुहेलों को कुचलने की एक नवीन योजना के तहत् बंगश प्रमुख कायम खाँ को रुहेलखण्ड का फौजदार नियुक्त किया.
  • किन्तु कायम खाँ की सेना अफगानों का सामना न कर सकी.
  • इसके विपरीत गंगा के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बंगश प्रमुख कायम खाँ के सभी क्षेत्रों पर हाफिज रहमत का अधिकार हो गया.
  • अप्रैल, 1751 में मुगल वजीर सफदरजंग केवल मराठों और जाटों से मित्रता करने में सफल रहा, बल्कि अपने नवीन मित्रों की सहायता से उसने रुहेलों पर भी एक महत्वपूर्ण सफलता प्रात की.
  • पानीपत के तृतीय युद्ध (1761) में रुहेलों ने अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया.
  • इस युद्ध के बाद रुहेल आजाद हो गए.
  • कुछ समय के लिए उनका दिल्ली पर भी कब्जा रहा.
  • वरेन हेस्टिंग्स के काल में अवध के नवाबों ने रुहेलखण्ड को अवध प्रान्त में मिला लिया.
  • इसकी राजधानी पहले बरेली में आंवला में थी, बाद में रामपुर चली गई.

जाट

  • दिल्ली, आगरा तथा मथुरा के समीपवर्ती क्षेत्रों में जाट लोग रहते थे.
  • ये लोग मुख्यतः कृषक थे.
  • ये अपनी वीरता, लड़ाकू भावना और धैर्य के लिए प्रसिद्ध थे.
  • इनमें जातीय भवना बहुत तीव्र थी.
  • इन्होंने औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध 1699 ई. में तिल्पत के जमींदार गोकला के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया.
  • यह विद्रोह असफल रहा.
  • आगे चलकर राजाराम, राम चेहरा और चूड़ामन आदि जाट नेताओं ने जाटों को संगठित किया.
  • जाट नेता चूड़ामन ने ‘थीम’ नामक स्थान पर एक सुदृढ़ दुर्ग बनाया और मुगलों की शक्ति को चुनौती दी.
  • आगरा के सूबेदार जयसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना ने थीम दुर्ग पर कब्जा कर लिया.
  • चूड़ामन ने आत्महत्या कर ली.
  • चूड़ामन के बाद उसके भतीजे बदन सिंह ने जाटों का नेतृत्व संभाला.
  • बदन सिंह ने अपनी स्थिति को काफी सुदृढ़ किया और दीग, कुम्बेर, वेद तथा भरतपुर में चार दुर्गों का निर्माण किया.
  • नादिरशाह के आक्रमण का लाभ उठाकर बदनसिंह ने आगरा और मथुरा पर कब्जा कर लिया.
  • जाट नेता बदन सिंह ने ही भरतपुर राज्य की नींव डाली.
  • अहमदशाह अब्दाली ने बदन सिंह को “राजा’ की उपाधि प्रदान की और इसके साथ “महेन्द्र” शब्द को भी जोड़ा.
  • 1756 ई. में जाट नेता सूरजमल को इस राज्य का उत्तराधिकारी बनाया गया.
  • 1763 ई. तक सूरजमल ने अपने राज्य को सुदृढ़ नेतृत्व प्रदान किया.
  • 1763 ई. में उसकी मृत्यु के बाद जवाहरसिंह गद्दी पर बैठा.
  • किन्तु 1768 ई. में जवाहर सिंह जयपुर के राजा माधो सिंह के हाथों पराजित हो गया.
  • जवाहर सिंह के समय से ही इस जाट राज्य का पतन प्रारंभ हो गया था.
  • जवाहरसिंह के उत्तराधिकारियों में वृद्धि और चरित्र दोनों का अभाव था.
  • जवाहर सिंह के बाद रतन सिंह (1768-69 ई.) केसरी सिंह (1769-75 ई.) तथा रणजीत सिंह (1775-1805 ई.) गद्दी पर बैठे.
  • अन्त में रणजीत सिंह (1775 से 1805 ई.) ने 1805 में ब्रिटिश अधीनता को स्वीकार कर लिया.
  • सूरजमल को जाटों का अफलातून (प्लेटो) कहा जाता है.

बुन्देलखण्ड

  • बुन्देलों ने मधुकर शाह के अधीन काफी शक्ति का अर्जन किया.
  • इन्होंने ओरछा में अपनी राजधानी को स्थापित किया.
  • 1592 ई. में मधुकरशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र वीरसिंह बुन्देलखण्ड का मुखिया बना .
  • जहाँगीर के शासनकाल में वीरसिंह को 3000 का मनसबदार बनाया गया.
  • वीरसिंह के अधीन बुन्देलों की शक्ति अपनी चरम सीमा तक पहुंच गई.
  • वीरसिंह ने मथुरा में 33 लाख रुपये की लागत से एक मन्दिर का निर्माण करवाया.
  • 1627 ई. में वीरसिंह की मृत्यु के बाद जुझारसिंह उसका उत्ताराधिकारी बना.
  • 1635 ई. में चंपतराय बुन्देलखण्ड का मुखिया बना .
  • सामूगढ़ की लड़ाई में उसने औरंगजेब का साथ दिया.
  • 1667 ई. के देवगढ़ अभियान के दौरान मुगलों का साथ दिया, किन्तु जब औरंगजेब ने हिन्दू मन्दिरों को नष्ट करके अपनी धार्मिक कट्टरता का परिचय दिया तो छत्रसाल ने बुन्देलों की हिन्दू जनता के नायक के रूप में अपने को प्रस्तुत किया.
  • 1710 ई. में पुनः छत्रसाल ने सिख नेता बन्दा बहादुर के विरुद्ध मुगलों के अभियान में अपना सक्रिय सहयोग दिया, किन्तु 1720 ई. में बुन्देलों ने पुनः मुगलों के विरुद्ध बगावत कर दी और काफी शक्ति का अर्जन कर लिया.
  • 1723 ई. में मुगल सम्राट ने मुहम्मद खाँ से छत्रसाल के नेतृत्व में बढ़ती हुई बुन्देलखण्ड की शक्ति को कुचलने के लिए कहा.
  • छत्रसाल ने मराठों की सहायता से मुहम्मद खाँ का सफलता पूर्वक सामना किया.
  • किन्तु मराठा कैम्प में महामारी फैलने के कारण मराठा सेना वापस दक्षिण में चली गई.
  • 1729 ई. में छत्रसाल ने मुहम्मद खाँ से समझौता कर लिया.
  • मुहम्मद खाँ ने पुनः बुन्देलखण्ड पर हमला न करने का वचन दिया.
  • 1731 ई. में छत्रसाल का निधन हो गया और उसकी रियासत को उसके पुत्रों ने आपस में बांट लिया.

सिक्ख

  • औरंगजेब ने अपनी धार्मिक कट्टरता का परिचय देते हुए सिखों के दसवीं गुरु, गुरु तेग बहादुर का वध करवा दिया.
  • इस महत्वपूर्ण घटना से सिख मुगलों के गंभीर शत्रु बन गए.
  • गुरु गोविन्द सिंह (1664-1708 ई.) ने अपने सुदृढ़ नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना का गठन किया और आनंदपुर साहब में अपने मुख्य कार्यालय की स्थापना की.
  • 1699 ई. में उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की.
  • गुरु गोविन्द सिंह ने अपने आस-पास की समस्त पहाड़ी रियासतों पर कब्जा करना प्रारंभ कर दिया.
  • औरंगजेब ने सिखों की बढ़ती हुई शक्ति को कुचलने के लिए लाहौर के गवर्नर तथा सरहिन्द के फौजदार को पहाड़ी राजाओं की सहायता के लिए भेजा.
  • प्रारंभ में सिख नेता ने वीरतापूर्वक मुगल सेना का सामना किए, किन्तु अचानक भुखमरी फैलने से सब अस्त-व्यस्त हो गया और मजबूरीवश गुरु गोविन्द सिंह को किले के दरवाजे खोलने पड़े.
  • मुगल सेनापति वजीर खाँ ने अचानक उन पर हमला कर उनके दो पुत्रों को पकड़ लिया और बाद में उनका वध कर दिया गया.
  • एक अन्य लड़ाई में गुरु गोविन्द सिंह ने अपने शेष दोनों बेटे भी खो दिए.
  • 1708 ई. में सिखों का नेतृत्व बंदा बहादुर के सुयोग्य हाथों में आ गया.
  • सरहिन्द के फौजदार वजीर खाँ से बदला लेने के लिए बंदा बहादुर ने सरहिन्द पर आक्रमण कर उस पर कब्जा कर लिया और वजीर खाँ की हत्या कर दी.
  • बंदा बहादुर ने अनेक कल्याणकारी कार्य भी किए.
  • इन कार्यों में प्रमुख कार्य, जमींदारों का भूस्वामित्व समाप्त कर भूमि को जोतने वालों को उसका स्थायी स्वामी बनाना था.
  • बंदा बहादुर ने 1716 ई. तक सिख राज्य को काफी शक्तिशाली बनाया.
  • किन्तु एक युद्ध में अपने सहयोगियों द्वारा विश्वासघात किए जाने के कारण बंदा बहादुर बन्दी बना लिए गए.
  • 1716 ई. में उनका वध कर दिया गया.
  • बंदा बहादुर की मृत्यु के बाद सिखों में फुट पड़ गई और सिख ‘बन्दई’ तथा “तत खालसा’ नामक दो गुटों में विभाजित हो गए.
  • 1721 ई. में भाई मणि सिंह और गुरु गोविन्द सिंह की विधवा माता सुन्दरी ने सिख एकता हेतु प्रयास किये.
  • 1739 ई. में नादिरशाह के आक्रमण के बाद फैली अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति ने सिखों को पुनः शक्ति संचयन का अवसर प्रदान किया.
  • इलेवाल नामक स्थान पर सिखों ने स्वयं को संगठित किया और एक किले का निर्माण किया.

 

  • 1748 से 1767 ई. के मध्य मुहम्मदशाह अब्दाली द्वारा किए गए विभिन्न आक्रमणों ने सिख शक्ति के उदय पर निर्णायक प्रभाव डाला.
  • 1752 ई. में पंजाब मुगल साम्राज्य का भाग न रहा.
  • 1760 ई. के आते-आते सिखों का पंजाब पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित हो गया.
  • 1764 ई. में सिखों ने लाहौर पर अधिकार कर लिया.
  • अब उनका प्रभाव सहारनपुर से अवध (अटक) तक तथा मुल्तान से कांगड़ा तथा जम्मू तक फैल गया.
  • आगे चलकर सिखों का नेतृत्व महाराजा रणजीत सिंह के हाथों में आया.
  • 1839 ई. में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिखों में फूट पड़ गई .
  • 1849 ई. में पंजाब पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया.

जम्मू-कश्मीर

  • जम्मू लम्बे समय से एक हिन्दू राजपूत वंश के अधीन था.
  • मुगल बादशाह इस पहाड़ी रियासत पर नियंत्रण रखने के लिए एक मुस्लिम फौजदार की नियुक्ति करता था.
  • मुगल साम्राज्य की पतनात्मक स्थिति का लाभ उठाकर जम्मू के राजा ने मुगल बादशाह को कर देना बन्द कर दिया तथा अपनी स्वतंत्रता हेतु प्रयत्न करने लगा.
  • 1750 ई. 1781 ई. तक जम्मू राजा रणजीत देव के अधीन था.
  • इस राजा के शासनकाल में जम्मू शहर काफी समृद्ध हुआ और व्यापार का प्रसिद्ध केन्द्र बन गया.
  • 1781 ई. में रणजीत देव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र बृजराज देव उसका उत्तराधिकारी बना.
  • बृजदेव के काल में जम्मू पूरी तरह सिखों के नियंत्रण में रहा.
  • 1752 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने कश्मीर पर अधिकार कर लिया.
  • इसके बाद 1819 ई. तक यहां अफगानों का शासन रहा.
  • 1819 ई. में कश्मीर पर महाराजा रणजीत सिंह ने अधिकार कर लिया.

