Monday, October 15, 2018

औरंगजेब आलमगीर (1658-1707 ई.) Aurangzeb Alamgir Muhi-ud-Din Muhammad

औरंगजेब आलमगीर (1658-1707 ई.) Aurangzeb Alamgir Muhi-ud-Din Muhammad

औरंगजेब (1658-1707 ई.) Aurangzeb

  • मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब का जन्म 16 अक्टूबर, 1610 ई. में ‘उज्जैन’ के निकट ‘दोहाट’ नामक स्थान पर मुमताज महल के गर्भ से हुआ था.
  • शीघ्र ही उसने कुरान, अरबी, फारसी, तुर्की तथा हिन्दी अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया.
  • सैनिक शिक्षा में भी उसने योग्यता प्राप्त की.
  • 16 वर्ष की आयु में उसने बड़ा मनसब प्राप्त किया.
  • बुन्देलखण्ड के राजा जुझार सिंह के विद्रोह का उसने दमन किया.

औरंगजेब आलमगीर (1658-1707 ई.) Aurangzeb Alamgir Muhi-ud-Din Muhammad

  • 1636 ई. से 1644 ई. तक तथा 1652 ई. में 1658 ई. तक औरंगजेब दक्षिण का राज्यपाल रहा.
  • वह मुल्तान (1640 ई.) तथा गुजरात (1645 ई.) का गवर्नर भी रहा.
  • अपने भाइयों से निपटने के पश्चात् औरंगजेब ने 31 जुलाई, 1658 ई. को आगरा में सिंहासनारोहण किया तथा अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन औरंगजेब ने दिल्ली में प्रवेश किया तथा जून, 1659 ई. में उसका दूसरी बार राज्याभिषेक हुआ.

प्रारम्भिक प्रबन्ध

  • राज्यप्राप्ति के युद्ध के कारण देश में गड़बड़ी फैली हुई थी.
  • व्यापार और कृषि पर बहुत कुप्रभाव पड़ा.
  • अतः औरंगजेब ने सर्वप्रथम अनेक करों तथा ‘राहदारी’, ‘पिण्डारी’ अर्थात् “भूमिकर’ तथा ‘गृहकर’ आदि लगभग 18 करों को समाप्त किया.
  • खाफी खाँ ने इनमें से केवल 14 करों का उल्लेख किया है.
  • उसने सिक्कों पर ‘कलमे’ का लिखा जाना बन्द करवा दिया, जिससे गैर-मुस्लिमों छूए जाने से यह अपवित्र न हो जाए.
  • उसने फारस के ‘नौरोज’ के त्यौहार का मनाया जाना बन्द करवाया तथा प्रजा के चरित्र की निगरानी करने हेतु ‘मुहतसिब’ नियुक्त किए.

पूर्वी सीमान्त पर युद्ध (1661-66 ई.)

  • दिसम्बर, 1661 ई. में बिहार के राज्यपाल दाऊद खाँ ने पोलमन जीता.
  • मीर जुमला को बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • उसने कूचबिहार व असम को जीता.
  • वह चीन पर आक्रमण करना चाहता था, किन्तु मार्च, 1663 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
  • शाईस्ता खाँ को दक्षिण से बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • उसने पुर्तगाली और बर्मी समुद्री लुटेरों का दमन किया तथा जनवरी 1666 ई. में अराकान के राजा से चाटगाँव प्राप्त किया.
  • 1662 ई. में औरंगजेब सख्त बीमार हुआ और लगभग एक मास तक वह चारपाई पर पड़ा रहा.
  • थोड़ा स्वस्थ होकर वह स्वास्थ्य लाभ हेतु कश्मीर गया.
  • बर्नियर भी उसके साथ था, जिसने इस यात्रा का रोचक वर्णन किया.

उत्तर पश्चिमी सीमान्त नीति

  • इस प्रदेश के प्रति औरंगजेब ने राजनैतिक और आर्थिक कारणों से उदार नीति अपनाई.
  • आरम्भ में औरंगजेब ने यहाँ के विद्रोही मुस्लिम कबीलों को धन देकर शान्त करने का असफल प्रयत्न किया.
  • 1667 ई. में यूसुफियों ने अपने नेता भागू के नेतृत्व में विद्रोह किया जिसे दबा दिया गया.
  • 1672 ई. में अकमल खाँ के नेतृत्व में अफरीदियों ने विद्रोह किया.
  • खुशहाल खाँ के नेतृत्व में ‘खट्क’ भी अफरीदियों से आ मिले.
  • 1674 ई. में मुगल सेनापति शुजात खाँ युद्ध में मारा गया.
  • जुलाई, 1674 ई. में हसन अब्दाल ने शस्त्र, शक्ति व कूटनीति से परिस्थिति को काबू में कर दिया.
  • अफगानिस्तान के मुगल राज्यपाल अमीर खाँ ने भी इन लोगों के प्रति समझौते की नीति अपनाई.
  • खुशहाल खाँ अपने पुत्र के विश्वासघात के कारण बन्दी बनाया गया.

डा. यदुनाथ सरकार के अनुसार

“अफगान-युद्ध शाही खजाने के लिए तो तबाही का कारण था ही किन्तु इसका राजनैतिक प्रभाव और भी अधिक हानिकारक था.”

औरंगजेब और मुस्लिम जगत

  • औरंगजेब ने 1661 से 1667 ई. तक मक्का के इमाम, फारस, बल्ख, बुखारा, एबीसिनिया, काशगर, खिवा और शहरीनाऊ के राजाओं और बसरा, यमन, मोचा, हदरामात के राज्यपालों के दूतों का स्वागत किया.
  • कुस्तुनतुनिया का राजदूत 1690 ई. में आया.

तपस्वी औरंगजेब (??)

  • औरंगजेब ने अपने शासन काल में अनेक नियमों आदि में परिवर्तन किए.
  • उसने अपने शासन काल की गणना के लिए शाही-गौर-वर्ष समाप्त कर दिया.
  • दरबार में गाना-बजाना तथा सार्वजनिक संगीत सम्मेलनों को भी बन्द करवा दिया.
  • ‘झरोखा दर्शन’ की परिपाटी तथा अपने शासन काल के 12वें वर्ष में उसने सोना-चाँदी व अन्य वस्तुओं से अपना तुलादान किया जाना बन्द कर दिया.
  • विजय दशमी तथा अन्य कई हिन्दू त्यौहार व उत्सवों पर रोक लगा दी तथा राज ज्योतिषियों तथा खगोल-पण्डितों को पदच्युत कर दिया.
  • दरबार से चाँदी के धूपदान व कलमदान हटा दिए गए. भाँग पीने, वैश्यावृत्ति और जुआ खेलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया.
  • उसने तत्कालीन वेश-भूषा पर भी प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास किया.
  • दाढ़ी तथा पायजामों की लम्बाई कानूनन निर्धारित की गई. जरी के कपड़े पहनने मना थे. सन्तों आदि की कब्रों पर दीपक जलाने बन्द करवा दिए गए. 1669 ई. में औरंगजेब में ‘मुहर्रम’ मनाना बन्द करवा दिया. हिन्दुओं को उच्च पदों पर नियुक्ति नहीं दी जाती थी.

हिन्दू विरोधी नीति

  • औरंगजेब ने हिन्दू मन्दिरों को नष्ट करने की आज्ञा जारी की.
  • अतः 1665 ई. में गुजरात में, 1666 ई. में मथुरा के केशवदेव मन्दिर का ‘कटघरा’ (दारा शिकोह द्वारा निर्मित), 1669 ई. में उड़ीसा, मुलतान, सिन्ध, बनारस आदि में मन्दिरों को तुड़वाया.
  • उदयपुर में लगभग 235 मन्दिर तथा अम्बेर (जयुपर) में लगभग 66 मन्दिर तोड़े गए.
  • हरिद्वार तथा अयोध्या में भी अनेक मन्दिर तोड़े गए.
  • हिन्दुओं के विरुद्ध अनेक दण्ड-विधेयक लागू किए गए.
  • अकबर द्वारा हटाया गया तीर्थ यात्रा कर तथा 1679 ई. में जजिया फिर से हिन्दुओं पर थोप दिया गया.
  • 1665 ई. में हिन्दुओं के ‘होली के त्यौहार पर प्रतिबन्ध लगाया गया.
  • इसी वर्ष मुसलमानों पर बन्दरगाहों पर हिन्दुओं से आधा टैक्स लगाया गया.
  • 1694 ई. में एक आज्ञानुसार मराठों और राजपूतों को छोड़ कर अन्य हिन्दुओं के लिए ईरानी घोडा, हाथी अथवा पालकी की सवारी प्रतिबन्ध लगा दिया.
  • 1702 ई. में हिन्दुओं को अंगूठियों पर हिन्दू देवी-देवताओं के नाम खुदवाने की मनाही की गई.
  • 1703 ई. में हिन्दुओं को अहमदाबाद में साबरमती के तट पर मुर्दो की अन्त्येष्टि पर प्रतिबन्ध लगाया गया.
  • हिन्दुओं को मुस्लिमों जैसी वेश-भूषा धारण करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया.

डा. यदुनाथ सरकार के अनुसार, औरंगजेब के आन्तरिक अनुशासन का सर्वप्रथम रूप यह था कि उसने अपने पूर्वजों की ‘अ-मुस्लिम’और अन्य राजाओं के प्रति नीति को पूर्णतः उलट दिया और इस नीति के कारण ही उसकी मृत्यु के पश्चात् मुगल साम्राज्य का इतना शीघ्र पतन हो गया.

हिन्दू विरोधी नीति के प्रभाव

राजपूतों से युद्ध, (1679-81 ई.)

  • दिसम्बर, 1678 ई. में जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह की मृत्यु के पश्चात् औरंगजेब ने उसकी दो विधवाओं को बन्दी बना कर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया.
  • दुर्गादास के नेतृत्व में जुलाई, 1679 ई. में राजपूतों ने विद्रोह कर दिया.
  • औरंगजेब ने अजमेर से मुगल सेना भेजी व जोधपुर पर अधिकार कर लिया गया.
  • 1681 ई. में शाहजादा अकबर ने विद्रोह किया व राजपूतों से जा मिला .
  • औरंगजेब ने शाहजादा अकबर व राजपूतों में फूट डलवानी चाही मगर पूर्ण रूप से सफल न हुआ.
  • 1683 ई. में शाहजादा दक्षिण से फारस भाग गया.
  • 1681 ई. में औरंगजेब को राजपूतों से सन्धि करनी पड़ी.
  • यह माना जाता है कि यदि औरंगजेब ने राजपूतों से शत्रुता न की होती तो सम्भवतः दक्षिण में वह अधिक सफल हुआ होता.
  • उल्लेखनीय है कि राजपूतों और मुगलों में 1681 ई. से संघर्ष निरन्तर उस समय तक चलता रहा जब तक 1709 ई. में, बहादुर शाह ने अजीत सिंह को मेवाड़ का एकमात्र छत्राधिपति स्वीकार नहीं कर लिया.
  • 1681 ई. से 1687 ई. तक अजीत सिंह गुप्त रूप से युद्ध करता रहा.
  • 1687 ई से 1701 ई. तक दुर्गादास और अजीत सिंह ने बंदी और हाड़ाओं की सहायता से इस स्वातन्त्रय युद्ध का संगठन और संचालन किया.
  • 1701 ई. से 1708 ई. तक यह संघर्ष अपने अन्तिम चरण में प्रविष्ट हुआ.

सतनामियों का विद्रोह

  • सतनामी मूलतः हिन्दू साधूओं का एक युद्धप्रिय मत था.
  • नारनौल और मेवाड़ इनके मुख्य केन्द्र थे.
  • मुगलों से इनके संघर्ष का तत्कालीन कारण एक मुगल पैदल सैनिक द्वारा एक सतनामी की हत्या तथा सतनामियों द्वारा उस मुगल प्यादे की हत्या था.
  • शीघ्र इस झगड़े ने धार्मिक रूप लिया व यह हिन्दुओं का औरंगजेब के विरुद्ध स्वातन्त्रय संग्राम बन गया.
  • नारनौल का फौजदार भी पराजित हुआ.
  • अन्त में मुगल सेनापतियों रदनदाज खाँ आदि ने सतनामियों का दमन किया.

गोकुल का विद्रोह

  • मथुरा में जाटों ने तिलपत के एक जमींदार गोकुल के नेतृत्व में विद्रोह करके यहां के फौजदार अब्दुलनबी खाँ (1660-69 ई.) का वध करके सादाबाद का परगना लूट लिया.
  • औरंगजेब स्वयं जाटों के विरुद्ध बढ़ा.
  • गोकुल सपरिवार पकड़ा गया तथा उसका वध कर दिया गया.
  • मथुरा के नए फौजदार ने भी जनता पर अत्याचार किए.
  • अतः 1686 ई. में जाटों ने राजाराम के नेतृत्व में एक बार पुनः विद्रोह किया.
  • उन्होंने 1688 ई. में सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे को लूट लिया.
  • राजाराम एक युद्ध में मारा गया तथा 1691 ई. में जाटों के कई गढ़ों पर कब्जा कर लिया गया.
  • किन्तु जाटों ने चड़ामन के नेतृत्व में अपना संघर्ष औरंगजेब के सारे जीवन भर जारी रखा.

