Tuesday, August 14, 2018

गयासुद्दीन बलबन (1266-86 ई.) Ghiyasuddin Balban in Hindi

गयासुद्दीन बलबन (1266-86 ई.) Ghiyasuddin Balban in Hindiनासिरुद्दीन के साथ ही इल्तुतमिश के ‘शम्शी वंश’ का अन्त हुआ व ‘बलवनी वंश‘ का सल्तनत पर अधिकार हो गया. बलबन सल्तनत काल का सबसे योग्य, सक्षम और प्रभावशाली शासक हुआ.

 

गयासुद्दीन बलबन (1266-86 ई.) Ghiyasuddin Balban in Hindi

 

गयासुद्दीन बलबन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन बलबन था. उसे ख्वाजा जमालुद्दीन वसरी नामक व्यक्ति खरीद कर 1232-33 ई. में दिल्ली लाया था. इल्तुतमिश ने ग्वालियर को जीतने के उपरान्त बहाउद्दीन को खरीद लिया था.

अपनी योग्यता के आधार पर ही वह इल्तुतमिश और रजिया के समय में ‘अमीर-ए-आखर’ तथा मसूद शाह के समय में ‘अमीर-ए-हाजिब’ के रूप में राज्य की सम्पूर्ण शक्ति का केन्द्र बना. 1266 ई. में बह गयासुद्दीन बलबन के नाम से सुल्तान बना.

गयासुद्दीन बलबन (Ghiyasuddin Balban) ने इल्तुतमिश द्वारा स्थापित ‘चालीस’ सरदारों के दल को समाप्त किया तथा बंगाल के विद्रोही सरदार तुगरिल खाँ का दमन किया. तुगरिल खाँ को पकड़ने में मलिक मकद्दीर ने बहुत साहसिक व कठिन कार्य किया अतः बलबन ने उसे ‘तुगरिलकुश’ (तुगरिल की हत्या करने वाला) की उपाधि प्रदान की.

पश्चिमोत्तर में मंगोलों से निपटने के लिए बनबन ने इमादुलमुल्क को ‘दीवन-ए-अर्ज‘ नियुक्त किया तथा सीमांत प्रदेशों में कई किलों का निर्माण करवाया. उसने वृद्ध व अयोग्य सैनिकों को पेंशन देकर मुक्त करने की नीति चलाई और अपने सैनिकों को नकद वेतन दिया.

तुर्की प्रभाव को कम करने के लिए उसने सिजदा (घुटनों के बल बैठ कर सिर झुकाना), पाबोश (सुल्तान के पाँव चुमना) तथा नवरोज उत्सव की फारसी परम्पराओं का प्रचलन अनिवार्य कर दिया. विद्रोहियों के प्रति उसने ‘लौह एवं रक्त’ की नीति का अनुसरण किया. गयासुद्दीनबलबन ने एक अत्यन्त कुशल जासूस व्यवस्था का संगठन किया.

राजपद का सिद्धान्त – बलबन राजपद के दैवी सिद्धान्त को मानता था. वह राजा को पृथ्वी पर ‘निमायते खुदाई’ (ईश्वर का प्रतिबिम्ब) मानता था. उसने ‘जिल्ली इल्लाह’ (ईश्वर का प्रतिबिम्ब) की उपाधि धारण की.

उसने ईश्वर, शासक तथा जनता के बीच त्रिपक्षीय सम्बन्धों को राजपद का आधार बनाना चाहा. उसने कुरान के नियमों के आधार पर शासन चलाया तथा खलीफा के महत्व को स्वीकार करते हुए अपने द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर खलीफा के नाम को अंकित कराया तथा उसके नाम से खुतबे भी पढ़े.

1286 ई. में मंगोलों ने बलबन के पुत्र मुहम्मद की हत्या कर दी. इस सदमें को सुल्तान सहन न कर सका. जब उसने अपना अन्त समय निकट पाया तो उसने अपने पुत्र बुगरा खाँ को निमन्त्रण भेजा.

मगर अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर बुगरा खाँ नहीं आया. फलस्वरूप गयासुद्दीनबलबन ने मुहम्मद के पुत्र खुसरों को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और कुछ ही समय बाद 80 वर्ष की अवस्था में 1286 ई. में ही बलबन की मृत्यु हो गई.