मराठे

  • छत्रपति शिवाजी (1627-16803 ई.) ने मराठा साम्राज्य की नींव डाली .
  • इससे पूर्व उन्हें बीजापुर और गोलकुण्डा की मुस्लिम रियासतों से कड़ा संघर्ष करना पड़ा था.
  • 1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु हो गई 1707 से 1749 ई. तक छत्रपति शिवाजी के पोते साहू ने मराठा साम्राज्य का नेतृत्व किया, किन्तु साहूजी एक शान्तिप्रिय और आलसी व्यक्ति था.
  • अतः उसके शासनकाल में विशेषतः 1714 से 1720 ई. के दौरान वास्तविक मराठा शक्ति का प्रयोग पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने किया और मराठा शक्ति को सुदृढ़ किया.
  • 1720 से 1740 ई. तक पेशवा बाजीराव प्रथम ने मराठा शक्ति का विस्तार किया.
  • पेशवा बाजीराव प्रथम ने सम्पूर्ण भारत में हिन्दू राज्य स्थापित करने की अपनी नीति का अनुसरण करते हुए मालवा और गुजरात पर अधिकार किया.
  • जनवरी, 1738 ई. में उसने दक्षिण के मुगल सूबेदार आसफजाह निजाम-उल-मुल्क को प्रसिद्ध दुरई सराय की संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया.
  • इस संधि के बाद चम्बल तथा नर्मदा नदी के बीच का सारा प्रदेश मराठों के अधिकार में आ गया.
  • 1738 ई. में ही बाजीराव ने भारत के पश्चिमी तट पर पुर्तगालियों का दमन किया.
  • 1750 ई. तक ऐसा लगने लगा कि मराठे ही आने वाले वर्षों में मुगल साम्राज्य के अधिकारी बनेंगे, किन्तु पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) में मराठों को अहमदशाह अब्दाली ने परास्त कर दिया.
  • आगे चलकर मराठों ने अंग्रेजों को भी गंभीर चुनौती दी, किन्तु कुछ समय बाद अंग्रेजों ने मराठों की शक्ति को कुचल दिया.

गुजरात

  • मुगलों के आंतरिक झगड़ों ने गुजरात पर कब्जा करने के लिए मराठों को उपयुक्त अवसर प्रदान किया.
  • 1724 ई. में मुगल बादशाह ने हामीद खाँ को नजरंदाज करते हुए सरबुलन्द खाँ को गुजरात का गवर्नर नियुक्त किया .
  • हमीद खाँ गुजरात का शासक बनना चाहता था.
  • मुगल बादशाह के उक्त कृत्य से रुष्ट होकर उसने बादशाह के विरुद्ध मराठों का समर्थन पाने के लिए मराठों को गुजरात से चौथ तथा सरदेशमुखी एकत्र करने का अधिकार दे दिया.
  • हमीद खाँ के इस कृत्य से रुष्ट होकर सम्राट ने सरबुलन्द खाँ को गुजरात पर आक्रमण करने का आदेश दिया.
  • सरबुलन्द खाँ हमीद खाँ की योजनाओं को तो निष्फल करने में सफल रहा.
  • किन्तु वह मराठों को गुजरात से नहीं निकाल पाया.
  • 1727 ई. में वह भी मराठों को गुजरात से चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने देने पर सहमत हो गया.
  • सरबुलंद खाँ के इस कृत्य से सम्राट सहमत न था.
  • सरबुलन्द खाँ को वापस बुला लिया गया और उसके स्थान पर राजा अभय सिंह को गुजरात का गवर्नर बनाया गया.
  • आगे चलकर मुगल सम्राट द्वारा गुजरात में पुनः मुगल प्रभुत्व स्थापित करने के सारे प्रयास नाकाम रहे और अन्ततः 1737 ई. में गुजरात मुगल साम्राज्य से पृथक हो गया.

मालवा

  • मालवा प्रान्त दक्कन तथा शेष हिन्दुस्तान को जोड़ने वाली कड़ी था.
  • इस प्रकार की केन्द्रीय स्थिति होने के कारण इस प्रान्त का सामारिक महत्व बहुत अधिक था.
  • व्यापार के मुख्यमार्ग तथा दक्कन और गुजरात को जाने वाले सैनिक रास्ते इस प्रान्त से होकर गुजरते थे.
  • औरंगजेब को धार्मिक कट्टरता एवं अत्याचार से तंग आकर इस प्रान्त के राजपूत सामंत, जमींदार तथा उनकी हिन्दू प्रजा मुगल साम्राज्य के विरुद्ध हो गई.
  • इन्होंने समय आने पर मुगलों के विरुद्ध मराठा आक्रमणकारियों का स्वागत किया.
  • इस क्षेत्र पर मराठों का पहला आक्रमण 1699 ई. में हुआ.
  • धीरे-धीरे इस क्षेत्र पर मराठों का प्रभुत्व स्थापित होता चला गया.
  • 1723-24 ई. में पेशवा बाजीराव ने मालवा पर आक्रमण किया.
  • इस आक्रमण ने इस क्षेत्र में मुगलों की स्थिति को और अधिक दुर्बल कर दिया.
  • 1738 ई. में मुगल सूबेदार निजाम-उल-मुल्क ने भोपाल में अपनी पराजय के बाद सम्पूर्ण मालवा तथा नर्मदा और चम्बल के बीच के क्षेत्र पर मराठों के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया.
  • आगे चलकर 1741 ई. में पेशवा बालाजी बाजीराव के मालवा में बढ़ते हुए प्रभाव को देखते हुए मुगल बादशाह मुहम्मदशाह ने पेशवा को मालवा के डिप्टी गवर्नर का पद प्रदान किया.
  • मुगल बादशाह का यह कृत्य अपनी लाज बचाने का एक उपाय मात्र था, क्योंकि इस उपाय के अभाव में मालवा दिल्ली के साम्राज्य (मुगल साम्राज्य) का एक भाग नहीं रह जाता.

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Friday, November 16, 2018

मुगल साम्राज्य का पतन (Decline of the Mughal Empire) आधुनिक भारत

मुगल साम्राज्य का पतन (Decline of the Mughal Empire) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

  • 18वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में औरंगजेब की मृत्यु के बाद से मुगल साम्राज्य का पतन तेजी से आरंभ हो गया.
  • मुगल बादशाहों ने अपनी सत्ता की महिमा खो दी.
  • हालांकि अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह द्वितीय (1837-57 ई.) तक यह किसी तरह चलता रहा.
  • मुगलों की सत्ता दिल्ली के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई.
  • 1803 ई. में ब्रिटिश का दिल्ली पर कब्जा हो जाने के पश्चात् तो मुगल बादशाह केवल अंग्रेजों के पेंशनधारी बनकर ही रह गए.

मुगल साम्राज्य का पतन (Decline of the Mughal Empire) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

 

  • औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् उसके तीनों बेटे मुअज्जम, आजम तथा कामबख्श के बीच सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया.
  • मुअज्जम ने 18 जून, 1707 को ‘जाजू’ नामक स्थान पर आजम को तथा 13 जनवरी, 1709 को हैदराबाद के निकट कामबख्श तथा उसके पुत्रों को हराकर मार डाला.

बहादुरशाह प्रथम (1707-12 ई.)

  • उत्तराधिकार संघर्ष जीतने के बाद मुअज्जम, बहादुरशाह-प्रथम के नाम से सिंहासन पर बैठा.
  • इसे शाहआलम भी कहा जाता है.
  • 65 वर्षीय बहादुरशाह-प्रथम ने समझौते तथा मेल-मिलाप की नीति अपनाई.
  • उसने हिन्दू सरदारों और राजाओं के प्रति अधिक सहिष्णुतापूर्ण रूख अपनाया.
  • वह विद्वान, योग्य और आत्मगौरव से परिपूर्ण व्यक्ति था.
  • उसने औरंगजेब द्वारा अपनाई गई कई संकीर्णतावादी नीति को बदल दिया.
  • आरंभ में उसने आमेर और मारवाड़ (जोधपुर) के राजपूत राज्यों पर पहले से अधिक नियंत्रण रखने की कोशिश की.
  • उसने आमेर की गद्दी पर जयसिंह को हटाकर विजय सिंह (जयसिंह का छोटा भाई) को बैठाया तथा मारवाड़ के राजा अजीत सिंह को मुगल सत्ता की अधीनता स्वीकार करने के लिए मजबूर किया.
  • कड़ा प्रतिरोध के कारण तुरंत ही दोनों राज्यों से समझौता कर लिया.
  • जयसिंह और अजीत सिंह को अपने राज्य वापस मिल गए, किन्तु मालवा और गुजरात के सूबेदार के ओहदों की माँग को अस्वीकार कर दिया गया.
  • मराठों को दक्कन की सरदेशमुखी दे दी गई, किन्तु चौथ का अधिकारी नहीं दिया गया.
  • उसने शाहू को मराठों का विधिवत राजा नहीं माना.
  • इस प्रकार वह मराठों को पूरी तरह खुश नहीं कर सका.
  • मराठे आपस में लड़ते रहे तथा दक्कन अव्यवस्था का शिकार बना रहा.
  • बहादुरशाह ने गुरु गोविंद सिंह के साथ संधि कर तथा एक बड़ा मनसब देकर सिखों के साथ मेल-मिलाप की नीति अपनाई.
  • गोविंद सिंह की मृत्यु के पश्चात् बंदा बहादुर के नेतृत्व में बगावत शुरू हुई तथा बहादुरशाह ने उनके विरुद्ध सैनिक अभियान किया.
  • किन्तु सिखों को दबाया नहीं जा सका और लौहगढ़ का किला, जिसपर बहादुरशाह ने अधिकार कर लिया था तथा उसे गोविंद सिंह ने अम्बाला के आर-पूर्व में हिमालय की तराई में बनाया था, वापस ले लिया.
  • बहादुरशाह ने बुंदेला सरदार छत्रसाल से मेल-मिलाप कर लिया तथा जाट सरदार चूरामन से भी दोस्ती कर ली.
  • चूरामन ने बंदा बहादुर के खिलाफ बहादुरशाह का साथ दिया.
  • इसके शासन काल में अंधाधुंध जागीरें तथा पदोन्नति देने के काल मुगल राजकोष, जो 1707 ई. में करीब 17 करोड़ थी, खाली हो गया.
  • इसी बीच बहादुरशाह की 1712ई. में दुर्भाग्यवश मृत्यु हो गई.
  • बहादुरशाह ने जुल्फीकार खाँ को मीर बख्शी के पद पर नियुक्त किया था तथा साथ ही दक्कन की सूबेदारी भी प्रदान की थी.
  • इतिहासकार खाफी खाँ ने बहादुरशाह के बारे में कहा है कि बादशाह राजकीय कार्यों में इतना अधिक लापरवाह था कि लोग उसे “शाहे बेखबर” कहने लगे.

मुगल शासक एवं उनके शासन काल शासन

शासन  शासन काल
जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर 1526-1530 ई.
नासिरुद्दीन हुमायूँ (1540 से 1545 तक दिल्ली पर अफगान शासक शेरशाह का शासन था) 1530-1556 ई.
जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर 1556-1605 ई.
जहाँगीर 1605-1627 ई.
शाहजहाँ 1627-1653 ई.
औरंगजेब 1653-1707 ई.
बहादुरशाह 1707-1712 ई.
जहाँदार शाह 1712-1713 ई.
फर्रुखसियर 1713-1719 ई.
मुहम्मदशाह 1719-1740 ई.
अहमदशाह 1748-1753 ई.
आलमगीर द्वितीय 1753-1758 ई
शाह आलम द्वितीय 1758-1806 ई.
अकबर द्वितीय 1806-1837 ई.
बहादुर शाह द्वितीय 1837-1857 ई.

जहाँदार शाह (1712-13 ई.)

  • बहादुरशाह (शाहआलम) की मृत्यु के बाद उसके चार पुत्रों जहाँदार शाह, अजीम-उश-शान, रफी-उश-शान तथा जहाँशाह के बीच हुए गृहयुद्ध में उस समय के सबसे ताकतवर सामंत जुल्फीकार खाँ की सहायता से 52 वर्षीय जहाँदार शाह को सफलता मिली.
  • इसी गृहयुद्ध के बाद उत्तराधिकारी की लड़ाईयों में एक नया तत्व आया.
  • पहले सत्ता के लिए शाहजादों के मध्य संघर्ष में सामंत गद्दी हथियाने में उनका साथ देते थे, किन्तु अब सांगत सत्ता के सीधे .
  • दावेदार बन गए तथा सत्ता पाने में वे शाहजादों का इस्तेमाल कठपुतली के रूप में करने लगे.
  • जहाँदार शाह एक अयोग्य व कमजोर शासक सिद्ध हुआ.
  • उसके काल में प्रशासन वस्तुतः जुल्फीकार खाँ के हाथों में था.
  • जुल्फीकार खाँ साम्राज्य का वजीर बन गया.
  • जहाँदार ने तेजी से औरंगजेब की नीतियों को बदला तथा जजिया कर को समाप्त कर दिया.
  • आमेर के जयसिंह को मिर्जा राजा सवाई की पदवी देकर मालवा का सूबेदार बनाया गया तथा.
  • मारवाड़ के अजीत सिंह को महाराजा की पदवी दी गई और गुजरात का सूबेदार बनाया गया.
  • मराठा शासक को दक्कन का चौथ और वहाँ की सरदेशमुखी इस शर्त पर दे दी गई कि उसकी वसूली मुगल अधिकारी करेंगे और फिर मराठा अधिकारियों को दे देंगे.
  • जुल्फीकार खाँ ने जाट चुरामन तथा छत्रसाल बुंदेला के साथ भी मेल-मिलाप कर लिया.
  • केवल बंदा बहादुर और सिखों के प्रति उसकी नीति दमन की रही.
  • जुल्फीकार खाँ ने वित्तीय हालत को सुधारने की कोशिश की.
  • उसने अंधाधुन्ध जागीरों तथा ओहदों की वृद्धि पर रोक लगा दी तथा मनसबदारों को नियत संख्या में सैनिक रखने पर मजबूर किया.
  • उसने इजारा व्यवस्था ठेकेदारी को बढ़ावा दिया, जो गलत साबित हुई.
  • इस व्यवस्था ने किसानों का उत्पीड़न बढ़ा दिया.
  • इस काबिल वजीर को बादशाह का पूरा विश्वास और सहायोग नहीं मिल सका .
  • बेईमान कृपापात्र लोगों के द्वारा बादशाह का कान भरने के कारण खुद बादशाह ने ही वजीर के खिलाफ षड्यंत्र करना शुरू कर दिया.
  • जहाँदार शाह पर उसकी प्रेमिका लालकुंवर का अत्यधिक प्रभाव था.
  • जहाँदार के शासनकाल के बारे में खाफी खाँ ने लिखा है कि

“नया शासनकाल चारणों और गायकों, नर्तकों एवं नाट्यकर्मियों के समस्त वर्ग के लिए अनुकूल युग था.”

