Saturday, July 21, 2018

राष्ट्रीय आंदोलन-उग्रवादियों का उदय(1906-1919)Rise of Extremist

उग्रवादियों का उदय, 1906-1919 (Rise of Extremist, 1906-1919)

 

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन-उग्रवादियों का उदय(1906-1919)Rise of Extremist-उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक नए दल का उदय हुआ, जो पुराने नेताओं के आदर्श तथा ढंगों का कड़ा आलोचक था. ये क्रुद्ध तरुण लोग (Angry youngmen) चाहते थे कि कांग्रेस का उद्देश्य स्वराज्य (Swaraj) होना चाहिए, जिसे वे आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से प्राप्त करें. इस नए दल को पुराने उदारवादियों की तुलता में उग्रवादी कहा जाता है.

 

उग्रवाद और आतंकवाद के उदय के कारण (Causes of the Rise of Extremism & Militants)

 

उदारवादियों के लम्बे प्रयत्नों के बावजूद जब मौलिक रूप में कुछ भी हासिल नहीं हो सका तो ऐसा समझा गया कि सरकार ने उदारवादियों के प्रयासों को कमजोरी के चिन्ह के रूप में स्वीकार किया है. अत: बंकिम चन्द्र चटर्जी, अरविन्द घोष तथा बालगंगाधर तिलक आदि नेताओं ने उदारवादियों की आलोचना करते हुए दृढ़ दबावों के द्वारा अधिकार प्राप्त करने के मार्ग को अपनाने की बात कही. बालगंगाधर तिलक के अनुसार “राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ना ही होगा. नरम दल वालों का विचार है कि ये अधिकार प्रेरणा से प्राप्त किये जा सकते हैं. हमारा विचार है कि उनकी प्राप्ति केवल दृढ़ दबाव से ही हो सकती है.”

उग्रवादियों के विपरीत क्रान्तिकारी विचारधारा के लोग बमों और बन्दूकों के उपयोग से स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते थे. उग्रवादी जहां शान्तिपूर्ण लेकिन सक्रिय राजनीतिक आन्दोलनों में विश्वास करते थे, वहीं क्रान्तिकारी अंग्रेजों को भारत से भगाने में शक्ति एवं हिंसात्मक उपायों में विश्वास करते थे. इन दोनों के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे . 

 

1. अंग्रेजी साम्राज्य की प्रकृति को ठीक-ठीक समझना (Enlightenment of True Nature of British Rule) 

 

आरम्भिक राष्ट्रवादी नेताओं ने अपने अध्ययन तथा लेखों के माध्यम से लोगों को भारत में अंग्रेजी राज्य के सच्चे स्वरूप को समझाने का प्रयत्न किया. उन्होंने आंकड़ों से यह सिद्ध किया कि अंग्रेजी राज्य तथा उसकी नीतियां ही भारत की दरिद्रता का मूलभूत कारण हैं. दादा भाई नौरोजी ने अंग्रेजी राज्य की शोषक नीतियों से लोगों को अच्छी तरह परिचित कराकर कहा कि अंग्रेज भारत को लूटने में लगे हुए हैं और भारत की आर्थिक कमजोरी का एकमात्र कारण ये ही हैं. श्री रमेशचन्द्र दत्त और जी. बी. जोशी ने अंग्रेजों की भूमिकर व्यवस्था का सही मूल्यांकन किया तथा श्री सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने इस बात को स्पष्ट किया कि सेवाओं की भर्ती में अंग्रेजों की कथनी और करनी में बहुत अधिक अन्तर है.

कांग्रेस ने शुरू से ही देश की बढ़ती दरिद्रता की ओर ध्यान आकर्षित किया और इससे संबन्धित प्रस्ताव प्रत्येक वर्ष पारित किया जाता था. इसके लिए सैनिक और असैनिक पदों पर नियुक्त यूरोपियनों को मिलने वाले ऊंचे-ऊंचे वेतनों, गृह शासन के तेजी के साथ बढ़ते व्यय, भेद-भाव पूर्ण आयात-निर्यात नीति, अदूरदर्शी भूमि कर नीति, भारत के औद्योगीकरण के प्रति उदासीनता और भारतीयों को अच्छे पदों और सेवाओं से वंचित रखना इत्यादि अनेक कारणों को जिम्मेदार ठहराया.

1892 से 1905 के बीच घटित विभिन्न घटनाओं तथा सरकार के कार्यों ने राष्ट्रवादियों को शासन में मौलिक परिवर्तनों की ओर सोचने के लिए मजबूर किया. 1892 का भारत परिषद् अधिनियम पूर्ण रूप से बाहरी दिखावा था जिससे कुछ भी मूल रूप में हासिल नहीं हुआ. 1899 में कलकत्ता अधिनियम स्वीकृत किया गया जिसके द्वारा कलकत्ता निगम को पूर्ण रूप से सरकारी रूप दे दिया गया. कलकत्ता निगम के कुल सदस्यों की संख्या को 75 को घटाकर 50 कर दिया गया. जो 25 लोग कम किए गए वे कलकत्ता के लोगों के प्रतिनिधि थे. इस व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि निगम में यूरोपीय बहुमत हो गया. 1904 में ‘भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम’ स्वीकृत हुआ. इस कानून से सिण्डीकेट, सीनेट तथा फैकल्टियों के सदस्यों की संख्या इसलिए घटा दी गई ताकि यूरोपियनों को महत्व दिया जा सके. 1904 में ही प्रसिद्ध ‘सरकारी गोपनीयता अधिनियम’ (Official Secrets Act) स्वीकृत हुआ. इस अधिनियम ने सरकार के अधिकारों में वृद्धि कर दी. “विद्रोह” शब्द की परिभाषा विस्तृत कर दी गई. 1889 तथा 1898 के सरकारी गोपनीयता के अधिनियम केवल फौजी गोपनीयता से सम्बन्धित थे. परन्तु 1904 के अधिनियम द्वारा नागरिक मामलों के उन सरकारी रहस्यों तथा समाचार-पत्रों की आलोचना के सम्बन्ध में भी कार्यवाही की जा सकती थी जो सरकार को सन्देहास्पद लगते थे. 1897 में लोकमान्य तिलक तथा कुछ अन्य समाचार-पत्र सम्पादकों को सरकार ने लोगों में सरकार विरोधी भावनाएं जगाने के आरोप में लम्बे कारावास की सजा दे दी थी. लार्ड कर्जन के भारतीयों के विरुद्ध उठाये गए विभिन्न कदमों तथा ब्रिटिश सरकार के किसी भी कार्य की अनुपयोगिता ने भी राष्ट्रवादियों को मौलिक परिवर्तनों के बारे में सोचने के लिए मजबूर किया.

सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भी ब्रिटिश शासन के अधीन किसी प्रकार के सुधार की सम्भावना नहीं थी. बेसिक और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में भी किसी प्रकार की उन्नति नहीं हो रही थी. 1904 के भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम के बाद विश्वविद्यालयों में व्यवहारिक रूप में कोई स्वतंत्रता नहीं रह गई थी. जिसे राष्ट्रवादियों ने भी भारतीय विश्वविद्यालयों के ऊपर कठोर नियंत्रण के रूप में देखा.

इस प्रकार लगातार बढ़ते हुए राष्ट्रवादी भारतीयों ने आवश्यक रूप से माना कि आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक वृद्धि के लिए स्वशासन आवश्यक और मूल आवश्यकता है.

 

2. बढ़ता हुआ पश्चिमीकरण (Increasing Westernisation)

 

भारतीय राष्ट्रवादियों की इस नई पीढ़ी ने देश में बढ़ते पश्चिमीकरण पर गहरी चिन्ता व्यक्त की. भारतीय जीवन, चिन्तन और राजनीति में पश्चिम का प्रभाव बहुत तेजी के साथ बढ़ रहा था जो कि भारतीय धर्मों और विचारों के लिए एक खुली चुनौती था. बढ़ते पश्चिमीकरण के कारण धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति का प्रभाव कम हो रहा था. ब्रिटिश शासक भारतीय राष्ट्रीयता की पहचान को पश्चिमी सभ्यता में विलीन करने में लगे हुए थे.

उदारवादियों की बौद्धिक और भावात्मक प्रेरणा का स्रोत भारत था. और उन्होंने भारत के इतिहास में भारतीय वीरों की गाथाओं से प्ररेणा प्राप्त की थी. बंकिम चन्द्र, स्वामी विवेकानन्द तथा स्वामी दयानन्द के लेखों ने उनको प्रभावित किया. स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय वेदान्त से नवयुवकों में आत्म-विश्वास जगाया तथा अपनी प्राचीन परम्पराओं व विरासत में एक नई आस्था उत्पन्न की. स्वामी दयानन्द ने बताया कि वैदिक काल में जब भारत में एक उच्च सभ्यता, संस्कृति तथा धर्म का विकास हो रहा था उस समय यूरोपवासी असभ्यता तथा अज्ञानता से घिरे हुए थे.

 

3. कांग्रेस की उपलब्धियों से असंतोष (Dissatisfaction with the Performance of the Congress)

 

युवावर्ग कांग्रेस की 15-20 वर्ष की अवधि में प्राप्त उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं था. वे शान्तिमय तथा संवैधानिक ढंगों के आलोचक बन गये थे. उनका अंग्रेजों की न्यायप्रियता तथा बराबरी की भावना पर किसी भी प्रकार का विश्वास नहीं रह गया था. उन्होंने याचना, प्रार्थना तथा प्रतिवाद आदि उपायों को ‘राजनीतिक शिक्षावृत्ति‘ का नाम देकर उनकी कटु आलोचना की. उन्होंने भारत से यूरोपीय साम्राज्यवाद की समाप्ति के लिए यूरोपीय ढंगों को अपनाने पर बल दिया.