बुन्देले

  • 1602 ई. में वीर सिंह बुन्देला ने अकबर के विरुद्ध खुला विद्रोह किया था.
  • किन्तु बुन्देलों की छापामार युद्ध नीति के कारण अकबर इसे दण्ड देने में असफल रहा.
  • चम्पतराय ने औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह किया.
  • किन्तु उस पर इतना भयंकर आक्रमण किया गया कि उसे आत्महत्या करनी पड़ी.
  • उसके चार पुत्रों में से छत्रसाल ने कालान्तर में छत्रपति शिवाजी के पद चिन्हों पर चलकर मुगल सत्ता की अवहेलना करने की ठानी.
  • उसने अनेक विजयें प्राप्त की और पूर्वी मालवा में एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना करने में सफल हुआ.
  • 1731 ई. में यह बुन्देलखण्ड से मुगल शासन को पूर्णतः उखाड़ कर मर गया.

सिक्ख

  • औरंगजेब ने सिक्खों के प्रति भी संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण अपनाया.
  • सिक्खों के नौवें गुरु तेगबहादुर को 1695 ई. में उसके द्वारा प्रस्तुत मुसलमान बनने के प्रस्ताव को ठुकराए जाने के कारण बहुत यातनाएं देकर मार डाला गया.
  • दसवें गुरु गोबिन्द सिंह ने धर्म की रक्षा हेतु “खालसा‘ का संगठन सैनिक संस्था के आधार पर किया .
  • कहा जाता है कि जब औरंगजेब की मृत्यु निकट थी, उसने सदव्यवहार का आश्वासन देकर गुरु गोबिन्द सिंह को बुलाया.
  • गुरु अभी मार्ग में ही थे कि 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हो गई.
  • 1708 ई. में गुरु गोबिन्द सिंह की एक अफगान ने छुरा मारकर हत्या कर दी.
  • इनके उत्तराधिकारी बन्दाबहादुर ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा.

औरंगजेब की दक्षिण नीति

  • दक्षिण के प्रति औरंगजेब ने आक्रमक व विजयात्मक नीति का अनुसरण किया.
  • दक्षिण के युद्धों का ध्येय मराठों की शक्ति को नष्ट करना तथा बीजापुर और गोलकुण्डा राज्यों को जीतना था.
  • 1567 ई. में बीजापुर के उत्तरपूर्व में कल्याणी और बीदर को विजय किया गया.
  • 1660 ई. में घूस देकर दूर उत्तर में ‘परिन्दा’ प्राप्त किया,
  • जुलाई 1668 की सन्धि द्वारा शोलापुर प्राप्त किया और फिर
  • नलदुर्ग और कुलबुर्गा प्राप्त किया.
  • इस प्रकार भीमा और पूर्व की ओर मंजरा नदी और बीदर से कुलबुर्गा तक काल्पनिक रेखा से घिरा हुआ विशाल प्रदेश मुगलों के हाथों में चला गया और शाही राज्य की दक्षिणी सीमा हलसाँगी के सामने भीमा के तट तक पहुँच गई.
  • यह सीमा बीजापुर से काफी दूर और दक्षिण पूर्व में गोलकुण्डा राज्य की पश्चिमी सीमा पर स्थिति मालखेड दुर्ग को छूती थी.

औरंगजेब और मराठे

  • 1663 ई. में छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध मुगल सेनापति शाइस्ताखाँ असफल रहा.
  • उसके बाद शाहजादा मुअज्जम और राजा जयसिंह को भेजा गया.
  • जयसिंह ने 1665 ई.में शिवाजी को पोरबन्दर की सन्धि के लिए बाध्य कर दिया.
  • 1666 ई. में शिवाजी को आगरा में मुगल दरबार में उपस्थित होना पड़ा.
  • 1680 ई. में छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के पश्चात् औरंगजेब ने छत्रपति सम्भाजी के विरुद्ध युद्ध किया व उसे पकड़ कर मार डाला.
  • छत्रपति सम्भाजी के पुत्र शाहू को कैद कर लिया गया जो 1708 ई. में मुक्त हुआ.
  • 1689 ई. में सम्भाजी की हत्या के बाद राजाराम ने 1700 ई. तक मराठों का संघर्ष जारी रखा.
  • उसके पश्चात् उसकी विधवा ताराबाई ने यह संघर्ष सफलतापूर्वक चलाया.
  • भरसक प्रयत्न करने पर भी औरंगजेब मराठों के विरोध का दमन करने में असफल रहा.

औरंगजेब और अंग्रेज

  • सर थोमस रो के समय अंग्रेज व्यापारियों ने मुगल सम्राट् के प्रति मित्रता की नीति अपनाई.
  • 1616 ई. में अंग्रेजों को मछलीपट्टनम में एक कारखाना स्थापित करने की अनुमति मिल गई.
  • 1639 ई. में फ्रांसीसी डे ने चन्द्रगिरि के राजा से थोड़ी-सी भूमि पट्टे पर ले ली.
  • शाहजहाँ ने 1650-51 में अंग्रेजों को हुगली और कासिम बाजार में कारखाने बनाने की आज्ञा दे दी.
  • औरंगजेब के समय दक्षिण में फैली अर्थव्यवस्था व असुरक्षा की स्थिति के कारण अंग्रेजों ने अपने स्थानों की किलेबन्दी कर ली.
  • 1685 ई. में शाइस्ता खाँ द्वारा अंग्रेजों के व्यापार पर स्थानीय रूप से टैक्स लगाये जाने पर अंग्रेजों ने विरोध किया, किन्तु मुगल सेनाओं ने उन्हें पराजित किया तथा 1688 ई. में अंग्रेज व्यापारियों को सूरत, मछलीपट्टनम और हुगली छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा.
  • बंगाल के नए राज्यपाल ने हुगली के अंग्रेजी कारखाने के उच्चाधिकारी चॉरनौक को शाही फारमान द्वारा एक छोटी-सी बस्ती बसाने की आज्ञा दे दी.
  • यह छोटी-सी बस्ती बाद में आधुनिक नगर कलकत्ता बन गई.

औरंगजेब और उसके पुत्र

  • औरंगजेब ने कभी अपने पुत्रों पर विश्वास नहीं किया.
  • शाहजादा अकबर को विद्रोह करके फारस भाग जाना पड़ा.
  • सबसे बड़े शाहजादे सुलेमान को अपने चाचा शाहशुजा से सहानुभूति जताने व उसकी पुत्री से शादी करने के कारण 18 वर्ष कैद में रहना पड़ा.
  • शाहजादा मुअज्जम को भी बीजापुर व गोलकुण्डा के शासकों से सहानुभूति जताने के कारण 1687 ई. से 1695 ई. तक कैद में रखा गया.
  • सबसे छोटे शाहजादे को भी कैद में रखा गया.

पश्चाताप और मृत्यु 

  • औरंगजेब ने सदैव अपने पुत्रों को अपने से दूर रखा और वह उनकी गतिविधियों को शंका की दृष्टि से देखता था.
  • जीवन के अन्तिम समय पर उसने अपने पुत्रों को बहुत पश्चाताप भरे पत्र लिखे.
  • इन पत्रों के विषय में स्मिथ का विचार है कि औरंगजेब को कठोर आलोचक भी इस पश्चाताप के दुःख की गहराई मानने से और मृत्यु-शय्या पर अकेले पड़े इस वृद्ध पुरुष के साथ सहानुभूति किए बिना नहीं रहेगा.
  • मार्च, 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हो गई.

मुगल काल के महत्वपूर्ण शासकों के मकबरे

शासक मकबरा
बाबर काबुल
हुमायूँ दिल्ली
अकबर सिकन्दरा (आगरा)
जहाँगीर शाहदरा (लाहौर)
शाहजहाँ आगरा
औरंगजेब खुलताबाद (औरंगाबाद)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Sunday, October 14, 2018

शाहजहाँ | मिर्जा शाहब-उद-दीन बेग मुहम्मद खान खुर्रम (1627-58 ई.) Shahjahan | Khurram

शाहजहाँ | मिर्जा शाहब-उद-दीन बेग मुहम्मद खान खुर्रम (1627-58 ई.) Shahjahan | Mirza Shahab-ud-din Baig Muhammad Khan Khurram

शाहजहाँ (1627-58 ई.) Shahjahan

  • शाहजाहाँ (Shahjahan) के बचपन का नाम खुर्रम था.
  • उसका जन्म 1592 ई. में लाहौर में एक हिन्दू माता के गर्भ से हुआ था.
  • वह बड़ा महत्वाकांक्षी और प्रतिभाशाली व्यक्ति था.
  • 1612 ई. में उसका विवाह आसफ खाँ की पुत्री से हुआ.
  • परन्तु नूरजहाँ की पुत्री का शाहजादा शहरयार से विवाह होने के कारण नूरजहाँ का व्यवहार पक्षपातपूर्ण हो गया.
  • 1622 ई. में शाहजहाँ के विद्रोह का यही कारण था.

शाहजहाँ | मिर्जा शाहब-उद-दीन बेग मुहम्मद खान खुर्रम (1627-58 ई.) Shahjahan | Mirza Shahab-ud-din Baig Muhammad Khan Khurram

  • 1627 ई. में जब जहाँगीर की मृत्यु हुई तो सिंहासन पर बिठाने हेतु नूरजहाँ ने शहरयार का और आसफ खाँ ने शाहजहाँ का पक्ष लिया.
  • शाहजहाँ उस समय दक्षिण में था तथा शीघ्र वहाँ नहीं पहुँच सकता था.
  • परिणामस्वरूप आसफ खाँ ने अन्तरिम प्रबन्ध के रूप में खुसरो के पुत्र दावरबख्श को सिंहासन पर बिठाया.
  • नूरजहाँ ने सार्वजनिक जीवन से अवकाश प्राप्त कर लिया तथा शहरयार को बन्दी बनाया गया.
  • 1628 ई. में शाहजहाँ के आगमन पर उसका राज्याभिषेक हुआ और दावरबख्श को फारस भेज दिया गया.
  • सौभाग्यवश दावरबख्श अपना जीवन बचाने में सफल रहा.
  • शाहजहाँ अपने सभी सम्बन्धियों की हत्या के लिए उत्तरदायी था.
  • 1645 ई. में नूरजहाँ की मृत्यु हुई.

बुन्देला राजपूतों का विद्रोह

  • अबुल फज़ल के हत्यारे वीरसिंह बुन्देला के पुत्र जुझार सिंह ने मुगल अधिकृत प्रदेशों पर आक्रमण करके विद्रोह की धमकी दी, किन्तु उसे पराजित होकर आत्मसमर्पण करना पड़ा.
  • उसे हरजाने के रूप में बहुत सारी धनराशि देनी पड़ी तथा शाहजहाँ (Shahjahan) के अभियानों के समय उसने शाहजहाँ को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया.
  • उसे 4000 जात व 4000 सवारों का खर्चा चलाने हेतु एक जागीर दी गई.
  • 1635 ई. में जुझार सिंह ने एक बार पुनः विद्रोह कर दिया.
  • मुगल सेना ने उसका पीछा किया, किन्तु वह गौंडों से एक अकस्मात् झड़प में मारा गया.

खानजहाँ लोदी का विद्रोह (1628 ई.)

  • खानजहाँ लोदी दक्षिण का प्रधान सेनापति व राज्यपाल था.
  • उसने अहमदनगर के साथ मित्रता करके विद्रोह कर दिया.
  • शाहजहाँ स्वयं 1629 ई. में युद्ध का नेतृत्व करने के लिए दक्षिण की ओर रवाना हुआ.
  • मुगल सेनापति अजीम खाँ खानजहाँ लोदी के लिए बड़ी मजबूत टक्कर थी.
  • खानजहाँ लोदी के साथियों- शाहजी भोसले तथा कालूजी भोसले ने मुगलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.
  • खानजहाँ ने बीजापुर तथा बुन्देलखण्ड के सरदारों से सहायता प्राप्त करने का असफल प्रयास किया.
  • बुन्देलखण्ड के सरदारों ने उसका विरोध किया.
  • फलस्वरूप 1630 ई. में खानजहाँ कालिंज, के किले के निकट युद्ध करता हुआ मारा गया.

1628 के नौरोज

  • 1628 ई. में शाहजहाँ (Shahjahan) ने नौरोज त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया.
  • इस अवसर को पवित्र बनाने का भरसक प्रयत्न किया गया.
  • शाहजहाँ ने अपने कुटुम्बियों को उदारतापूर्वक उपहार दिए.
  • आसफ खाँ को 9000 जात व 9000 सवार का मनसब दिया गया.

1630 ई. का दुर्भिक्ष (Famine)

  • 1630 ई. में दक्षिण, गुजरात और खानदेश में दुर्भिक्ष (Famine) पड़ा.
  • यह दुर्भिक्ष इतना भयानक था कि सहस्त्रों मनुष्य भूख से मर गए.
  • उसके पश्चात् महामारी का प्रकोप हुआ.
  • इससे अनेक ग्राम नष्ट हो गए.
  • डा. वी.ए. स्मिथ के अनुसार सरकार ने जनता का दुःख दूर करने के लिए अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया.
  • अब्दुल हमीद के कथनानुसार सम्राट् ने कर-निर्धारण में लगभग 70 लाख रुपये माफ कर दिए तथा दरिद्रों व निराश्रितों के लिए बहरानपुर, अहमदाबाद व सूरत प्रदेश में दलिया बाँटने के ढाबे तथा लंगर स्थापित किए.