  • वजीर जुल्फीकार खाँ ने अपने एक चाटुकार सुभगचन्द्र को समस्त प्रशासकीय दायित्व सौंप रखा था.
  • जहाँदारशाह को लोग लम्पट मूर्ख कहा करते थे.

फर्रुखसियर (1713-19 ई.)

  • जहाँदारशाह के भतीजे एवं अजीम-उश-शान के दूसरे बेटे फर्रुखसियर ने 11 फरवरी, 1713 ई. को सैयद बंधुओं-अब्दुला खाँ तथा हुसैन अली खाँ-की सहायता से जहाँदारशाह की हत्या कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया.
  • फर्रुखसियर सुन्दर किन्तु कायर, क्रूर, अविश्वसनीय, बेईमान तथा नैतिक बल से रहित व्यक्ति था.
  • वह चापलूसों के असर में जल्दी आ जाता था.
  • फर्रुखसियर ने अब्दुला खाँ को बजीर तथा हुसैन अली खाँ को मीर बख्शी का ओहदा प्रदान किया.
  • दोनों भाईयों ने जल्द ही शासन पर अपना दबदबा बना लिया.
  • किन्तु कमजोरियों के बावजूद फर्रुखसियर उन्हें बेरोकटोक काम नहीं करने देता था.
  • उसके दोनों भाईयों के खिलाफ षड्यंत्र किया, किन्तु हर बार असफल रहा. अंततः सैयद बंधुओं ने उसे गद्दी से उतार दिया और मार डाला.
  • उसकी जगह उन्होंने बारी-बारी से दो युवा शाहजादों रफी-उद्-दरजात (शाहजहाँ द्वितीय) तथा रफी उद्-द्दौला को गद्दी पर बिठाया, किन्तु दोनों बहुत जल्द क्षय रोग से मर गए.
  • इसके बाद सैयद बंधुओं ने शाहजहाँ द्वितीय के पुत्र रौशन अख्तर (मुहम्मदशाह) को अगला बादशाह बनाया.
  • सैयद बंधुओं ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई.
  • उन्होंने राजपूतों, मराठों तथा जाटों के साथ मेल-मिलाप कर उनका इस्तेमाल फर्रुखसियर और प्रतिद्वंद्वी सामंतों के खिलाफ करने की कोशिश की.
  • उन्होंने जजिया को समाप्त किया तथा तीर्थयात्रा कर हटा दिया.
  • जाट सरदार चूरामन के साथ दोस्ती कर ली तथा शाहू को शिवाजी का स्वराज एवं दक्कन के छह प्रांतों का चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार दे दिया.
  • बदले में शाहू 15,000 घुड़सवारों के द्वारा दक्कन में समर्थन देने को तैयार हो गया.
  • सैयद बंधुओं ने यद्यपि सभी प्रकार के सामंतों से मेल-मिलाप करने की कोशिश की, लेकिन निजाम-उल-मुल्क और उसका भाई (बाप के रिश्ते का) अमीन खाँ के नेतृत्व में सामंतों का एक शक्तिशाली गुट ईष्र्या के कारण उनके विरुद्ध षड्यंत्र करने लगा.
  • बादशाह (फर्रुखसियर) की हत्या के कारण जनता में भी दोनों भाईयों के खिलाफ घृणा पैदा कर दी.
  • बादशाह मुहम्मदशाह भी अपने को दोनों भाइयों के नियंत्रण से मुक्त करना चाहता था.
  • इस कार्य में दक्कन का पूर्व सूबेदार चिनकिलिच खाँ (निजामुलमुल्क) तथा उसके सहायोगी सादात खाँ का सहयोग रहा.
  • निजामुलमुल्क के नेतृत्व में एक तूरानी सैनिक हैदरबेग ने 9 अक्टूबर, 1720 को छोटे भाई हुसैन अली की चाकू भौंककर हत्या कर दी.
  • अब्दुला खाँ को भी 15 नवम्बर, 1720 ई. में कैद कर लिया गया.
  • इस प्रकार सैयद बंधुओं (जिन्हें राजा बनाने वाले के नाम से भी जाना जाता है) का आधिपत्य खत्म हो गया.

मुहम्मदशाह (1719-48 ई.)

  • शाहजहाँ II या जहाँशाह का पुत्र रौशन अख्तर मुहम्मदशाह के नाम से 28 सितम्बर, 1719 ई. को गद्दी पर बैठा.
  • प्रशासन के प्रति लापरवाह तथा युवतियों का शौकीन होने के कारण इसे ‘रंगीला’ कहा गया.
  • तूरानी दल, जो सैयद बंधुओं के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था, के नेता चिकिलिच खाँ को सैयद बंधुओं का पतन करने की खुशी में मुहम्मदशाह ने अपना प्रधानमंत्री (21 फरवरी 1722 ई. को) नियुक्त किया.
  • अनुशासन प्रिय होने के कारण वह दरबार में कठोर नियम लागू करना चाहता था, किन्तु बादशाह के विलासी प्रवृत्ति के कारण कोई सहयोग प्राप्त न कर सका.
  • अंततः निराश होकर वह 18 दिसम्बर, 1799 ई. को दिल्ली त्याग दिया तथा हैदराबाद के सूबेदार मुबारिज खाँ को अपदस्त कर हैदराबाद एवं दक्कन के 6 सूबों को अपने अधिकार में कर अक्टूबर, 1724 ई. में अपने को स्वतंत्र घोषित कर हैदराबाद को अपनी राजधानी बनायी तथा सम्राट मुहम्मदशाह से ‘आसफजाह’ की उपाधि ग्रहण की.
  • निजामुलमुल्क का दिल्ली से प्रस्थान “साम्राज्य से निष्ठा एवं सद्गुण के पलायन का प्रतीक था.”
  • मुहम्मदशाह के काल में हैदराबाद के निजामशाही वंश के साथ ही बंगाल में मुर्शीद कुली खाँ, अवध में सआदत खाँ, भरतपुर और मथुरा में बदन सिंह, गंगा-यमुना दोआब में कटेहर रूहेलों के नेतृत्व में और फर्रुखाबाद में बंगश पठानों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली.
  • 1 मार्च, 1737 ई. में मराठों ने लगभग 500 घुड़सवारों के साथ दिल्ली पर अधिकार करने का प्रयास किया तथा अंत में 17 जनवरी, 1738 ई. में मुगल सम्राट तथा मराठों के मध्य सिरौंज के समीप संधि हुई, जिसके परिणामस्वरूप मुगल सम्राट ने मराठों का अधिकार नर्मदा से चंबल तक स्वीकार किया तथा साथ ही 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता भी देनी पड़ी.
  • मुहम्मदशाह के शासन काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना 1739 ई. में नादिरशाह का भारत पर आक्रमण था.
  • दिल्ली के भयानक कत्लेआम में लगभग 30,000 लोगों की जाने गईं.
  • वह दिल्ली को लूटते हुए शाही खजाने, मोती, हीरे, जवाहरात एवं संसार भर में प्रसिद्ध मयूर सिंहासन (तख्ते ताऊस) को भी लूट लिया.
  • 16 मार्च, 1739 ई. को नादिरशाह भारत से वापस चला गया.
  • अपने साथ वह विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा (जो तख्ते ताउस में लगा था) भी ले गया.
  • 1739 ई. में ही नादिशाह की मृत्यु के बाद उसका सेनापति ‘अहमदशाह अब्दाली‘ अफगानिस्तान का शासक बना.
  • उसने मुहम्मद शाह के शासनकाल के दौरान पंजाब के सूबेदार शाहनवाज खाँ के निमंत्रण पर भारत पर आक्रमण किया.
  • अब्दाली लाहौर जीतने के बाद दिल्ली पर आक्रमण के लिए आगे बढ़ा, किन्तु मुहम्मदशाह के पुत्र शाहजादा अहमद ने मार्च, 1748 ई. में मच्छीवाड़ा के समीप ‘मानूपुर’ में उसे पराजित किया.
  • 28 अप्रैल, 1748 ई. को मुहम्मदशाह की मृत्यु के बाद अहमदशाह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा.
  • नादिरशाह के आक्रमण के समय उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था.
  • वह बिना किसी प्रतिरोध के भारतीय इलाकों में घुस आया.
  • दिल्ली की सुरक्षा के लिए जल्दी-जल्दी तैयारियाँ की गई, किन्तु आपसी गुटाबाजी के कारण सामंतों ने सूत्रबद्ध होने से इंकार कर दिया था.
  • वे सुरक्षा की योजना तथा सेनापति के नाम पर सहमत नहीं हो सके.
  • परिणामस्वरूप 13 फरवरी, 1739 ई. को करनाल में हुए युद्ध में मुगल फौज ने जबरदस्त शिकस्त खाई.
  • अब्दाली ने भी 1748 तथा 1767 ई. के बीच उत्तरी भारत, खासकर दिल्ली और मथुरा पर बार-बार आक्रमण किया.

अहमदशाह (1748-54 ई.)

  • 28 अप्रैल, 1748 ई. को अहमदशाह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा.
  • इसके शासन काल में प्रशासन का काम काज हिजड़ों और औरतों के एक गिरोह के हाथों में आ गया, जिसकी मुखिया राजमाता उधमबाई (उपाधि-किबला-ए-आलम) थी.
  • उसने हिजड़ों के सरदार जाबेद खाँ को ‘नवाब बहादुर’ की उपाधि प्रदान की.
  • उसे बुरहान-उल-मुल्क के दामाद एवं अवध के सूबेदार ‘सफदरजंग’ को अपना बजीर तथा कमरुद्दीन के लड़के मुइन-उल-मुल्क को पंजाब का सूबेदार बनाया.
  • इसके काल में अब्दाली ने भारत पर कुल पाँच बार आक्रमण किए.
  • वह अपने दूसरे तथा तीसरे आक्रमण में पंजाब तथा मुल्तान को जीतने में सफल रहा.
  • वजीर सफदरजंग के अवध में स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर लेने के बाद निजामुलमुल्क के पुत्र गाजीउद्दीन फिरोज जंग की स्थिति मजबूत हो गई.
  • उसने मुगल दरबार में बजीर का पद प्राप्त कर लिया तथा उचित अवसर पाकर बादशाह अहमदशाह को अपदस्थ कर उसकी आँखें निकलवाकर सलीमगढ़ की जेल में डाल दिया.
  • अब गाजीउद्दीन ने जहाँदारशाह के पुत्र आलमगीर द्वितीय को दिल्ली के सिंहासन पर बिठाया.

आलमगीर द्वितीय (1754-59 ई.)

  • 55 वर्षीय आलमगीर द्वितीय के शासन की वास्तविक शक्ति गाजीउद्दीन-इमाद-उल-मुल्क के हाथों में थी.
  • आलमगीर ने गाजीउद्दीन के विरुद्ध षड्यंत्र करना शुरू किया, किन्तु षड्यंत्र का भेद खुल जाने पर गाजीउद्दीन ने उसे सत्ताच्युत कर हत्या करवा दी.
  • उसने आलमगीर II के पुत्र अलीगौहर को ‘शाहआलम’ की उपाधि से गद्दी पर बिठाया.

शाहआलम द्वितीय (1759-1806)

  • यह शासक अंग्रेजों, मराठों एवं अमीरों के हाथों का कठपुतली मात्र था.
  • हालांकि यह कबिल और भरपूर हिम्मत वाला था, लेकिन आरंभ के वर्षों में अपनी राजधानी से दूर एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहा, क्योंकि उसे अपने ही वजीर से जान का खतरा था.
  • उसने 1764 ई. में बंगाल के मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ मिलकर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ाई की घोषणा की.
  • बक्सर की यह लड़ाई हार जाने के कारण वह इलाहाबाद में कंपनी का पेंशनधारी बन कर रहा.
  • 1772 ई. में वह मराठों के संरक्षण में ब्रिटिश आश्रय छोड़ दिल्ली लौटा.
  • 1803 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया.
  • इसके शासन काल में पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ तथा 1765 में अंग्रेजों को बंगाल एवं बिहार की दीवानी, 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन एवं कड़ा प्रदेश के बदले प्रदान कर दिया.
  • बाद में मराठों से मिल जाने के कारण अंग्रेजों ने उसकी पेंशन बंद कर दी.
  • 1806 ई. में गुलाम कादिर खाँ ने शाहआलम द्वितीय की हत्या करवा दी.