गयासुद्दीन बलबन (Ghiyasuddin Balban) शरीयत का कट्टर समर्थक था तथा वह दिन में 5 बार नमाज पढ़ता था. सुल्तान बनने के बाद उसने शराब व भोग-विलास पूर्णतः त्याग दिए. उसके राजदरबार में अनेक कलाकार एवं विद्धान थे.

फारसी के प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरोंअमीर हसन तथा उनके अतिरिक्त ज्योतिषी एवं चिकित्सक मौलाना हमीमुद्दीन मुतरिज, प्रसिद्ध मौलाना बदरुद्दीन एवं मौलाना हिसानुद्दीन आदि बलबन के दरबार में थे.

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नासिरुद्दीन महमूद (1246-66 ई.) Nasiruddin Mahmud in Hindi

नासिरुद्दीन महमूद (1246-66 ई.) Nasiruddin Mahmud in Hindi -1236 से 1246 ई. तक के काल में नासिरुद्दीन महमूद राज्य में अमीरों या तुर्क सरदारों की शक्ति का प्रभाव देख चुका था. अतः उसने राज्य की समस्त शक्ति बलबन को सौंप दी.

 

नासिरुद्दीन महमूद (1246-66 ई.) Nasiruddin Mahmud in Hindi

 

अगस्त 1249 ई. में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नासिरुद्दीन महमूद से कर दिया. 7 अक्टूबर, 1249 ई. को सुल्तान ने बलबन को ‘उलूग खाँ‘ की उपाधि प्रदान की व बाद में उसे ‘अमीर-ए-हाजिब’ बनाया.

कालान्तर में 1253 ई. में बलबन को पदच्युत करके हाँसी भेज दिया गया तथा मलिक मुहम्मद जुनैदी को ‘वज़ीर’, किशलू खाँ (बलबन का भाई) को ‘नाइब अमीरे-हाजिब’ और इमादुद्दीन रेहान को ‘वकीलदार’ या ‘अमीरे-हाजिब’ का पद दिया गया.

बलबन ने पुनः तुर्क सरदरों का समर्थन प्राप्त किया तथा 1255 ई. में पुनः ‘नाइब-ए-मुमलिकत’  का पद प्राप्त कर लिया. सम्भवतः इसी समय बलबन ने सुल्तान से ‘छत्र’ (सुल्तान के पद का प्रतीक) प्रयोग की अनुमति प्राप्त कर ली.

नासिरुद्दीन महमूद (Nasiruddin Mahmud) के काल में बलबन ने ग्वालियर, रणथंभौर, मालवा तथा चन्देरी के राजपूतों का दमन किया, दिल्ली के आस-पास के क्षेत्र में लुटेरे मेवातियों का दमन किया तथा प्रतिद्वन्द्वी मुस्लिम सरदारों (रहान आदि) की शक्ति को कुचला. उसने 1249 ई. में मंगोल नेता हलाकू से समझौता करके पंजाब में शान्ति स्थापित की.

12 फरवरी, 1265 ई. में सुल्तान की अचानक मृत्यु हो गई. क्योंकि नासिरुद्दीन महमूद का कोई पुत्र नहीं था. अतः बलबन उसका उत्तराधिकारी बना.

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अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46 ई.)Alauddin masud Shah in Hindi

अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46 ई.)Alauddin masud Shah in Hindi -अलाउद्दीन मसूद शाह बहराम शाह के भाई रुक्नुद्दीन फिरोजशाह का पुत्र व इल्तुतमिश का पौत्र था.

 

अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46 ई.)Alauddin masud Shah in Hindi

 

उसके समय में तुर्क सरदार सर्वोच्च बने रहे तथा मसूद शाह के पास केवल सुल्तान की उपाधि मात्र ही रह गई. ‘नाईब-ए-मुमलिकत‘ के पद पर तुर्क नेता मलिक कुतुबुद्दीन हसन को नियुक्त किया गया.

शासन का वास्तविक अधिकार वजीर मुहाजिबुद्दीन के हाथ में था. वह जाति से ताजिब (गैर तुक) था. अतः तुर्क सरदारों के विरोध के परिणामस्वरूप यह पद नजीमुद्दीन अबुबक्र को प्राप्त हुआ. चालीस सरदारों में से बलबन को अमीर-ए-हाजिब नियुक्त किया गया. धीरे-धीरे सारी शक्ति बलबन ने अपने हाथों में एकत्र कर ली.