मुमताज महल

  • आसफ खाँ की पुत्री मुमताज महल वास्तव में ताज की रानी थी.
  • शाहजहाँ उससे प्रगाढ़ प्रेम करता था.
  • वह सुन्दरी ही नहीं अपितु, अत्यन्त पतिपरायणा भी थी.
  • वह शाहजहाँ के उसके बुरे दिनों में सहयोगिनी रही .
  • वह अनेक दुःखी व पीड़ित नर-नारियों का आश्रय थी.
  • 1631 ई. में उसकी मृत्यु हुई.
  • शाहजहाँ (Shahjahan) ने उसकी स्मृति में ‘ताजमहल‘ बनवाया.

पुर्तगालियों के साथ युद्ध (1631-32 ई.)

  • पुर्तगाली कारखाने स्थापित होने के कारण हुगली नगर की महत्ता बढ़ गई थी.
  • पुर्तगाली प्रायः हिन्दू और मुसलमानों के अनाथ बच्चों को पकड़कर बलपूर्वक ईसाई बना देते थे.
  • उनका यह कार्य सर्वथा अनुचित था.
  • 1631 ई. में कासिम खाँ को बंगाल का राज्यपाल बना कर पुर्तगालियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की आज्ञा दी गई.
  • पुर्तगालियों को चारों ओर से घेर लिया गया.
  • तीन महीने के घेरे के पश्चात तीव्र अवरोध के बाद पुर्तगालियों ने आत्मसमर्पण कर दिया.
  • 10,000 से अधिक पुर्तगाली मारे गए तथा लगभग 4,000 बन्दी बनाए गए.
  • बन्दियों में से कुछ ने इस्लाम ग्रहण करके अपनी जान बचा ली तथा शेष यातनाएँ भोगते हुए मर गए.
  • उल्लेखनीय है कि शाहजहाँ पुर्तगालियों के प्रति बड़ा द्वेष रखता था.

शाहजहाँ की दक्षिणी नीति

  • समस्त उत्तर भारत पर मुगलों का आधिपत्य हो गया था.
  • अतः शाहजहाँ (Shahjahan) ने भी अपना ध्यान दक्षिण की ओर लगाया .
  • 1632 ई. में सुल्तान हुसैनशाह को बन्दी बनाकर ग्वालियर भेज दिया गया तथा अहमदनगर में निजामशाही वंश का अन्त हो गया.
  • शाहजी भोसले ने निजामशाही राजवंश को पुनर्जीवित करने के लिए राजवंश के अन्य बालक को सिंहासन पर बैठाया.
  • परन्तु उसे भी शाहजहाँ के सम्मुख आत्मसमर्पण करना पड़ा.
  • 1636 ई. में अहमदनगर राज्य को पूर्णतया नष्ट कर दिया गया और उसका प्रदेश शाहजहाँ और बीजापुर के सुल्तान ने आपस में बाँट लिया.

बीजापुर के साथ युद्ध (1631 ई.)

  • बीजापुर के मोहम्मद आदिलशाह ने मुर्ताजा निजाम के साथ मित्रता के सम्बन्ध स्थापित करके मुगल सत्ता की अवहेलना की थी.
  • आसफ खाँ की सेनाओं ने बीजापुर को घेर लिया.
  • मराठों ने बीजापुर को सहयोग दिया.
  • मुगलों का यह प्रयास असफल रहा.
  • 1635 ई. में शाहजहाँ को शाहजी भोसले के विरुद्ध कदम उठाना पड़ा.
  • गोलकुण्डा तथा बीजापुर को शाहजी भोसले की सहायता न करने हेतु शाही-पत्र भेजे गए.
  • गोलकुण्डा के शासक ने यह स्वीकार कर लिया, किन्तु बीजापुर ने शाही आज्ञा मानने से इन्कार किया.
  • अतः मुगल सेना ने खान दौरान के नेतृत्व में बीजापुर की राजधानी को घेर लिया.
  • मुगल बीजापुर के शासक को पराजित नहीं कर सके और उन्होंने आसपास के क्षेत्रों में मार-काट की.
  • अपनी प्रजा की असहाय अवस्था के कारण बीजापुर के शासक को मुगलों से सन्धि हेतु बाध्य होना पड़ा और उसे 20 लाख रु. “शन्ति के उपहार स्वरूप” मुगलों को देने पड़े.

औरंगजेब दक्षिण का राज्यपाल

  • 1636-44 ई. के काल में औरंगजेब दक्षिण का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • उसने इस काल में नासिक के निकट बगलाना को अपने राज्य में मिला लिया और शाहजी भोसले की शक्ति को कम किया.
  • 1656 ई. में दूसरी बार उसे दक्षिण का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • गोलकुण्डा के शासक ने पूर्व में मुगलों से हुई सन्धि (1636 ई.) के अनुसार निर्धारित वार्षिक कर नहीं दिया तथा मीर जुमला की सहायता से अपने राज्य की सीमा बढ़ा दी.
  • 1656 ई. में गोलकुण्डा के शासक को काफी धन राशि और प्रदेश देकर मुगलों से सन्धि करनी पड़ी.
  • उसने अपनी पुत्री का विवाह औरंगजेब के पुत्र से करना तथा अपने दामाद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना स्वीकार किया.
  • बीजापुर के साथ औरंगजेब के सम्बन्ध मित्रतापूर्ण नहीं थे, क्योंकि मोहम्मद आदिलशाह दारा शिकोह का पक्ष लेता था.
  • 1656 ई. में आदिलशाह की मृत्यु के बाद उसका 19 वर्षीय पुत्र सिंहासन पर बैठा.
  • औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण करके बीदर और कल्याणी पर अधिकार कर लिया.
  • बीजापुर का शासक सन्धि के लिए बाध्य हुआ.
  • औरंगजेब का विचार युद्ध अभी और जारी रखने का था, परन्तु शाहजहां की बीमारी के समाचार ने उसे युद्ध बन्द करने व उत्तर की ओर आने के लिए बाध्य कर दिया.

मुगल साम्राज्य को कन्धार की हानि

  • कन्धार 1626 ई. में मुगलों के हाथ से निकल चुका था.
  • फारस के शाह की ओर से अलीमदन खाँ को कन्धार का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
  • 1638 ई. में मुगलों ने कन्धार विजय की तैयारी की; तो अलीमर्दानि खाँ ने फारस के शाह से सहायता हेतु प्रार्थना की, किन्तु फारस के शाह ने भ्रमवश अलीमर्दान को कैद करने का प्रयल किया. अलीमर्दान के लिए यह अपमानजनक बात थी.
  • अतः उसने कन्धार मुगलों को सौंप दिया.
  • मुगल दरबार में उसका स्वागत किया गया और उसे काबुल और कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया.
  • फारसियों ने पुनः कन्धार पर आक्रमण किया व 57 दिन के घमासान युद्ध के पश्चात् 11 फरवरी, 1649 ई. को मुगलों ने आत्म-समर्पण कर दिया.
  • 1649 ई. में औरंगजेब की अधीनता में एक विशाल मुगल सेना ने कन्धार को 3 महीने 20 दिन तक घेरे रखा, किन्तु कोई परिणाम न निकला और मुगल सेना को वापस बुला लिया गया.
  • 1652 ई. में औरंगजेद की अध्यक्षता में दूसरी बार 2 मास 8 दिन तक कुन्धार को घेरे रखा.
  • औरंगजेब के विरोध के बाद भी शाहजहां ने उसे घेरा छोड़ देने की आज्ञा दी.
  • 1653 ई. में शाहजहां के सबसे बड़े पुत्र दारा शिकोह के नेतृत्व में कन्धार विजय हेतु तीसरा अभियान भेजा गया.
  • दारा शोकोह ने गर्व-पूर्वक कहा कि वह कन्धार को एक सप्ताह में ले लेगा.
  • किन्तु उसका घेरा भी महीनों तक चलता रहा और उसके पश्चात् यह प्रयत्न छोड़ देना पड़ा.
  • 1653 ई. के पश्चात् कन्धार को विजय करने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया.
  • कन्धार विजय के असफल प्रयत्नों से मुगलों के सम्मान को धातक चोट पहुंची व लगभग 12 करोड़ से अधिक की धनराशि नष्ट हुई.
  • सर वुल्जले हे के अनुसार कन्धार विजय की असफलता का मुख्य कारण मुगलों की अपने शत्रुओं से हीन सैन्य शक्ति थी.
  • इसमें आश्चर्य नहीं कि 17वीं शताब्दी के शेष काल में फारसी आक्रमण का खतरा भारत के शासकों को सदा ही व्यग्न करता रहा.

बल्ख और बदख्शाँ

  • शाहजहां ने बल्ख तथा बदख्शा को जीतने के लिए 1646 ई. में शाहजादा मुराद तथा अलीमन को और 1647 ई. में औरंगजेब और शाह शुजा को भेजा.
  • किन्तु इस कार्य में भी वे असफल रहे.
  • मुगल इन प्रदेशों पर किसी भी प्रकार से नियन्त्रण करने में असफल रहे.
  • सर यदुनाथ सरकार के अनुसार

” ऐसा युद्ध जिसमें हिन्दुसतानी खजाने से ही साल में 4 करोड़ रुपये खर्च किए और विजित प्रदेश से सिर्फ साढे बाईस लाख की आमदनी वसूल की.”

  • मुगलों को जब-धन की बहुत हानि उठानी पड़ी.

उत्तराधिकार का युद्ध (1657-59 ई.)

  • सितम्बर, 1657 ई. में शाहजहां बहुत बीमार पड़ गया.
  • उसने अपनी अन्तिम वसीयत भी बना दी.
  • उसकी मृत्यु के विषय में अनेक प्रकार की अफवाहें फैल गई.
  • शाहजहां की मुमताज द्वारा उत्पन्न 14 सन्तानों में से 7 जीवित थीं.
  • इनमें से चार पुत्र थे, जोकि उस समय प्रौढ़ अवस्था में थे.
  1. 1657 ई. में दारा शिकोह 43 वर्ष का,
  2. शाहशुजा 41 वर्ष का,
  3. औरंगजेब 39 वर्ष का तथा
  4. मुराद 33 वर्ष का था.
  5. तीन पुत्रियाँ जहान आरा,
  6. रोशन आरा तथा
  7. गोहन आरा थी.
  • जहान जारा ने दारा शिकोह का, रोशन आरा ने औरंगजेब का तथा गोहन आरा ने मुराद का पक्ष लिया .
  • शाहजहां ने दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा इस घोषणा के साथ ही उत्तराधिकारी का युद्ध आरम्भ हो गया.

प्रथम युद्ध (dara shikoh vs shahashja)

  • सर्वप्रथम युद्ध शाहशुजा एवं दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह तथा आमेर के राजा जयसिंह के मध्य 24 फरवरी, 1658 ई. को बहादुर गढ़ में हुआ था.
  • शाह शुजा पराजित हुआ.

दूसरा युद्ध (dara shikoh vs aurangzeb)

  • दूसरा युद्ध 25 अप्रैल, 1658 को दारा शिकोह व औरंगजेब की सेनाओं के मध्य धर्मत के स्थान पर हुआ .
  • दारा इस युद्ध में पराजित हुआ.
  • इस विजय के उपलक्ष्य में औरंगजेब ने फतेहाबाद नामक नगर की स्थापना की.

तीसरा युद्ध (dara shikoh vs aurangzeb)

  • तीसरा युद्ध दारा शिकोह एवं औरंगजेब के मध्य 8 जून, 1658 ई. को सामूगढ़ में हुआ
  • और इसमें भी दारा शिकोह की पराजय हुई.

चौथा व अन्तिम युद्ध (dara shikoh vs aurangzeb)

  • उत्तराधिकार का अन्तिम युद्ध 12-14 अप्रैल, 1659 ई. को दारा व औरंगजेब के मध्य ‘देवराई की घाटी’ में लड़ा गया.
  • दारा को बन्दी बना लिया गया तथा 30 अगस्त, 1659 ई. को उसका वध करवा दिया गया.

शाहजहां (Shahjahan) की कैद और मृत्यु

  • औरंगजेब ने सितम्बर, 1658 ई. में शाहजहां को भी कैद कर लिया.
  • 31 जनवरी, 1666 ई. को 74 वर्ष की अवस्था में कैदी के रूप में ही शाहजहां की मृत्यु हुई.
  • शाहजहां (Shahjahan) को ताजमहल में मुमताज महल के बगल में दफनाया गया.
  • औरंगजेब ने अपने तीनों भाईयों को रास्ते से हटा लिया था.
  • मुराद को दावत पर बुलाकर नशे की अवस्था में उसे बन्दी बना लिया तथा 1661 ई. में ग्वालियर में उसकी हत्या कर दी गई.
  • शाहशुजा पराजित होकर अराकान भाग गया, जहां माघों ने उसकी हत्या कर दी .
  • दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह ने भी विद्रोह कर दिया था.
  • उसे दिसम्बर, 1660 ई. में बन्दी बना लिया गया तथा ग्वालियर के किले में उसे अफीम खिला-खिला कर मार डाला गया.
  • दारा का पुत्र सिफर शिकोह भाग्यशाली निकला.
  • बाद में उसका विवाह औरंगजेब की पुत्री से कर दिया गया.

शाहजहाँ (Shahjahan) के रत्नजड़ित सिंहासन ‘तख्ते-ताऊस’ में विश्व का सबसे मंहगा हीरा ‘कोहिनूर‘ लगा था.

वास्तुकला की दृष्टि से शाहजहाँ (Shahjahan) का शासन काल मध्य कालीन इतिहास का ‘स्वर्णयुग’ कहा गया है.