अकबर द्वितीय (1806-37 ई.)

  • अगला मुगल बादशाह शाहआलम-द्वितीय का पुत्र अकबर द्वितीय बना.
  • यह भी अंग्रेजों को पेंशनभोगी बना रहा.
  • इसका अधिकार लाल किला तक ही सिमट कर रह गया.
  • 1837 ई. में इसकी मृत्यु हो गई.
  • अकबर द्वितीय अंग्रेजों के संरक्षण में बनने वाला प्रथम मुगल बादशाह था.

बहादुरशाह द्वितीय (1837-62 ई.) मुगल साम्राज्य का पतन

  • यह अंतिम मुगल बादशाह था.
  • 1857 ई. के विद्रोह में भाग लेने के कारण इसे निर्वासित कर (अंग्रेजों ने) रंगून भेज दिया, जहाँ 1862 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
  • इस प्रकार मुगल वंश का सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया.
  • बहादुरशाह द्वितीय ‘जफर’ के नाम से कविता तथा शायरी लिखते थे.
  • इसलिए वह बहादुरशाह जफर के नाम से प्रसिद्ध थे.

 सैयद बन्धुओं ने कुल छह शाहजादों को बादशाह बनायारफी-उद्-दरजात, रफी-उद्-दौला, नेकसियर, फर्रुखसियर, मुहम्मद इब्राहिम तथा मुहम्मदशाह .

 

मुगल साम्राज्य का पतन (Decline of the Mughal Empire) आधुनिक भारत (MODERN INDIA)

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Monday, November 12, 2018

धुआं और धूल के कण का संकट (Smoke and dust particle crisis)

धुआं और धूल के कण का संकट (Smoke and dust particle crisis)

धुआं और धूल के कण का संकट (Smoke and dust particle crisis)

दिल्ली में, धुआं और धूल के कण ‘धुआं ‘ के रूप में बड़ी समस्याएं पैदा कर रहे हैं. धुआं का विशालकाय न केवल दिल्ली में बल्कि अन्य शहरों में भी चुनौती के रूप में देखा जाता है. ये धुआं कैसे दिखाई देते हैं, लेकिन यह कैसे तैयार किया जाता है, क्यों इसकी उतार चढ़ाव इतनी तेजी से दिखती है, उन्हें नियंत्रित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए.

हर साल, भारत के कई प्रमुख शहर वायु प्रदूषण हैं, नवंबर-दिसंबर की अवधि की अवधि, जो उच्च वृद्धि की अवधि है, इस साल, कई महानगरीय शहर एक ही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं! दिल्ली एक प्रतिनिधि शहर के रूप में दुनिया भर में इस आपदा पर चर्चा कर रही है. मेट्रोपॉलिटन क्षेत्रों में, धुआं और धूल के कण एक अभिशाप बन रहे हैं और लाखों लोगों को स्वास्थ्य के एक बड़े संकट का सामना करना पड़ रहा है.

दिल्ली आज दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है. एक अनुमान के अनुसार, हर साल दिल्ली में 11 हजार से ज्यादा लोग मारे जाते हैं. 2013-14 के बाद से, बढ़ते वाहन यातायात, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण और खेत की भूमि में जलने की प्रबल जलती हुई, प्रदूषण की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है. दिल्ली में, 2.5 माइक्रोमीटर (suspended particulate matter) की वार्षिक मात्रा प्रति घन मीटर 153 माइक्रोग्राम है. यह अनुपात 60 माइक्रोग्राम होने की उम्मीद है. वॉल्यूम के 10 माइक्रोमीटर से कम फ्लोटिंग ठोस पदार्थों की वार्षिक मात्रा हवा में 2 घन मीटर और 292 माइक्रोग्राम है. इससे नागरिकों की श्वसन शिकायतों में बड़ी वृद्धि हुई है; इसके अलावा, तापमान में उतार-चढ़ाव की घटनाएं, दृश्यता कम हो जाना (visibility decreases), और हवाई यातायात को बंद करना आदि .

दिल्ली में वायु प्रदूषण का यह स्तर इतनी खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया है कि, दृश्यता घटने, सड़क दुर्घटनाओं, उड़ान रद्दीकरण की घटनाओं और स्कूलों और कॉलेजों के कारण प्रदूषण के कारण कॉलेज हर साल बंद होते हैं. दिल्ली एक बड़ा गैस कक्ष है! इस साल, 30 अक्टूबर को, 10 माइक्रोमेट्रिक कणों का आकार प्रति क्यूबिक मीटर 1519 माइक्रोग्राम था, प्रदूषण नियंत्रण विभाग द्वारा निर्धारित स्तर से पंद्रह फीट से अधिक! वह स्तर उस रात 1016 माइक्रोग्राम था. वर्ष 2016 में, दिल्ली में बीस प्रतिशत वाहन 2.5 माइक्रोमेट्रिक आकार के प्रदूषक के स्तर को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं. इस साल, वर्ष 2018 में 40% की वृद्धि हुई है.

सीएनजी संचालित वाहनों के लॉन्च के प्रयासों के बावजूद, पर्यावरण अनुकूल दिल्ली मेट्रो, मोटर वाहनों की संख्या में वृद्धि, निर्माण में वृद्धि, और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले धुएं की घटनाओं में वृद्धि में कोई वृद्धि नहीं हुई है.

दुनिया भर के कई शहरों से तस्वीरें

यह तस्वीर अब तक सीमित नहीं है, लेकिन दुनिया के कई शहरों में इस जहरीले वायु प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) की रिपोर्ट के अनुसार, शहर की आबादी का अस्सी प्रतिशत शुद्ध हवा के सभी मानकों में श्वसन रोगों से प्रभावित होता है. दिल्ली, ब्रिटिश कोलंबिया (कनाडा), शंघाई, बीजिंग (चीन), लंदन (यूके), ग्लास्गो, एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड), मेक्सिको सिटी, सैंटियागो (चिली), तेहरान (ईरान), लॉस एंजिल्स (कैलिफोर्निया), फियोना मक्खन (मंगोलिया ) कलिमंतन (दक्षिणपूर्व एशिया) जैसे कई विश्व शहर आज यहां पाए गए हैं.

पटना, ग्वालियर, रायपुर, अहमदाबाद, कानपुर और आगरा के कई शहर भी इन समस्याओं से प्रभावित हैं. महाराष्ट्र, मुंबई, पुणे, नासिक और नागपुर की स्थिति बहुत अलग नहीं है. कानपुर सूची में प्रथम क्रमांक पर है. प्रति घन मीटर 2.5 माइक्रोमीटर से कम शहर में तैरने वाली ठोस सामग्री का वार्षिक अनुपात हवा में 319 माइक्रोग्राम है. 10 माइक्रोमीटर से कम में 1 घन मीटर की वायु गुणवत्ता मुंबई में 104 से कम है, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में, कैरो 284, ढाका 147 पर है और बीजिंग में केवल 92 माइक्रोग्राम हैं. पिछले साल 2 दिसंबर को दिल्ली की वायु प्रदूषण सूचकांक 331 थी. यह रविवार को बिल्कुल 3 9 0 था. फ्लोटिंग वाले माइक्रोस्कोपिक प्रदूषक का स्तर बहुत अधिक था.

प्रदूषण का उगम

वायु के इस प्रदूषण के इतिहास को देखते हुए, यह देखा जाता है कि केवल जब मनुष्यों ने अग्नि का आविष्कार किया और लकड़ी की आग शुरू करने के लिए आग का इस्तेमाल किया, तो केवल मानव निर्मित प्रदूषण शुरू हुआ. उसके बाद धीरे-धीरे इस तरह की आग से उत्पन्न धुआं घनी आबादी वाले शहरी बस्तियों की मोटाई में दिखाई देना शुरू कर दिया. औद्योगिक क्रांति के बाद, जब कोयले जला दिया गया, प्रदूषण का संकट और भी अंधेरा हो गया.

1850 के दौरान, काले धुएं और कोहरा (pea soup) का विशाल शहर लंदन की शहर की दीवार से हिलना शुरू कर दिया. इससे कई लोगों ने भी नेतृत्व किया. 1911 से, इस प्रदूषण को धुआं के रूप में नामित किया गया था. ‘धुआं’ नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड, ओजोन, कार्बन मोनोऑक्साइड और स्मोक के मिश्रण के रूप में प्रदूषण का एक प्रकार है. आजकल वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण प्रदूषण में बहुत तनाव है. वायु के औद्योगिक शहर में, इस तथ्य के कारण कि कारखाने में धुआं, परमाणु अवशोषित पानी की मात्रा बहुत अधिक है. यही कारण है कि कल्पद ध्रुक की एक बड़ी मात्रा का उत्पादन होता है. ज्वालामुखीय विस्फोटों के कारण, सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य सूक्ष्म-कण इतनी धूल निकलते हैं. इसे एक व्हॉग (vog) कहा जाता है.

प्रदूषण को कम करने के सभी प्रयासों के बाद, लंदन शहर को धुआं और धुएं से धुएं से मुक्त कर दिया गया था; लेकिन आधुनिक समय में, वाहनों से प्रदूषण की मात्रा फिर से बढ़ने लगी है. संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में पिट्सबर्ग, पेंसिल्वेनिया, सेंट लुइस, मिसौरी जैसे कई शहरों में, वाहनों को हेडलाइट्स के साथ संचालित किया जा रहा है. 1948 में, डोनोरा, पेंसिल्वेनिया शहर में आस-पास की पहाड़ियों से घिरे दीवार में स्थिर धुंध के पांच दिन, मिश्रित रसायनों और सल्फ्यूरिक पौधों और शहर में सल्फरिक पौधों को हवा में जारी प्रदूषकों के साथ मिश्रित किया गया था और हजारों लोगों पर असर हुआ. इसके बाद आने वाले ‘स्वच्छ वायु अधिनियम'(clean air act) के बाद, यह सभी तरह से घट गया है.

प्रदूषण का रसायन शास्त्र (chemistry of pollution)

वायु प्रदूषण के स्तर मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, सल्फर ट्रायएक्साइड, नाइट्रिक और नाइट्रोजन ऑक्साइड, मीथेन, क्लोरोफ्लोरोकार्बन और माइक्रोस्कोपिक पदार्थ और हवा में दव की बूंदों के कारण होते हैं.

बड़े शहरों में अब दो मुख्य प्रकार के धुएं (धुआं) जैसे फोटोकैमिकल धुआं और औद्योगिक धुआं की जबरदस्त विविधताएं आ रही हैं. उपर्युक्त वर्णित सभी प्रदूषकों को सूरज की रोशनी के कारण ‘प्रकाशकरणिक धुआं’ कहा जाता है जो धुएं के गठन का कारण बनता है. वाहनों से निकलने वाला धुआं नाइट्रोजन ऑक्साइड का कारण बनता है. बड़े शहरों में,सवेरे स्वच्छ सूर्य प्रकाश के बाद दोपहर में पीले रंग का स्तर दिखने लगता है . यह आंखों को आग बनाता है और वे गिर जाते हैं. गर्म और शुष्क हवा के शहरी क्षेत्रों पर प्रकाश उत्सर्जक प्रभाव, जो बहुत सारी ऊर्जा का अनुभव कर रहे हैं.

कण 2.5 माइक्रोमेटर्स से 2.5 सेमी छोटे, आग से और डीजल जलाने से हवा में फैले हुए हैं, पर्यावरण में लंबे समय तक तैरते हैं और आसानी से पुरुषों के फेफड़ों में प्रवेश करते हैं. दिल्ली जैसे औद्योगिक शहरों में लोगों को सल्फर डाइऑक्साइड के कारण सल्फ्यूरिक एसिड यौगिकों का सामना करना पड़ता है, और सूक्ष्म पदार्थों जैसे कि राख राख, पराग, सीमेंट धूल, पीसने, कोयले की राख और पिग्मेंटेशन जैसे सूक्ष्म पदार्थों के कारण धूल का सामना करना पड़ता है. चीन, भारत, यूक्रेन और कुछ पूर्वी यूरोपीय देशों में जहां प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बहुत अधिक प्रयास नहीं हैं, ऐसे मात्रा में धूल को बढ़ाने के लिए कोयले की बड़ी संख्या देखी जाती है.

कोयले, लकड़ी और धूल के तूफान, जंगल की आग जलने के अलावा, प्रदूषित हवा भारत की पहाड़ियों में कम मात्रा में इलाकों में बड़ी मात्रा में संग्रहित होती है. फसल जलती हुई, निर्माण स्थल में विशाल धूल का निर्माण भी सहायक है.