1945 ई. में मंगोल एक बार फिर भारत में प्रकट हुए. बलबन ने मंगोल नेता मंगु के विरुद्ध सल्तनत की सेना का संचालन करके लाहौर, उच्च व मुल्तान पर अधिकार कर लिया.

उसने ‘चालीस‘ के सदस्यों का विश्वास भी प्राप्त कर लिया तथा नासिरुद्दीन महमूद व उसकी मां से मिल कर अलाउद्दीन मसूद शाह (Alauddin masud Shah) के विरुद्ध एक षड्यन्त्र रचा.

10 जून, 1246 ई. को चार वर्ष एक मास और एक दिन के शासन के पश्चात् अलाउद्दीन मसूद को कैद कर लिया गया तथा नासिरुद्दीन महमूद को सिंहासन पर बिठाया गया.

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Sunday, August 12, 2018

मुईजुद्दीन बहराम शाह (1240-42 ई.) Muiz ud din Bahram shah

मुईजुद्दीन बहराम शाह (1240-42 ई.) Muiz ud din Bahram shahरजिया सुल्ताना के पश्चात् तुर्क सरदारों ने उसके भाई व इल्तुतमिश के तीसरे पुत्र मुईज्जुद्दीन बहराम शाह(Muiz ud din Bahram shah) को सुल्तान बनाया.

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रजिया सुल्ताना (1236-40 ई.) Razia Sultana in hindi

रजिया सुल्ताना (1236-40 ई.) Razia Sultana in hindi– रजिया सुल्ताना दिल्ली के अमीरों तथा जनता के सहयोग से सिंहासन पर बैठी थी. अतः अन्य तुर्क सरदार जैसे निजामुल मुल्क जुनैदी, मलिक अलाउद्दीन जानी, मलिक सैफुद्दीन कूची, मलिक ईनुद्दीन कबीर खाँ अयाज एवं मलिक इजुद्दीन सलारी आदि रजिया के प्रबल विरोधी बन गए.

 

रजिया सुल्ताना (1236-40 ई.) Razia Sultana in hindi

 

रजिया सुल्ताना ने बड़ी बुद्धिमत्ता से इजुद्दीन सलारी और इनुद्दीन कबीर खाँ को अपनी ओर मिलाकर उनमें फूट डाल दी और सफलता पूर्वक उनके विद्रोह को कुचल दिया. इसके पश्चात् रजिया सुल्तान ने राजपूतों को परास्त कर रणथम्भौर पर अधिकार कर लिया तथा इस किले को ध्वस्त करवा दिया.

रजिया सुल्ताना  (Razia Sultana) की शक्ति एवं सम्मान में वृद्धि करने हेतु रजिया सुल्ताना ने अपने व्यवहार में परिवर्तन किया. उसने पर्दा-प्रथा को त्याग कर पुरुषों जैसी वेशभूषा (‘कुबा‘ या कोट व ‘कुलाह‘ या टोपी) धारण करनी आरम्भ कर दी तथा घुड़सवारी, शिकार तथा सैन्य संचालन जैसे वीरतापूर्ण कार्य करने आरम्भ कर दिए.

उसने अपने विरोधियों का अन्त किया तथा शासन कार्यों में रुचि ली. अपने उच्चाधिकारियों की उसने स्वयं नियुक्ति की. उसने इख्तियारुद्दीन ऐतगीन को ‘अमीर हाजिब’ तथा जमालुद्दीन याकूत (अबीसीनिया की निग्रो जाति का) को ‘आखूर’ (घुड़सवारों का प्रधान) तथा मलिक हसन गोरी को प्रधान सेनापति नियुक्त किया.

रजिया सुल्ताना  (Razia Sultana)के शासन काल में चहलगानी (चालीस) सरदारों ने उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचने आरम्भ कर दिए. 1239 ई. में लाहौर-मुल्तान के गवर्नर आयाज ने विद्रोह किया जिसे दबा दिया गया.

मीर हाजिब ऐतगीन के नेतृत्व में अन्य तुर्क सरदारों ने रजिया के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा तथा भटिंडा के गवर्नर अल्तूनिया से मिल कर विद्रोह. कर दिया. 1240 ई. में रजिया ने अल्तूनिया के विरुद्ध कूच किया. पूर्व योजनानुसार ऐतिगीन ने जमालुद्दीन याकूत की हत्या कर दी.