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Saturday, October 13, 2018

जहाँगीर | मिर्जा नूरुद्दीन बेग मुहम्मद खान सलीम (1605-27 ई.) Jahangir | Mohammad Salim

जहाँगीर | मिर्जा नूरुद्दीन बेग मुहम्मद खान सलीम (1605-27 ई.) Jahangir | Mirza Nur-ud-din Beig Mohammad Khan Salim

जहाँगीर (Jahangir) (1605-27 ई.)

  • ‘मोहम्मद सलीम’ का जन्म 30 अगस्त, 1569 ई. को फतेहपुर सिकरी में ‘शेख सलीम चिश्ती’ की कुटिया में हुआ था.
  • उसकी माता भारमल की पुत्री ‘मारियम उज्जमानी’ थी.
  • अकबर उसे ‘शेखूबाबा’ कह कर पुकारता था.
  • चार वर्ष की अवस्था में सलीम की शिक्षा का अच्छा प्रवन्ध किया गया.
  • उसके शिक्षकों में प्रमुख अब्दुर्रहीम खानखाना था.
  • 13 फरवरी, 1586 ई. में सलीम (जहाँगीर) का विवाह राजा भगवान दास की पुत्री मानबाई से हुआ.

जहाँगीर | मिर्जा नूरुद्दीन बेग मुहम्मद खान सलीम (1605-27 ई.) Jahangir | Mirza Nur-ud-din Beig Mohammad Khan Salim

  • शाहजादा खुसरो मानबाई का ही पुत्र था.
  • उसने राजा उदयसिंह की पुत्री जोधाबाई से भी विवाह किया.
  • उसके रनवास में स्त्रियों की कुल संख्या 800 थी.
  • अकबर की बहुत देखभाल के बावजूद भी सलीम ने तत्कालीन समाज में प्रचलित अनेक बुराइयों को ग्रहण कर लिया.
  • वह मदिरा-पान का आदी हो गया था.
  • 1600 ई. में जब अकबर दक्षिण में असीरगढ़ के किले को जीतने में व्यात था तो शाहजादा सलीम ने खुलेआम विद्रोह करके स्वयं को इलाहाबाद का सम्राट् घोषित कर दिया.
  • 1602 ई. में सलीम ने वीर सिंह बुन्देला से अबुल फज़ल की हत्या करवा दी.
  • किन्तु बाद में अकबर से उसने माफी मांग ली तथा उसे क्षमा कर दिया गया.
  • 1604 ई. को शाहजादा दानियाल की मृत्यु हो गई, अतः सलीम अकबर का इकलौता जीवित पुत्र रह गया.
  • 21 अक्टूबर, 1605 ई. को अकबर ने सलीम को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया.
  • अकबर की मृत्यु के पश्चात् आठवें दिन 3 नवम्बर, 1605 ई. को आगरे के किले में सलीम का राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ.
  • उसने ‘नूरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीर बादशाह गाजी‘ की उपाधि धारण की.

आरम्भिक कार्य

  • सलीम ने “जहाँगीर’ या ‘विश्वविजयी’ की उपाधि धारण की .
  • उसने अनेक बन्दियों को मुक्त कर दिया तथा अपने नाम के सिक्के चलवाए.
  • उसने अपनी नीति की घोषणा निम्नलिखित प्रमुख 12 नियमों में की–
  1.  ‘तमगा’ तथा ‘मीर बाहरी’ कर समाप्त कर दिया गया.
  2. मदिरा तथा अन्य मादक पदार्थों को बनाना तथा बेचना अवैध घोषित किया गया.
  3. व्यापारियों की आज्ञा के बिना उनके सामान की तालाशी लेने की मनाही की गई.
  4. सरकारी कर्मचारियों के किसी के घर पर कब्जा करने के अधिकार पर प्रतिबन्ध .
  5. बिना शाही आज्ञा के कोई सरकारी कलैक्टर या जागीरदार अपने परगने की प्रजा की घरानों से विवाह सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकता.
  6. गरीबों के लिए सरकारी औषधालय खोले गए.
  7. अंग-भंग (नाक-कान काटना आदि) दण्ड समाप्त कर दिया गया.
  8. किसानों की भूमि पर जबरन अधिकार करने पर रोक लगाई गई.
  9. गुरुवार (जहाँगीर के राज्याभिषेक का दिन) तथा रविवार (अकबर के जन्मदिन) को पशु हत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया.
  10. किसी मृतक व्यक्ति का कोई उत्तराधिकारी न होने की अवस्था में उसकी सम्पत्ति को सार्वजनिक कार्यों में लगाने की घोषणा की गई.
  11. सड़कों के किनारे सराय, मस्जिद व कुओं आदि का निर्माण करवाया गया.
  12. उन कर्मचारियों को, जो अकबर के समय से कार्यरत थे, उनको पदों पर स्थाई कर दिया गया.
  • जहाँगीर ने आगरे के किले की शाह बरजी के मध्य ‘न्याय की जंजीर’ (जो शुद्ध सोने की बनी थी तथा लगभग 30 गज लम्बी थी) और यमुना के किनारे एक पत्थर का स्तम्भ स्थापित करने की आज्ञा दी ताकि दुःखी जनता अपनी शिकायतों को सम्राट् के सम्मुख रख सके.
  • ‘इन्तेखाब-ए-जहाँगीर शा’ में जहाँगीर के गुजरात के जैनियों के प्रति कठोर व्यवहार का वर्णन दिया गया है.

शाहजादा खुसरो का विद्रोह, (1606 ई.)

  • जहाँगीर(Jahangir) के सम्राट् बनने के पाँच महीने पश्चात् ही उसके सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने अपने मामा मानसिंह, एवं ससुर अजीज कोका की सलाह पर विद्रोह कर दिया.
  • हुसैन बेग तथा लाहौर का दीवान अब्दुल रहीम भी उसके साथ हो लिए.
  • शाहजादा खुसरो ने तरन तारन में सिक्खों के पांचवें गुरु अर्जुन देव का आशीर्वाद लिया तथा सहायता भी प्राप्त की.
  • जहाँगीर की शाही सेनाओं ने जालन्धर के निकट भैरावाल में विद्रोहियों को पराजित किया.
  • खुसरो पकड़ा गया.
  • उसे बन्दी बना लिया गया.
  • सिक्खों के गुरु अर्जुनदेव को भी तलवार से मौत के घाट उतारा गया.
  • 1607 ई. में जहाँगीर को खुसरो की ओर से एक षड्यन्त्र की भनक पड़ गई और उसने शाहजादा खुसरो को अन्धा करवा दिया.
  • 1620 ई. में उसे शहाजादा खुर्रम (शाहजहाँ) को सौंप दिया गया.
  • शाहजादा खुर्रम ने अपने दक्षिण अभियान के समय 1621 ई. में खुसरो की हत्या करवा दी .

नूरजहाँ

  • जहाँगीर(Jahangir) के इतिहास में नूरजहाँ की कथा को एक प्रमुख स्थान प्राप्त है.
  • वह तेहरान के निवासी ग्यास- बेग की पुत्री थी.
  • ग्यासबेग एक धनी व्यापारी ‘‘मलिक मसूद” की संरक्षता में भारत आया.
  • कन्धार में उसके एक पुत्री उत्पन्न हुई.
  • मलिक मसूद ने ग्यासबेग का परिचय अकबर से करवाया तथा वह कालान्तर में काबुल के दीवान के पद पर आसीन हुआ.
  • उसकी पुत्री ‘मेहरुन्निसा‘ का विवाह 17 वर्ष की आयु में फारस के एक साहसी युवक अली कुलीबेग इस्तगलू से हुआ.
  • उसे बंगाल की जागीर तथा ‘शेर अफगान’ की उपाधि दी गई.
  • जहाँगीर को पता लगा कि शेर अफगन शाही आदेशों का उल्लंघन करता है तथा विद्रोही होता जा रहा है.
  • बंगाल के नए राज्यपाल कुतुबुद्दीन को शेर अफगन के विरुद्ध भेजा गया, किन्तु वह मारा गया.
  • शेर अफगन भी कुतुबुद्दीन के अंगरक्षकों के हाथों मारा गया.
  • 1607 ई. में शेर अफगन की विधवा मेहरुन्निसा को आगरा ला कर सुल्ताना सलीमा बेगम की संरक्षता में रखा गया.
  • 1611 ई. में जहाँगीर ने उससे विवाह कर लिया तथा उसे “नूर-महल’ की उपाधि दी.
  • बाद में यह उपाधि “नूरजहाँ” अर्थात “संसार का प्रकाश” कर दी गई.
  • नूरजहाँ का इतना प्रभाव था कि उसकी आज्ञा के विना शासन का कोई भी कार्य नहीं हो सकता था.
  • उसका प्रभाव बढ़ता गया और शासन की वास्तविक शक्ति उसे हाथ में आ गई.
  • अब उसी के नाम से सिक्के चलने लगे व शाही फरमानों पर उसी के हस्ताक्षर होने लगे.
  • उसने एक कुशल प्रशासिका एवं महान् कूटनीतिज्ञ होने का परिचय दिया.
  • कुशल शासिका होने के साथ वह उदार हृदय और दीन-दुखियों की सेवा करने वाली महिला थी.
  • उसकी बुद्धि कुशाग्र, स्वभाव कोमल तथा ज्ञान गम्भीर था.

मेवाड़ का युद्ध

  • 1597 ई. में राणा प्रताप की मृत्यु के पश्चात् राणा अमर सिंह उसका उत्तराधिकरी बना.
  • जहाँगीर(Jahangir) ने अपने शासन काल में 1605 ई. में शाहजादा परवेज के अधीन मेवाड़ के विरुद्ध सेना भेजी.
  • आसफ खाँ तथा जफर बेग भी शाहजादे के साथ थे.
  • ‘वेवार के दर्रे ’ में राणा अमर सिंह तथा मुगल सेना के मध्य संघर्ष हुआ.
  • किन्तु इसका कोई परिणाम नहीं निकला. 1608 ई. में महावत खाँ तथा 1609 ई. में अन्ला खाँ को अमरसिंह के ‘विरुद्ध’ भेजा गया, किन्तु उसने भी कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं किया.
  • 1614 ई. में शाहजादा खुर्रम को अमरसिंह के विरुद्ध भेजा गया.
  • घोर युद्ध के पश्चात् राजपूतों को सन्धि करनी पड़ी.
  • अमरसिंह के साथ कृपापूर्ण व्यवहार किया गया.
  • अकबर के समय से जीता हुआ सारा प्रदेश उसे लौटा दिया गया.
  • उसे यह भी आश्वासन दिया गया कि उसे स्वयं दरबार में नहीं जाना पड़ेगा.
  • अमरसिंह के पुत्र कर्णसिंह को पाँच हजारी मनसबदार बना दिया गया.
  • कहा जाता है कि जहाँगीर ने अजमेर के मूर्तिकारों द्वारा बनाई गई अमरसिंह और कर्णसिंह की आदम-कद मूर्तियों को आगरा के शाही बाग में ठीक “झरोखे’ के नीचे स्थापित करवाया.

किश्तवार की विजय (1622 ई.)

  • अकबर के समय किश्तवार पर अधिकार करने का प्रयत्न किया गया था, किन्तु वह असफल रहा.
  • कश्मीर के राज्यपाल दिलावर खाँ ने 1620 ई. में किश्तवार के राजा को जहाँगीर के सामने पेश किया.
  • राज्यपाल के अत्याचारों से तंग आकर जनता ने विद्रोह कर दिया.
  • विद्रोह का दमन करने के लिए एक बड़ी सेना भेजी गई और 1622 ई. में यहाँ शान्ति स्थापित हो गई.

अहमदनगर से युद्ध (1610-20 ई.)

  • अकबर ने अहमदनगर से निजामशाही वंश का अन्त कर दिया था.
  • जहाँगीर(Jahangir) के समय मलिक अम्बर नामक अबीसीनिया निवासी ने इस वंश की पुनः स्थापना की.
  • उसे उस युग के सर्वश्रेष्ठ सेनानायकों और शासकों में से एक माना जाता है.
  • उसने मराठों को छापामार युद्ध का प्रशिक्षण दिया.
  • मलिक अंबर ने शाहजादा खुसरों के विद्रोह का लाभ उठाकर अब्दुर्रहीम खानखाना की सेना पर आक्रमण करके 1610 ई. में अहमदनगर पुनः प्राप्त कर लिया.
  • खानखाना को वापस बुलाकर खानेजहाँ को मलिक अम्बर के विरुद्ध भेजा गया.
  • किन्तु वह भी असफल रहा. 16 16 ई. में गुजरात से शाही सेना खानेजहाँ के सहायोग हेतु भेजी गयी, किन्तु फिर भी कोई परिणाम नहीं निकला. 1616 ई. में शाहजादा खुर्रम को मलिक के साथ सन्धि करनी पड़ी.
  • खुर्रम को सम्राट् ने शाहजहाँ’ की उपाधि दी तथा 30,000 जात और 20,000 सवारों का मनसब दिया.
  • बहुत खुशियाँ मनाई गई, किन्तु वास्तव में न तो अहमदनगर को जीता गया और न मलिक अम्बर की शक्ति का दमन हुआ.
  • 1629 ई. तक, जब तक मलिक अम्बर जीवित रहा,यही परिस्थिति बनी रही.

