Wednesday, September 5, 2018

सल्तनत काल न्याय प्रशासन (Sultanate Justice administration)

सल्तनत काल न्याय प्रशासन (Sultanate Justice administration)-मुस्लिम कानून के चार स्रोत कुरान, हदीस, इजमा एवं कयास थे. इनके नियमों के आधार पर न्यास किया जाता था.

सल्तनत काल न्याय प्रशासन (Sultanate Justice administration)

कुरान

  • यह मुसिल्म कानून का प्रमुख स्रोत था.
  • इसके नियमों की सहायता से प्रशासकीय समस्याओं का समाधान किया जाता था.

हदीस

  • इस ग्रन्थ में पैगम्बर के कार्यों और कथनों का उल्लेख किया गया है.
  • जव ‘कुरान’ के नियमों के माध्यम से किसी समस्या का समाधान नहीं होता था तो ‘हदीस’ का सहारा लिया जाता था.

इजमा

  • मुस्लिम कानूनों की व्यवस्था करने वाले विधिशास्त्रियों को ‘मुजतहिद’ कहा जाता था.
  • अतः मुजतहिद द्वारा व्याख्यायित कानून को अल्ला की इच्छा माना जाता था.
  • इसे ‘इजमा’ कहा जाता था.

कयास

  • तर्क के आधार पर विश्लेषित कानून को ‘कयास’ कहा जाता था.

न्याय विभाग दिल्ली के सुल्तानों का एक असंगठित विभाग था.

सुल्तान, सद्र-उस-सुदूर, काजी-उल्-कजात आदि न्याय से सम्वन्धित सर्वोच्च अधिकारी थे.

सुल्तान दीवान-ए-कजा तथा दीवान-ए-मजालिम के द्वारा भी न्याय का काम पूरा करता था.

इस दिशा में मुहम्मद तुगलक ने एक नया विभाग दीवान-ए-रियासत’ कायम किया.

‘दीवान-ए-मजालिम’ का अध्यक्ष’ अमीरे-दाद होता था.

दीवान-ए-मुमालिक सुल्तान को कानूनी परामर्श देता था.

प्रान्ताध्यक्षों की सहायता काजी या ‘साहिब-ए-दीवान’ करते थे.

सल्तनत काल में मुख्यतः चार प्रकार के कानून थे —

  1. सामान्य कानून – व्यापार आदि से सम्बन्धित कानून थे, जो मुस्लिम तथा गैर मुस्लिम दोनों पर लागू होते थे. सामान्यतः यह कानून केवल मुसलमानों पर ही लागू थे.
  2. देश का कानून – सुल्तानों के अधीन या शासित देश में प्रचलित स्थानीय कानून .
  3. फौजदारी कानून – यह कानून मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों पर समान रूप से लागू होता था.
  4. गैर-मुस्लिमों के कानून – हिन्दू या गैर-मुस्लिमों के सामाजिक या धार्मिक मामलों में सल्तनत का नाम मात्र ही हस्तक्षेप होता था. ये मामले प्रायः पंचायतों में विद्वान पण्डित एवं ब्राह्मण लोगों द्वारा सुलझाए जाते थे.

दण्ड-विधान

  • सल्तनत काल में दण्ड-विधान कठोर था.
  • अपराधानुसार अंग-भंग, मुत्यु दण्ड तथा सम्पत्ति जब्त कर लेना आदि दण्ड दिए जाते थे.

प्रान्तीय न्यायालय (सल्तनत काल न्याय प्रशासन)

प्रान्तों में चार प्रकार के न्यायालय अस्तित्व में थे (सल्तनत काल न्याय प्रशासन Sultanate Justice administration)

1. गवर्नर का न्यायालय

  • यह प्रान्त का सर्वोच्च न्यायालय होता था जिसे ‘वली’ कहते थे.
  • वली या गवर्नर मुकद्दमों के सम्बन्ध में काजी-ए-सूबा की सहायता लेता था
  • उसके निर्णय के विरुद्ध केन्द्रीय न्यायालय में अपील की जा सकती थी. 

2. काजी-ए-सूबा का न्यायालय

  • यह मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर सुल्तान द्वारा नियुक्त किया जाता था तथा दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार के मुकद्दमों का फैसला करता था.
  • प्रान्त के अन्य काजियों तथा परगनों में काजियों की नियुक्ति हेतु व्यक्तियों की सिफारिश भी ‘काजी-ए-सूबा’ ही करता था .

3. दीवान-ए-सूबा का न्यायालय

  • यह केवल भूमि-राजस्व सम्बन्धी मामलों पर ही फैसला देता था.

4. सद्रे-सूबा का न्यायालय

  • दीवाने-सूबा की तरह इस न्यायालय का अधिकार क्षेत्र भी बहुत सीमित था.
  • प्रान्त में यथा-मुफ्ती, गुहतसिब व दादबक आदि न्याय सम्बन्धी पदाधिकारी होते थे.
  • काजी, फौजदार, आमिल, कोतवाल, ग्राम-पंचायतें आदि प्रान्तों के न्यायिक उप-विभागों में शामिल थे.

सल्तनत काल न्याय प्रशासन (Sultanate Justice administration)

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सल्तनत काल सैनिक प्रशासन (Sultanate Era Military Administration)

सल्तनत काल सैनिक प्रशासन (Sultanate Era Military Administration)-दिल्ली सल्तनत की शासन व्यवस्था मुख्यतः सैनिक शक्ति पर आधारित थी.