कांग्रेस की नई पीढ़ी जिसे अग्रवादी भी कहा जाता है पुरानी पीढ़ी के किसी भी कार्य से असंतुष्ट थी. उनके अनुसार कांग्रेस का ‘राजनीतिक धर्म’ केवल क्राउन के प्रति राजभक्ति प्रकट करना, राजनीतिक उद्देश्य केवल अपने लिए प्रान्तीय अथवा केन्द्रीय विधान परिषदों में सदस्यता प्राप्त करना और उनके ‘राजनीतिक कार्यक्रम- केवल भाषण देना तथा प्रत्येक वर्ष दिसम्बर में कांग्रेस के अधिवेशन में उपस्थित होना था. उन पर यह आरोप लगाया गया कि वे केवल मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों के लिए काम करते हैं. और कांग्रेस की सदस्यता इस मध्यमवर्गीय लोगों तक ही सीमित है. उन्हें भय है कि यदि जन-साधारण इन आंदोलन में आ गया तो उनका नेतृत्व समाप्त हो जाएगा. अत: उदारवादियों पर देश-भक्ति के नाम पर व्यापार (Trading in the name of Patriotism) करने का आरोप लगाया.

 

4. अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव (International Influences)

 

विदेशों में घटित विभिन्न घटनाओं ने राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया. मुख्य रूप से भारतीयों के साथ दक्षिण अफ्रीका में हुए दुर्व्यवहार से अंग्रेज विरोधी भावनाएं प्रबल हुई. साथ ही मिस्र, ईरान, तुर्की और रूस के राष्ट्रवादी आंदोलनों ने भी इन्हें महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया.

1868 के बाद आधुनिक जापान के उदय से यह सिद्ध हो गया कि एशियाई राष्ट्र बिना पश्चिमी राष्ट्रों के नियंत्रण या सहयोग के अपना विकास कर सकते हैं. भारतीय राष्ट्रवादी 1896 में इथोपिया की इटली पर विजय तथा 1905 में जापान की रूस पर विजय से अत्यधिक प्रभावित हुए तथा इससे उनके आत्मविश्वास में वृद्धि हुई. अब यह बात साफ हो गई थी कि यूरोप अजेय नहीं है.

 

5. शिक्षा का विकास (Growth of Education)

 

भारत में शिक्षा के विकास से प्रजातंत्र के बारे में पश्चिमी विचारों, राष्ट्रवाद तथा राजनीति के मौलिक सिद्धान्तों ने भारतीयों को अत्यधिक प्रभावित किया. अधिकतर शिक्षित लोग क्रान्तिकारियों तथा आतंकवादियों की नीतियों के समर्थक बन गए. जिनके लिए स्वराज्य का अर्थ था, “विदेशी नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्रता जिसमें अपने राष्ट्र की नीतियों तथा प्रबन्ध में पूर्णतया स्वतंत्रता हो.” देश में उस समय आर्थिक राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास के लिए स्वशासन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी.

 

6. भारत की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति (Poor Economic Condition of India)

 

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों, अर्थात् 1876 से 1900 के मध्य देश में लगभग 18 बार अकाल पड़े थे. जिससे अपार जन-धन की हानि हुई. 1896-97 और 1899-1900 के बीच बम्बई तथा आस-पास के क्षेत्रों में प्लेग की बीमारी से करीब 1 लाख 73 हजार लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा. जबकि सरकार की ओर से किसी भी प्रकार की सहायता करने के बजाय उल्टा भारतीयों के साथ अमानवीय व बर्बरता का व्यवहार किया जाता था. तिलक ने सरकार के व्यवहार की कटु आलोचना की जिस कारण उन्हें 18 महीने के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई. बाल गंगाधर तिलक ने कहा कि ”प्लेग हमारे लिए सरकारी प्रयत्नों से कम निर्दयी है.”

1902 में दिल्ली दरबार ऐसे समय पर लगाया गया था जबकि लोग भूखों मर रहे थे. सरकार के इस कार्य को अत्यधिक आलोचना की गई तथा लोगों में अत्यधिक रोष व्याप्त हो गया. अंग्रेज सरकार की प्लेग के समय की ज्यादतियों से परेशान होकर चापेकर बन्धुओं ने 1899 में पूना के प्लेग अधिकारी रैण्ड और उसके एक साथी मिस्ट की गोली मारकर हत्या कर दी. इस प्रकार सरकार की गलत नीतियों के कारण भी उग्र-राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन मिला.

 

7. स्वाभिमान का विकास (Growth of Self Respect) 

 

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल जैसे नेताओं ने भारतीय को स्वाभिमानी बनने का पाठ पढ़ाया और कहा कि सभी राष्ट्रवादियों को देश की जनता की शक्ति और क्षमता पर पूरा विश्वास है. उन्होंने लोगों से कहा कि वह अपना भविष्य खुद अपने प्रयत्नों से बनायें. उन्होंने जन आक्रोश का पूरा समर्थन किया. उन्हें संवैधानिक साधनों की सामर्थ्य अथवा इनके प्रयोग पर किसी प्रकार का विश्वास नहीं था.

 

8. बंगाल का विभाजन (The Partition of Bengal)

 

लार्ड कर्जन के शासनकाल 1905 में अंग्रेज सरकार द्वारा बंगाल विभाजन के फैसले के कारण देश-भर में जन-आक्रोश व्याप्त हो गया. कर्जन के हो शासन काल में कुछ और प्रतिक्रियावादी कार्यों, जैसे- कलकत्ता कारपोरेशन अधिनियम एवं विश्वविद्यालय अधिनियम आदि ने भी उग्रवादी कार्यों को प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया. संभवत: कर्जन का बंगाल विभाजन का फैसला हिन्दू-मुस्लिमों में परस्पर फूट डालकर शासन करने की नीति का ही एक अंग था. जिससे स्पष्ट हो गया कि प्रार्थना, याचना तथा सिर्फ प्रतिरोध प्रकट करने से कुछ नहीं होने वाला है.

 

उग्रवादियों के उद्देश्य और ढंग (Objectives and Methods of Extremists)

 

1906 के बाद भारतीय राजनीति में कांग्रेस के भीतर उग्रवादी दल के उदय के साथ-साथ देश में क्रान्तिकारी तथा आतंकवादी दल का भी उद्य हुआ. चार प्रमुख कांग्रेसी नेताओं– बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चन्द्र पाल एवं अरविन्द घोष ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया तथा इनके कार्यों का मार्गदर्शन किया. तिलक ने कहा, “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा.”(Swaraj is my birthright and I shall have it). राष्ट्रवादियों या आतंकवादियों ने स्वराज्य को अपना प्रमुख लक्ष्य एवं उद्देश्य बनाया तथा इनके लिए स्वराज्य का अर्थ “विदेशी नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्रता था जिसमें अपने राष्ट्र की नीतियों तथा प्रबन्ध में पूर्णतया स्वतंत्रता हो.’

उदारवादियों के लिए स्वराज्य का अर्ध साम्राज्य के अन्दर औपनिवेशिक स्वशासन था. दोनों दलों के मार्ग और दुग बिल्कुल अलग-अलग थे. उग्रवादी और आतंकवादियों ने उदारवादियों की तरह संवैधानिक दायरे के अन्दर अपनी मागें मनवाने में विश्वास नहीं जताया. उन्हें अपने अधिकारों के लिए याचना करने या गिड़गिड़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. ये लोग हिंसात्मक प्रतिरोध (Active resistance), सामूहिक आंदोलन तथा आत्म-बलिदान के लिए दृढ़ निश्चय में विश्वास रखते थे. उन्होंने अपने भड़काऊ भाषणों से स्वतंत्रता के लिए तीव्र लालसा तथा आत्म-बलिदान के लिए प्रस्तुत रहने की भावना उत्पन्न करने का प्रयास किया. उन्होने विदेशी माल के बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के महत्व पर बल दिया.

उन्हें जनता पर बहुत अधिक विश्वास था तथा उन्होंने जन-शक्ति तथा समूहिक प्रयासों से स्वराज्य प्राप्त करने का फैसला किया. इसलिए उन्होंने राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए जन समूह के माध्य से कार्य किए.

उग्रवादियों ने विदेशी माल का बहिष्कार और स्वदेशी माल अंगीकार करने तथा राष्ट्रीयता और सत्याग्रह पर भी विशेष बल दिया. विदेशी माल का बहिष्कार बाद में एक शक्तिशाली हथियार के रूप में सामने आया. क्योंकि इसके माध्यम से लोगों से समर्थन प्राप्त करना अधिक सरल था. सरकार नियंत्रित शिक्षा संस्थाओं के स्थान पर एक राष्ट्रीय शिक्षा योजना बनाई गई. उग्रवादी दल की योजना विद्यार्थियों को देश सेवा में लगाने की थी. उग्रवादियों ने सहकारी संगठन को बढ़ावा दिया तथा स्वयंसेवी सभाएं स्थापित की गईं. दिवानी मामलों तथा अहस्तकक्षेप्य (non-cognizable) झगड़ों को सुलझाने के लिए पंचनिणर्य समितियाँ बनाई गई.

 

उग्रवाद का मूल्यांकन (Analysis of Extremisms)

 

यद्यपि राष्ट्रीय आंदोलन में उग्रवाद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही थी परन्तु इसको एक सुसंगठित राजनीतिक दर्शन नहीं कहा जा सकता है. इस धारा से जुड़े हुए लोग विभिन विचारों तथा विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग तरीकों के समर्थक थे. इसके समर्थक एक ओर जहां सक्रिय क्रान्तिकारिता में भागीदारी कर रहे थे वहीं कुछ गुप्त समर्थक तथा कुछ आतंकवाद के विरुद्ध भी थे. यहां तक कि इसके शीर्ष के प्रमुख नेताओं अरविन्द, तिलक, पाल और लाजपत राय सभी अपने राजनीतिक आदशों तथा कार्य-प्रणाली में विभिन्नता लिए हुए थे तथा इनके विचार भी समयानुसार बदलते रहे. उग्रवादी नेता प्रजातंत्र संविधान और प्रगति की बात करते थे तथा राष्ट्रीय आंदोलन के सामाजिक आधार को विस्तृत करना चाहते थे. उग्रवादियों ने अनुभव किया कि अंग्रेजों का भारत छोड़ना किसी-न-किसी प्रकार की प्रत्यक्ष क्रिया और दबाव के बिना सम्भव नहीं. इसीलिए सहयोग के स्थान पर असहयोग और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की नीति को आधार बनाया गया. साथ ही इन लोगों ने जनता को असहयोग, अहिंसात्मक प्रतिरोध, सामूहिक आंदोलन, आत्मनिर्भरता और दुःख सहने” का नया पाठ पढ़ाया.