कन्धार का मामला

  • कन्धार को अकबर ने मुगल साम्राज्य का अंग बनाया था.
  • 1605 ई. में शाहजादा खुसरो के विद्रोह के समय फारस के शासक शाह अब्बास ने खुरासान के सरदार को कन्धार पर आक्रमण हेतु उकसाया.
  • किन्तु उसका आक्रमण असफल रहा.
  • शाह अब्बास ने जहाँगीर ने इस विषय में पूर्ण अनभिज्ञता प्रकट की.
  • कालान्तर में शाह अब्बास ने जहाँगीर का ध्यान कन्धार की ओर से हटाने के लिए 1611 ई, 1615 ई., 1616 ई. तथा 1620 ई. में बहुत-सी भेट व खुशामदी पत्र देकर आगरा मुगल दरबार में भेजे.
  • 1621 ई. में शाह अब्बास ने बड़ी सेना के साथ कन्धार पर चढ़ाई कर दी.
  • जहाँगीर(Jahangir) ने शाहजहाँ (खुर्रम) को सेना का नेतृत्व करने हेतु कहा, किन्तु उसने सम्भवतः शासन में नूरजहाँ के प्रभाव के कारण सेना का नेतृत्व करने से इन्कार कर दिया और विद्रोह कर दिया.
  • अतः शाह अब्बास ने आसानी से 45 दिन के घेरे के बाद कन्धार जीत लिया.
  • जहाँगीर ने शाहजादा परवेज को कन्धार पर आक्रमण करने की आज्ञा दी, किन्तु आसफ खाँ के कहने पर आज्ञा रद्द कर दी गई. फलतः जहाँगीर के शासन काल में कन्धार जीता नहीं जा सका.

प्लेग की महामारी

  • 1616 ई. में प्लेग की महामारी सरहिन्द, दोआबा और दिल्ली आदि स्थानों में फैली .
  • जहाँगीर(Jahangir) ने स्वयं इस महामारी का उल्लेख किया है कि आठ वर्ष तक यह महामारी देश का नाश करती रही.
  • सन् 1618-19 ई. में आगरा में प्लेग फैला और आस-पास के प्रदेशों में भी छा गया.
  • इससे लगभग 100 आदमी रोज मर जाते थे.
  • अमीर तथा गरीब सब ही इससे पीड़ित हुए.
  • इतना सब होने पर भी राज्य की ओर से इसकी रोकथाम के लिए कुछ भी नहीं किया गया.

शाहजहाँ का विद्रोह, (1623-25)

  • शाहजहाँ ने शाह अब्बास के विरुद्ध कन्धार जाने की अपेक्षा विद्रोह कर दिया.
  • जहाँगीर तथा शाहजादा खुर्रम (शहजहाँ) के मध्य ‘बलोचपुर’ के स्थान पर युद्ध हुआ.
  • शाहजहाँ पराजित होकर दक्षिण की ओर भागा.
  • बुरहानपुर होता हुआ वह 1624 ई. में बंगाल पहुंचा.
  • उसने मुगल अधिकारियों के सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के कारण बंगाल और बिहार पर अधिकार कर लिया.
  • शाहजादा परवेज तथा महावत खाँ ने शाहजहाँ को पराजित किया तथा शाहजहाँ फिर दक्षिण की ओर भाग गया.
  • 1625 ई. में शाहजहाँ व जहाँगीर में समझौता हो गया.
  • शाहजहाँ ने रोहतास और असीरगढ़ समर्पण करना स्वीकार कर लिया तथा औरंगजेब और दारा शिकोह को जमानत के रूप में शाही दरबार में भेजा.

जहाँगीर की मृत्यु (1627 ई.)

  • अत्यधिक शराब पीने से जहाँगीर अस्वस्थ था.
  • वह स्वास्थ्य को कश्मीर और काबुल में रहकर सुधारने के प्रयत्न में था.
  • जब वह कश्मीर से काबुल जा रहा था तो अत्यधिक सर्दी के कारण लाहौर की ओर लौट गया.
  • किन्तु मार्ग में ही 7 नवम्बर, 1627 ई. को भीमवार नामक स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई.
  • उसके शव को “जहाँगीर के मकबरे” में शाहदरा (लाहौर) में दफनाया गया.
  • जहाँगीर(Jahangir) के दरबार में विलियम हॉकिन्स (1608 ई.), विलियम फिंच, सर थॉमस रो (1615 ई.) एवं एडवर्ड टैरी जैसे यूरोपीय यात्री आये थे.
  • जहाँगीर के पांच पुत्र थे-
  1. खुसरो,
  2. परवेज,
  3. खुर्रम(शहजहाँ),
  4. शहरयार तथा 
  5. जहाँदार.

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अकबर महान् (जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर) Jalal-ud-din Muhammad Akbar

अकबर महान् (जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर) (1556-1605 ई.) Jalal-ud-din Muhammad Akbar

अकबर महान्

  • 23 नवम्बर, 1542 ई. के विकट परिस्थितियों में हमीदा बानू बेगम के गर्भ से अकबर का जन्म हुआ था.
  • हुमायूँ शरणार्थी की दशा में भटक रहा था.
  • अकबर का बचपन क्रमशः उसके चाचा अस्करी तथा कामरान के यहाँ बीता.
  • अकबर पर्याप्त शिक्षा प्राप्त न कर सका, किन्तु यह सैनिक और प्रशासनिक कार्यों में निपुण हो गया.
  • 1551 ई. में मात्र 9 वर्ष की आयु में अकबर को हुमायूँ ने मूनीम खाँ के संरक्षण में गजनी का गवर्नर नियुक्त किया.
  • 1555 ई. में हुमायूँ ने उसे लाहौर का गवर्नर बना दिया.

अकबर महान् (जलाल-उद-दीन मुहम्मद अकबर) (1556-1605 ई.) Jalal-ud-din Muhammad Akbar

  • हुमायूँ की मृत्यु होने पर बैरम खाँ ने ‘कलानौर’ (गुरुदासपुर-पंजाब) में 14 फरवरी, 1556 ई. को अकबर का राज्याभिषेक कर दिया.
  • उधर दिल्ली में हेमू ने मुगल गवर्नर तार्दीवेग खाँ को मार भगाया और दिल्ली पर अधिकार कर लिया.
  • ऐसी स्थिति में अनेक सरदारों ने बैरम खाँ को अकबर सहित गजनी भाग जाने की सलाह दी.
  • किन्तु बैरम खाँ और अकबर ने मुगल सेना सहित दिल्ली की ओर कूच किया .

पानीपत का दूसरा युद्ध

  • यह युद्ध अकबर और हेमू के मध्य 9 नवम्बर, 1556 ई. को पानीपत के मैदान में हुआ.
  • आरम्भ में हेमू की सेना मुगलों पर भारी पड़ी, किन्तु दुर्भाग्यवश हेमू की आँख में तीर लग गई तथा उसकी सेना में भगदड़ मच गई.
  • हेमू को पकड़ कर उसका वध कर दिया गया तथा अकबर की विजय हुई तथा मुगल वंश की पुनः स्थापना की गई.

मेवात की विजय

  • हेमू की मृत्यु के पश्चात् बैरम खाँ ने मेवात पर विजय प्राप्त की तथा वहाँ की सारी सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया.

सिकन्दर सूरी पर आक्रमण

  • सिकन्दर सूरी को पराजित करके बैरम खाँ ने 1557 ई. में मानकोट के दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
  • इन विजयों के अतिरिक्त अकबर ने बैरम खाँ के संरक्षण में 1558 ई. से 1560 ई. तक अजमेर, जौनपुर तथा ग्वालियर पर भी अधिकार कर लिया.

पेटीकोट शासन (1560-64 ई.)

  • बैरम खाँ के पतन के पश्चात् 1560 ई. से 1564 ई. तक शासन में अकबर के सम्बन्धियों और हरम की स्त्रियों का बहुत अधिक प्रभाव रहा.
  • इसी शासन काल को अनेक इतिहासकारों ने ‘पेटीकोट शासन’ का नाम दिया है.

अकबर की विजयें

मालवा की विजय

  • 1560 ई. में अकबर ने बाजबहादुर से ‘मालवा प्रदेश जीत कर पीर मुहम्मद को सौंपा.
  • किन्तु बाजबहादुर ने मालवा पर फिर अधिकार कर लिया. 1562 ई. में अकबर ने फिर मालवा के विरुद्ध विशाल सेना भेजी.
  • बाजबहादुर ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली और मालवा मुगल साम्राज्य का अंग बन गया.

गोंडवाना की विजय

  • 1564 ई. में अकबर ने रानी दुर्गावती को पराजित करके गोंडवाना प्रदेश पर अधिकार कर लिया है.

चित्तौड़ की विजय

  • 1568 ई. में अकबर ने राणा सांगा के पुत्र उदयसिंह को पराजित करके मेवाड़ के रणथम्भौर प्रसिद्ध दुर्ग चित्तौड़ को जीत लिया.
  • उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात् महाराणा प्रताप ने अकबर के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा.

रणथम्भौर तथा कालिंजर की विजय

  • 1569 ई. में अकबर ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया.
  • यहाँ के शासक राणा सूजान राय ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली.

राणा प्रताप के विरुद्ध युद्ध

  • मेवाड़ के राणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से इन्कार कर दिया.
  • 1567 ई. में राजपूतों (राणा प्रताप) तथा मुगल सेना के मध्य हल्दी घाटी का प्रमुख युद्ध हुआ.
  • राजपूत शक्ति को बहुत क्षति पहुंची.
  • किन्तु फिर भी उन्होंने मुगलों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा और अन्त तक मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की.

गुजरात की विजय

  • 1572 ई. में अकबर गुजरात के विरुद्ध बड़ा .
  • यहाँ के शासक मुजफ्फर खाँ तृतीय ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली.

बिहार और बंगाल की विजय

  • 1576 ई. में अकबर ने टोडरमल के नेतृत्व में बिहार तथा बंगाल के विरुद्ध सेना भेजी.
  • यहाँ के शासक दाऊद खाँ को पराजित करके यह प्रदेश मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया.

काबुल की विजय

  • 1585 ई. में अकबर ने अपने सौतेले भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम की मृत्यु के पश्चात् काबुल पर भी अपना अधिकार कर लिया.

कश्मीर पर अधिकार

  • 1586 ई. में अकबर ने राजा भगवानदास की सहायता से कश्मीर पर अधिकार कर लिया.

सिन्ध और कन्धार की विजय

  • अकबर ने 1591 ई. में सिन्ध और 1596 ई. में कन्धार पर विजय प्राप्त की.

अहमदनगर की विजय

  • 1600 ई. में अकबर ने मुराद और खानखाना के नेतृत्व में अमदनगर के विरुद्ध सेना भेजी.
  • मुगल सेनाओं ने वहाँ के शासक निजाम शाह को बन्दी बना लिया और अहमदनगर पर अधिकार कर लिया.

खानदेश की विजय

  • 1601 ई. में खानदेश के शासक मिर्जा बहादुर को पराजित करके इस पर अधिकार कर लिया गया.
  • इस प्रकार अकबर ने अनेक विजयें कीं तथा उसका साम्राज्य हिमालय से नर्मदा नदी तक विस्तृत हो गया.

अकबर के समय हुए विद्रोह

उजबेगों का विद्रोह

  • उजबेग पुराने अमीर थे.
  • अब्दुल्ला खाँ, खानजमाँ या अलीकुली खाँ, आसफ खाँ, बहादुर खाँ, इब्राहिम खाँ, अवध का सूबेदार खाने आलम आदि इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे.
  • 1564 ई. में अब्दुल्ला खाँ ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया.
  • कालान्तर में अन्य उजबेग सरदार भी उससे मिल गए.
  • 1565 ई. में खानजमों ने भी विद्रोह कर दिया तथा आसफ खाँ भी उससे जा मिला.
  • अकबर ने खानजमाँ के विरुद्ध सेना भेजी, किन्तु मुगल सेना को 1565 ई. में मुँह की खानी पड़ी.
  • अकबर ने दूसरी बार स्वयं सेना का नेतृत्व किया, किन्तु उसे अपने भाई हकीम मिर्जा के कार्यों के कारण यह अभियान स्थगित करना पड़ा.
  • अपने भाई से निपटने के पश्चात् 1567 ई. में अकबर की सेनाओं ने रात के समय गंगा नदी को पार करके प्रातः ही उजबेगों पर आक्रमण कर दिया.
  • खानजमाँ मारा गया.
  • यह स्पष्ट है कि विद्रोह केवल अकबर की वीरता और उपयुक्त समय पर कार्य करने के कारण ही दब सका था.

मिर्जा वर्ग का विद्रोह

  • मिर्जा वर्ग के लोग अकबर के सम्बन्धी थे.
  • इब्राहिम मिर्जा, मुहम्मद हुसैन मिर्जा सिकन्दर मिर्जा, महमूद मिर्जा, मसूद मिर्जा आदि इस वर्ग के प्रमुख विद्रोही थे.
  • बादशाह के सम्बन्धी होने के कारण ये लोग कुछ विशिष्ट अधिकार चाहते थे.
  • अतः उन्होंने विद्रोह कर दिया.
  • 1573 ई. तक अकबर मिर्जाओं के विद्रोह को पूर्ण रूप से कुचलने में सफल हो गया.

बंगाल एवं बिहार में हुए विद्रोह

  • 1580 ई. में बंगाल में बाबा खाँ काकशल एवं बिहार में मासूम काबुली तथा अरव बहादुर ने विद्रोह कर दिया.
  • 1581 ई. में राजा टोडरमल के नेतृत्व में मुगल सेना ने इस विद्रोह को को कुचला.