शहरों के साथ प्रदूषण लक्ष्य अब शहरों के पास के गांवों की ओर बढ़ते हैं. गांवों में 75% मौतों के कारणों के कारण वर्ष 2015 में आंकड़े उपलब्ध हैं. यह जानकारी हमें बताती है कि कैफीन लकड़ी और लकड़ी की आग से प्रदूषित प्रदूषित गैस का कारण बनता है. यह धुआं मुंबई, चेन्नई जैसे मेट्रोपॉलिटन शहरों की ओर फैलता है, इस तथ्य के कारण कि खेतों में खेतों को बनाया जाता है, इन प्रदूषकों को शहर की निर्माण की धूल, वाहनों से निकलने वाला धुआं, फैक्ट्री और अन्य उद्योगों से धुआं जाता है. चुला के उपयोग में 25 प्रतिशत वायु प्रदूषण का इस्तेमाल किया गया था. शहरों के पास ईंट भट्टियां भी सहायक हैं.

एक सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत में जहरीले गैस प्रदूषण की समस्या शायद बहुत पुरानी है. आजकल, शहरों और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण की संख्या में वृद्धि के कारण यह ध्यान देने योग्य हो गया है. चूंकि प्रदूषण की संख्या बढ़ जाती है, यह भी महसूस करना संभव है कि यह स्तर भारत में कई अन्य स्थानों पर पहुंच चुका है.

शहर की भूगोल, भूगर्भ विज्ञान, जलवायु, जनसंख्या घनत्व, औद्योगिक परिसरों की संख्या, छोटी कारों और ट्रकों की संख्या, और ईंधन का उपयोग ऐसी चीजों पर वायु प्रदूषण की मात्रा है.

जहां बारिश या बर्फ ऊंची है, ये शहर स्वाभाविक रूप से प्रदूषण से मुक्त हैं. इस संबंध में समुद्र तट कुछ हद तक भाग्यशाली हैं. क्योंकि नमकीन महासागर की हवा के कारण जमीन से हवा में तैरने वाले प्रदूषक बोए जाते हैं. यदि तट पर लंबी इमारतें हैं, तो यह परिणाम थोड़ा कम लगता है. जहां हवा तेजी से बहती है, वायु प्रदूषक कहीं और ले जाया जाता है. हालांकि, जिन स्थानों में यह बहती है, इसके पक्ष में प्रदूषित हो जाते हैं.

बड़े शहर में ऊंची इमारतें हवा की गति को रोकती हैं और वायु प्रदूषक वहां रहते हैं. पहाड़ी क्षेत्रों के शहरी इलाकों में, प्रदूषक कम क्षेत्रों में चुप रहते हैं. वे कहीं और नहीं फैल सकते हैं. प्रदूषण और प्रदूषण के साथ तापमान उप द्रव धुएँ के साथ बढ़ता है और प्रदूषण के स्तर में वृद्धि होती है.

‘अर्बन स्प्रॉल ‘ की समस्या

कई पर्यावरणविदों के मुताबिक, शहरीकरण एक समस्या नहीं है, लेकिन शहरी जादू शहरी मंत्रों की समस्या है. इससे बड़े ग्रामीण, प्रदूषण, स्वच्छ और सूखे क्षेत्र को समाप्त होने की संभावना बढ़ जाती है.

पत्थर कोल्हू के निर्माण, दिल्ली में गर्म मिश्रण संयंत्र, कोयले और जैव संश्लेषण (बायोमास) के उपयोग पर प्रतिबंध, रिश्वत पर प्रतिबंध, निजी वाहनों का नियंत्रण, विशेष रूप से डीजल संचालित वाहन, अपशिष्ट निपटान पर प्रतिबंध, और पूर्ण बंद नवंबर में औद्योगिक कारोबार के नीचे. संकट का मुकाबला करने के लिए उन्हें दिया गया है.

पश्चिमी भारत में पश्चिमी बाधाओं के चलते पश्चिमी भारत में पश्चिमी बाधाओं के कारण नवंबर में भी इस समस्या की तीव्रता बढ़ती है और उपनगरों के उपनगरों के माध्यम से विंडसर्जल और पारस्परिक (एंटीसाइक्लोन) बहती है. पंजाब और हरियाणा के कृषि राज्यों से पंजाब और हरियाणा के खेतों में कृषि रसायन के कारण अशांति के कारण तीव्रता बढ़ जाती है. हवा की गति कम होने के बाद, ये प्रदूषक हवा में अवशोषित रहते हैं और फिर बैठते हैं. ये प्राकृतिक कारण दिल्ली और उत्तर भारत में प्रदूषण के रूप में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं.

दिल्ली जैसे शहर अधिक स्वच्छ, स्वच्छ हवा, प्रदूषण मुक्त हैं और वास्तव में रहने का अधिकार वास्तव में इस समस्या का उत्तर है. इसके लिए, अब शहरों को ग्रीन हाउस या इको शहरों में परिवर्तित करना भी आवश्यक है. ऐसे शहरों में, मुख्य ध्यान प्रदूषण के पूर्ण नियंत्रण, अपशिष्ट में कमी और सौर ऊर्जा का उपयोग करके रीसाइक्लिंग पर होना चाहिए. शहर और आसपास के क्षेत्रों की जैव विविधता की रक्षा के लिए और इसमें बढ़ने की कोशिश करने के लिए यहां भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए. इन शहरों को लोक अभिमुख होना चाहिए, उन्हें कार ओरिएंटेड नहीं होना चाहिए.

उपाय क्या है?

मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में नदियों और नदियों को साफ करें, अक्सर अपने पारिस्थितिकी तंत्र को साफ, अपग्रेड या पुनर्निर्मित करते हैं; दिल्ली, मुंबई, पुणे, बैंगलोर जैसे शहरों की पारिस्थितिकी में सुधार के अलावा, कई पेड़, पेड़ों का वृक्षारोपण, पहाड़ियों की पर्यावरण संरक्षण और शहर की बढ़ती सीमा के नियंत्रण, प्रदूषण नियंत्रण के संदर्भ में कई उपाय किए गए हैं.

इको सिटी का सफल उपयोग पहले से ही कई स्थानों पर किया जा चुका है. ब्राजील में की क्युरिटीबा, न्यूजीलैंड के वेता केरी, फिनलैंड में टैपिओला, ओरेगॉन में पोर्टलैंड और कैलिफ़ोर्निया में डेविस जैसे कई उदाहरण मिल सकते हैं. इन सार्वजनिक पारिस्थितिक तंत्रों में प्रदूषण के उन्मूलन के लिए सबसे अच्छी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली ने बहुत योगदान दिया है. स्वच्छ, सस्ता, सुविधाजनक, सक्षम, और अच्छी तरह से प्रचारित सार्वजनिक परिवहन प्रणाली एक अच्छा उदाहरण है कि शहर को शहर के वायु प्रदूषण, क्यूरीटीबा शहर, ब्राजील में एक विकासशील देश से कितनी अच्छी तरह से मुक्त किया जा सकता है!

दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई, पुणे और बैंगलोर जैसे शहरों में बढ़ते प्रदूषण के स्तर के खिलाफ इस तरह के उपाय करना उचित है. दुनिया में कहीं भी किए गए सभी प्रयोगों को शहर में प्रदूषण नियंत्रण पर लागू नहीं किया जा सकता है. हमारे शहरों की भूगोल, इतिहास, विकास और विकास और पर्यावरण सभी अलग हैं. हमें हर किसी के बारे में सोचकर अल्पकालिक और दीर्घकालिक समाधानों की तलाश करनी होगी. हमने देखा है कि हमारे शहरों में विदेशी आप्रवासियों को लाकर कितनी यातायात योजनाएं शुरू की गई हैं!

किसी भी शहरीकरण की अनुपस्थिति में आपके अधिकांश शहरों में वृद्धि हुई है. नए तरीकों को खोजने की आवश्यकता है और अभी भी उन्हें ढूंढने के तरीके खोजने के कई तरीके हैं और अभी भी उन्हें देखने के कई अवसर हैं. वाहनों की वार्षिक वृद्धि दर और पर्यावरण के निर्बाध निर्माण के बावजूद, दिल्ली और निश्चित रूप से नियंत्रण, पुणे, मुंबई जैसे शहरों को कम किया जा सकता है. मुंबई, चेन्नई और कोलकाता के शहर सीमाएं हैं और उनके वायु प्रदूषण के सवाल समुद्र के जलवायु से संबंधित हैं, जबकि दिल्ली के शहर, पुणे समुद्र से बहुत दूर हैं, समस्याएं अलग-अलग हैं. फिर भी, प्रदूषण की इस समस्या की जड़ तक बढ़ने का शहर का दृष्टिकोण और निजी वाहनों के असीमित उपयोग से भारत के सभी शहरों को जल्द ही मिलना असंभव हो जाएगा!

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Sunday, November 11, 2018

मुगल कालीन सांस्कृतिक अवस्था- स्थापत्य कला (वास्तुकला) और चित्रकला Architecture, Painting

मुगल कालीन सांस्कृतिक अवस्था- स्थापत्य कला (वास्तुकला), चित्रकला और संगीत कला  Mughal period cultural status- Architecture,Painting and Music

मुगल कालीन शिक्षा (Education)

  • मुगल सम्राटों ने शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया.
  • प्राथमिक शिक्षा ‘मक्तबों’ में दी जाती थी.
  • बाबर के समय ‘शुहरते आम‘ नामक विभाग स्कूल तथा कॉलेजों की व्यवस्था करता था.
  • हुमायूँ की भी अध्ययन में विशेष रुचि थी .
  • अकबर परिस्थितियों के कारण अधिक औपचारिक शिक्षा प्राप्त न कर सका, किन्तु शिक्षा के क्षेत्र में उसने स्मरणीय कार्य किए.
  • उसने भी हुमायूं की तरह एक प्रसिद्ध पुस्तकालय की स्थापना की.
  • उसने हिन्दुओं के ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद हेतु अनुवाद विभाग की स्थापना की.
  • अकबर ने अनेक खानकाह एवं मदरसों की स्थापना की.
  • जहाँगीर को तुर्की एवं फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान था.
  • शाहजहाँ ने भी दिल्ली में एक कॉलेज की स्थापना करवाई तथा ‘दारुल बक’ नामक कॉलेज की स्थापना की.

मुगल कालीन सांस्कृतिक अवस्था- स्थापत्य कला (वास्तुकला) और चित्रकला Mughal period cultural status- architecture and painting

  • आगरा, फतेहपुर सीकरी, दिल्ली, लाहौर, स्यालकोट, गुजरात, जौनपुर अजमेर आदि मुगल कालीन शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे.
  • मुगलों ने फारसी को अपनी राजभाषा बनाया.

मुगल कालीन स्थापत्य कला वास्तुकला चित्रकला (architecture and painting)

स्थापत्य कला (वास्तुकला) Architecture

  • अन्य कलाओं के अनुरूप वास्तुकला के क्षेत्र में मुगलकाल नवीनताओं और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के साथ-साथ तुर्क अफगान काल में प्रारंभ प्रवृत्तियों के विकास के चरमोत्कर्ष की ओर उन्मुख प्रक्रियाओं का युग था.
  • सम्पूर्ण मुगलकाल की वास्तुकलात्मक शैली पर हिन्दू प्रभाव बना रहा.
  • इस कला में फारस, तुर्की, मध्य एशिया, गुजरात, जौनपुर, बंगाल आदि शैलियों का अनोखा मिश्रण हुआ.
  • स्मिथ ने मुगल वास्तुकला को ‘कला की रानी’ कहा तथा पर्सी ब्राउन ने इस कला को भारतीय वास्तु कला ‘ग्रीष्म काल‘ कहा, जो प्रकाश व उर्वरा का प्रतीक है.

 

  • मुगल स्थापत्यकला के विकास की पहली सीढ़ी ‘फतेहपुर सीकरी’ आदि के निर्माण में तथा इसकी चरम परिणति शाहजहाँ के शाहजहानाबाद नगर के निर्माण में दिखाई देती है.
  • इस काल के वास्तुकला के क्षेत्र में पहली बार आकार एवं डिजाइन की विविधता का प्रयोग तथा निर्माण के लिए पत्थर के अलावा पलस्तर एवं गच्चीकारी (Stuceo) का प्रयोग किया गया.
  • सजावट के लिए संगमरमर पर जवाहरात से की गई जड़ावट ‘पित्रा ड्यूरा’ (Pietra Duro) का प्रयोग किया गया.
  • पित्रा ड्यूरा का प्रयोग इस काल की एक विशेषता थी.
  • पित्रा ड्यूरा के लिए पत्थरों को काटकर फूल-पत्ते, बेलबूटे को सफेद संगमरमर में जड़ा जाता था.
  • इस काल के बुर्जा एवं गुम्बदों को ‘कलश’ से सजाया जाता था.