 

सल्तनत काल- सैनिक प्रशासन (Sultanate Era - Military Administration)

 

 सुल्तान की सेना में मुख्यतः चार प्रकार के सैनिक थे-

  1. सुल्तान द्वारा रखे गए स्थायी सैनिक.
  2. सरदारों तथा प्रान्ताध्यक्षों द्वारा रखे गए स्थायी सैनिक.
  3. युद्ध के समय भर्ती किए गए (अस्थायी) सैनिक.
  4. जिहाद (धर्म युद्ध) लड़ने वाले स्वयं-सेवक. इन्हें लूट के माल में से हिस्सा दिया जाता था.
  • सुल्तान के सैनिक ‘हश्म-ए-कल्ब’ कहलाते थे .
  • सुल्तान की सेवा में रहने वाली टुकड़ियाँ ‘खसाह खैल’ कहलाती थीं.
  • युद्ध के समय सरदारों व प्रान्ताध्यक्षों की सेनाएं ‘दीवान-ए-आरिज’ के अधीन रहती थीं.
  • सैनिकों की भर्ती प्रशिक्षण व पदोन्नति आदि के विषय में कोई सामान्य नियम नहीं थे.

अलाउद्दीन खिलजी ने नकद वेतन देकर एक विशाल स्थायी सेना रखी, किन्तु फिरोजशाह तुगलक ने इस सेना को सामन्ती संगठन में परिणत कर दिया.

सैनिकों में कट्टरपन जागृत करने के लिए मौलवी व उलेमा लोगों को भी सेना में रखा जाता था.

दिल्ली के सुल्तान की सेना एक बहुरूपी वस्तु थी. इसमें विभिन्न प्रकार के तुर्की वंश, तजिक लोग,फारसी, मंगोल, अफगान, अरबी, अबीसीनियावासी, भारतीय मुसलमान व हिन्दू आदि थे.

पैदल, घुड़सवार व हाथी सेना के मुख्य अंग थे. घुड़सवार सेना को बहुत महत्व दिया जाता था तथा अरब, तुर्किस्तान, रूस आदि देशों से अच्छी नस्ल के घोड़े मंगवाए जाते थे.

ज्यादा सिपाहियों को ‘पायक’ कहते थे . ये अधिकतर हिन्दू, दास, नीच जाति के गरीब (जो घोड़े नहीं रख सकते थे) होते थे, जो निजी रक्षक तथा द्वारपाल के रूप में अच्छी सेवा करते थे.

हाथियों को भी सेना में विशेष स्थान दिया जाता था तथा ‘शहना-ए-पील’ के अधीन हस्तिदल को रखा गया था.

सेना का संगठन दाशमिक आधार पर किया जाता था.

  • ‘सर-ए-खेल’ के अधीन 10 घुड़सवार
  • ‘सिपहसालार’ के अधीन 10 ‘सर-ए-खेल’;
  • ‘अमीर’ के अधीन 10 ‘सिपहसालार’;
  • ‘मालिक’ के अधीन 10 ‘अमीर’ तथा
  • ‘खान’ के अधीन 10 मलिक होते थे.
1 सर-ए-खेल  10 अश्वारोही
1 सिपहसालार 10 सर-ए-खेल
1 अमीर  10 सिपहसालार
1 मलिक 10 अमीर
1 खान 10 मलिक

 

  • उस समय तोपखाने का प्रचलन नहीं हुआ था. लेकिन इस काल में किलों की दीवारें तोड़ने, बड़े गोले फेंकने, बारुदी गोले व पटाखे आदि फेंकने वाले यन्त्र को ‘मंगलीक’ या ‘अदि’ कहा जाता था.
  • नावों के एक बेड़े को सैनिक सामग्री ढोने के लिए प्रयोग किया जाता था.
  • युद्ध की समस्त जानकारी ‘साहिब-ए-वरीद-ए-लश्कर’ राजधानी तक पहुंचाता था.
  • सुल्तान की अपनी सेना में भी गुप्तचर होते थे.
  • शत्रु सेना की गतिविधियों की सूचना ‘तले अह’ एवं ‘यज्की’ नामक गुप्तचर देते थे.
  • विभिन्न प्रकार के युद्ध-इंजनों का भी प्रयोग किया जाता था, जैसे-चर्ख (शिला प्रक्षेपास्त्र), सवत (सुरक्षित गाड़ी) गरगज (चलायमान मंच), फलावून (गुलेल) आदि.

सेना के आकार व वेतनों में समय-समय पर परिवर्तन होते रहते थे.

अलाउद्दीन खिलजी के समय एक सुसज्जित अश्वारोही को 234 टके प्रति वर्ष मिलते थे.

मुहम्मद तुगलक भोजन, वस्त्र, चारे के अतिरिक्त लगभग 500 टंके दिया करता था.

यह अन्तर सम्भवतः इसलिए है कि अलाउद्दीन ने सैनिकों के वेतन को पर्याप्त रखने के लिए वस्तुओं के मूल्यों में कमी कर दी थी.

यह स्पष्ट नहीं है कि सिपाही को भोजन व वस्त्रों की सुविधाएं केवल युद्ध-काल में ही दी जाती थीं या सामान्य समय में भी दी जाती थीं.