रजिया सुल्ताना को भी कैद कर लिया गया. रजिया ने अल्तूनिया से मिल जाना अच्छा समझा तथा उसके साथ विवाह कर लिया. इससें तुर्क सरदार और भी क्रोधित हुए और सम्भवतः अल्तूनिया का तुरन्त ही वध कर दिया गया लेकिन रजिया सुल्ताना भागने में सफल हुई. मगर उसे जंगल में सोते हुए कुछ डाकुओं ने मार डाला.

रजिया की असफलता के कारण मुख्यतः उसका स्त्री होना, याकूत से प्रेम, ‘चालीसा‘ का विरोध तथा मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया से रजिया का विवाह आदि माने जाते हैं रजिया दिल्ली सल्तनत की प्रथम तुर्क महिला शासिका थी.

उसने अपने गुलाम सरदारों पर पूर्ण नियन्त्रण रखा. लेकिन फिर भी वह देदीप्यमान चरित्र वाली स्त्री अपनी महत्ता सिद्ध करने में असफल रही.

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रुक्नुद्दीन फिरोजशाह (1236 ई.)ruknuddin Firoz Shah in hindi

रुक्नुद्दीन फिरोजशाह (1236 ई.)ruknuddin Firoz Shah in hindiइल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी बनाया था, परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके सबसे बड़े पुत्र रुक्नुद्दीन फिरोजशाह को गद्दी पर बिठाया गया.

रुक्नुद्दीन फिरोजशाह (1236 ई.)ruknuddin Firoz Shah in hindi

उसकी माता शाह तुर्कान(shah turkan)मूलतः एक तुर्की दासी थी. रुक्नुद्दीन फिरोजशाह एक अयोग्य व विलास-प्रिय शासक सिद्ध हुआ. उसे ‘विलास-प्रेमी’ जीव कहा गया है. शासन कार्यों में उसकी रुचि नहीं थी, अतः शासन कार्य का भार उसने अपनी मां शाह तुर्कान को सौंपा हुआ था.

उनके अत्याचारों से चारों और विद्रोह व अशान्ति की स्थिति उत्पन्न हो गई. हाँसी, बदायूँ व लाहौर के प्रान्ताध्यक्षों ने रुक्नुहीन की सत्ता मानने से इन्कार कर दिया. सुल्तान व उसकी मां ने रजिया की हत्या करने का भी षड्यन्त्र रचा.

मुस्लिम सरदारों ने शाह तुर्कान(shah turkan) की हत्या कर दी और रुक्नुद्दीन फिरोज को भी बन्दी बना कर उसकी हत्या कर दी गई. इस प्रकार 6 महीने व 7 दिन बाद ही रुक्नुद्दीन के शासन का अन्त हो गया.

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इल्तुतमिश (1210-36 ई.)गुलाम वंश | दिल्ली सल्तनत | Iltutmish in Hindi

इल्तुतमिश (1210-36 ई.)गुलाम वंश- दिल्ली सल्तनत-Iltutmish in Hindi-इल्तुतमिश के साथ इल्बारी (शक्शी) वंश का शासन आरम्भ हुआ. यह भी एक दास था तथा अपनी योग्यता के बल पर वह बदायूँ का प्रान्ताध्यक्ष बना और मुहम्मद गोरी के आदेश पर उसे दासता से मुक्ति तथा ‘अमीर-उल-उमरा’ की उपाधि मिली. इल्तुतमिश आरामशाह को पराजित करके शम्सुद्दीन के नाम से सिंहासन पर बैठा .

 

इल्तुतमिश (1210-36 ई.)गुलाम वंश | दिल्ली सल्तनत |Iltutmish in Hindi

सुल्तान बनते ही उसने कुत्बी तथा मुईज्जी सरदारों के विद्रोहों का दमन किया. उसने अपने चालीस गुलाम सरदारों का एक गुट बनाया जिसे ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी‘ या ‘चारगान’ कहा गया.