बाबर शासनकाल में वास्तुकला

  • बाबर के अल्पकालीन शासनकाल में वास्तुकला का कोई विशेष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है.
  • उसके बाबरनामा से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन स्थानीय वास्तुकला में संतुलन या सुडौलपन का अभाव था.
  • निर्माण कार्य ग्वालियर के मानसिंह एवं विक्रमाजीत सिंह के महलों से प्रभावित हैं.
  • बाबर ने अपने उद्यान निर्माण कार्य में इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उसका निर्माण सामंजस्यपूर्ण और पूर्णतः ज्यामितीय हो .
  • उसने आगरा में ज्यामितीय विधि पर आधारित एक उद्यान का निर्माण करवाया.
  • पानीपत के काबुली बाग में निर्मित मस्जिद (1524 ई.) की विशेषता, उसका ईंटों द्वारा किया गया निर्माण थी.
  • रूहेलखण्ड के सम्भल नामक स्थान पर निर्मित जामी मस्जिद (1529 ई.) तथा आगरा के पुराने लोदी के किले के भीतर की मस्जिद बाबर द्वारा निर्मित अन्य स्मारक हैं.

हुमायूँ शासनकाल में वास्तुकला

  • प्रतिकूल राजनीतिक परिस्थितियों के कारण हुमायूँ के शासनकाल में कोई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला.
  • शासन के आरंभिक वर्षों में उसने दिल्ली में ‘दीनपनाह‘ (धर्म का शरण स्थल) नामक नगर का निर्माण करवाया, किन्तु इस प्रथम मुगल नगर का कोई अवशेष आज उपलब्ध नहीं है.
  • हुमायूँ द्वारा निर्मित 1540 ई. में फतेहाबाद की दो मस्जिदें फारसी शैली में हैं.

शेरशाह शासनकाल में वास्तुकला

  • वास्तुकला के क्षेत्र में शेरशाह का शासनकाल ‘संक्रमण का काल’ माना जाता है.
  • उसने दिल्ली को जीतने के पश्चात् ‘शेरगढ़’ या ‘दिल्ली शेरशाही’ का निर्माण करवाया.
  • वर्तमान में इस नगर के केवल ‘लाल दरवाजा‘ तथा ‘खूनी दरवाजा‘ ही शेष हैं.
  • शेरशाह ने हुमायूँ द्वारा निर्मित ‘दीनपनाह’ को तुड़वाकर उसके मलवे पर ‘पुराना किला’ का निर्माण करवाया.
  • इस किले के अन्दर 1542 ई. में किला-ए-कुहना नामक मस्जिद का निर्माण करवाया.
  • उसने रोहतास (बिहार में) में एक किले का निर्माण करवाया.
  • सासाराम (बिहार) में झील के अन्दर एक ऊँचे टीले पर निर्मित मकबरा (शेरशाह का) हिन्दू-मुस्लिम वास्तुकला का श्रेष्ठ नमूना है.
  • किला-ए-कुहना मस्जिद के परिसर में एक अष्टभुजी तीन मंजिला मण्डप निर्मित है, जिसे ‘शेरमण्डल’ कहा जाता है.

अकबर शासनकाल में वास्तुकला

  • अबुल फजल ने अकबर के विषय में लिखा है कि-

“सम्राट सुन्दर इमारतों की योजना बनाते हैं और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार से पत्थर एवं गारे का रूप दे देते हैं.”

  • अकबर के निर्माण कार्य में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का व्यापक समन्वय दिखता है.

हुमायूँ का मकबरा

  • यह मकबरा भारतीय तथा फारसी शैली के समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
  • इस मकबरे ने स्थापत्य कला को एक नई दिशा प्रदान की.
  • इस मकवरे का खाका ईरान के मुख्य वास्तुकार ‘मीरक मीर्जा गियास’ ने तैयार किया था.
  • 1564 ई. में निर्मित इस मकबरे में ईरानी प्रभाव के साथ-साथ हिन्दू शैली की ‘पंचरथ’ से प्रेरणा ली गई है.
  • इसका निर्माण कार्य अकबर की सौतेली माँ हाजी-बेगम की देख-रेख में हुआ था.
  • मकबरे का मुख्य दरवाजा पश्चिम की ओर है.
  • इसकी मुख्य विशेषता सफेद संगमरमर से निर्मित गुम्मद हैं.
  • यह भारत का पहला मकबरा है, जिसमें उभरी हुई दोहरी गुम्बद है.
  • यह तराशे गए लालू रंग के पत्थरों द्वारा निर्मित है.
  • उद्यानों में निर्मित मकवरों का आयोजन प्रतीकात्मक रूप में करते हुए मकवरों में दफनाए गए व्यक्तियों के देवी स्वरूप की ओर संकेत किया गया है.
  • इस परम्परा में, निर्मित यह मकवरा भारत का पहला स्मारक है.
  • यह मकबरा ‘ताजमहल का पूर्वगामी’ है तथा इस परम्परा की परिणति ताजमहल में हुई है.

 

  • अकबर ने मेहराबी एवं शहतीरी शैली का समान अनुपात में प्रयोग किया.
  • उसने ऐसी इमारतों का निर्माण करवाया जो अपनी सादगी से ही सुन्दर लगती थीं.
  • उसके अपने निर्माण कार्यों में अधिकतर लाल पत्थर का प्रयोग किया.

आगरा का किला 

  • अकबर के मुख्य वास्तुकार कासिम खाँ के नेतृत्व में 1566 ई. में इस .
  • किले का निर्माण कार्य शुरू किया.
  • यमुना नदी के किनारे 1½ मील में फैले इस किले के निर्माण में 15 वर्ष तथा 35 लाख रुपये खर्च हुए.
  • अकबर ने इसकी मेहराबों पर कुरान की आयतों के स्थान पर पशु-पक्षी, फूल-पत्तों की आकृतियों को खुदवाया.
  • इस किले के पश्चिमी भाग में स्थित ‘दिल्ली दरवाजे’ का निर्माण 1566 ई. में किया गया.
  • किला का दूसरा दरवाजा ‘अमरसिंह दरवाजा’ के नाम से प्रसिद्ध है.
  • किले के अन्दर अकबर ने लगभग 500 निर्माण कराए हैं, जिनमें लाल पत्थर तथा गुजराती एवं बंगाली शैली का प्रयोग हुआ है.

जहाँगीरी महल

  • जहाँगीरी महल ग्वालियर के राजा मानसिंह के महल की नकल है.
  • यह अकबर का उत्कृष्ट निर्माण कार्य है.
  • महल के चार कोनों में चार बड़ी छतरियाँ हैं तथा महल में प्रवेश के लिए बनाया गया दरवाजा नोकदार मेहराव का है.
  • पूर्णतः हिन्दू शैली में निर्मित इस महल में संगमरमर का अत्यल्प प्रयोग हुआ है.
  • कड़ियाँ तथा तोड़े का प्रयोग इसकी विशेषता है.
  • जहाँगीरी महल के दाहिनी ओर अकबरी महल का निर्माण हुआ था.
  • जहाँगीरी महल की सुन्दरता का अकवरी महल में अभाव है.

फतेहपुर सीकरी 

  • शेख सलीम चिश्ती के प्रति आदर प्रकट करने के उद्देश्य से अकबर ने 1571 ई में फतेहपुर सीकरी के निर्माण का आदेश दिया.
  • अकबर ने 1570 ई. में गुजरात को जीतकर इसका नाम फतेहपुर सीकरी या विजय नगरी रखा तथा 1571 ई. में इसे राजधानी बनाया.
  • लगभग 7 मील लम्बे पहाड़ी क्षेत्र में फैले इस नगर में प्रवेश के लिए अजमेर, आगरा, ग्वालियर, दिल्ली, धौलपुर आदि नाम के 9 प्रवेश द्वार हैं.
  • सीकरी के निर्माण का श्रेय वास्तु विशेषज्ञ बहाउद्दीन को जाता है.
  • फग्र्युसन के अनुसार, ‘फतेहपुर सीकरी पत्थर में प्रेम तथा एक महान व्यक्ति के मस्तिष्क की उपज है.’

जोधाबाई महल

  • सीकरी के सभी भवनों में यह महल सबसे बड़ा है.
  • इस महल में गुजराती प्रभाव है तथा यह दक्षिण के मंदिरों से प्रभावित है.
  • महल के उत्तर में ग्रीष्म विलास तथा दक्षिण में शरद् विलास का निर्माण हुआ है.
  • इस महल के समीप ही ‘मरियम की कोठी’ एक छोटी इमारत है.
  • मरियम के महल में फारसी विषयों से संबंधित भिति चित्र बनाए गए हैं.
  • सुल्तान के महल पर पंजाब के काष्ठ निर्माण कला का प्रभाव है.

पंचमहल

  • ‘हवा महल’ के नाम से भी विदित पिरामिड के आकार वाले इस स्मारक की पाँच मंजिलें हैं.
  • महल के खम्भों पर फूल-पत्तियों तथा रूद्राक्ष के दानों से सुन्दर सजावट की गई है.
  • इस महल में हिन्दू धर्म तथा बौद्ध विहारों का स्पष्ट प्रभाव दिखायी देता है.

बीरबल का महल

  • इस महल का निर्माण मरियम के महल की शैली पर किया गया है.
  • इस महल की दो मंजिलें हैं.
  • महल के छज्जे कोष्ठकों पर आधारित हैं.
  • छज्जों में कोष्ठकों का प्रयोग इस इमारत की विशेषता है.

खास महल

  • इस महल का प्रयोग अकबर द्वारा व्यक्तिगत आवासगृह के रूप में किया जाता था.
  • महल के चारों कोनों पर 4 छतरियों का निर्माण किया गया था.
  • महल के दक्षिण में शयनगार था जिसमें 4 दरवाजे लगे थे.
  • महल के उत्तरी हिस्से में ‘झरोखा दर्शन’ की व्यवस्था की गई थी.

तुर्की सुल्तान की कोठी 

  • यह एक मंजिल की छोटी तथा आकर्षक इमारत है.
  • इमारत के अन्दर की दीवारों पर पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों की चित्रकारी की गई है.
  • इसके अलंकरण में काष्ठकला का प्रभाव है.
  • यह इमारत रूकिया बेगम या सलीमा बेगम के लिए बनवाई गई थी.
  • पर्सी ब्राउन इसे ‘कलात्मक रत्न’ तथा ‘स्थापत्य कला का मोती’ कहते हैं.

दीवान-ए-आम

  • यह इमारत ऊँची कुर्सी पर निर्मित खंभों पर निकली हुई बरामदों की आयताकार कक्ष है.
  • इसमें मनसबदारों एवं उनके नौकरों के लिए मेहराबी बरामदे बने हैं.
  • इसके बरामदे में लाल पत्थर से बना अकबर का दफ्तरखाना है.
  • दीवाने आम में अकबर अपने मंत्रियों से सलाह-मशविरा करता था.

दीवान-ए-खास

  • 47 फीट वर्गाकार यह भवन हिन्दू एवं बौद्ध कला शैली से प्रभावित है.
  • भवन के मध्य में बने एक ऊँचे चबूतरे पर बादशाह अकबर अपने कर्मचारियों की बहस को सुनता था.
  • यही भवन अकबर का इबादतखाना था, जहाँ प्रत्येक बृहस्पतिवार की शाम को वह विभिन्न धर्मों के धर्माचार्यों से चर्चाएँ करता था.
  • दीवान-ए-खास के उत्तर में ‘कोषागार’ का निर्माण तथा पश्चिम में एक वर्गाकार चंदोवा जैसा ‘ज्योतिषी की बैठक का निर्माण किया गया है.
  • अबुल फज़ल भवन, सराय, हिरन मीनार, शाही अस्तबल आदि फतेहपुर सीकरी के अन्य निर्माण थे.

जामा मस्जिद

  • 542 फीट लम्बी तथा 438 फीट चौड़ी आयताकार यह मस्जिद मुक्का की प्रसिद्ध मस्जिद से प्रेरित है.
  • इस मस्जिद के मध्य में शेख सलीम चिश्ती का मकबरा, उत्तर में इस्लाम खाँ का मकबरा तथा दक्षिण में बुलन्द दरवाजा निर्मित है.
  • इसी मस्जिद से अकबर ने 1582 ई. में ‘दीन-ए-इलाही’ की घोषणा की थी.
  • फग्र्युसन ने इसे ‘पत्थर में रूमानी कथा’ कहा है.

शेख सलीम चिश्ती का मकबरा

  • 1571 ई. में जामा मस्जिद के अहाते में इस मकबरे का निर्माण कार्य शुरू हुआ.
  • इसका निर्माण लाल एवं बलुआ पत्थर से किया गया है.
  • बाद में जहाँगीर ने लाल बलुआ पत्थर के स्थान पर संगमरमर लगवाया.
  • मकवरे की फर्श रंग-बिरंगी है.
  • इस मकबरे के बारे में पर्सी ब्राउन ने कहा कि-

“इसकी शैली इस्लामी शैली की बौद्धिकता तथा गांभीर्य की अपेक्षा मंदिर निर्माता की स्वतंत्र कल्पना का परिचय प्रदान करती है.”