अफगान वलूचियों का विद्रोह

  • अकबर के कश्मीर अभियान के समय 1585 ई. में पश्चिमोत्तर सीमा पर अफगानों एवं बलूचियों ने विद्रोह कर दिया.
  • इस विद्रोह में बीरबल की हत्या कर दी गई.
  • राजा टोडरमल एवं राजा मानसिंह ने इस विद्रोह को कुचला..

शाहजादा सलीम का विद्रोह

  • सम्राट अकबर शाहजादा सलीम को बहुत लाड़-प्यार करता था.
  • अतः यह बिगड़ चुका था.
  • वह बादशाह बनना चाहता था.
  • 1599 ई. में अकबर की आज्ञा के बिना अजमेर से इलाहाबाद चला गया तथा वहाँ स्वतन्त्र शासक के रूप में रहने लगा.
  • 1602 ई. में अकबर ने सलीम को समझाने का प्रयत्न किया.
  • इस दौरान इसी संदर्भ में ओरछा के बुन्देल सरदार वीरसिंह द्वारा अबुल फजल की हत्या करवा दी गई.
  • 1603 ई. में सलीम ने आगरा आकर अकबर से माफी मांग ली.
  • उसे क्षमा कर दिया गया.
  • अकबर ने उसे मेवाड़ को जीतने के लिए भेजा, किन्तु वह फिर अकबर की आज्ञा का उल्लंघन करके इलाहाबाद पहुंच गया.
  • 1604 ई. में उसने फिर आगरा आकर क्षमा मांग ली तथा अकबर ने एक बार फिर उसे क्षमा कर दिया.
  • इसके पश्चात् सलीम ने कभी विद्रोह नहीं किया.

अकबर की मृत्यु

  • 25-26 अक्टूबर, 1605 ई. की अर्द्धरात्रि को अकबर की अतिसार रोग (Dysentry) के कारण मृत्यु हो गई.
  • उसे सिकन्दराबाद के मकबरे में दफनाया गया.

अकबर की राजपूत नीति

  • अकबर हिन्दुओं की स्वेच्छा से साम्राज्य स्थापित करना चाहता था.
  • अतः उसने राजपूतों को अपने पक्ष में करने का संकल्प किया.
  • इस हेतु अनेक राजपूत योद्धा शासन में रखे गए. जिनमें से अनेक को मनसबदार बनाया गया.
  • ‘जजिया’ तथा ‘तीर्थ-यात्रा कर समाप्त कर दिया गया.
  • अकबर ने राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित किए.
  • 1562 ई. में उसने जयपुर के राजा बिहारीमल की पुत्री से तथा 1570 ई. में जैसलमेर तथा बीकानेर की राजकुमारियों से विवाह किया.
  • 1584 ई. में शाहजादा सलीम का विवाह राजा भगवानदास की पुत्री से किया गया.
  • इस नीति से अकबर ने समस्त राजपूताने को अपने पक्ष में कर लिया.
  • किन्तु मेवाड़ के राज्य ने अकबर की शक्ति की अवहेलना की और परिणामतः अकबर को चित्तौड़ पर चढ़ाई करनी पड़ी.
  • उल्लेखनीय है कि मेवाड़ (चित्तौड़) के विरुद्ध संघर्ष में राजा मानसिंह और अन्य राजपूत योद्धाओं ने भी अकबर की सहायता की .
  • अकबर ने राजपूत शासकों को अपना अधीनस्थ साथी बनाए रखने की कोशिश की.
  • इस प्रकार सहकारिता की नीति के कारण अकबर मुगल साम्राज्य की नींव को इस देश में दृढ़ कर सका.
  • औरंगजेब के शासनकाल में इस नीति के विरुद्ध कार्य करने के कारण यह साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया.

धार्मिक विकास

  • अकबर वह प्रथम सम्राट था जिसके धार्मिक विचारों में क्रमिक विकास दिखाई देता है.
  • उसके इस विकास को निम्नलिखित तीन कालों में बाँटा जा सकता है

प्रथम काल (1556 से 1575 ई.)

  • इस काल में अकबर इस्लाम धर्म का कट्टर अनुयायी था.
  • वह दिन में पाँच बार नमाज पढ़ता था तथा रमजान के महीने रोजे रखता था.
  • वह मुल्ला व मौलवियों का आदर करता था.
  • इस्लाम की उन्नति हेतु उसने अनेक मस्जिदों का निर्माण करवाया, परन्तु वह धार्मिक दृष्टि से असहनशील नहीं बना.
  • उल्लेखनीय है कि इसी काल में अकबर ने राजपूत नीति अपनाई थी.
  • वस्तुतः इस समय धर्म उसका व्यक्तिगत मामला था तथा राजपूत नीति आदि कार्य राजनीति से प्रेरित थे.

द्वितीय काल (1575 से 1582 ई.)

  • अकबर का यह काल धार्मिक दृष्टि से क्रान्तिकारी काल था.
  • इस काल में उसने ‘दीन-ए-इलाही‘ धर्म तथा ‘इबादतखाने‘ की स्थापना की.
  • 1581 ई. में उसने ‘दीन-ए-इलाही’ को राजकीय धर्म घोषित कर दिया.
  • ‘इबादतखाने’ में पहले केवल मुसलमान ही भाग लेते थे, किन्तु कालान्तर में सभी धर्मों के लिए धर्म सम्बन्धी वाद-विवाद हेतु इसे खोल दिया गया.
  • इस काल में अकबर का आत्म-चिन्तन बढ़ गया तथा उसने प्रत्येक शुक्रवार को माँस खाना छोड़ दिया.
  • पशुबलि तथा मुल्ला और मौलवियों पर नियन्त्रण रखने का प्रयास किया गया.

तृतीय काल (1582 से 1605 ई.)

  • इस काल के दौरान अकबर पूर्ण रूप से ‘दीन-ए-इलाही’ में अनुरक्त हो गया .
  • इस्लाम धर्म के प्रति उसकी निष्ठा कम हो गई.
  • बदायूँनी का यह कथन कि ‘इस काल में अकबर ने कई इस्लाम विरोधी कार्य भी किए सही प्रतीत नहीं होता, क्योंकि सहिष्णुता के युग में अकबर द्वारा किसी धर्म विरोधी कार्य किया जाना सम्भव नहीं था.

दीन-ए-इलाही

  • 1581 ई. में अकबर ने सभी धर्मों के गुणों का संग्रह करके ‘दीन-ए-इलाही’ या ‘तौहिदे-इलाही’ या ‘तकहीद-ए-इलाही’ या दैवी एकेश्वरवाद’ (Divine Monotheism) नामक धर्म की स्थापना की.
  • अबुल फज़ल इसका प्रधान पुरोहित था.
  • इस मत में दिक्षित होने हेतु एक संस्कार प्रचलित किया गया.
  • दीक्षा प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपनी पगड़ी एवं सिर को सम्राट के चरणों में रखता था.
  • सम्राट उसे पुनः उठा कर उसे शास्त (Shast) प्रदान करता था, जिस पर ‘परम नाम’ और सम्राट का स्वयं का गुरुमंत्र ‘अल्ला-हु-अकबर‘ खुदा होता था.
  • नव-दीक्षित व्यक्ति को यह दीक्षा मिलती थी कि–“पवित्र और दिव्य दृष्टि कभी त्रुटि नहीं करती. इस धर्म के प्रमुख सिद्धान्त थे
  1.  इसका मुख्य आधार भगवान की एकता थी.
  2. एक दूसरे का अभिवादन करते समय इस धर्म के सदस्य ‘अल्ला-हु-अकबर’ तथा ‘जल्ला जलालहु’ शब्दों का प्रयोग करते थे.
  3. माँस भक्षण वर्जित था.
  4. जन्म दिवस पर दावत देनी पड़ती थी.
  5. मछुआरों, कसाइयों तथा शिकारियों के साथ भोजन करने पर प्रतिबन्ध था.
  6. अपने जीवन काल में ही श्राद्ध भोजन देना होता था.
  7.  ‘इज्जत, समान धर्म, सम्पत्ति और सम्राट के प्रति स्वामि भक्ति, भक्ति की चार दिशाएं थीं.
  8. जैनबोस (Jainbos) दण्डवत् का आचरण करना.
  9. सूर्य के लिए आदर और अग्नि पूजा इस धर्म का मुख्य अंग हो गया. अरस्तु द्वारा उल्लिखित चार तत्वों ‘अग्नि, हवा, पानी तथा पृथ्वी या भूमि’ को अबुल फज़ल ने इस प्रकार वर्गीकृत किया
योद्धा अग्नि
शिल्पकार एवम् व्यापारी हवा
विद्वान पानी
किसान भूमि
  • शाही कर्मचारियों का वर्गीकरण अबुल फजल ने इस प्रकार किया
उमरा वर्ग अग्नि
राजस्व अधिकारी हवा
विधि वेत्ता, धार्मिक अधिकारी,ज्योतिषी, कवि एवं दार्शनिक पानी
बादशाह के व्यक्तिगत सेवक भूमि
  • अकबर ने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की भावना रखी.
  • उसने आगरा एवं लाहौर में ईसाइयों को गिरजाघर बनाने की अनुमति दी.
  • उसने सूफी मत के ‘चिश्ती सम्प्रदाय‘ को आश्रय दिया.
  • अकबर ने जैनाचार्य हरिविजय सूरि को “जगद गुरु’ की उपाधि प्रदान की.
  • अकबर पर सर्वाधिक प्रभाव हिन्दू धर्म का पड़ा.
  • 1571 ई. में अकबर ने फतेहपुर सिकरी को अपनी राजधानी बनाया.
  • 1583 ई. में अकबर ने नया संवत् ‘इलाही संवत्’ जारी किया.

अकबर के दरबार के नौ रत्न

(1) अबुल फज़ल

  • अबुल फज़ल का जन्म 1550 ई. में हुआ था.
  • अबुल फज़ल शेख मुबारक का पुत्र था.
  • अबुल फज़ल ने 20 सवार के मनसब से अपना जीवन आरम्भ किया तथा अपनी योग्यता से 5000 सवार का मनसबदार बना.
  • अबुल फज़ल साहित्य, इतिहास तथा दर्शनशास्त्र का बहुत ज्ञान था.
  • धार्मिक तथा साहित्य सम्बन्धी वाद-विवाद में बहुत कम व्यक्ति ही उसका मुकाबला कर सकते थे.
  • अबुल फज़ल में धार्मिक कट्टरता नहीं थी.
  • अबुल फज़ल ने ‘अकबरनामा‘ तथा ‘आइने-अकबरी‘ की रचना की.
  • 1599-1600 ई. में उसने सैनिक प्रतिभा भी दिखाई.
  • वह एक कुशल राजदूत भी था.
  • 1602 ई. में शाहज़ादे सलीम के कहने पर वीर सिंह बुन्देला ने उसकी हत्या कर दी.

(2) बीरबल

  • बीरबल का जन्म ‘काल्पी’ में 1528 ई. में हुआ था.
  • बीरबल का बचपन का नाम ‘महेशदास’ था तथा वह ब्राह्मण वंश का था.
  • बीरबलअपनी स्वामिभक्ति, चतुराई और स्वाभाविक योग्यताओं के कारण उसने बहुत उन्नति की तथा वह 2,000 का मनसबदार नियुक्त किया गया.
  • बीरबल को 1586 ई. में न्याय विभाग का उच्चाधिकारी नियुक्त किया गया तथा उसे ‘राजा‘ को पदवी भी प्राप्त थी.
  • उच्च शिक्षा प्राप्त न कर सकने पर भी उसमें ‘हास्यरस’ और ‘हाजिर जवाबी’ के महान् प्रशंसनीय गुण थे.
  • उसे ‘कविराज’ की उपाधि भी प्राप्त थी.
  • बीरबल ‘दीन-ए-इलाही’ को मानने वाला एकमात्र हिन्दू था.
  • 1586 ई. में यूसुफजाइयों के विरुद्ध लड़ते समय बीरबल की मृत्यु हुई.
  • अबुल फज़ल तथा बदायूँनी के अनुसार अकबर को सब अमीरों से अधिक बीरबल की मृत्यु पर शोक पहुँचा था.

(3) राजा टोडरमल

  • यह उत्तर प्रदेश के क्षत्रिय वंश से सम्बन्धित था.
  • उसने आरंभ में शेरशाह सूरी के पास नौकरी की तथा सूरवंश के अन्त के बाद मुगल सेना में आया.
  • 1562 ई. में यह प्रमुख अधिकारी बन गया तथा 1572 ई. में वह गुजरात प्रदेश का दीवान नियुक्त हुआ.
  • 1582 ई. में वह प्रधानमंत्री वन गया.
  • वह सत्यवादी, साहसी, एक कुशल सैनिक, सेनानायक तथा राजदूत था.
  • वह शासन प्रबन्ध व अन्य विषयों का गूढ़ ज्ञाता था.
  • भूमि सम्बन्धी सुधारों के लिए राजा टोडरमल का नाम विख्यात है.
  • 1589 ई. में टोडरमल की मृत्यु हो गई.