खान को 1 लाख टंके प्रति वर्ष, अमीर को 30 से 40 हजार टंके प्रतिवर्ष, सिपहसालार को 20 हजार टंके प्रतिवर्ष वेतन के रूप में दिए जाते थे.

छोटे अधिकारियों को वर्ष में एक से दस हजार टंके तक वेतन दिया जाता था.

युद्ध के समय सेना को प्रायः अगुवा टुकड़ी, केन्द्रीय टुकड़ी, दक्षिणपक्षी टुकड़ी, वामपक्षी टुकड़ी, पीछे की टुकड़ी और सुरक्षित टुकड़ी में बांटा जाता था. उल्लेखनीय है कि 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी की सेना में ऐसी कोई टुकड़ी नहीं थी.

 

सल्तनत काल सैनिक प्रशासन (Sultanate Era Military Administration)

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सल्तनत काल केन्द्रीय प्रशासन (Sultanate – Central Administration)

सल्तनत काल केन्द्रीय प्रशासन (Sultanate-Central Administration)-प्रशासन के सुचारु संचालन हेतु सुल्तान मन्त्रियों की नियुक्ति करके उन्हें विभिन्न विभाग सौंपता था. इस काल में मन्त्रिपरिषद् को ‘मजलिस-ए-खलवत कहा जाता था.

सल्तनत काल- केन्द्रीय प्रशासन (Sultanate - Central Administration)

 

दास वंश के काल में मन्त्रियों की संख्या चार थी, किन्तु कालान्तर में यह संख्या बढ़ कर 6 हो गई थी.

  1. वजीर
  2. आरिज-ए-मुमालिक
  3. दीवान-ए-रसालत
  4. दीवान-ए-इंशा
  5. सद्ग-उस-सुदूर.
  6. दीवान-ए-कजा 

‘मजलिस-ए-खलवत’ की बैठकें ‘मजलिस-ए-खास’ में हुआ करती थीं. ‘बार-ए-आजम’ (जिसमें विद्वान, मुल्ला, काजी आदि भी उपस्थित रहते थे) में सुल्तान राजकीय कार्यों को अधिक भाग पूरा करता था.

वजीर

  • यह सुल्तान का प्रधानमन्त्री होता था तथा लगान, कर व्यवस्था, दान, सैनिक व्यवस्था आदि सभी विभागों की देश-रेख करता था.
  • मुख्यतः वजीर राजस्व विभाग का प्रमुख होता था.
  • सुल्तान की अनुपस्थिति में शासन कार्य का भार वजीर ही सम्भालता था.
  • वजीर ‘दीवान-ए-इसराफ’ (लेखा परीक्षक विभाग), “दीवान-ए-अमीर कोही’ (कृषि विभाग) आदि का प्रमुख था.
  • ‘नायब वजीर’, ‘मुसरिफ-ए-मुमालिक’, ‘मजमुआदार’, ‘खजीन’ आदि वजीर के सहयोगी होते थे.

नाइब

  • बहराम शाह के शासन काल में उसके सरदारों द्वारा इस पद का सृजन किया गया था तथा दुर्बल सुल्तानों के काल में इस पद का विशेष महत्व रहा.
  • यह पद सुल्तान के पश्चात् सर्वोच्च पद माना जाता था.
  • कालान्तर में शक्तिशाली सुल्तानों द्वारा इस पद को समाप्त कर दिया गया अथवा यह पद किसी को सम्मान देने हेतु उपाधि के रूप में दिया जाने लगा.

नाइब वजीर

  • यह वजीर का अनुपस्थिति में उसके स्थान पर तथा उसकी उपस्थिति में उसके सहयोगी के रूप में कार्य करता था.

मुशरिफ-ए-मुमालिक (महालेखाकार)

  • यह प्रान्तों व अन्य विभागों से प्राप्त होने वाले आय-व्यय का ब्यौरा रखता था.
  • फिरोजशाह के समय यह केवल आय का हिसाब-किताब रखने लगा.
  • इसकी सहायता के लिए नाजिर होता था.

मुस्तौफी-ए-मुमालिक (महालेखा परीक्षक)

  • यह मुशरिफ के लेखों-जोखों की जाँच करता था. कभी-कभी यह मुशरिफ की तरह आय-व्यय का निरीक्षण भी करता था.

मजमुआदार

  • इसका मुख्य कार्य उधार दिए गए धन का हिसाब रखना और आय-व्यय को ठीक करना था.

दीवाने वक्फ

  • इस विभाग की स्थापना जलालुद्दीन खिलजी द्वारा की गई थी.
  • यह व्यय के कागजातों की देख-रेख करता था.

दीवाने मुस्तखराज

दीवाने अमीर-कोही

  • मुहम्मद तुगलक द्वारा स्थापित इस विभाग का मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र को उन्नत बनाना एवं भूमि को कृषि योग्य बनाना था.
  • ये समस्त विभाग वजीर के कार्यालय ‘दीवाने विजारत‘ द्वारा नियन्त्रित होते थे.
  • विजारत को संस्था के रूप में प्रयोग करने की प्रेरणा अब्बासी खलीफाओं ने फारस से ली थी.