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Friday, July 20, 2018

उदारवादी युग 1885-1905 (Moderate Period)भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

उदारवादी युग 1885-1905 (Moderate Period)

उदारवादी युग 1885-1905 (Moderate Period)-1885-1905 तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अर्थात् कांग्रेस पर पूरी तरह से उदारवादियों का प्रभाव रहा. इस काल में कांग्रेस का नेतृत्व करने वाले नेता ब्रिटिश उदारवाद से प्रभावित थे. जिन्होंने 20 साल तक कांग्रेस की बागडोर संभाली. इनमें प्रमुख थे- सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, दादाभाई नौरोजी, फीरोजशाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव रानाडे, उमेश चन्द्र बनर्जी तथा पण्डित मदन मोहन मालवीय आदि.

उदारवादी एकदम क्रांति रूप में नहीं, वरन् क्रमिक सुधारों में विश्वास रखते थे. इनका मानना था कि भारत में राष्ट्रीय चेतना के उदय का प्रधान श्रेय ब्रिटिश शासन को है और ब्रिटिश शासन ने भारत के सामाजिक जीवन को पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति का स्पर्श देकर उसमें स्वतंत्रता की भावना जागृत की है. अतः यह उचित है कि देश के राजनीतिक एवं प्रशासनिक क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से धीरे-धीरे सुधार लाने की चेष्टा की जाए. उन्हें पूर्ण विश्वास था कि अंग्रेजी शासन भारत के हित में है तथा वे आशा रखते थे कि कालान्तर में अंग्रेज उन्हें अपनी परम्पराओं के अनुसार स्वशासन करने के योग्य बना देंगे. उस समय इनकी मांगों में अवज्ञा तथा चुनौती का स्वर न होकर आग्रह और प्रार्थना का स्वर होता था.

अपने 20 वर्ष के समय-अंतराल में उदारवादियों अर्थात् कांग्रेस ने अपने वार्षिक अधिवेशनों में अनेक प्रस्ताव पास किए और ब्रिटिश सरकार से प्रशासन में सुधारों की मांग की. उदारवादी युग में कांग्रेस की मांगें बहुत साधारण थी. तत्कालीन उदारवादी नेताओं का मानना था कि न्याय-प्रिय अंग्रेजों से प्रार्थनाओं द्वारा अपने अधिकार मांगने पर वे अधिकार प्रदान कर देंगे. कांग्रेस की प्रमुख मांगें थी, जैसे- भारत सचिव की इंडिया कौंसिल को समाप्त किया जाए, केन्द्र और प्रांतों में विधान परिषदों का विस्तार किया. जाए, उच्च सरकारी नौकरियों में भारतीयों को भी अंग्रेजों के समान अवसर तथा सिविल सेवा की प्रतियोगी परीक्षाएं भारत में भी आयोजित की जाएं. आदि तक ही सीमित थीं.

 

उदारवादियों की कार्य-पद्धति (Work-method of Moderates)

 

उदारवादी नेताओं द्वारा अपनाई जाने वाली कार्य-प्रणाली पूर्ण रूप से संवैधानिक और ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग की भावनाओं पर आधारित होती थी. ये लोग सरकार से किसी भी स्थिति में टकराव नहीं चाहते थे. वे प्रार्थना पत्रों, आवेदन-पत्रों, प्रतिनिधि मण्डलों और स्मरण-पत्रों आदि द्वारा सरकार से अपनी न्याययुक्त मांगों को मानने का आग्रह करते थे. उदारवादी पाश्चात्य सभ्यता और विचारों से प्रभावित थे. अतः वे ब्रिटेन से स्थायी सम्बन्ध की स्थापना, भारत के हित में मानते थे. उदारवादियों के साधनों को “राजनैतिक भिक्षावृत्ति के रूप में वर्णित किया गया है.

 

कांग्रेस ने आरम्भिक समय में संवैधानिक साधनों का प्रयोग करते हुए अपनी वफादारी की घोषणाओं के साथ मध्यम मार्ग तथा अपील के स्वर को अपनाया. कांग्रेस ने उस समय राष्ट्रीय जागृति के प्रसार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए. इसने भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावनाओं के विकास, उनमें समन्वय तथा राष्ट्रीय जागृति उत्पन्न करने में पर्याप्त योग दिया.

 

उदारवादी राष्ट्रीय आन्दोलन का विकास (Growth of Moderate National Movement)

 

महत्वपूर्ण रूप से उदारवादियों ने साम्राज्यवाद का आर्थिक विवेचन किया था. वे इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि ब्रिटिश आर्थिक साम्राज्यवाद में निहित उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के अधीन रखना है. इसीलिए प्रारंभिक उदारवादियों ने सरकार की आर्थिक नीतियों के विरोध में प्रभावशाली तर्क रखे और आंदोलन आयोजित किए. सरकार द्वारा भू-राजस्व में की गई बढ़ोत्तरी के विरोध में आंदोलन चलाया तथा कराधान और व्यय के तत्कालीन स्वरूप में भी परिवर्तनों का आग्रह किया.

उदारवादियों ने सरकार द्वारा उठाये जाने वाले प्रशासनिक कदमों की आलोचना करते हुए प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और अक्षमताओं को दूर करने की आवाज उठाई. इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सुधार आंदोलन प्रशासनिक सेवा की उच्चतर श्रेणी के पदों का भारतीयकरण के सम्बन्ध में था. यूरोपियनों को मिलने वाले ऊंचे वेतन का भारतीय वित्त पर भारी बोझ था. राजनीतिक रूप में यूरोपीय नागरिक भारतीयों की उपेक्षा करते थे तथा उन्हें हीन-दृष्टि से देखते थे. उदारवादियों ने सरकारी ऐजेण्टों व पुलिस द्वारा जनसाधारण के साथ दुर्व्यवहार का विरोध किया. इनकी एक महत्वपूर्ण मांग यह थी कि न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक किया जाए, ताकि जनसाधारण के हित में कुछ सुरक्षात्मक कार्य हो सकें.

कांग्रेस के प्रारम्भिक उदारवादी नेताओं ने कुछ गिने-चुने व्यक्तियों को मिलने वाली सुविधाओं का विरोध किया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा सामाजिक समानता के सिद्धान्तों को व्यवहार में लाने की अपील की. इन नरमपंथी नेताओं को आधुनिक नागरिक अधिकारों जैसेभाषण, प्रेस, विचार और संगठन आदि की स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता थी. तत्कालीन परिस्थितियों में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के लिए आवश्यक था. कि देश के विभिन्न भागों में रहने वाले तथा अलग-अलग मतों के लोगों के बीच समन्वय स्थापित कर देश को एक राष्ट्र के रूप में संगठित किया जाए. नरम पंथियों द्वारा इस क्षेत्र में किए गए प्रयासों के फलस्वरूप ही शिक्षित भारतीयों में राष्ट्रीय एकता की भावनाओं का विकास हुआ.

कांग्रेस के प्रारम्भिक उदारवादी नेता धीरे-धीरे आग्रहों, आवेदनों और प्रार्थनाओं द्वारा क्रमिक सुधारों में विश्वास रखते थे. परन्तु एक बात अवश्य थी कि वे मौलिक सांविधानिक परिवर्तनों के लिए शुरू से ही बल देने लगे थे. कांग्रेस ने स्थानीय कौंसिलों के विस्तार की तथा उनमें अधिक संख्या में चुने हुए सदस्यों को लेने और उनके कार्यों के विस्तार की मांग की, ताकि एक ऐसी सरकार स्थापित की जा सके जिसका आधार जनता के प्रतिनिधियों के साथ सलाह हो. इस प्रस्ताव को बाद में भी बार-बार दोहराया गया. इनके प्रयत्न के परिणामस्वरूप ही सरकार ने पुरानी व्यवस्था में सुधार करके नया ‘भारतीय विधान परिषद विधेयक, 1892‘ पास किया. इसमें गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाने, सदस्यों को बजट पर बोलने आदि अधिकारों की व्यवस्था थी, परन्तु वोट देने का अधिकार नहीं था. इस प्रकार ‘इंडियन कौंसिल एक्ट, 1892‘ द्वारा भारतीय परिषदों में कुछ सुधार किए गए.

 

इसके बाद से भारतीयों के प्रति अंग्रेजों ने अधिक कठोरता का रुख अपनाना शुरू कर दिया था. 1894 में इंग्लैंड से भारत में आने वाले कपड़े पर आयात-कर घटा दिया गया. 1895-97 के वर्षों में दक्षिण भारत में अकाल की स्थिति व्याप्त थी तथा 1897 में यहां भूकंप से बहुत अधिक नुकसान हुआ. पूना और आस-पास के क्षेत्रों में प्लेग की स्थिति व्याप्त रही. परन्तु सरकार इन सभी स्थितियों को अनदेखा करते हुए उदासीन बनी रही. सरकार के इस व्यवहार से लोगों में असन्तोष की भावनाएं उत्पन्न होने लगी. इसी समय दो युवकों ने पूना के प्लेग कमिश्नर रैण्ड और उसके एक साथी की गोली मारकर हत्या कर दी. परिणामस्वरूप, अंग्रेजों ने अधिक सख्त कानून बना दिए तथा कांग्रेस व लोगों के साथ उनका व्यवहार पहले से अधिक कठोर हो गया. लार्ड कर्जन के समय 1899-1905 के बीच सरकार ने अनेक अन्यायपूर्ण कानून पास किए तथा ऐसे कार्य किए जिनसे लोगों में अत्यधिक असंतोष व्याप्त हो गया. 1905 के बंगाल-विभाजन ने तो लोगों के बीच तूफान खड़ा कर दिया.