(4) भगवानदास

  • भगवानदास आमेर के राजा भारमल का पुत्र था.
  • भगवान दास की बहन का विवाह अकबर के साथ हुआ था.
  • वह 1562 से 1589 ई. तक अकबर का साथी व मित्र रहा.
  • गुजरात से काबुल और कश्मीर तक उसने बहुत से युद्धों में भाग लिया.
  • उसे 5,000 का मनसबदार बना दिया गया तथा ‘अमीर-उल-उमरा’ की उपाधि दी गई.
  • वह मुगल राज्य के सम्मानित दरबारियों में-से एक था.
  • अबुल फज़ल के अनुसार भगवानदास सत्यवादी तथा वीर था.

(5) मानसिंह

  • मानसिंह आमेर के राजा भारमल का पौत्र था.
  • उसके सम्पर्क में आकर अकबर का हिन्दुओं के प्रति दृष्टिकोण और भी उदार हुआ.
  • अकबर के अधीन राजा मानसिंह ने काबुल, बिहार तथा बंगाल आदि प्रदेशों पर सफल सैनिक अभियान किए.

(6) तानसेन

  • प्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन का जन्म ग्वालियर में हुआ था.
  • उसने कई रागों का निर्माण किया.
  • उसके समय ‘ध्रुपद गायन शैली का विकास हुआ.
  • तानसेन ने सम्भवतः इस्लाम ग्रहण किया था.
  • उसकी प्रमुख कृतियां थीं-मियाँ की टोड़ी’, ‘मियाँ की मल्हार’, मियाँ की सारंग’, ‘दरबारी कान्हड़ा’ आदि.
  • अकबर ने उसे ‘कण्ठाभरणवाणीविलास‘ की उपाधि दी.

(7) अब्दुर्रहीम खानखाना

  • यह बैरम खाँ का पुत्र था तथा उच्च कोटि का विद्वान और कवि था.
  • यह जहाँगीर (सलीम) का गुरु था तथा जहाँगीर सबसे अधिक अब्दुर्रहीम से ही प्रभावित था.
  • उसने तुर्की भाषा में रचित ‘बाबरनामा‘ का फारसी में अनुवाद किया.
  • अकबर ने उसे ‘खानखाना’ की उपाधि से सम्मानित किया.

(8) मुल्ला दो प्याजा

  • यह अरब का रहने वाला था तथा हुमायूँ के समय भारत आया था.
  • अकबर के नौ-रत्नों में इसे भी स्थान प्राप्त है.
  • भोजन में इसे दो प्याज अधिक पसन्द होने के कारण अकबर ने इसे ‘दो प्याजा’ की उपाधि प्रदान की.

(9) फैजी

  • फैजी अबुल फज़ल का बड़ा भाई था.
  • वह ‘दीन-ए-इलाही धर्म का कट्टर समर्थक था.
  • अकबर के दरबार में वह राजकवि के पद पर आसीन था.
  • उसकी 1595 ई. में मृत्यु हो गई.

हकीम हुकाम

  • हकीम हुकाम को भी अकबर के दरबारियों में प्रमुख स्थान प्राप्त था.
  • वह अकबर के रसोई-घर का प्रधान था.

अकबर के कुछ महत्वपूर्ण कार्य

कार्य वर्ष
दास प्रथा का अन्त 1562 ई.
हरमदल से मुक्ति 1562 ई.
तीर्थ यात्रा कर समाप्त 1563 ई.
जजिया कर समाप्त 1564 ई.
फतेहपुरसिकरी की स्थापना 1571 ई.
राजधानी आगरा से फतेहपुर सिकरी स्थानान्तरण 1571 ई.
जागीरदारी प्रथा का अन्त 1575 ई.
इबादतखाने की स्थापना 1575 ई.
इबादतखाना में सभी धर्मों को प्रवेश की अनुमति 1578 ई.
मजहर की घोषणा 1579 ई.
दीन-ए-इलाही की स्थापना 1581 ई.
इलाही संवत्’ की स्थापना 1583 ई.

अकबर द्वारा विजित प्रदेश

प्रदेश शासक समय मुगल सेनापति
(i) दिल्ली हेमू 1556 ई अकबर तथा बैरम खाँ
(ii) मालवा बाजबहादुर 1561 ई. आदम खाँ, पीर मुहम्मद
1562 ई. अब्दुल्ला खाँ
(iii) चुनार अफगान 1561 ई. आसफ खाँ
(iv) गोंडवाना वीर नारायण तथा रानी दुर्गावती 1564 ई. आसफ खाँ
   
(v) राजस्थान
(A) आमेर भारमल 1562 ई. (स्वेच्दा से अधीनता स्वीकार की)
(B) मेड़ता जयमल
(C) मेवाड़ उदयसिंह 1568 ई. अकबर
   राणा प्रताप
1576 ई. मानसिंह, आसफ खाँ
(D) रणथम्भौर सूरजन हाड़ा 1569 ई. भगवान दास व अकबर
(E) कालिंजर रामचन्द्र 1569 ई. मजनु खाँ काकशाह
(F) मारवाड़ राव चन्द्र सेन  1570 ई. (स्वेच्दा से अधीनता स्वीकार की)
(H) जैसलमेर रावल हरिराय  1570 ई. (स्वेच्दा से अधीनता स्वीकार की)
(I) बीकानेर कल्याणमल  1570 ई. (स्वेच्दा से अधीनता स्वीकार की)
       
(vi) गुजरात मुजफ्फर खाँ तृतीय 1571-72 ई. खान कला, खाने आजम एवं सम्राट अकबर
(vii) बिहार-बंगाल दाऊद खाँ 1674-76 ई. मुनीम खाँ खानखाना
(viii) काबुल हकीम मिर्जा 1581 ई. मानसिंह एवं अकबर
(ix) कश्मीर युसुफ खाँ एवं याकूब खाँ 1586 ई. राजा भगवान दास एवं कासिम खाँ
(x) उड़ीसा निसार खाँ  1590-91 ई. राजा मानसिंह
(xi) सिन्ध जानी बेग 1591 ई. अब्दुर्रहीम खानखाना
(xii) बलूचिस्तान अफगान 1595 ई. मीर मासूम
(xiii) कन्धार मुजफ्फर हुसैन मिर्जा 1595 ई.  मीर मासूम
       
दक्षिण भारत की विजय      
(i) खानदेश अली 1591 ई. (स्वेच्छा से अधीनता स्वीकार की.) 
(ii) दौलताबाद चाँदबीबी 1599 ई. मुराद, अबुल फज़ल, अब्दुर्रहीम खानखाना एवं अकबर
(iii) अहमद नगर बहादुरशाह 1600 ई. राजकुमार दानियाल एवं अब्दुर्रहीम खानखाना
(iv) असीरगढ़ मीरन बहादुर 1601 ई. सम्राट अकबर

 

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शेरशाह सूरी और उसके उत्तराधिकारी (Sher Shah Suri and his successor)

शेरशाह सूरी और उसके उत्तराधिकारी (Sher Shah Suri and his successor)

शेरशाह सूरी

  • शेरशाह का असली नाम फरीद था.
  • उसका जन्म 1472 ई. में पंजाब में हुआ था.
  • उसके पिता हसन खाँ की चार पत्नियाँ और आठ पुत्र थे.
  • उसे अपनी सौतेली माँ और पिता से उसे सच्चा स्नेह प्राप्त नहीं हुआ.

शेरशाह सूरी और उसके उत्तराधिकारी (Sher Shah Suri and his successor)

  • 1494 ई. में वह सहसराम (बिहार) छोड़कर जौनपुर चला गया.
  • वहाँ उसने अरबी और फारसी की पुस्तकों-गुलिस्ताँ, बोस्ताँ, सिकन्दरनामा आदि का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया.

कुशाग्रबुद्धि होने के कारण वह अपने पिता के आश्रयदाता जमात खाँ का विश्वास पात्र बन गया. 1497 ई. में उसके पिता ने उसे सहसराम तथा ख्यासपुर के परगने का प्रबन्धक नियुक्त किया. यह क्षेत्र 1518 ई. तक उसके अधिकार में रहे.

लुहानी के यहां सेवा

  • अपनी सौतेली माँ की ईष्र्या के प्रकोप से फरीद को एक बार पुनः घर से निकाल दिया गया.
  • फरीद ने बिहार के सुल्तान बहार खाँ लुहानी के यहां सेवा प्राप्त कर ली.
  • एक बार शिकार पर गए लुहानी के साथ फरीद ने एक शेर मारा.
  • उसकी बहादुरी से प्रसन्न होकर लुहानी ने उसे शेर खाँ की उपाधि दी.
  • लुहानी अमीरों एवं अन्य अफगान सरदारों ने शेर खाँ के विरुद्ध बहार खाँ लुहानी के कान भरने शुरू कर दिए .
  • फलस्वरूप शेर खाँ को निकल दिया गया.

मुगलों की नौकरी

  • 1527 ई. में शेर खाँ ने मुगलों की नौकरी कर ली.
  • इस दौरान उसने मुगलों के प्रशासन और सैनिक संगठन के दोषों का अध्ययन किया.
  • 1528 ई. में उसने मुगलों की नौकरी छोड़ दी.
  • तब उसने दक्षिण बिहार के जलाल खाँ के रक्षक व शिक्षक के रूप में नौकरी की.

बिहार का नायब-सूबेदार या वकील

  • 1528 ई. में बिहार के शासक की मृत्यु के पश्चात् शेर खाँ वहां का नायब-सूबेदार या वकील नियुक्त किया गया.
  • कालान्तर में हुमायूँ के साथ उसका संघर्ष हुआ और 1540 ई. में वह दिल्ली की गद्दी पर बैठा.
  • मुगलों को सहायता देने वाले ‘गक्खरों‘ को शेरशाह सूरी इनकी कुचलना चाहता था.
  • 1541 ई. में शेरशाह सूरी ने गक्खरों के विरुद्ध एक अभियान छोड़ा.
  • इस अभियान में वह गक्खरों की शक्ति को पूर्णतया नष्ट तो नहीं कर सका, किन्तु कम करने में अवश्य सफल हुआ.
  • भारत की उत्तर-पश्चिम की रक्षा हेतु शेरशाह सूरी ने ‘रोहतास गढ़‘ नामक दुर्ग बनवाया तथा वहां पर हैबस खाँ तथा खवास खाँ के नेतृत्व में अफगान सेना की टुकड़ी नियुक्त की.
  • 1542 ई. में शेरशाह ने मालवा पर आक्रमण किया तथा इसे जीत लिया.
  • इसके चलते ग्वालियर के किले के राज्यपाल ने भी आत्मसमर्पण कर दिया.

रायसीन शासक पूरनमल

  • 1542 ई. में रायसीन के शासक पूरनमल ने शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किन्तु शेरशाह को सूचना मिली कि पूरनमल मुस्लिम लोगों से अच्छा व्यवहार नहीं करता.
  • अतः 1543 ई. में शेरशाह की सेनाओं ने रायसीन को घेर लिया.
  • पूरनमल व उसके सैनिक बड़ी वीरता से लड़े.
  • शेरशाह ने चालाकी से काम लिया तथा पूरनमल को उसके आत्मसम्मान एवं जीवन की रक्षा का वायदा करके आत्मसमर्पण हेतु तैयार कर लिया.
  • किन्तु मुस्लिम जनता के आग्रह पर शेरशाह ने राजपूतों के खेमों को चारों ओर से घेर लिया.
  • राजपूत जी-जान से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए.
  • शेरशाह की पूरनमल और उसके परिवार के साथ व्यवहार करने के ढंग की बड़ी निन्दा की गई है.
  • डा. ईश्वरी प्रसाद लिखते है कि शेरशाह अपने शत्रु के प्रति, जिसने अपनी दुर्दशा में उस पर विश्वास किया हो, अमानुषिक क्रूरता का व्यवहार करता था.
  • 1543 ई. में हैवत खाँ के नेतृत्व में अफगान सेना ने मुल्तान तथा सिन्ध को जीत लिया.

मालदेव के विरुद्ध अभियान

  • सन् 1544 ई. में शेरशाह ने जोधपुर के शासक मालदेव के विरुद्ध अभियान छेड़ा.
  • मालदेव हुमायूँ को संरक्षण देना चाहता था, किन्तु शेरशाह ने उसे सचेत कर दिया.
  • अतः मालदेव शेरशाह और हुमायूँ दोनों को ही रुष्ठ होने का अवसर न देकर तटस्थ रहा.
  • शेरशाह मालदेव के व्यवहार से असन्तुष्ट था . और उसको दण्ड देना चाहता था.
  • शेरशाह ने मालदेव के विरुद्ध 1543 ई. में . युद्ध आरम्भ कर दिया. वह मालदेव पर सरलता से विजय न पा सका .
  • अन्त में शेरशाह ने मालदेव और उसके अनुयायियों के मध्य फूट डलवा कर उसे पराजित किया.
  • युद्ध इतना घोर था कि शेरशाह ने इस प्रकार की घोषणा की-

“मैंने एक मुठ्टी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान का साम्राज्य लगभग खो दिया था.”

कालिन्जर का अभियान

  • कालिन्जर का अभियान (बुन्देलखण्ड) (1545 ई.) शेरशाह का अन्तिम सैन्य अभियान था.
  • यहाँ के शासक कीरत सिंह ने शेरशाह के आदेश के विरुद्ध ‘वीरों के शासक वीरभान को संरक्षण दिया था.
  • नवम्बर 1544 ई. को शेरशाह ने कालिंजर के किले को घेरा. छह महीने तक किले को घेरे में रखा.
  • अन्त में शेरशाह ने गोला बारूद से किले की दीवर को तोड़ने का आदेश दिया.
  • यह माना जाता है कि 22 मई, 1545 ई. को किले की दीवार से टकरा कर लौटे एक गोले के विस्फोट से शेरशाह की मृत्यु हो गई.
  • इतिहासकार कानूनगो के अनुसार-

”इस प्रकार एक महान् राजनीतिज्ञ एवं सैनिक का अन्त अपने जीवन की विजयों एवं लोकहितकारी कार्यों के मध्य में ही हो गया.”