आरिजे मुमालिक

  • इसे दीवाने अर्ज’ अथवा ‘दीवाने आरिज’ भी कहा जाता था.
  • यह सैन्य विभाग का प्रमुख था तथा सैनिकों को भर्ती करना, उनका हुलिया दर्ज करना, घोड़ों को दागना, सैनिकों का प्रशिक्षण, सेना का निरीक्षण आदि इसके प्रमुख कार्य थे.
  • इस विभाग का सृजन सुल्तान गयासुद्दीन बलबन ने किया था.

वकीले सुल्तान

  • इस विभाग की स्थापना तुगलक वंश के अन्तिम शासक नसिरुद्दीन महमूद द्वारा की गई थी.
  • ‘वकील-ए-सुल्तान’ का कार्य शासन व्यवस्था एवं सैनिक व्यवस्था की देखभाल करना था.
  • कालान्तर में यह पद समाप्त कर दिया गया.

दीवाने इंशा

  • ‘वरीद-ए-खास’ के अधीन इस विभाग का कार्य शाही घोषणाओं और पत्रों के मसविदे तैयार करना होता था.
  • इसकी सहायता हेतु अनेक दबीर (लेखक) होते थे.
  • सुल्तान के सभी फरमानों को इसी विभाग से जारी किया जाता था.

दीवाने रसालत

  • यह विदेशों से पत्र व्यवहार तथा विदेशी राजदूतों की व्यवस्था करता था.
  • यह विदेशों में राजदूत भी नियुक्त करता था.
  • किन्तु इस विभाग के कार्यों के विषय में अभी तक विवाद है.

सद्र-उस-सुदूर

  • यह धर्म तथा राजकीय दान विभाग का सर्वोच्च अधिकारी होता था.
  • राज्य के प्रधान काजी तथा सद्र-उस-सुदूर का पद प्रायः एक ही व्यक्ति को दिया जाता था.
  • इसका मुख्य कार्य इस्लामी नियमों और उप-नियमों को लागू करना तथा उन नियमों की व्यवहार में पालना हेतु व्यवस्था करना था.
  • वह मस्जिदों, मदरसों, मकतबों आदि के निर्माण हेतु धन की व्यवस्था भी करता था.
  • मुसलमानों से प्राप्त ‘जकात’ (धार्मिक कर) पर इस अधिकारी का अधिकार होता था.

काजी-उल्-कजात

  • यह सुल्तान के पश्चात् न्याय विभाग का सर्वोच्च अधिकारी होता था.
  • मुकद्दमें प्रायः इसी के न्यायालय में शुरू किए जाते थे.
  • इसके न्यायालय में नीचे के काजियों के निर्णयों पर पुनर्विचार किया जाता था.

बरीद-ए-मुमालिक

  • यह गुप्तचर तथा डाक विभाग का अध्यक्ष था.
  • विभिन्न गुप्तचर, संदेशवाहक एवं डाक चौकी इसी के अधीन होती थी.
  • राजमहल तथा दरबार से सम्बन्धित अन्य कर्मचारी निम्नलिखित थे-
  1. वकील-ए-दरयह अत्यन्त महत्वपूर्ण पद था जिस पर सुल्तान विश्वसनीय व्यक्तियों की नियुक्ति करता था. इसके प्रमुख कार्य शाही महल और सुलतान की व्यक्तिगत सेवाओं की देखभाल करना था. शाही आदेशों का प्रसार व क्रियान्वयन इसी के माध्यम से किया जाता था.
  2. बारबरक – यह शाही दरबार की शान-शौकत, रस्मों एवं मर्यादाओं की रक्षा करता था.
  3. अमीर-ए-हाजिब – यह सुल्तान से भेंट करने वालों की जाँच-पड़ताल करता था तथा सुल्तान का निम्न श्रेणी के पदाधिकारियों और जनता के बीच मध्यस्थ का कार्य करता था.
  4. अमीर-ए-शिकार – यह सुल्तान के शिकार की व्यवस्था किया करता था.
  5. अमीर-ए-मजलिस – यह राज्य दरबार में होने वाले उत्सवों और दावतों का प्रबन्ध करता था.
  6. सदर-ए-जहाँदार – यह सुल्तान के अंग-रक्षकों का अधिकारी था.
  7. अमीर-ए-आखूर – यह अश्वशाला (अस्तबल) का अध्यक्ष था.
  8. शहना-ए-पील – यह हस्तिशाला का अध्यक्ष होता था.
  9. दीवान-ए-बंदगान – यह दासों या गुलामों का विभाग था. इसकी स्थापना फिरोजशाह तुगलक ने की थी.
  10. दीवान-ए-इस्तिफाक – यह पेंशन विभाग का अध्यक्ष था.
  11. दीवान-ए-खैरात – यह दान विभाग का अध्यक्ष था. इसकी स्थापना फिरोज तुगलक ने की थी.

सल्तनत काल केन्द्रीय प्रशासन Sultanate-Central Administration

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सल्तनत कालीन प्रशासन, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास तथा सामाजिक और धार्मिक अवस्था

सल्तनत कालीन प्रशासन, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास तथा सामाजिक और धार्मिक अवस्था-सल्तनत काल में सुल्तानों ने भारतीय शासन व्यवस्था के स्थान पर अरबी-फारसी पद्धति पर आधारित शासन व्यवस्था प्रचलित की.