 

बंगाल विभाजन, 1905 (Partition of Bengal, 1905)

 

1905 में बंगाल विभाजन की घोषणा से सम्पूर्ण देश में चारों और विरोध स्वरूप अनेक बैठकें आयोजित की गई. यद्यपि तत्कालीन गवर्नर जनरल. लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन का प्रमुख कारण प्रशासनिक असुविधा बताया परन्तु वास्तव में इसका प्रमुख कारण राजनति से प्ररेति था. चूंकि उस समय बंगाल भारतीय राष्ट्रीय चेतना का केन्द्र बिन्दु था तथा बंगालियों में प्रबल राजनीतिक जागृति थी जिसे दबाने के लिए कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर उसे क्रमशः हिन्दू और मुस्लिम बहुलता वाले दो भागों में बांटने और उन्हें आपस में लड़ाने की नीति अपनाई. जंग-भंग की घटना ने न केवल बंगाल में बल्कि सम्पूर्ण देश में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न कर दी. जगह-जगह आम सभाएं होने लगी तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार होने लगा. 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता में ‘टाउन हाल’ में स्वदेशी आंदोलन की घोषणा की गई, जिसमें ऐतिहासिक बहिष्कार प्रस्ताव पारित किया गया.

16 अक्टूबर, 1905 को पूरे बंगाल में ‘शोक दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की गई. बंगाल विभाजन के विरोध में पहली बार एक सभा में 50 से 75 हजार लोग एकत्र हुए. बहिष्कार आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैलने . लगा बम्बई और पुणे में बाल गंगाधर तिलक ने इसका प्रचार-प्रसार किया. अजीत सिंह एवं लाला लाजपत राय ने पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में, सैय्यद हैदर रजा ने दिल्ली तथा आस-पास के स्थानों पर तथा चिदम्बरम् पिल्ले ने मद्रास में इसका प्रचार-प्रसार किया. गोपाल कृष्ण गोखले ने भी इस आंदोलन को पूरा समर्थन दिया.

 

सरकार का रुख (Government’s Attitude)

 

यद्यपि कांग्रेस का रुख आराध में बहुत ही नरम था तथा कांग्रेस पूरी राज-भक्ति के साथ अपनी मांगे प्रस्तुत करती थी, परन्तु सरकार की ओर से उसे कोई सहायता व प्रोत्साहन नहीं मिला. 1886 में इसी भावना से प्रेरित होकर लार्ड डफरिन ने कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन में सम्मिलित प्रतिनिधियों को भोज दिया. 1887 में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में भी प्रतिनिधियों को पूर्ववत् सुविधाएं मुहैया कराई गई. इसी समय डफरिन ने ह्यूम को सुझाव दिया कि कांग्रेस को अपने कार्यक्रम राजनीतिक गतिविधियों की अपेक्षा सामाजिक गतिविधियों में सुधार की ओर मोड़ देने चाहिए. परन्तु कांग्रेसी नेताओं ने यह सुझाव अस्वीकार कर दिया. 1887 में कांग्रेस ने एक पुस्तिका (Parmphlet) प्रकाशित की, जिसमें दो व्यक्तियों के बीच प्रश्नोत्तर के रूप में तानाशाही राजपद्धति और अन्यत्रवासी भूमिपतियों (Absentee Landlordism) की आलोचना की गई थी. इन कारणों से कांग्रेस और सरकार के बीच गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए. अब अंग्रेजों ने कांग्रेस की खुले रूप में आलोचना शुरू कर दी तथा डफरिन जिसने कांग्रेस की स्थापना में पूर्ण सहयोग किया था इसे चुनौती देते हुए कहा कि कांग्रेस केवल एक “सूक्ष्मदर्शी अल्पसंख्या” (Microscopic Minority of the People) का प्रतिनिधित्व करती है तथा मुझे उसका भारतीय जनता के प्रतिनिधित्व का दावा बेबुनियाद लगता है. सरकार ने मुसलमानों को कांग्रेस से अलग करने तथा हिन्दू-मुस्लिमों में परस्पर फूट डालने की नीति शुरू कर दी. 1888 में सर सैय्यद अहमद खाँ द्वारा ‘ऐग्लों मुस्लिम डिफेंस एसोसिएशन‘ की स्थापना सरकार की इस दिशा में प्रारम्भिक सफलता थी. सरकार का रुख भारतीयों के प्रति अब दिन-प्रतिदिन कठोर होता चला गया.

 

उदारवादियों का मूल्यांकन (Analysis of Moderates)

 

यदि हम उदारवादियों के कार्यों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें तो स्पष्ट होता है कि वह अधिक उपलब्ध्यिां प्राप्त कर पाने में असफल रहे. उन्हें बहुत कम सुधार लागू करवाने में सफलता प्राप्त हो पाई. ब्रिटिश भारतीय सरकार ने हमेशा ही इनकी मांगों की उपेक्षा की. उदारवादी तत्कालीन कांग्रेसियों और सामान्य जनता के बीच बहुत अधिक समझबूझ स्थापित करने अर्थात् जनसामान्य को कांग्रेस के साथ जोड़ने में असफल रहे. उदारवादियों के राजनीतिक कार्य अधिक उत्साहवर्धक नहीं थे तथा वे आवेदनों और प्रार्थनाओं के माध्यम से अपनी मांगे प्रस्तुत करते थे. इनके कार्यों को राजनीतिक भिक्षावृत्ति” (Political Mendicancy) कहा गया. लाला लाजपतराय ने इसको अवसरवादी आंदोलन कहा.

उदारवादी ब्रिटिश साम्राज्य के वास्तविक आधार अथवा उसकी प्रकृति को नहीं समझ सके थे. उदारवादियों के विरुद्ध सबसे बड़ा दोषारोपण उनका ‘क्राउन के प्रति राजभक्ति‘ था. उनका यह अनुमान था कि दोनों देशों के हित परस्पर जुड़े हुए हैं तथा उनका यह विश्वास था कि अंग्रेजों के चले जाने से भारतीयों के हितों की हानि होगी. उदारवादी इस बात को समझने में असफल रहे कि भारत ब्रिटिश पूंजीवाद के लाभार्थ अंग्रेजों का एक शोषित आर्थिक उपनिवेश था.

उदार राष्ट्रवादियों की यह आशा कि विदेशी सरकार के आगे हाथ फैलाकर तथा प्रार्थना के माध्यम से भारत के लिए प्रतिनिधि-शासन प्राप्त किया जा सकता है एकदम भ्रान्तिपूर्ण थी. उनकी मांगें दबी जुबान में बिना किसी उत्साह के प्रस्तुत की जाती थी. उन्हें अपने आप पर भरोसा नहीं था तथा वे अपने शासकों की कृपा पर निर्भर रहे. इसी कारण ब्रिटिश सरकार उदारवादियों की मांगों पर विशेष ध्यान नहीं देती थी तथा वह उदारवादियों के प्रति लगातार उदासीन बनी रही. सरकार शासन में मूल-भूत परिवर्तन करके कभी भी भारतीयों को शासन में भागीदारी प्रदान करने को तैयार नहीं हुई.

यद्यपि उदारवादी शासन-व्यवस्था में अधिक सुधार प्राप्त करवाने में असफल रहे तथापि उन्होंने अपनी नरम नीति के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन को एक मजबूत आधार अवश्य प्रदान किया और अनेक उपयोगी कार्य करने में भी सफलता प्राप्त की. उदारवादियों ने डटकर राजनीतिक मांगों का प्रचार-प्रसार किया, जिससे वह शिक्षित भारतीयों को प्रभावित करने में तथा राष्ट्रीय चेतना को गति प्रदान करने में सफल सिद्ध हुए. इन्हीं के प्रयासों से 1886 में एक ‘लोक सेवा आयोग’ (Public Service Commission) गठित हुआ तथा 1892 में भारतीय परिषदों का अधिनियम’ (Indian Council’s Act) पारित हुआ. परन्तु दोनों से ही लोगों में निराशा हुई. क्योंकि इनसे संविधान में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था. कुल मिलाकर उदारवादी युग के नेताओं ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी. उन्होंने देशवासियों को अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया. उदारवादी नीतियों में परिवर्तन करके बाद में कांग्रेस ने औपनिवेशिक स्वराज्य तथा स्वाधीनता को अपना लक्ष्य घोषित किया.

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना(Foundation of the Indian National Congress)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना Foundation of the Indian National Congress

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना(Foundation of the Indian National Congress)-सन् 1885 का वर्ष भारत के इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण है. क्योंकि इस वर्ष से भारत में एक नए युग का सूत्रपात हुआ. 28 दिसम्बर, 1885 को अखिल भारतीय स्तर के राजनीतिक संगठन ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी जो कि ए.ओ. ह्यूम (A.O. Hume) के नेतृत्व में भारतीयों के एक मंच पर आने की भावनाओं का परिचायक थी.

 

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास को देखने से स्पष्ट होता है कि इसका विकास तीन मुख्य चरणों में हुआ. प्रथम चरण (1885-1905) तक माना जाता है, जिसे ‘उदारवादी राजनीति‘ अथवा ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ का युग कहते हैं. इस युग में कांग्रेस पर समृद्धिशाली मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों का अधिकार था जो कि देश के बड़े-बड़े नगरों से आते थे. इनका सामान्य जनता के साथ कोई सम्बन्ध नहीं था. प्रारम्भिक वर्षों में कांग्रेस अधिवेशनों की कार्यवाही बहुत दबे हुए ढंग से होती थी और इनकी मांगों में चुनौती का स्वर न होकर आग्रह और प्रार्थना का स्वर होता था. 1906-1918 की अवधि को ‘द्वितीय चरण में रखा जाता है.

 

इस अवधि में उदारवादियों के नरम रूख से कोई परिणाम न निकलता देख कांग्रेस में असंतोष व्याप्त हो गया. परिणामस्वरूप क्रान्तिकारी और उग्रवादी प्रवृत्तियों ने जोर पकड़ा. उग्रवादी पूर्ण स्वराज्य के पक्ष में थे जिसे वे आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास से प्राप्त करना चाहते थे. उग्रवाद के साथ-साथ क्रान्तिकारी या आतंकवाद की लहर भी फैली जो कि हिंसात्मक उपायों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पक्ष में थे. तीसरा और अन्तिम चरण (1919-1947) में कांग्रेस का उद्देश्य पूर्ण स्वराज या पूर्ण आजादी था. इस चरण में कांग्रेस गांधी जी के नेतृत्व में अहिंसात्मक और ब्रिटिश सरकार के साथ असहयोग के उपायों द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति में विश्वास रखती थी.