शेरशाह सूरी का प्रशासन

  • डॉ. कानूनगो के अनुसार शेरशाह सूरी में स्वयं अकबर से भी अधिक रचनात्मक प्रतिभा थी .
  • इतिहासकार डॉ. त्रिपाठी तथा डॉ. सरन के अनुसार शेरशाह केवल एक सुधारक था और किसी नवीन पद्धति का प्रचलन करने वाला नहीं था.
  • परन्तु अन्य इतिहासकारों का मानना है कि शेरशाह सूरी का शासन केवल सामंत नौकरशाही ही नहीं, अपितु पक्षपात रहित और प्रभावशाली था.
  • प्रशासन में शेरशाह को विभिन्न मन्त्रालयों द्वारा सहायता प्राप्त होती थी.
  • ये मंत्रालय थे –

दीवाने वजारत

  • देश की आय और व्यय दोनों इसके अधीन थे. सामान्यतः यह अन्य मन्त्रालयों की देखभाल भी करता था.

दीवाने-आरीज

  • यह दीवाने ममालीक के अधीन था. वह सेना का अनुशासन प्रबन्ध, भर्ती व वेतन सम्बन्धी कार्य करता था.

दीवाने-रसालत

  • यह विदेश मन्त्रालय था.
  • राजदूतों और राजप्रतिनिधि मण्डलों से सम्पर्क स्थापित करना तथा राजनैतिक पत्र-व्यवहार सम्बन्धी कार्य भी यही करता था.

दीवाने-इंशा

  • यह शाही घोषणा-पत्र और सन्देशों का रिकार्ड रखता था तथा सरकारी अभिलेखों का कार्य-भारी था.
  • राज्यपालों तथा अन्य स्थानीय अधिकारियों से पत्र-व्यवहार यही करता था.

दीवाने-काजी

  • यह विभाग मुख्य काजी के अधीन था.
  • सुल्तान के पश्चात् वह राज्य के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य करता था.

दीवाने-वरीद

  • यह राज्य की डाक-व्यवस्था एवं गुप्तचर विभाग की देखभाल किया करता था.

शेरशाह सूरी का प्रान्तीय प्रशासन

  • शेरशाह के प्रान्तीय प्रशासन के सम्बन्ध में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं.
  • डॉ. कानूनगो के अनुसार देश का सबसे बड़ा खण्ड ‘सरकार’ था तथा प्रान्त अकबर महान् के आविष्कार थे.
  • डॉ. सरन ने इस मत का खण्डन किया है.
  • यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे प्रशासकीय खण्ड थे, जो प्रान्तों से मिलते-जुलते थे.
  • डॉ. ए.बी. पाण्डेय के अनुसार जिन राज्यों को शासन करने की स्वतन्त्रता दे दी गई थी, उन्हें सूबा या इक्ता कहा जाता था.
  • सूबे का प्रमुख हाकिम, अमीन अथवा फौजदार होता था.
  • पंजाब के हाकिम हैबत खाँ को ‘मनसद-ए-आलम’ की उपाधि दी गई थी.
  • फिर भी शेरशाह के प्रान्तीय शासन का वितरण स्पष्ट नहीं है और उसके अधिकारियों की नियुक्ति की रीतियों और नामों का उल्लेख करना सम्भव नहीं है.

सरकार

  • प्रान्त आगे सरकारों में बंटे हुए थे.
  • सरकार के दो मुख्य अधिकारी थे—
  1. मुन्सिफे-मुन्सिफान (न्यायाधीश) तथा
  2. शिकदारे-शिकदारान (शान्ति-व्यवस्था स्थापित करना व परगनों के शिकदारों के कार्यों का निरीक्षण करना).

परगना

  • सरकार परगनों में विभाजित थे. परगना का शासन एक मुन्सिफ, एक फोतदार (खजांची) तथा दो कारकुन (लिपिक) की सहायता से चलता था.

ग्राम

  • ग्राम या गाँव शासन की सबसे छोटी इकाई थी, जिसका प्रवन्ध वहाँ के प्रधान, पटवारी आदि करते थे.

सैन्य-व्यवस्था

  • शेरशाह ने सेना के बल पर ही समस्त उत्तरी भारत पर अधिकार किया था.
  • उसने एक शक्तिशाली, अनुशासित व सु-संगठित सेना की व्यवस्था की.
  • उसने सैनिकों की भर्ती व प्रशिक्षण आदि में व्यक्तिगत रुचि ली और घोड़ों को दागने और सैनिकों का हुलिया दर्ज करने की प्रथा को पुनः प्रचलित किया.
  • उसने अश्वारोही टुकड़ी को बहुत महत्व दिया.

वित्त प्रबन्ध

  • शेरशाह ने राज्य की आय के साधनों में वृद्धि करने का भरसक प्रयास किया.
  • राजस्व, जजिया, वाणिज्य, टकसाल, उपहार,नमक, चुंगी, खम्स आदि राज्य की आय के साधन थे.
  • अमीरों को भी राजा को भेंट देनी पड़ती थी.
  • किन्तु भू-राजस्व आय का प्रमुख साधन था.

राजस्व-प्रशासन

  • शेरशाह ने समस्त भूमि की नपाई करवा कर उसको वर्गीकरण करवाया.
  • पैदावार का एक तिहाई भाग भूमिकर निश्चित किया .
  • सम्भवतः भू-राजस्व की तीन प्रथाएं प्रचलित थीं-
  1. गल्ला बख्शी या बटाई के तीन प्रकार थे-खेत बटाई, लंक बटाई और रास बटाई,
  2. नस्क या मकतई या कनकुट,
  3. नकदी या जाती या जमई.
  • किसानों और फसल की सुरक्षा का विशेष ध्यान दिया जाता था.
  • लगान नकद या अनाज दोनों रूपों में लिया जा सकता था.

पुलिस

  • आन्तरिक शान्ति स्थापित करने हेतु शेरशाह ने एक सुव्यवस्थित पुलिस विभाग की स्थापना की.
  • उसने उच्चकोटि की सुसंगठित गुप्तचर व्यवस्था की स्थापना भी की.

मुद्रा

  • शेरशाह ने मुद्रा में विशेष सुधार किया.
  • उसने एक नया सिक्का ‘दाम’ प्रचलित किया.
  • उसने पुराने और धातु मिश्रित सिक्कों को समाप्त कर दिया.
  • सिक्कों पर देवनागरी लिपि में नाम लिखे गए.
  • उसने सोने, चाँदी तथा तांबे के सिक्के चलाए .
  • ‘दाम’ और रुपये में विनिमय अनुपात 64 : 1 निश्चित किया गया.

व्यापार

  • व्यापार को प्रोत्साहन देने हेतु शेरशाह ने ‘आयात कर’ और ‘बिक्री कर’ के अतिरिक्त सभी आन्तरिक करों को समाप्त कर दिया.

सड़कें तथा सराये

  • शेरशाह ने व्यापार, यातायात तथा डाक सुविधा हेतु अनेक सड़कों और सरायों का निर्माण करवाया.
  • उसके द्वारा निर्मित कराई गई सड़कें थीं
  1. बंगाल से सिन्ध तक जाने वाली ग्रांड ट्रंक रोड (G.T. Road) .
  2. आगरा से बुरहानपुर .
  3. आगरा से मारवाड़.
  4. लाहौर से मुल्तान.
  • शेरशाह ने लगभग 1,700 सरायों का निर्माण करवाया.
  • इनमें हिन्दू तथा मुस्लिमों के ठहरने की अलग-अलग और उत्तम व्यवस्था की गई.
  • इनका प्रबन्ध शिकदार करता था.

दान तथा अस्पताल

  • शेरशाह ने अनेक दानशालाओं और औषधालयों का निर्माण करवाया.
  • उसके समय सरकारी भोजनालय का प्रतिदिन का व्यय 500 अशर्फी था.

शिक्षा

  • पाठशालाओं को उसने आर्थिक सहायता प्रदान की तथा प्रत्येक मस्जिद में मकतबों की स्थापना करवाई.
  • निर्धन छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था भी की गई.

साहित्य, कला एवं भवन

  • शेरशाह के काल में मुहम्मद जायसी ने ‘पदमावत‘ की रचना की.
  • उसने अनेक इमारतों यथा-रोहतासगढ़ का दुर्ग, सहसराम में झील के अन्दर ऊँचे टीले पर स्थापित मकबरे आदि का निर्माण करवाया.
  • उसने दीनपनाह को तुड़वाकर पुराने किले (दिल्ली में) का निर्माण करवाया.
  • किले के अन्दर उसने ‘किला-ए-कुहना’ का निर्माण करवाया.
  • उसने कन्नौज नगर को समाप्त करके ‘शेरसूर’ नामक नगर की स्थापना करवाई.

शेरशाह के उत्तराधिकारी 

  • शेरशाह की अचानक मृत्यु हुई थी तथा उसके दो पुत्र आदिल और जलाल वहाँ पर उपस्थित नहीं थे.
  • जलाल खाँ जो उसका छोटा पुत्र था वहाँ पहले पहुंचा और अमीरों ने उस राजा घोषित कर दिया.
  • जलाल खाँ ने इस्लाम शाह की उपाधि धारण करके सिंहासन सम्भाला.

इस्लाम शाह (1545-53 ई.)

  • इस्लाम शाह योग्य व शक्तिशाली था, परन्तु वह स्वभाव से अविश्वासी व्यक्ति था.
  • अमीर उसके विरुद्ध हो गए और इस्लामशाह के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे.
  • ख्वास खाँ तथा इस्लाम शाह का भाई आदिल खाँ पराजित होकर भाग गए तथा षड्यन्त्रकारियों को इस्लाम शाह ने कठोर दण्ड दिए.
  • अपने पिता की भांति इस्लाम शाह का शासन भी व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित था.
  • परन्तु उसमें शेरशाह के गुणों का अभाव था.
  • उसने एक-एक करके अमीरों को कुचलने का प्रयत्न किया.
  • वह पूर्णतया अप्रिय था, फिर भी अपनी चारित्रिक शक्ति के सहारे राज करता रहा.
  • उसने अपनी निर्दयता और शक्ति द्वारा शत्रुओं के हृदयों में भय उत्पन्न कर दिया.
  • उसकी नीति अफगानों की राष्ट्रीय एकता को छिन्न-भिन्न करने के लिए उत्तरदायी थी.
  • इस्लाम शाह ने सैन्य शक्ति को संगठित करने की ओर अधिक ध्यान दिया.
  • उसने तोपखाने को शक्तिशाली बनाया तथा शेरगढ़, इस्लामगढ़, रशीदगढ़, फिरोजगढ़ नामक किलों का निर्माण करवाया.
  • डॉ. त्रिपाठी के अनुसार यदि इस्लाम शाह जिन्दा रहता तो इस बात में सन्देह है कि हुमायूँ अपने खोए हुए साम्राज्य को फिर से जीतने का साहस करता.

मोहम्मद आदिल (1553-57 ई.)

  • इस्लाम शाह की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र फिरोज सिंहासन पर बैठा.
  • किन्तु मुबारिज खाँ ने उसकी हत्या कर दी व स्वयं मोहम्मद आदिल की उपाधि धारण करके सिंहासन पर बैठा.
  • ऐलफिंस्टन के अनुसार “वह नितान्त मूर्ख, व्यभिचारी और नीच समाज का प्रिय था और वह अपने पापों और चरित्रहीनता दोनों के ही कारण प्रजा के लिए घृणा का पात्र था.”
  • उसके प्रधानमंत्री ‘हेमू’ ने, जो रेवाड़ी की ‘धूसर’ जाति से सम्बन्धित था, अपनी योग्यता द्वारा उच्चपद प्राप्त करके अपने स्वामी को विश्वासपात्र बन गया.
  • उसने ‘‘बड़ी नीचतापूर्ण चालाकी’ द्वारा ‘‘विक्रमाजीत” की उपाधि धारण कर ली.
  • देश में असन्तोष फैला हुआ था तथा षड्यन्त्र व राजद्रोह व्याप्त था.
  • राजा के भतीजे सिकन्दर सूर ने दिल्ली, आगरा, मालवा, पंजाब और बंगाल पर अधिकार कर लिया तथा मोहम्मद आदिल के अधीन केवल गंगा के पूर्वस्थित प्रान्त ही रह गए.
  • पाँच अफगान राजा प्रभुत्व के लिए संघर्ष कर रहे थे ये थे-
  1. बिहार व जौनपुर आदि में मोहम्मद शाह, 
  2. दिल्ली व समस्त दोआब में इब्राहिम,
  3. पंजाब में अहमद खाँ सूर (उसने सिकन्दर शाह की उपाधि धारण की),
  4. बंगाल में मोहम्मद खाँ (उसने सुल्तान मोहम्मद की उपाधि धारण की),
  5. मालवा में सुजात खाँ का पुत्र दौलत खाँ..
  • ऐसी परिस्थितियों में हुमायूँ ने सिकन्दर सूर को पराजित करके दिल्ली पर अधिकार कर लिया.
  • इस प्रकार दूसरे अफगान साम्राज्य का अन्त हो गया.

 

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