 

सल्तनत कालीन प्रशासन, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास तथा सामाजिक और धार्मिक अवस्था (The Sultanate-Administration, Economic and Cultural Development and Social and Religious Conditions)

 

‘खलीफा इस्लामिक संसार का, पैगम्बर के बाद का सर्वोच्च नेता होता था. किन्तु वह सुल्तानों का नाम मात्र का ही मुखिया होता था. सुल्तानों के लिए ‘खलीफा’ के प्रभुत्व को मानना उनकी इच्छा पर निर्भर करता था.

मुबारक खिलजी ने तो स्वयं अपने को खलीफा घोषित कर दिया था. इस काल में सुल्तानों की प्रशासनिक व्यवस्था पूर्णतः इस्लामिक धर्म व उसके आदर्शों पर आधारित थी.

सुल्तान

यह सल्तनत के प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था. उस पर किसी का अंकुश नहीं होता था.

प्रशासन के सभी विभाग उसके अधीन होते थे. सुल्तान का पद सामान्यतः पैतृक था, क्योंकि सुल्तान प्रायः अपने पुत्र या पुत्री को ही उत्तराधिकारी नियुक्त करता था.

किन्तु अयोग्य शासकों के काल में अमीरों व सरदारों ने सुल्तान को चुनने की प्रणाली का प्रयोग किया. खिज्र खाँ और बहलोल लोदी ने तलवार की शक्ति से सिंहासन प्राप्त किया था.

अतः सल्तनत काल में उत्तराधिकार सम्बन्धी विभिन्न परम्पराओं का प्रचलन था.

अमीर

सल्तनल काल में प्रभावशाली पद अमीरों के अधीन हुआ करते थे.

सुल्तानों के लिए प्रायः अमीरों को अपने पक्ष में करना अनिवार्य होता था.

अमीरों का महत्व इस बात से पता चलता है कि अनेक बार अमीरों ने विद्रोह व षड्यन्त्रों द्वारा सुल्तानों का अपदस्थ करके स्वेच्छा से किसी अन्य को सुल्तान बना दिया.

बलबन और अलाउद्दीन के समय अमीरों का महत्व कम हो गया था, परन्तु लोदी वंश के काल में अमीरों का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया था.

सल्तनत कालीन प्रशासन, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास तथा सामाजिक और धार्मिक अवस्था (The Sultanate-Administration, Economic and Cultural Development and Social and Religious Conditions)

 

सल्तनल काल-केन्द्रीय प्रशासन

सल्तनल काल-सैनिक प्रशासन

सल्तनल काल-न्याय प्रशासन

सल्तनल काल-प्रान्तीय तथा स्थानीय शासन

सल्तनल काल-कृषि एवं राजस्व व्यवस्था

सल्तनल काल-आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास

सल्तनल काल-गुलाम तथा खिलजी कालीन वास्तुकला

सल्तनल काल-तुगलक काल में वास्तुकला

सल्तनल काल-सैय्यद कालीन वास्तुकला

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Monday, September 3, 2018

दिल्ली सल्तनत पर राज करने वाले राजवंश (Dynasty ruling over Delhi Sultanate)

दिल्ली सल्तनत पर राज करने वाले राजवंश (Dynasty ruling over Delhi Sultanate)

 

गुलाम वंश | दास वंश | ममलुक वंश (1206-1290 ई.) Mamluk Dynasty (दिल्ली सल्तनत )

 

वंश   शासक शासन काल
1 कुतबी राजवंश  कुतुबुद्दीन ऐबक 1206-10 ई.
आराम शाह 1210-11 ई.
2 शम्शी राजवंश इल्तुतमिश 1211-36 ई.
रुक्नुद्दीन फिरोज 1236 ई.
रजिया सुल्तान 1236-40 ई.
मुइजुद्दीन बहराम शाह 1240-42 ई.
अलाउद्दीन मसूद शाह 1242-46 ई.
नासिरुद्दीन महमूद 1246-65 ई.
3 बलबनी राजवंश गयासुद्दीन बलबन 1265-87 ई.
  कैकुबाद एवं शम्सुद्दीन 1287-90 ई.

 

खिलजी वंश (1290-1320 ई.) Khilji dynasty

 

शासक शासन काल
जलालुद्दीन फिरोज खिलजी 1290-96 ई.
अलाउद्दीन खिलजी 1296-1316 ई.
शहाबुद्दीन उमर 2 जनवरी से 1 अप्रैल, 1316 ई. तक
कुतुबुद्दीन मुबारक शाह 1316-20 ई.
नासिरुद्दीन खुसरो शाह 15 अप्रैल से 5 सितम्बर, 1320 ई. तक

 

तुगलक वंश (1320-1413 ई.) Tughlaq dynasty(दिल्ली सल्तनत Delhi Sultanate)

 

शासक शासन काल
गयासुद्दीन तुगलक 1320-25 ई.
मुहम्मद बिन तुगलक 1325-51 ई.
फिरोज शाह तुगलक 1351-88 ई.
गयासुद्दीन तुगलक द्वितीय सितम्बर, 1388 ई. से फरवरी, 1389 ई.
अबुबकर शाह 1389-90 ई.
नासिरुद्दीन मुहम्मद शाह  1390-94 ई.
अलाउद्दीन सिकन्दर शाह (हुमायू) 22 जनवरी से 8 मार्च, 1394 ई.
नासिरुद्दीन महमूद तुगलक  1394-1413 ई.