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उत्पत्ति (The Genesis of the Indian National Congress)

 

कांग्रेस की स्थापना के साथ ही भारतीय राजनीतिक इतिहास में 1885 से नए युग का सूत्रपात हुआ. 1907 में ‘सूरत की फूट’ के बाद कांग्रेस की भारतीय राजनीति में भूमिका और भी महत्वपूर्ण बन गई. इस समय कांग्रेस का गरम दल (जिसका नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं विपन चन्द्रपाल कर रहे थे) तथा नरम दल (जिसके नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे) दो भागों में विभाजन हो गया. बाद में इस अखिल भारतीय विस्तृत राजनीतिक संगठन ‘काग्रेस’ को संगठित रूप में जिन्दा रखते हुए गांधी जी तथा अनेक अन्य लोगों ने समय-समय पर अनेक अहिंसात्मक उपाय अपनाते हुए स्वतंत्रता के लिए लगातार महत्वपूर्ण उपलब्ध्यिां प्राप्त की. जिनके सहारे हमें पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो सकी.

 

यह कहना कि इंडियन नेशलन कांग्रेस की स्थापना का समस्त श्रेय ए. ओ. ह्यूम को है या यह एक आकस्मिक घटना थी उचित नहीं है. 1885 में कांग्रेस की स्थापना के लिए आधार तैयार करने में देश के विभिन्न भागों से अनेक राजनीतिक संगठनों, विभिन्न विचारों और लोगों की एक मंच पर इकट्ठा होने की भावनाओं ने मिले-जुले रूप में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था.

 

डब्ल्यू. सी बनर्जी ने अपने बयान में कहा कि इंडियन नेशनल कांग्रेस का विचार डफरिन के मस्तिष्क की उपज था और उसी ने ह्यूम को इसके लिए सुझाव दिया था. डफरिन का विचार था कि जनता की वास्तविक भावनाओं को जानने के लिए इस प्रकार की एक संस्था होनी चाहिए ताकि सरकार जनता की ओर से उठने वाली किसी भी प्रतिक्रिया से सतर्क रह सके. अर्थात् इस संस्था की स्थापना इसलिए हुई थी ताकि यह अंग्रेजी राज्य की रक्षा हेतु अभय कपाट (Safety Valve) के रूप में कार्य कर सके.

 

कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य अंग्रेजी साम्राज्य के लिए ‘अभय कपाट’ (Safety Valve) का कार्य करना था यह कहना ज्यादा सही नहीं है. अब यह बात साफ हो चुकी है कि डफरिन के उद्देश्य कुछ भी रहे हों, ह्युम सच्चे उदारवादी तथा जागरूक साम्राज्यवादी (enlightence imperialist) थे तथा वे एक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता तथा वांछनीयता का अनुभव करते थे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरूआती समय में जिस किसी भारतीय राजनीतिज्ञ ने रूम के साथ सहयोग किया वे सभी चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार को इस बात का बिल्कुल भी शक नहीं होना चाहिए कि भारतीय स्वतंत्रता के लिए भारतीय राष्ट्रवादी कुछ करने का प्रयास कर रहे हैं. इसलिए उन्होंने ह्यूम के साथ पूरी निष्ठा के साथ सहयोग किया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यों का विस्तार किया.

 

कांग्रेस का अधिवेशन (The Congress Session)

 

28 दिसम्बर, 1885 को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज भवन में कांग्रेस का प्रथम सम्मेलन सम्पन्न हुआ. इसकी अध्यक्षता व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने की. इसमें कुल 72 सदस्यों ने भाग लिया. जिनमें प्रमुख थे- दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, दीनशा एदलजी वाचा, काशीनाथ तैलंग, वी. राघवाचार्य, एन. जी. चन्द्रावरकर, एस. सुब्रमण्यम आदि. कांग्रेस के प्रथम सम्मेलन में निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य बताये गए थे- देश हित की दिशा में प्रयत्नशील भारतीयों के बीच परस्पर समन्वय स्थापित कर मित्रता को प्रोत्साहित करना. देश में व्याप्त धर्म, वंश एवं प्रान्त सम्बन्धी विवादों को समाप्त कर राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रोत्साहित करना. एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि शिक्षित वर्ग की सहमति से आवश्यक सामाजिक विषयों पर विचार विमर्श करके भविष्य में भारतीय जनकल्याण के लिए नीति निर्धारित करना.

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन 1886 में कलकत्ता में सम्पन्न हुआ. जिसकी अध्यक्षता दादाभाई नारौजी ने की. इस अधिवेशन में विभिन्न स्थानों से अलग-अलग संगठनों और समूहों द्वारा चुने हुए 436 प्रतिनिधियों ने भाग लिया. इसके बाद कांग्रेस की प्रत्येक वर्ष देश के विभिन्न स्थानों पर बैठकें सम्पन्न हुई. कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त कादम्बिनी गौंगुली ने 1890 में कांग्रेस अधिवेशन को संबोधित किया. यह इस बात का सूचक था कि भारतीय नारी की अतीत में जे उपलब्धियाँ थी वह बीच में लुप्त हो जाने के बाद एक बार फिर से उजागर होने लगी थी.

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Thursday, July 19, 2018

आधुनिक राजनीतिक विचारों तथा राजनीतिक संघो का विकास (Growth of Modern Political Ideas and Political Association)

आधुनिक राजनीतिक विचारों तथा राजनीतिक संघो का विकास (Growth of Modern Political Ideas and Political Association)

आधुनिक राजनीतिक विचारों तथा राजनीतिक संघों का विकास (Growth of Modern Political Ideas and Political Association)-भारत में पाश्चात्य संस्कृति व विचारों की उपस्थिति ने अनेक ऐसी शक्तियों के जन्म में सहायता प्रदान की जो बाद में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए गंभीर चुनौतियों का कारण बन गई थी. पाश्चात्य संस्कृति की उपस्थिति के फलस्वरूप ही भारत में राष्ट्रवाद राष्ट्रीयता तथा राजनीतिक अधिकारों जैसी धारणाएं विकसित हो सकी. आधुनिक राजनीतिक विचारों तथा राजनीतिक संघों के विकास के फलस्वरूप ही भारतीय इतिहास को अपना गौरव प्राप्त हो सका तथा भारत आधुनिकता की ओर बढ़ने में सफल हुआ. इन राजनीतिक संघों के विकास से ही लोगों में एकता तथा एकजुटता देखने को मिली. 1885 से पूर्व अर्थात् राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन निम्नलिखित थे, जिन्होंने राष्ट्रवादी विचारों के विकास की दिशा में प्रयास किए थे.

 

बंगाल में राजनीतिक संगठन (Political Association in Bengal)

 

राजाराम मोहन राय प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने आधुनिक भारत में समाज सुधारक कार्यों व राजनीतिक आंदोलन का शुभारम्भ किया तथा भारतीयों की शिकायतों की ओर अंग्रेजों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयत्न किया और समाधान मांगा. वह बहुत बड़े विद्वान थे. राजाराम जी पाश्चात्य विचारों से बहुत अधिक प्रभावित थे. सार्वभौमिकता से ओत-प्रोत राजाराम मोहन राय ने समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता, सिविल न्यायालयों में भारतीयों की नियुक्ति तथा उच्च पदों आदि के लिए मांग की. परिणामस्वरूप 1833 के चार्टर में कुछ उदारवादी धाराएं देखने को मिली.

 

(i) बंगभाषा प्रकाशन सभा(Bangabhasha Prakashan Sabha)

 

राजाराम मोहन राय के अनेक साथियों ने सर्वप्रथम 1836 में ‘बंगभाषा प्रकाशन सभा’ नामक राजनीतिक संस्था की स्थापना की. इस सभा का उद्देश्य सरकारी क्रिया-कलापों की समीक्षा कर उनके सुधार के लिए प्रार्थना पत्र भेजना था.

 

(ii) जमीदारी एसोसिएशन (Zamindari Association)

 

जमींदारी एसोसिएशन की स्थापना 1838 में हुई थी. इसे भूमिपतियों की सभा (Landholders Society) के नाम से भी जाना जाता था. यह पहली सभा थी जिसने संगठित राजनीतिक प्रयासों का शुभारम्भ किया तथा शिकायतों को दूर करने के लिए संवैधानिक उपचारों का प्रयोग किया. कलकत्ता के भूमिपतियों की यह सभा श्री एडम्ज द्वारा स्थापित इंग्लैण्ड की ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (British India Society) से भी सहयोग करती थी.

 

(iii) बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (Bengal-British India Society )

 

1843 में बंगाल-ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी नामक एक अन्य राजनीतिक सभा स्थापित की गई. इस सभा का प्रमुख उद्देश्य अंग्रेजी शासन में भारतीयों की वास्तविक अवस्था के विषय में जानकारी प्राप्त कर उनका प्रचार-प्रसार करना तथा जनता की उन्नति के लिए व न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए शान्तिमय और कानूनी साधनों का प्रयोग करना था.

 

(iv) ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन (British-Indian Association)

उपरोक्त में से दो सभाओं अर्थात् भूमिपतियों की सभा और बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी की असफलताओं के कारण इन दोनों को 28 अक्टूबर, 1851 को मिलाकर एक ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन नामक संगठन बनाया गया. यह सभा भूमिपतियों के हितों के लिए मुख्य रूप से काम कर रही थी तथा इसी के प्रयासों से 1853 में चार्टर के नवीकरण के समय ब्रिटिश संसद को एक प्रार्थनापत्र भेजा गया. इस प्रार्थना पत्र में एक लोकप्रिय विधान सभा की, न्यायिक और दण्डनायक कार्य अलग कर दिए जाने की, अधिकारियों के वेतन कम किए जाने की तथा नमक, आबकारी और स्टाम्प कर को समाप्त करने की मांग की गई. इसके प्रभावस्वरूप 1853 के चार्टर एक्ट में छ: और सदस्य गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी में कानून बनाने के लिए जोड़ दिए गए. एक राजनीतिक संस्था के रूप में यह 20वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में रही, तदोपरान्त भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे आच्छादित कर लिया.

 

(v) इण्डियन लीग (Indian League)

 

1870 तक भारतीय समाज में काफी बदलाव आ चुके थे. प्रेजिडेन्सी नगरों में उच्च शिक्षा के प्रसार के कारण पढ़े-लिखे लोगों का एक नया वर्ग अस्तित्व में आ गया था. इसी क्रम में सितम्बर, 1875 में बाबू शिशिर कुमार घोष ने ‘इण्डियन लीग‘ स्थापित की. इसका प्रमुख उद्देश्य लोगों में राष्ट्रवाद की भावना का विकास कर राजनीतिक शिक्षा को प्रोत्साहित करना था.