बुलन्द दरवाजा

  • गुजरात विजय के उपलक्ष्य में अकबर ने जामा मस्जिद के दक्षिणी द्वारा पर बुलंद दरवाजा का निर्माण करवाया.
  • लाल एवं बलुआ पत्थर से निर्मित जमीन की सतह से इसकी ऊँचाई 176 फीट है.
  • इसका मेहरावी मार्ग दक्षिण विजय के उपलक्ष्य में बनवाया गया था, जो इसकी विशेषता है.
  • इसके दरवाजे पर एक लेख है जिसके द्वारा अकबर ने मानव समाज को विश्वास, भाव एवं भक्ति का संदेश दिया है.

इस्लाम खाँ का मकबरा

  • यह मकबरा शेख सलीम चिश्ती के मकबरे के दक्षिण में स्थित है.
  • इस मकबरे में ‘वर्णाकार मेहराब’ का प्रयोग हुआ है.
  • वर्णाकार मेहराब का प्रयोग का पहला उदाहरण है.

लाहौर का किला

  • 1570 से 1585 तक फतेहपुर सीकरी मुगल साम्राज्य की राजधानी रही.
  • इसके पश्चात् उजबेकों के आक्रमण का सामना करने के लिए अकबर लाहौर लौटा.
  • यहाँ पर उसने लाहौर किला का निर्माण करवाया.
  • यह किला आगरा में वने जहाँगीरी महल से प्रेरित है.
  • एकमात्र अंतर यह है कि किले के कोष्ठकों पर हाथी एवं सिंहों की आकृति तथा छज्जों पर मोर की आकृतियाँ उकेरी गई

इन इमारतों के अतिरिक्त अकबर ने 1583 में 40 स्तंभों वाला ‘इलाहाबाद का किला’, 1581 में ‘अटक का किला’ आदि का निर्माण करवाया.

अकबर के निर्माण में मुगल काल के पूर्व की शाही शैली तथा गुजरात, मालवा, और चंदेरी की आंचलिक शैलियों का संयोजन है.

जहाँगीर शासनकाल में वास्तुकला

  • जहाँगीर ने स्थापत्य कला से अधिक रूचि चित्रकारी तथा बाग-बगीचों में ली.
  • फिर भी उसने स्थापत्य के क्षेत्र में कुछ उत्कृष्ट निर्माण करवाए.

अकबर का मकबरा

  • सिकन्दरा स्थित इस मकबरे की योजना स्वयं सम्राट अकबर ने तैयार की थी, किन्तु जहाँगीर ने इसे 1612 ई. में अंतिम रूप से पूर्ण करवाया.
  • यह मकबरा पिरामिड के आकार का है तथा इसमें पाँच मंजिलें हैं .
  • उपरी मंजिल का निर्माण संगमरमर द्वारा जहाँगीर ने करवाया.
  • प्रवेश-द्वार बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित है.
  • इस मकबरे के प्रवेश द्वार तीन हैं, किन्तु दक्षिणी द्वार का ही अधिक प्रयोग होता है.
  • फग्र्युसन ने इस मकबरे के बारे में कहा है कि —

“यदि इस मकबरे की पाँचवीं मंजिल के ऊपर गुम्बद बनाने की योजना सफल हो गई होती तो यह मकबरा ताजमहल के बाद द्वितीय स्थान प्राप्त करता.”

  • पूरा मकबरा उद्यान के बीच विशाल चबूतरे पर स्थित है.
  • इसकी ऊँचाई 100 है.

 

एतमादुद्दौला का मकबरा .

  • इस मकबरे का निर्माण 1626 ई. में नूरजहाँ बेगम ने करवाया था.
  • मुगलकालीन वास्तुकला की यह प्रथम इमारत है जो पूर्ण रूप से सफेद संगमरमर से निर्मित है.
  • सर्वप्रथम इसी इमारत में ‘पित्रा ड्यूरा’ का प्रयोग किया गया.
  • मकबरे के अंदर सोने एवं अन्य रत्नों से जड़ावट का काम किया गया है.
  • मकबरे के अन्दर निर्मित एतमादुद्दौला एवं उसकी पत्नी की कद्रे पीले किस्म के कीमती पत्थर से निर्मित है.
  • पर्सी ब्राउन के अनुसार, “आगरा में यमुना नदी के तट पर स्थित एतमादुद्दौला का मकबरा अकबर एवं शाहजहाँ की शैलियों के मध्य एक कड़ी है.”
  • इस मकबरे पर ईरानी प्रभाव अधिक है.

मरियम-उज-जमानी का मकबरा

  • सिकन्दरा में स्थित यह मकबरा अकबर के मकबरे से दो फर्लाग की दूरी पर है.
  • इसका निर्माण लाल-पत्थर एवं ईंटों से किया गया है.
  • मकबरे का मध्य भाग सफेद संगमरमर से निर्मित है.

जहाँगीर के समय में ही अब्दुर्रहीम खानखाना के मकबरे का निर्माण ईरानी शैली में हुआ है.

शाहजहाँ शासनकाल में वास्तुकला

  • शाहजहाँ का काल सफेद संगमरमर के प्रयोग में चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया.
  • शाहजहाँ का काल स्थापत्य के क्षेत्र में स्वर्ण काल माना जाता है.
  • संगमरमर जोधपुर के मकराना से लिया जाता था.
  • पर्णिल या नक्काशी युक्त मेहराबें, बंगाली शैली के मुड़े हुए कंगूरे, जंगले के खम्भे आदि शाहजहाँ के निर्माण की विशेषता है.

मोती मस्जिद

  • शाहजहाँ द्वारा 1654 ई. में आगरा में इस मस्जिद का निर्माण करवाया.
  • यह आगरा के किले की सर्वोत्कृष्ट इमारत है. दीवान-ए-आम 1627 ई. में शाहजहाँ द्वारा आगरा के किले में इसका निर्माण करवाया.
  • शाहजहाँ के काल का यह प्रथम निर्माण था, जो संगमरमर से बना था.
  • इसमें शाहजहाँ के लिए मयूर सिंहासन रखा गया था, जिसे तख्त-ए-ताउस कहा गया है.

दीवान-ए-खास

  • शाहजहाँ द्वारा इसका निर्माण 1637 ई. में आगरा के किले में करवाया गया था.
  • संगमरमर से निर्मित फर्श तथा स्वर्ण एवं रंगों से सजे मेहराब वाली इस इमारत में केवल अमीर एवं उच्चाधिकारी ही आ सकते थे.
  • इस इमारत की अंदर की छत चाँदी की बनी थी तथा उसमें संगमरमर, सोने और बहुमूल्य पत्थरों की मिली-जुली सजावट थी.
  • दीवान-ए-खास पर एक अभिलेख है —

‘ अगर फिरदौस बररूयीं जमीं हमीं अस्त, उ हमीं अस्त, उ हमीं अस्त .’

अर्थात् पृथ्वी पर कही परमसुख का स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, दूसरा कोई नहीं.

मुसम्मन बुर्ज

  • आगरा किला में खास महल के उत्तर में निर्मित यह इमारत छह मंजिली है.
  • इसका निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था.
  • इस बुर्ज में शाही परिवार की स्त्रियाँ पशुओं का युद्ध देखा करती थीं.
  • इस बुर्ज में जहाँगीर ने हाथी पर सवार राणा अमर सिंह एवं उनके पुत्र करण सिंह की मूर्तियों का निर्माण करवाया था.
  • बाद में औरंगजेब ने इन मूर्तियों को ध्वस्त करवा दिया.

 

  • शाहजहाँ ने खास महल का निर्माण सफेद संगमरमर से हरम की स्त्रियों के लिए करवाया था.
  • झरोखा दर्शन, अंगूरी वाग, शीश महल, नगीना मस्जिद, मच्छी भवन, नहर-ए-बहिश्त आदि आगरा के किले के अंदर के अन्य महत्वपूर्ण निर्माण थे.

जामा मस्जिद 

  • शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा ने 1648 ई में आगरा के किले में, लकड़ी एवं ईंट से निर्मित, इस मस्जिद का निर्माण करवाया था.
  • इस मस्जिद को ‘मस्जिदे-जहाँ-नामा’ भी कहा जाता है.

ताज महल (Taj Mahal)

  • एल. मुखर्जी ने ताज महल (Taj Mahal) के बारे में लिखा है कि-

“शाहजहाँ अपनी प्रिय पत्नी मुमताजमहल की समाधि पर निर्मित, भव्य एवं आकर्षक मकबरा-विश्वविख्यात ताजमहल, मुगलकला का सर्वोत्कृष्ट पुष्प है.”

  • इसका निर्माण ‘उस्ताद ईसा खाँ’ (शाहजहाँ की देख-रेख में) द्वारा सम्पन्न करवाया गया था.
  • मकबरे की योजना ‘उस्ताद अहमद लाहौरी‘ ने तैयार की थी.
  • शाहजहाँ ने लाहौरी को ‘नादिर-उल-अस्र’ की उपाधि प्रदान की थी.
  • ताज के निर्माण में सहायता के लिए लाहौरी ने बगदाद तथा शिराज से हस्तकला विशेषज्ञ, कुस्तुनतुनिया से गुम्बदकला विशेषज्ञ, बुखारा से फूल-पत्ते की खुदाई विशेषज्ञ, समरकन्द से शिखर निर्माण एवं बाग-बगीचा निर्माण विशेषज्ञों को बुलाया था.
  • ताज में भारत, ईरान तथा मध्य एशिया की भवन निर्माण शैलियों का सामंजस्यपूर्ण संयोजन हुआ है.
  • ताज का रूपांकन तथा कार्यान्वयन पूर्णतया नवीन नहीं था.
  • इसके कुछ विशेष तत्व शेरशाह और हुमायूँ के मकवरों में उपलब्ध हैं.
  • इसके अंदर के भाग में पित्रा ड्यूरा शैली का बखूबी प्रयोग हुआ है.
  • अर्जूमन्द बानू बेगम (मुमताज महल)की स्मृति में बने ताजमहल का निर्माण कार्य 1631 ई. में आरंभ हुआ तथा 1653 ई. में सम्पन्न हुआ.
  • हैवेलने ताजमहल को भारतीय नारीत्व की साकार प्रतिमा कहा है.
  • कला इतिहासकार वेन बेगले के अनुसार, —

“यह मकबरा सम्राट् की पत्नी की यादगार न होकर ईश्वरीय सिंहासन और बहिश्त की प्रतिकृति है.”

शाहजहाँनाबाद (लाल किला)

  • शाहजहाँ ने अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली लाने के लिए यमुना के दाहिने तट पर 1638 ई. में शाहजहाँनावाद नाम के एक नगर की नींव रखी.
  • इस नगर (पुरानी दिल्ली) में एक चतुर्भुज के आकार का एक ‘लाल किला’ नाम के एक किले का निर्माण करवाया.
  • लाल किले का निर्माण कार्य 1648 ई. में पूर्ण हुआ.
  • इस किले के निर्माण में लगभग एक करोड़ रुपये खर्च हुए.
  • 3100 फीट लम्बे तथा 1650 फीट चौड़े इस किले का निर्माण हमीद तथा अहमद नामक वास्तुकारों के निर्देशन में हुआ.
  • इस किले के पश्चिमी दरवाजे का नाम ‘लाहौरी दरवाजा’ तथा दक्षिणी दरवाजे का नाम ‘दिल्ली दरवाजा’ है.

जामा मस्जिद

  • दिल्ली की प्रसिद्ध जामा मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ द्वारा 1648 ई. में करवाया गया.
  • ऊँचे चबूतरे पर बनी इस मस्जिद में शाहजहाँनी शैली में फूलदार अलंकरण की मेहराबें बनी हैं. 

 

शीस महल, नहर-ए-बहिश्त, मोती महल, हीरा महल आदि लाल किला के अन्दर बनी इमारतें थीं.

दीवाने आम, शाह बुर्ज, शीश महल, नौलखा महले, ख्वाबगाह निर्माण कार्य लाहौर के किले में शाहजहाँ द्वारा करवाए गए.

शाहजहाँ के काल में ही कश्मीर में शालीमार बाग एवं निशांत बाग फारसी शैली में बनाए गए थे.

औरंगजेब शासनकाल में वास्तुकला

  • औरंगजेब के काल में बहुत थोड़े भवनों का निर्माण हुआ.
  • जो भी निर्माण कार्य हुए उनमें से एक को भी श्रेष्ठ इमारत नहीं कहा जा सकता.

मोती मस्जिद

  • 1659 ई. में दिल्ली की मोती मस्जिद के अधूरे निर्माण कार्य को पूरा करवाया.

बादशाही मस्जिद

  • 1674 ई. में उसने लाहौर में ‘बादशाही मस्जिद’ का निर्माण करवाया.