सैय्यद वंश (1414-1450 ई.) Sayyid dynasty(दिल्ली सल्तनत Delhi Sultanate)

 

शासक शासन काल
 खिज्र खाँ 1414-21 ई.
मुबारक शाह 1421-34 ई.
मुहम्मद शाह 1434-44 ई.
अलाउद्दीन आलम शाह 1445-50 ई.

 

लोदी वंश (1451-1526 ई.) Lodi dynasty(दिल्ली सल्तनत Delhi Sultanate)

 

शासक शासन काल
बहलोल लोदी 1451-89 ई.
सिकन्दर शाह लोदी 1489-1517 ई.
इब्राहिम लोदी 1517-26 ई.

 

 

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Saturday, September 1, 2018

लोदी वंश का इतिहास बहलोल लोदी से इब्राहिम लोदी(1451-1526 ई.) Lodi Dynasty in Hindi

बहलोल लोदी (1451-89 ई.) Bahlul Khan Lodi

 

लोदी वंश का इतिहास (Lodi Dynasty in Hindi)- बहलोल लोदी दिल्ली में प्रथम अफगान शासक था. तैमूर के आक्रमण के समय पंजाब में लोदी वंश जों ने अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी.

 

लोदी वंश का इतिहास बहलोल लोदी से इब्राहिम लोदी(1451-1526 ई.) Lodi Dynasty in Hindi

 

बहलोल लोदी अफगानिस्तान के ‘गिजलोई कबीले‘ की महत्वपूर्ण शाखा शहूखेल में पैदा हुआ था. बहलोल लोदी 19 अप्रैल, 1451 ई. को ‘बहलोल शाह गाजी’ की उपाधि धारण करके दिल्ली का सुल्तान बना.

उसने सर्वप्रथम महत्वपूर्ण स्थानों की निगरानी आदि के लिए अफगानों को नियुक्त किया. उसने सम्भल, कोट, इटावा, परी, भोगॉव एवं मेवात आदि पर आक्रमण करके इन्हें अपने अधीन कर लिया.

जौनपुर के महमूद शाह शर्की से सुल्तान का काफी लंबा संघर्ष चला . लेकिन अन्त में बहलोल लोदी की विजय हुई. काल्पी, चलपुर, बड़ी, अलापुर आदि के शासकों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली.

तारीखे-सलातीने अफगान” के लेखक अहमद यादगार का कहना है कि-

“बहलोल लोदी ने सिन्ध पर अधिकार कर लिया और चित्तौड़ पर आक्रमण किया और वहाँ के शासक को पराजित किया.”

1487 ई. में सुल्तान ने ग्वालियर के राजा मानसिंह को पराजित करके उससे 80 लाख टंके वसूल किए. इस सफलता के बाद वापसी पर वह बीमार पड़ गया और जलाली के निकट जुलाई, 1489 ई. में उसका देहान्त हो गया.

उसने लगभग 38 वर्ष तक शासन किया. यह अपने सरदारों को ‘मकसद-ए-अली‘ कहकर पुकारता था व उनका पूर्ण सम्मान करता था. उसने ‘बहलोल सिक्के‘ का प्रचलन करवाया.

 

सिकन्दर शाह लोदी (1489-1517 ई.) Sikandar Shah Lodi

लोदी वंश का इतिहास (Lodi Dynasty in Hindi)-बहलोल लोदी का पुत्र एवं उत्तराधिकारी निजाम खाँ 17 जुलाई, 1489 ई. में ‘सुल्तान सिकन्दर शाह लोदी‘ के नाम से सिंहासन पर बैठा.

उसने अपने भाई (जौनपुर के शासक बारबक शाह) को पराजित किया, परन्तु उदारता पूर्वक उसे जौनपुर का शासक रहने दिया.

मगर जब वह जौनपुर में जागीरदारों को नियन्त्रण में रखने में नाकाम रहा तो उसे कैद में डाल कर सुल्तान ने वहाँ अपने एक अमीर को नियुक्त किया.

सुल्तान ने जथरा (अलीगढ़ का एक गांव) के राज्यपाल तातार खाँ को अपने अधीन किया व बयाना के शासक अशरफ को 1492 ई. में पराजित करके उसकी जागीर अपने साम्राज्य में मिला ली.

सुल्तान ने बिहार के शासक हुसैन शर्की को भी पराजित किया व बाद में उसके सन्धि करके एक-दूसरे के प्रति वफादार रहने का निश्चत किया.

1501 ई. में सुल्तान ने ग्वालियर के राजा मानसिंह के विरुद्ध कूच किया व तीन वर्षों के संघर्ष के पश्चात् विजय प्राप्त की. 1504 में मंद्रालय के विरुद्ध अभियान छेड़ा गया. सुल्तान ने

  • अवंतगढ़ (1507)
  • नरवर (1508) तथा
  • चंदेरी (1512-13) पर अधिकार कर लिया.

1509 ई. में नागौर के शासक मुहम्मद खाँ ने सिकन्दर लोदी की अधीनता स्वीकार कर ली. सुल्तान ने रणथम्भौर पर विजय पाने का प्रयास किया, लेकिन उसे निराश होना पड़ा.

21 नवम्बर, 1517 ई. को गले के कैंसर के कारण सुल्तान सिकन्दर शाह लोदी की मृत्यु हो गई.