 

(vi) इण्डियन एसोसिएशन (Indian Association)

 

इण्डियन लीग की स्थापना के एक वर्ष के भीतर ही 26 जुलाई, 1976 को इसका स्थान इंडियन एसोसिएशन ने ले लिया, जिसे आनन्द मोहन बोस और सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी ने स्थापित किया था. इस संगठन का उद्देश्य मध्यम वर्ग के साथ-साथ साधारण वर्ग को भी इसमें सम्मिलित करना था. जिसके लिए इसमें चन्दे की दर, ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन के 30 रुपये वार्षिक के विपरीत मात्र 5 रुपये वार्षिक रखा गया. बहुत जल्दी ही यह संगठन शिक्षित वर्ग का केन्द्र बिन्दु बन गया.

भारत में लिटन की गलत नीतियों के कारण राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगी. आई. सी. एस. की परीक्षा के लिए प्रवेश की आयु 21 से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई. चूंकि यह परीक्षा लन्दन में होती थी इसलिए कम आयु के युवकों के लिए वहां जाकर परीक्षा देना मुश्किल हो गया था. अतः इण्डियन एसोसिएशन ने इसके विरुद्ध आंदोलन प्रारम्भ कर दिया जिसे ‘भारतीय जनपद सेवा आंदोलन’ (Indian Civil Service Agitation) कहते हैं.

 

बम्बई में राजनीतिक संगठन (Political Associations in Bombay)

 

(i) बम्बई एसोसिएशन (Bombay Association)

 

26 अगस्त, 1852 को बम्बई में कलकत्ता की ब्रिटिश इण्डिया एसोसिएशन के नमूने पर ‘बम्बई एसोसिएशन‘ बनाई गई. इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य सरकार को समय-समय पर ज्ञापन देना था, ताकि हानिकारक समझे जाने वाले नियमों तथा सरकारी नीतियों के लिए सुझाव दिए जा सकें.

 

(ii) बम्बई प्रेजिडेन्सी एसोसिएशन (Bombay Presidency Association)

 

लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियों तथा इल्बर्ट बिल पर हुए विवाद का बम्बई के राजनीतिक क्षेत्रों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा, परिणामस्वरूप 1885 में बम्बई प्रेजिडेन्सी एसोसिएशन (Bombay Presidency Association) की स्थापना की गई. इस संगठन की स्थापना का श्रेय बम्बई के तीन प्रमुख सम्प्रदायों से जुड़े हुए व्यक्तियों मेहता, तेलांग और जयबजी को जाता है.

 

(iii) पूना सार्वजनिक सभा (Poona Sarvajanik Sabha)

 

इस सभा की स्थापना 1970 में न्यायमूर्ति व उनके सहयोगियों द्वारा पूना में की थी. इसका प्रमुख उद्देश्य सरकार और जनता के बीच सेतु के रूप में कार्य करना था. बम्बई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन और पूना सार्वजनिक सभा घनिष्ठ तालमेल के साथ कार्य करती थी.

 

मद्रास में राजनीतिक संस्थाएं (Political Associations in Madras)

 

(i) मद्रास नेटिव एसोसिएशन (Madras Native Association)

 

मद्रास नेटिव (स्थानीय) एसोसिएशन की स्थापना कलकत्ता की ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन की शाखा के रूप में की गई थी. 1853 के चार्टर में सुधारों के लिए इसने भी ब्रिटिश संसद को बम्बई तथा कलकत्ता एसोसिएशन के नमूने पर ही एक ज्ञापन भेजा. परन्तु इस संगठन का विशेष महत्व नहीं है क्योंकि 1857 में यह लुप्त हो गया था.

 

(ii) मद्रास महाजन सभा (Madras Mahajan Sabha)

 

मई, 1884 मे विरारघवाचारी(Viraraghavachari),जी. सब्रह्मण्यम अय्यर,आनन्दा चालू आदि लोगों ने मद्रास महाजन सभा की स्थापना की. इसके 29 दिसम्बर, 1884 से 2 जनवरी, 1885 तक चले अधिवेशन में इस सभा ने निम्नलिखित मांगे रखी- विधान परिषदों का विस्तार किया जाए तथा इनमें भारतीयों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए. न्यायपालिका व राजस्व एकत्रित करने वाली संस्थाओं का पृथक्करण किया जाए.

 

इसी क्रम में आगे अखिल भारतीय स्तर पर एक संयुक्त राजनीतिक संस्था की आवश्यकता महसूस होने लगी थी. 1866 में लन्दन में दादा भाई नौरोजी ने ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन (East India Association) का गठन किया. जिसका उद्देश्य तत्कालीन भारतीय समस्याओं पर गंभीरता से विचार कर ब्रिटिश शासन को प्रभावित करना था. 1877 की पूना सार्वजनिक सभा (Poona Sarvajnik Sabha) ने बम्बई और कलकत्ता के प्रतिनिधियों से मिल जुल कर कार्य करने की प्रेरणा दी.

1878 में लाइसेंस कर (Licence Tax) लगाने और 1879 में कपास के कपड़े पर आयात कर (Cotton Duties) हटाने के विरोध में संपूर्ण भारत में स्थान-स्थान पर विरोध प्रकट करने के लिए सभाएँ आयोजित की गई. इस प्रकार विभिन्न कारणों से स्थानीय संगठनों के नेता सम्मिलित व एकरत कार्यक्रम चलाने के लिए उद्यत हो गये. 1882 में राष्ट्रीय स्तर पर सभा बुलाने, आपस में समन्वय स्थापित करने तथा अखिल भारतीय स्तर पर अनेक कार्यक्रम शुरू करने की बात चल रही थी.

 

1 मार्च, 1883 को ह्युम(Allan Octavian Hume) ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने सबसे मिल-जुलकर स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करने की अपील की जिसका शिक्षित भारतीयों पर अच्छा प्रभाव देखा गया. इस ओर पहला कदम सितम्बर, 1884 में उठाया गया, जब ‘आड्यार’ (मद्रास) में थियोसोफिकल सोसायटी का वार्षिक अधिवेशन हुआ और इसमें ह्यूम(Allan Octavian Hume), दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी आदि गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया. 1884 में ‘इंडियन नेशनल यूनियन’ नामक राष्ट्रीय स्तर के संगठन की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य देश की सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध में विचार-विमर्श कर उचित कार्यवाही करना था.

इसी समय ह्यूम ने तत्कालीन वायसराय लार्ड डफरिन से विचार विमर्श किया. ऐसा माना जाता है कि ‘इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना का निर्णय ह्यूम ने डफरिन की सलाह पर ही लिया था. डफरिन भी चाहता था कि भारतीय राजनीतिज्ञ वर्ष में एक बार एकत्रित हों. जहां पर वे प्रशासनिक कार्यों के प्रति अपनी वास्तविक भावनाएं प्रकट करें ताकि प्रशासन भविष्य की घटनाओं के प्रति सतर्क रह सके.

ह्यूम इस संगठन की स्थापना से पूर्व इंग्लॅण्ड गये जहां उन्होंने डलहौजी, जान बाइट, रिपन एवं स्लेग आदि राजनीतिज्ञों से इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श किया. भारत लौटने से पहले ह्यूम ने इंग्लेण्ड में भारतीय समस्याओं के प्रति ब्रिटिश संसद के सदस्यों में रुचि पैदा करने के उद्देश्य से ‘भारत संसदीय समिति’ (Indian Parliamentary Committee) की स्थापना की. भारत पहुँचने के बाद ह्यूम ने ‘इंडियन नेशलन यूनियन’ (Indian National Union) की 25 दिसम्बर, 1885 को बम्बई में बैठक बुलाई जहां पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद इंडियन नेशलन यूनियन का नाम बदल कर ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ (Indian National Congress) या ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस‘ रखा गया. इस प्रकार 28 दिसम्बर, 1885 को ए. ओ. ह्यूम (Allan Octavian Hume) के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई.

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भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन-राष्ट्रवाद का उदय (Rise of Nationalism)

राष्ट्रवाद का उदय Rise of Nationalism

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन-राष्ट्रवाद का उदय (Rise of Nationalism)-भारत में संगठित राष्ट्रीय आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में प्रारम्भ हुआ था. मुख्य रूप से ब्रिटिश साम्राज्यवाद (British Imperialism) की नीतियों की चुनौतियों के प्रत्युत्तर में भारतीयों ने एक राष्ट्र के रूप में सोचना प्रारम्भ किया था. भारतीयों में राष्ट्रीय भावना के विकास तथा भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के लिए स्वयं ब्रिटिश शासन ने आधार तैयार किया.

 

राष्ट्रवाद के उदय के कारण (Causes of the Rise of Nationalism)

 

राष्ट्रवाद के उदय के लिए विभिन्न कारण सम्मिलित रूप से जिम्मेदार थे. मुख्य रूप से ब्रिटिश शासन तथा उसके प्रत्यक्ष तथा परोक्ष परिणामों ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के लिए भौतिक, नैतिक तथा बौद्धिक परिस्थितियां तैयार की. धीरे-धीरे भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक समूह ने देखा कि उसके हित कभी भी अंग्रेजी शासन के हाथ में सुरक्षित नहीं रह सकते.

 

अंग्रेजी सरकार की छत्र-छाया में किसानों से मालगुजारी के नाम पर उपज का बहुत बड़ा भाग ले लिया जाता था. जमींदारों, व्यापारियों तथा सूद खोरों को किसानों से लगान वसूलने तथा तरह-तरह से उनका शोषण करने के लिए सरकारी पदाधिकारियों व कर्मचारियों का पूरा सहयोग प्राप्त था. सरकारी नीति जिसमें विदेशी प्रतियोगिता को प्रोत्साहन दिया जा रहा था के कारण दस्तकार तथा शिल्पी भी बेरोजगार होने लगे थे. कारखानों, खदानों तथा बागानों में मजदूरों का तरह-तरह से शोषण हो रहा था.