बीबी का मकबरा

  • 1678 ई. में उसने भी बेगम रबिया दुर्रानी की स्मृति में औरंगाबाद में एक मकबरे का निर्माण करवाया.
  • यह मकबरा ‘बीबी का मकबरा’ के नाम से प्रसिद्ध है.
  • यह ताजमहल की फूहड़ नकल है.

औरंगजेब के बाद के इमारतों में सफदरजंग (अवध के दूसरे नवाव) का मकबरा दिल्ली में 1753 ई. में बना.

मुगल काल में चित्रकला (Painting in Mughal period)

  • मुगल चित्रकला शैली मुख्यतः फारसी या ईरानी चित्रकला से प्रभावित है, जो स्वयं में चीनी, बौद्ध, भारतीय, वैक्ट्रियाई तथा मंगोलियाई चित्रकला शैलियों की विशेषताओं का समिश्रण थी .
  • इस चित्रकला का प्रेरणा स्रोत ‘समरकन्द’ एवं हेरात रहा है.

बाबर के समय में चित्रकला

  • बेहजाद, जिसे ‘पूर्व का राफेल’ कहा जाता है, को तैमूर चित्रकला शैली को चरमोत्कर्ष पर ले जाने का श्रेय जाता है.
  • बेहजाद बाबर के समय का महत्वपूर्ण चित्रकार था.
  • अपनी आत्मकथा बाबरनामा या जुजुक-ए-बाबरी में बेहजाद की प्रशंसा की गई है.

हुमायूँ के समय में चित्रकला

  • अफगानिस्तान एवं फारस में अपने निर्वासन के दौरान मीर सैयद अली (बेहजाद का अनुयायी) तथा अब्दुस समद नामक दो ईरानी चित्रकारों की सेवाएँ प्राप्त की.
  • भारत लौटने पर वह दोनों चित्रकारों को साथ लाया.
  • प्रवास के दौरान हुमायूँ की अस्थाई राजधानी काबुल में अब्दुस समद द्वारा बनाई गई कछ कलाकृतियाँ जहाँगीर की ‘गुलशन चित्रावली’ में संकलित हैं.
  • इन्हीं दोनों चित्रकारों ने हुमायूँ तथा अकबर को चित्रकला की शिक्षा दी तथा अकबर के लिए एक उन्नत कला संगठन की स्थापना की.
  • इन्हीं दोनों चित्रकारों को फारसी भाषा की विख्यात कृति ‘दास्तान-ए-अमीर-हम्जा या ‘हम्जनामा’ के चित्र बनाने के लिए नियुक्त किया गया.
  • मुगल चित्रशाला की इस प्रथम कृति में लगभग 1200 चित्र (12 भागों में विभाजित–प्रत्येक भाग में लगभग 100 पृष्ठ) हैं.
  • इस संग्रह में लाल, नीला, पीला, हरा, काला एवं कासनी रंगों का प्रयोग मिलता है.

अकबर  के समय में चित्रकला

  • अबुल फज़ल ने आईने अकबरी में अकबर के दरबार से संबंधित 17 चित्रकारों का उल्लेख किया है, जिनमें मीर सैयद तथा अब्दुस समद के अतिरिक्त-दसवंत, बसावन, मिशिकीन, केशवलाल,मुकुंद, फारुक कमलक, महेश, माधो जगन, खेमकरण, तारा, सांवल, हरिवंश एवं राम शामिल हैं.
  • हस्तलिपियों में किए गए चित्रांकनों द्वारा लगभग एक सौ पचास चित्रकारों के नाम दिखते हैं.
  • अब्दुस समद ने अन्य चित्रकारों को ईरानी सूक्ष्म चित्रकारी की सभी तकनीकी विशेषताओं से अवगत कराया.
  • दसवंत एक साधारण कलाकार की हैसियत से कार्य आंरभ किया तथा बाद में ‘साम्राज्य का प्रथम अग्रणी कलाकार बना.
  • दसवंत द्वारा बनाए गए चित्र ‘रज्मनामा’ नामक पाण्डुलिपि में मिलते हैं.
  • दसवंत की अन्य दो कृतियाँ हैं-तूतीनाम एवं खानदान-ए-तैमुरिया .
  • बाद में दसवंत मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया तथा 1584 ई. में उसने आत्महत्या कर ली.

 

  • बसावन को चित्रकला के सभी क्षेत्रों में-रेखांकन, रंगों के प्रयोग, भू-दृश्य,छवि चित्रकारी आदि-में महारत हासिल था इसलिए इसे अकबर के समय का सर्वोत्कृष्ट कृति–एक दुबले पतले घोड़े के साथ मजनू का निर्जन एवं उजाड क्षेत्र में भटकता हुआ चित्र था.
  • भित्ति चित्रकारी की शुरुआत पहली बार अकबर के काल में ही हुई.
  • सन् 1580 में अकबर के दरबार में पहली बार जेस्रस्ट पुरोहितों का आना हुआ और उन्होंने अकबर को पालीग्लाट वाइवल की एक प्रति भेंट की, जिसपर कुछ नक्काशी थी.
  • उसके बाद यूरोपीय चित्र दरबार में लाए गए और उन्हें जिज्ञासा के साथ परखा गया.
  • इसी के प्रभाव से मुगल चित्रकारों ने भी रोशनी और छाया का प्रयोग शुरू किया.
  • आसमान को बादलों और सूर्यास्त द्वारा ज्यादा वास्तविक बनाया गया.
  • 1595 के बाद मुगल चित्रकारी में पश्चिमी प्रभाव का समन्वय दिखता है, जिसमें तीन आयाम वाले आकार छायांकन भी शामिल हैं.
  • तूतीयानामा तथा अनवर-ए-सुहैली प्रत्येक चिड़िया व जानवर को एक विशेष वास्तविकता के साथ दर्शाते हैं.

जहाँगीर के समय में चित्रकला

  • जहाँगीर ने अन्य कलाओं की अपेक्षा चित्रकला में अधिक रुचि ली.
  • इसके काल में मुगल चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई.
  • जहाँगीर ने अकबर के शासन काल में ही आकारिजा-जो हेरात का प्रसिद्ध चित्रकार था–के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रणशाला की स्थापना की.
  • उसने हस्तलिखित ग्रंथों की चित्रकारी के लिए प्रयोग करने की पद्धति को समाप्त किया तथा उसके स्थान पर छवि चित्रों, प्राकृतिक दृश्यों आदि के प्रयोग की पद्धति को अनाया.
  • इसके काल में प्रमुख चित्रकार थे-आकारिजा का पुत्र अबुल हसन, बिशनदास, मनोहर, दौलत, फारुख बेग, मधु, अनंत, गोवर्द्धन तथा उस्ताद मंसूर, जिन्होंने मुगल चित्रकारी को चरम सीमा पर पहुँचाया.
  • इस काल में यूरोपीय प्रभाव के चलते रंग थोड़े हल्के और पहले से कम चमकदार हो गए.
  • विशेषकर प्राकृतिक दृश्यों में रंगों का मिश्रण अच्छी तरह किया जाने लगा.
  • जिन प्रमुख पुस्तकों का चित्रांकन हुआ वे थीं-इयार-ए-दानिश तथा अनवर-ए-सुहेली.

 

  • जहाँगीर के निर्देश पर दौल्त ने अपने साथी चित्रकार बिसन दास, अबुल हसन, गोवर्द्धन के छविचित्र तथा स्वयं अपना एक छवि चित्र बनाया.
  • अपने समय के अग्रणी चित्रकार विसनदास को फारस के शाह के दरबार में-उसके अमीरों तथा परिजनों के यथारूप छवि चित्र बनाने के लिए भेजा.
  • मनोहर ने कई छवि चित्रों का निर्माण किया.
  • जहाँगीर के काल की चित्रकारी से संबंधित एक महत्वपूर्ण घटना थी-मुगल चित्रकाल की पारसी प्रभाव से मुक्ति .
  • जहाँगीर ने अपने श्रेष्ठ कलाकारों-मंसूर को ‘नादिर-उल-अप्त’ तथा अबुल हसन को ‘नादिर-उल-अज्मा’ की उपाधि प्रदान की.
  • मंसूर दुर्लभ पशुओं, विरले पक्षियों एवं अनोखे पुष्पों की चित्रकारी में सिद्ध हस्त था.
  • उसकी महत्वपूर्ण कृति में ‘साइबेरिया का बिरला सारस’ एवं बंगाल का एक पुष्प है.
  • जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि –

“कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो या जीवित, मैं यह देखते ही तुरंत बता सकता हूँ कि यह किस चित्रकार की कृति है. यदि किसी चेहरे पर आँख किसी एक चित्रकार ने, भौंह किसी और ने बनाई हो तो भी यह जान लेता हूँ कि आँख किसने बनाई है और भौंह किसने बनाई है.”

  • जहाँगीर के समय में चित्रकारों ने सम्राट के दरबार, युद्ध स्थल, हाथी पर बैठकर धनुष-बाण के साथ शिकार का पीछा करना, प्राकृतिक-दृश्य, फूल, पौधे, पशु, पक्षी, चीता, घोड़े, शेर आदि को अपना विषय बनाया.

शाहजहाँ के समय में चित्रकला

  • अपने आरंभिक वर्षों में शाहजहाँ ने चित्रकारों को पूरी आजादी दे रखी थी, किन्तु उसकी रुचि में परिवर्तन के कारण चित्रकारों की संख्या में कटौती कर दी.
  • मुहमद फकीर एवं मीर हासिम उसके प्रमुख चित्रकार थे.
  • उसे दैवी संरक्षण में खुद का चित्र बनवाना हमेशा से प्रिय रहा.
  • शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह, चित्रकला का पोषक था, किन्तु उसकी अकाल मृत्यु ने इस कला को छिन्न-भिन्न कर डाला.

औरंगजेब के समय में चित्रकला

  • औरंगजेब ने चित्रकारी को इस्लाम के विरुद्ध मानकर इससे घृणा की.
  • उसने चित्रकला को संरक्षण नहीं दिया, किन्तु शासन के अंतिम दिनों इस कला में थोड़ी रुचि ली.
  • परिणामस्वरूप उसके कुछ लघु चित्रों में शिकार करते हुए, दरबार लगाते हुए तथा युद्ध करते हुए दिखाया गया है.
  • कुछ चित्रों में उसे हाथ में कुरान लेकर बैठा हुआ दिखाया गया है.
  • अंततः मुगल दरबार के चित्रकारों को अन्यत्र स्वतंत्र राज्यों में पलायन करना पड़ा.

मुगल काल में संगीत कला (Music in Mughal period)

  • संगीत के विकास में अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ का विशेष योगदान रहा.
  • अकबर के समय एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन उसके नवरत्नों में से एक था.
  • वह ‘ध्रुपद’ का महान गायक था.
  • तानसेन के अतिरिक्त गोपाल, हरिदास, सूरदास, वैज बक्श आदि भी प्रसिद्ध ध्रुपद गायक थे.
  • अबुल फजल ने तानसेन के बारे में कहा है कि –

“पिछले एकहजार वर्षों से भारत में उनके जैसा संगीतज्ञ नहीं हुआ.”

  • अबुल फज़ल के ‘आइने-अकबरी’ में 36 उत्कृष्ट संगीतज्ञों के नाम मिलते हैं.
  • ध्रुपद गायन शैली और वीणा का प्रचार अकबर के काल में ही हुआ.
  • अकबर के सर्वाधिक प्रसिद्ध गायकों में तानसेन और बाजबहादुर थे.
  • तानसेन ने राजा मानसिंह द्वारा स्थापित ग्वालियर के संगीत विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की.
  • हरिदास तानसेन के गुरु थे.
  • ग्वालियर के सूफी संत मुहम्मद गौस की प्रेरणा से तानसेन ने इस्लाम धर्म अंगीकार कर लिया था.

 

  • अकबर ने तानसेन को ‘कण्डाभरणवाणीविलास’ की उपाधि प्रदान की थी.
  • कालान्तर में ध्रुपद गायन शैली का स्थान ‘ख्याल गायकी’ ने ग्रहण कर लिया.
  • अबुल फज़ल ने बाजबहादुर के बारे में कहा था कि “वह संगीत; विज्ञान एवं हिन्दी गीत में अपने समय का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति था.”
  • बाजबहादुर मालवा का शासक था.
  • ‘राम सागर’ ग्रंथ की रचना अकबर के दरबार में की गई थी.

 

  • जहाँगीर के दरबार के मुख्य कलाकारों में तानसेन के पुत्र विलास खाँ, छतर खाँ एवं हमजान थे.
  • जहाँगीर ने एक प्रसिद्ध गजल गायक ‘शौकी’ को आनन्द खाँ की उपाधि दी.
  • शाहजहाँ ने विलास खाँ के दामाद लाल खाँ को ‘गुन समन्दर’ की उपाधि प्रदान की.

 

  • औरंगजेब के काल में संगीत को दबा दिया गया, फिर भी फकीरुल्लाह ने ‘मान कुतूहल’ का अनुवाद रोगदर्पण के नाम से अनुवाद कर औरंगजेब को अर्पित किया.

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