1504 ई. में सिकन्दर शाह लोदी ने ‘आगरा‘ शहर की नींव डाली थी व इसे अपनी नई राजधानी बनाया. उसने भूमि के लिए एक प्रमाणिक पैमाना ‘गज-ए-सिकन्दरी‘ का प्रचलन करवाया.

धार्मिक दृष्टि से वह बड़ा ही असहिष्णु था. कहा जाता है कि उसने ज्वालामुखी मन्दिर (कांगड़ा) की मूर्ति के टुकड़े कसाइयों को माँस तोलने के लिए दिए. फिर भी उसे लोदी वंश का सर्वाधिक सफल शासक स्वीकार किया जाता है.

वह विद्या का संरक्षक था तथा उसने संस्कृत के ग्रन्थ “आयुर्वेद” का “फरंहगे-सिकन्दरी’ के नाम से फारसी में अनुवाद करवाया.

इब्राहिम लोदी (1517-26 ई.) Ibrahim Lodi

लोदी वंश का इतिहास (Lodi Dynasty in Hindi)-सिकन्दर लोदी के पश्चात् 29 नवम्बर, 1517 ई. को अमीरों ने सर्व सहमति से उसके पुत्र इब्राहिम को इब्राहिम शाह लोदी के नाम से सिंहासन पर विठाया.

सुल्तान की शक्तियां व निरंकुशता को कम करने हेतु उन्होंने जौनपुर में इब्राहिम के भाई जलाल खाँ को जलालुद्दीन के नाम से शासक बनाया.

इब्राहिम ने बड़ी कूटनीति से अमीरों को अपनी ओर मिलाया व जलाल खाँ का वध करवा दिया. 1517 ई. में इब्राहिम ने ग्वालियर पर मानसिंह के उत्तराधिकारी विक्रमादित्य पर आक्रमण किया व उससे संधि करके ग्वालियर का दुर्ग प्राप्त किया.

मेवाड़ के राणा सांगा (संग्राम सिंह) के विरुद्ध भी सुल्तान ने अभियान छेड़ा. मगर उसे पराजित न कर सका और राणा सांगा (संग्राम सिंह) ने चंदेरी पर अधिकार कर लिया.

उसके काल की उल्लेखनीय बात थी कि उसने अमीरों की शक्ति को सीमित करने का प्रयास किया . फलस्वरूप अमीर उसके विरुद्ध हो गये. अफगान सरदारों ने बिहार के गवर्नर दरिया खाँ लोहानी के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया.

दौलत खाँ लोदी (पंजाब का सूबेदार) तथा सुल्तान के चाचा आलम खाँ (बहलोल का पुत्र) ने काबुल के शासक बाबर को इब्राहिम के विरुद्ध आक्रमण का निमन्त्रण दिया.

आलम खाँ ने अफगान सरदारों की सहायता से स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया. इब्राहिम लोदी के शासन काल की अन्तिम और महत्वपूर्ण घटना पानीपत का प्रथम युद्ध है.

बाबर ने इब्राहिम को पराजित करके दिल्ली और आगरा पर अधिकार करके ‘मुगल वंश‘ की नींव डाली.

इब्राहिम लोदी अनेक कारणों से पराजित हुआ यथा बाबर का योग्य सैनिक संचालन, कुशल व सधे हुए सैनिक, तोपखाने का प्रयोग व तुगलमा जैसी युद्ध नीति आदि के सामने अफगानों की एक लाख से अधिक सेना टिक न सकी .

इब्राहिम की हत्या कर दी गई और उसकी मृत्यु के साथ यही दिल्ली का ‘सल्तनत काल’ समाप्त हुआ और ‘मुगल काल’ का श्रीगणेश हुआ.

 

 

लोदी वंश का इतिहास बहलोल लोदी से इब्राहिम लोदी(1451-1526 ई.) Lodi Dynasty in Hindi

 

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सैय्यद वंश का पूरा इतिहास (1414-1451 ई.) Sayyid dynasty In Hindi

सैय्यद वंश का पूरा इतिहास (1414-1451 ई.) Sayyid dynasty In Hindiखिज्र खाँ द्वारा स्थापित सैय्यद वंश के काल में सबसे ज्यादा उत्तेजित राजनीतिक गतिविधियाँ देखी गयी, किन्तु वे सभी घटनाएँ बहुत घटिया स्तर की थी.

 

सैय्यद वंश का पूरा इतिहास (1414-1451 ई.) Sayyid dynasty In Hindi

 

इसलिए सैय्यद वंश की शक्ति विद्रोहों को दबाने में ही नष्ट हो गई. इस वंश के काल में दिल्ली सल्तनत घटते-घटते केवल 200 मील के घेरे तक ही सीमित रह गई.

 

सैय्यद खिज्र खाँ इब्न मलिक (1414-21 ई.) Sayyid Khizr Khan ibn Malik

 

जब खिज्र खाँ ने दिल्ली पर अधिकार किया, उस समय उसकी स्थिति अत्यन्त कमजोर थी और इसलिए उसने सुल्तान की उपाधि ग्रहण न की और ‘रेयत-ए-आला’ के नाम से ही संतुष्ट रहा.

उसके शासन काल में पंजाब, लाहौर व मुल्तान पुनः सल्तनत के अधीन हो गये. अपने समय में खिज्र खाँ ने कटेहर, इटावा, खोर, चलेसर, बयाना, मेवात, बदायूँ, आदि में विद्रोहों को दबाया.