 

सरकार एक ओर विदेशी पूंजीपतियों को प्रोत्साहित कर रही थी दूसरी ओर देश के लोगों को पूरी तरह से अनदेखा किया जा रहा था. सरकार की व्यापारिक, कर, चुंगी तथा यातायात संबंधी नीतियों के कारण भारतीय पूंजीपति वर्ग को बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा था. समाज के सभी वर्गों के हो रहे शोषण के कारण लोगों ने महसूस किया कि ब्रिटिश सरकार के अधीन अब और लम्बे समय तक नहीं रहा जा सकता. उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट्रीयता तथा स्वतंत्रता का दौर तेजी के साथ चल रहा था तथा जर्मनी व इटली स्वतंत्र राष्ट्र बन चुके थे, जिसका भारतीयों पर राष्ट्रवादी विचारों के सन्दर्भ में बहुत ही अनुकूल प्रभाव पड़ा.

 

पाश्चात्य शिक्षा एवं संस्कृति ने राष्ट्रवादी भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया. पढ़े-लिखे भारतीयों को बर्क, मिल, ग्लैडस्टोन, वाइट, मैकाले जैसे लोगों के विचार सुनने का अवसर मिला तथा मिल्टन, शैलेवायरन आदि महान कवियों की कविताएं पढ़ने एवं रूसो, मैजिनी तथा वाल्टेयर आदि लोगों के विचारों को जानने का सौभाग्य मिला. जिससे भारतीयों में राष्ट्रवादी भावनाओं ने जन्म लिया. अनेक धार्मिक तथा समाज सुधारकों, जैसे- राजाराम मोहन राय, देवेन्द्र नाथ ठाकुर, किशोर चन्द्र सेन, पी. सी. सरकार, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद आदि ने भारत के अतीत का गौरवपूर्ण चित्र उपस्थित कर भारतीयों में राष्ट्रवाद के विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया. अनेक समाचार-पत्रों तथा साहित्य ने लोगों में राष्ट्रीय जागरण की भावना को जगाया. राजाराम मोहन राय ने सर्वप्रथम राष्ट्रीय प्रेस की नींव डाली तथा “संवाद कौमुदी‘ बंगला में तथा ‘मिरात उल अखबार‘ फारसी में, का सम्पादन कर भारत में राजनैतिक जागरण की दिशा में प्रयास किया. इनके अतिरिक्त इण्डियन मिरर, बम्बई समाचार, दि हिन्दू, पैट्रियाट, अमृत बाजार पत्रिका, दि केसरी आदि समाचार-पत्रों का प्रभाव भी बहुत महत्वपूर्ण था.

 

राष्ट्रीय साहित्य का भी राष्ट्रीय भावना की उत्पत्ति की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान रहा.भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रताप नारायण मिश्र, बाल कृष्ण भट्ट, बद्री नारायण चौधरी, दीन बन्धु मित्र, हेम चन्द्र बैनर्जी, नवीनचन्द्र सेन, बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय तथा रवीन्द्र नाथ ठाकुर की रचनाओं ने लोगों को काफी हद तक प्रभावित किया और लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. तीव्र परिवहन तथा संचार साधनों में रेल, डाक-तार आदि के विकास ने भी राष्ट्रवाद की जड़ को मजबूत किया. इनके अतिरिक्त लार्ड लिटन के कार्यकाल में 1876 से 1884 तक बिना सोचे-समझे ब्रिटिश सरकार द्वारा कुछ ऐसे कार्य किए गए जिनसे राष्ट्रीय आन्दोलन को तीव्र गति प्राप्त हुई. 1877 में जब दक्षिण भारत के लोग अकाल से पीड़ित थे तो लिटिन ने ऐतिहासिक दिल्ली दरबार लगाया था.

 

1878 में भारतीयों को सार्वजनिक सम्पत्ति का गला घोटने के लिए प्रसिद्ध भारतीय प्रेस अधिनियम स्वीकार किया गया. भारतीयों और यूरोपियनों के बीच भेद-भाव पर आधारित शस्त्र अधिनियम भी इसी समय स्वीकार किया गया. अन्त में ‘इल्बर्ट बिल’ ने भारतीयों के दिलों को पुनः जबरदस्त ठेस पहुंचाई तथा भारतीयों के अन्दर राष्ट्रीयता की भावना जगाने में एक बार फिर महत्वपूर्ण योगदान दिया.

 

इस प्रकार विदेशी साम्राज्य की भेदभाव पूर्ण नीतियों के परिणामस्वरूप भारतीयों में वाद की भावनाओं ने जन्म लेना प्रारम्भ किया. इस प्रकार एक शक्तिशाली साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन का धीरे-धीरे विकास हुआ. इसने लोगों में एकता स्थापित करने और साम्राज्यवाद का मिलकर विरोध करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया.

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Wednesday, July 18, 2018

1857 के विद्रोह का स्वरूप Nature of the revolt of 1857

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन-1857 के विद्रोह का स्वरूप Nature of the revolt of 1857

 

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन1857 के विद्रोह का स्वरूप (Nature of the revolt of 1857)इतिहासकारों ने 1857 के विद्रोह क्रांति के स्वरूप को अलग-अलग दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया है. कुछ इतिहासकारों ने इसे एक केवल सैनिक विद्रोह बतलाया है.  जिसे जनसाधारण का समर्थन प्राप्त नहीं था. कुछ अन्य ने इसे ईसाइयों के विरुद्ध धार्मिक युद्ध बतलाया है. कुछ इतिहासकारों ने कहा कि यह काले तथा गोरे लोगों के बीच श्रेष्ठता के लिए संघर्ष था. साथ ही कुछ लोगों ने इसे पाश्चात्य तथा पूर्वी सभ्यता  तथा संस्कृति के बीच संघर्ष का नाम दिया. बहुत से लोगों ने इसे अंग्रेजी राज्य की भारत से समाप्ति के लिए हिंदू मुस्लिम षड्यंत्र का नाम देते हैं. अनेक राष्ट्रवादी भारतीय इसे सुनियोजित राष्ट्रीय आंदोलन और स्वतंत्रता के लिए पहला युद्ध बताते हैं.

 

आंदोलन के कारण ( causes of the revolt)

 

1857 में हुए आंदोलन के लिए ब्रिटिश साम्राज्य की गलत नीतियों के कारण उत्पन्न हुए सभी प्रकार के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारण जिम्मेदार थे. चर्बी वाले कारतूसों ने अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध राष्ट्रवादी लोगों के दिलों में लगी हुई आग के लिए हवा का काम किया. वह स्वतंत्रता के लिए पहले स्वाधीनता संग्राम के रूप में सामने आया.

 

राजनीतिक कारण (Political causes)

 

डलहौजी के “ व्यपगत के सिद्धांत”( Doctrine of Lapse) के कारण इस समय आर्थिक और राजनीतिक आचार की सभी सीमाओं का अतिक्रमण हो रहा था तथा डलहौजी की विलय की नीति में सभी भारतीय राजाओं को चिंता में डाल दिया था. हिंदू राजाओं से पुत्र गोद लेने के अधिकार को छीन लिया गया था. किसी भी विवादास्पद मामले में ईस्ट इंडिया कंपनी आवश्यक रूप से हस्तक्षेप करती थी और उसका निर्णय मानना पड़ता था तथा कोर्ट ऑफ डायरेक्टर का फैसला अंतिम था. साम्राज्यवादी नीति के तहत विभिन्न राज्यों का विलय कर लिया गया था. पंजाब और सिक्किम का विजय के आधार पर तथा अन्य का जैसे- सातारा,  जैतपुर, संभलपुर, बघाट, उदयपुर, झांसी, और नागपुर का व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत विलय किया गया था. अवध को शासन. का कारण बता कर विलय किया गया. अब सभी राजाओं को यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ा कि उनका अस्तित्व खतरे में है. डलहौजी की नीतियों तथा अंग्रेजी प्रशासन के उच्च पदाधिकारियों के वक्तव्य से एक प्रकार का अविश्वास का वातावरण उत्पन्न हो गया. मुसलमानों की भावनाओं को भी अंग्रेजी नीति के कारण गहरी चोट पहुंची थी. डलहौजी ने यद्यपि शहजादा फखरुद्दीन के उत्तराधिकार को मान्यता प्रदान कर दी थी. परंतु उस पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए गए. फखरुद्दीन की मृत्यु के पश्चात 1856 में लॉर्ड कैनिंग ने घोषणा की कि नवीन उत्तराधिकारी शहजादे को राजकीय उपाधि के साथ मुगल महल भी छोड़ना होगा. कैनिंग की इस घोषणा और अंग्रेजो की अन्य मुस्लिम विरोधी नीतियों के कारण मुसलमान चिंतित हो गए तथा अन्य भारतीय जातियों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा. मुगल सम्राट बहादुरशाह के जीवनकाल में भी अंग्रेजों ने उसका पर्याप्त अपमान किया. मुगल सम्राट को अंग्रेज अफसरों द्वारा दी जाने वाली भेंट बंद कर दी गई. अंतिम पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र नाना साहब की 80000 पाउंड की वार्षिक पेंशन भी समाप्त कर दी गई.

 

जब किसी देशी रियासत का विलय अंग्रेजी राज्य में किया जाता था तो रियासत के राजा की पदच्युति के साथ-साथ जनता को  प्राप्त होने वाले उच्च प्रशासनिक पद भी उन्हें मिलते थे. इस कारण समाज के उच्च वर्गों में कटुता की भावनाएं उत्पन्न होने लगी. अंग्रेजों द्वारा लागू नई न्याय प्रणाली के कारण भी लोगों में तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई. क्योंकि भारत में जाति प्रथा पूर्व से ही बलवती थी और नई न्याय व्यवस्था में सबको समान समझा जाता था तथा यह एक लंबी प्रक्रिया थी. भारतीयों को उनकी योग्यताओं के अनुसार पद नहीं मिलता था तथा पूरी योग्यताओं के बावजूद उन्हें निम्न पदों पर नियुक्त किया जाता था. इस प्रकार विभिन्न राजनीतिक कारणों से भारतीय जनमानस में असंतोष उत्पन्न हुआ.