ताजुद्दीन यल्दौज ने 1214 ई. में लाहौर पर अधिकार कर लिया. इल्तुतमिश ने उसे तराइन के युद्ध में पराजित किया. 1217 ई. में नारिरुद्दीन कुबाचा को पराजित किया गया. 1227 ई. में उसे पूर्ण रूप से पराजित किया गया तथा कुबाचा की सिन्धु नदी में डूब कर मृत्यु हो गई. अपने शासन काल में इल्तुतमिश को बड़े संकट का सामना करना पड़ा.

उसने बड़ी बुद्धिमत्ता से मंगोलों के आक्रमण से स्वयं को बचा लिया. ख्वारिज्म शाह का पुत्र जलालुद्दीन मांगबरनी मंगोल नेता चंगेज खाँ के भय से भारत की ओर भागा और इल्तुतमिश(Iltutmish) ने बड़ी बुद्धिमत्ता से उसे संरक्षण देने से टाल दिया. चंगेज खाँ जलालुद्दीन मांगबरनी का पीछा करने हुए 1220-21 ई. में सिन्ध तक आ गया. 1228 ई. में जलालुद्दीन मागबरनी के वापस लौटने के मंगोल आक्रमण का भय टल गया.

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद अली मरदान ने ‘अलाउद्दीन‘ की उपाधि धारण करके स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित किया. उसके बाद उसका पुत्र हिसाम-उद-दीन इवाज़ उसका उत्तराधिकारी बना.

1225 ई. में इल्तुतमिश (Iltutmish)ने उसके विरुद्ध अभियान भेजा तथा उसने सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली. मगर शीघ्र ही विद्रोह कर दिया. 1926 ई. में इल्तुतमिश के पुत्र नासिरुद्दीन महमूद ने उसे पराजित करके लखनौती पर अधिकार कर लिया.

मगर दो वर्ष बाद नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु होने पर बल्का खिलजी ने बंगाल पर उसका अधिकार कर लिया. 1930 ई. में इल्तुतमिश(Iltutmish) ने उसे पराजित किया व बल्का खिलजी मारा गया. इस प्रकार बंगाल एक बार फिर सल्तनत के अधीन हो गया.

इल्तुमिश(Iltumish) ने 1226 में रणथंभौर पर तथा 1227 ई. परमारों की राजधानी मन्दौर पर अधिकार कर लिया. 1231 ई. में उसने ग्वालियर, 1233 ई. में चंदेलों के विरुद्ध तथा 1234-35 ई. में उज्जैन एवं भिलसा के विरुद्ध अभियानों में सफलता प्राप्त की.

18 फरवरी, 1229 ई. को बगदाद के खलीफा के राजदूत ने दिल्ली आकर उसे मानाभिषेक पत्र (मंसूर) प्रदान किया. खलीफा ने उसे ‘सुल्तान-ए-आजम‘ की उपाधि प्रदान की. ‘खिलअत’ प्राप्त होने के पश्चात् इल्तुतमिश ने ‘नासिक-अमीर-अल-मोमिन‘ की उपाधि धारण की. उसका अन्तिम अभियान ‘बनमयान’ के विरुद्ध था. मगर मार्ग में ही वह बीमार हो गया तथा 29 अप्रैल 1236 ई. को उसका देहान्त हो गया.

इल्तुमिश(Iltumish) प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने शासन व्यवस्था में सुधार करने का प्रयास किया तथा चाँदी-सोने के अरबी ढंग के सिक्के चलाए. उसने चाँदी का टंका (लगभग 175 ग्रेन का) तथा ताँबे का जीतल चबाया. उसने ‘इक्ता व्यवस्था’ का प्रचलन भी किया. अपनी राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थानान्तरित किया.

1231-32 ई. में इल्तुतमिश ने दिल्ली में मेहरोली के निकट सुप्रसिद्ध कुतुबमीनार का निर्माण (Qutub Minar) पूरा करवाया. उसने ‘अजमेर की मस्जिद‘ का निर्माण भी करवाया तथा सम्भवतः भारत में पहला मकबरा स्थापित करने का श्रेय भी इल्तुतमिश को ही दिया जाता है.

रूहानी, मलिक ताजुद्दीन रेजाब तथा ‘तबकात-ए-नासिरी’ के लेखक मिन्हाज-उस-सिराज आदि विद्वानों को इल्तुतमिश ने अपने दरबार में संरक्षण दिया. अवफी ने इल्तुतमिश के शासन काल में ही ‘जिवामी-उल-हिकायत‘ की रचना की.

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