इस काम में उसके राजभक्त मन्त्री ताजुल्मुल्क ने उसकी बहुत सेवा की. अपने इन अभियानों के दौरान ही 13 जनवरी, 1421 ई. को ताजुल्मुल्क और 20 मई, 1421 ई. को खिज्र खाँ की मृत्यु हुई.

खिज्र खाँ को स्थाई रूप से सल्तनत का विस्तार करने में सफलता नहीं मिली. उसका प्रशासन उदार व न्याय संगत था. वह सैय्यद वंश का सर्वाधिक योग्य शासक था.

 

मुबारक शाह (सैय्यद वंश) (1421-34 ई. )Mubarak Shah

 

सैय्यद खिज्र खाँ ने मृत्यु से पूर्व अपने पुत्र मुबारक शाह को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया. मुबारक शाह ने शाह की उपाधि धारण करके अमीरों व सरदारों की सर्व-सम्मति से सुल्तान का पद ग्रहण किया.

अपने शासन काल में उसने भटिण्डा व दोआब क्षेत्र के विद्रोहों का दमन किया मगर वह नमक की पहाड़ियों के खोखर लोगों को दण्ड नहीं दे सका.

उल्लेखनीय है कि वह पहला सुल्तान था जिसके काल में दिल्ली के दरबार में दो हिन्दू अमीरों का उल्लेख मिलता है.

अपने तेरह वर्ष के शासन काल में उसने मेवात, कटेहर, उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सैनिक कार्यवाहियां की लेकिन यह किसी ठोस और वास्तविक उपलब्धि को पाने में असफल रहा.

उसके आश्रय में प्रसिद्ध इतिहासकार याहिया-बिन-अहमद सरहिन्दी ने ‘तारीखे-मुबारकशाही‘ में लिखा है कि-

“मुबारक शाह का काल अशान्ति एवं विद्रोह का काल था, इसलिए उसका पूर्ण समय विद्रोहों को दबाने में ही व्यतीत हो गया.”

उसमें धर्मान्धता का नाम भी नहीं था. उसने दिल्ली के क्षत्रियों को उदारता पूर्ण संरक्षण दिया और ग्वालियर के हिन्दुओं को अत्याचार से बचाया.

यमुना के तट पर उसने ‘मुबारक बाद‘ नामक एक नगर बसाया, जिसकी जामा-मस्जिद बहुत सुन्दर थी.

19 फरवरी, 1434 ई. को उसके एक सरदार सरवर-उल-मुल्क ने एक षड्यन्त्र द्वारा मुबारक शाह की हत्या करवा दी.

 

मुहम्मद शाह (1434-43 ई.) Mohammad Shah

 

मुबारक शाह के पश्चात् उसका भतीजा फरीद खाँ के नाम से सुल्तान बना. 6 महीने तक वास्तविक सत्ता वजीर सरवर-उल-मुल्क के सहयोग से वजीर का वध करवा कर उससे मुक्ति प्राप्त कर ली.

मुहम्मदशाह के काल में दिल्ली सल्तनत में अराजकता व कुव्यवस्था व्याप्त रही. जौनपुर के शासक ने सल्तनत के कई जिले अपने अधीन कर लिए.

मालवा के शासक महमूद खिलजी ने तो दिल्ली पर ही आक्रमण करने का साहस कर लिया. लाहौर और मुल्तान के शासक बहलोल खाँ लोदी ने सुल्तान की सहायता की.

सुल्तान ने उसे ‘खान-ए-खाना’ की उपाधि दी और. साथ ही उसे अपना पुत्र कह कर भी पुकारा. सुल्तान की स्थिति बहुत दुर्बल हो गई. यहां तक कि दिल्ली से बीस ‘करोह’ की परिधि में अमीर उसके विरोधी हो गए.

1444 ई. में मुहम्मद शाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र अलाउद्दीन ‘आलमशाह‘ के नाम से गद्दी पर बैठा .

 

आलम शाह (1445-51 ई.) Alam Shah

 

आलम शाह अपने देश का सबसे अयोग्य शासक साबित हुआ. आलम शाह के काल में दिल्ली सल्तनत, दिल्ली शहर और कुछ. आस-पास के गाँवों तक रह सीमित हो गई.

बहलोल लोदी (लाहौर का गवर्नर) के भय के कारण आलम शाह अपनी राजधानी दिल्ली कसे हटा कर बदायूँ ले. गया और यहाँ वह भोग-विलास में डूब गया.

उसके मन्त्री हमीद खाँ ने बहलोल लोदी को आमन्त्रित किया, जिसने कि दिल्ली पर अधिकार कर लिया. कुछ समय तक बहलोल खाँ लोदी ने आलम शाह के प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया.

1451 ई. में आलमशाह ने बहलोल लोदी को दिल्ली का राज्य पूर्णतः सौंप दिया और स्वयं बदायूं की जागीर में रहने लगा. वहीं पर 1476 ई में उसकी मृत्यु हुई.

इस प्रकार 37 वर्ष के अकुशल शासन के बाद सैय्यद वंश का अन्त हुआ और लोदी वंश की नींव पड़ी.

 

सैय्यद वंश का पूरा इतिहास (1414-1451 ई.) Sayyid dynasty In Hindi

 

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