 

प्रशासनिक और आर्थिक कारण (Administrative and economic causes)

 

भारतीय रियासतों के अंग्रेजी साम्राज्य में विलय के बाद भारतीय अभिजीत वर्ग अब पूर्व में प्राप्त पदों और शक्तियों से वंचित हो गया. क्योंकि ऊंचे पदों पर अब केवल अंग्रेज ही नियुक्त होते थे. भारतीयों के पास आवश्यक योग्यताओं के बावजूद उन्हें छोटे पदों पर ही नियुक्त किया जाता था. ईस्ट इंडिया कंपनी की  प्रशासकीय व्यवस्था बहुत निम्न स्तर की थी. कंपनी द्वारा लागू भूमि कर व्यवस्था बहुत अप्रिय थी. कृषकों द्वारा भूमि कर व्यवस्था के विरुद्ध जब कभी भी प्रतिक्रिया की जाती थी तो इसके लिए सेना का सहारा लिया जाता था. जैसे कि पानीपत जिले में पुलिस कार्य के लिए 22 घुड़सवारों के विपरीत भूमि कर के एकत्रण के लिए 136 व्यक्ति कार्यरत थे. बहुत से तालुकदार और वंशानुगत भूमि पतियों से उनके पद और अधिकार छीन लिए गए थे. बहुत सी भूमि जप्त कर उस की नीलामी कर दी गई. इसमें भूमि ऐसे सिद्धांत हीन साहूकारों व जमींदारों के पास चली गई जो प्रायः लोगों का शोषण करते थे. इस प्रकार बहुत से भूमि पति निर्धन बन गए.

अंग्रेज व्यापारिक लाभ के उद्देश्य भारत आए थे. भारत से कच्चे माल का निर्यात कर निर्मित माल भारत को आयात किया जाता था. इस प्रकार भारत को तैयार माल की मंडी बना दिया गया था. जिसका प्रमुख उद्देश्य प्राकृतिक साधनों का अधिकाधिक शोषण कर पूंजी एकत्र करना था. अंग्रेजों की इस नीति का भारतीय उद्योगों पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. पूर्व में भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं पर अब प्रतिबंध लगा दिया गया. औद्योगीकरण की प्रक्रिया विरुद्ध हो जाने के कारण लोग कृषि कार्य पर निर्भर रहने लगे. परंतु कृषि क्षेत्र  मैं सुविधाओं और नई तकनीकी के अभाव से कृषि भूमि की उत्पादन क्षमता निरंतर कम होने लगी. फल स्वरुप अन्न धान्य की कमी और अकाल की स्थिति व्याप्त रहने लगी. ब्रिटिश सरकार की अत्यधिक लगान नीति के कारण उत्तरी भारत के अधिकतर क्षेत्रों के जमींदारों में आक्रोश व्याप्त था. क्योंकि लग्न की राशि बहुत ज्यादा थी. और उसमें उस समय वृद्धि की गई थी जबकि अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक विपदाएं व्याप्त थी. यह भी नियम बनाए गए थे कि भूमि कर का भुगतान न कर सकने वाले किसानों से भूमि जप्त कर ली जाएगी.

सामाजिक और धार्मिक कारण ( social and religious causes)

 

अंग्रेज जाति-भेद की भावना से पूरी तरह ओतप्रोत थे तथा भारतीयों को ही दृष्टि से देखते थे. अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भारतीयों के प्रति कठोर नीति अपनाई जाती थी तथा अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर तरह-तरह के अत्याचार किए जाते थे. पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव धीरे-धीरे भारतीय समाज पर आने लगा था. तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अंधविश्वासों और प्रथाओं को सुधारने हेतु यद्यपि अंग्रेजी सरकार ने प्रयास किए परंतु ब्रिटिश सरकार की अनेक अन्यायपूर्ण नीतियों के कारण भारतीय अपने सामाजिक जीवन में विदेशी जाति का हस्तक्षेप नहीं सह सके. और उनके मन में यह धारणा दर्द हो चुकी थी ,अंग्रेज सामाजिक हस्तक्षेप द्वारा भारतीय सभ्यता को नष्ट करना चाहते हैं. 1829  ईसवी में विलियम बैंटिंग द्वारा सती प्रथा के उन्मूलन हेतु पास किए गए कानून का बंगाल में व्यापक स्तर पर विरोध किया गया. डलहौजी द्वारा 1850 में यह नियम पास किया गया कि धर्म परिवर्तन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी पैतृक संपत्ति को प्राप्त करने का उतना ही अधिकारी होगा जिसका कि वह धर्म परिवर्तन करने से पूर्व था. 1857 में डलहौजी द्वारा विधवा विवाह के समर्थन में कानून बनाया गया. इस प्रकार सुधार की आड़ में अंग्रेजों ने ईसाई धर्म और संस्कृति का प्रचार किया. भारतीय जनता कभी भी किसी विदेशी जाति द्वारा धर्म पर किए गए प्रहार को नहीं सह पाई है. यही स्थिति ब्रिटिश शासनकाल में रही. अंग्रेजों का उद्देश्य भारतीयों को ईसाई बनाना था. 1813 ईसवी में जब ब्रिटिश सरकार ने ईसाई पादरियों को धर्म प्रचार के लिए भारत आने की अनुमति दी थी तो भारतीय जनता की भावनाओं को कभी ठेस पहुंची. मैकाले द्वारा पाश्चात्य संस्कृति की श्रेष्ठता के संबंध में दिए गए वक्तव्य तथा पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली के समर्थन का भी भारतीयों पर प्रतिकूल असर पड़ा. ईसाई मिशनरियों द्वारा जगह-जगह सभाएं आयोजित की जाने लगी. 1850 में पास किए गए धार्मिक अयोग्यता अधिनियम द्वारा हिंदू रीति रिवाजों में परिवर्तन लाया गया. इसके अनुसार धार्मिक परिवर्तन के बाद भी पुत्र का पिता की संपत्ति पर अधिकार पूर्ववत बना रहेगा. भारतीय सैनिकों को भी इसाई बनाने की प्रेरणा दी  जाती थी. तथा ईसाई धर्म स्वीकार कर लेने वाले सैनिकों को पर्याप्त सुविधाएं दी जाती थी. हिंदू देवी देवताओं का अंग्रेजों द्वारा उपहास किया जाता था तथा मूर्ति पूजा को बुरा कहा जाता था. इस प्रकार द्वारा हिंदू धर्म पर किए गए प्रहारों से हिंदू जनता में भारी आक्रोश फैला. ऐसे वातावरण में यह विश्वास किया जाने लगा कि रेलवे और वाश्प्तोप (steamship) आदि भारतीय धर्म परिवर्तन का एक अप्रत्यक्ष साधन है. उस समय जनता में यह आम धारणा व्याप्त फीकी सरकार ने ही ईसाई पादरियों को नियुक्त किया है और सरकारी खर्चे पर ही यह लोग अपने कार्यक्रम प्रदर्शित करते हैं. लोगों में धार्मिक कारणों से भी राष्ट्रवाद की भावनाओं का पर्याप्त विकास हुआ तथा लोगों ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की.

 

सैनिक कारण ( military causes)

 

1857 के विद्रोह का एक प्रमुख कारण सैनिक असंतोष भी था. भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के प्रसार से सैनिकों की सेवा शर्तों पर प्रतिकूल प्रभाव हुआ. भारतीय सैनिकों का वेतन बहुत ही कम तथा उनकी पदोन्नति का मार्ग भी विरुद्ध था. जिस पथ पर भारतीय सैनिक भर्ती होता था उसी पद पर वह रिटायर भी होता था. तथा भारतीय सैनिकों की योग्यता पर भी सरकार का विश्वास नहीं था. 1856 में कैनिंग की सरकार ने अधिनियम पास किया जिससे सैनिकों में निराशा बड़ी. इस कानून के अंतर्गत सभी भावी सैनिकों को यह स्वीकार करना होता था कि जहां कहीं भी सरकार चाहेंगी उन्हें वहां कार्य करना होगा. भारतीय समाज में समुद्र पार जाना धर्म के विरुद्ध माना जाता था. 1856 में अवध का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय करने के बाद अवध की रियासती से ना भंग कर दी गई, परिणाम स्वरुप 60000 सैनिक बेरोजगार हो गए. इस कारण भी सैनिकों में पर्याप्त आक्रोश व्याप्त था. 1854 में डाकघर अधिनियम पारित होने के बाद सैनिकों को प्राप्त निशुल्क डाक सेवा समाप्त कर दी गई.

उपयुक्त विभिन्न असंतोषजनक घटनाओं से संबंधित बारूद के ढेर में चिंगारी का काम कारतूसों की घटना ने किया. 1856 में ब्रिटिश सरकार ने नई और अपेक्षाकृत अच्छी एनफील्ड राइफल ( new Enfield rifle) के प्रयोग का निश्चय किया इस राइफल में  उपयोग में लाए जाने वाले कारतूसों को बनाने में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया था. तथा उनका ऊपरी हिस्सा प्रयोग से पहले मुंह से काटना होता था. जब सैनिकों को पता चला कि कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी धर्म भ्रष्ट करने की नीति के तहत प्रयुक्त की गई है तो उन्होंने इन के प्रयोग से इंकार कर दिया. जब उन्हें कारतूसों का प्रयोग करने के लिए विवश किया जाने लगा तो सर्वप्रथम कोलकाता के निकट बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे ने विद्रोह कर दिया. जो धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया और 1857 के विद्रोह के रूप में सामने आया.

 

विद्रोह विप्लव और इसका विस्तार (The Revolt and its expansion)

 

सर्वप्रथम 29 मार्च 1857 का विद्रोह कब प्रारंभ कोलकाता के निकट बैरकपुर की छावनी से हुआ. भारतीय सैनिकों ने गाय और सूअर की चर्बी से तैयार एनफील्ड राइफल के लिए प्रयुक्त होने वाले कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया. परंतु जब सरकार ने इनके प्रयोग के लिए सैनिकों पर दबाव डाला तो सैनिक भड़क उठे. अंग्रेजी सरकार के इस दबाव को हिंदू और मुस्लिम दोनों ही सैनिकों ने अपने धर्म पर प्रहार समझा. किसी घटना से प्रेरित होकर सैनिक मंगल पांडे ने अपने एजुटेंट (adjutant) पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी. 34 वी एन आई रेजिमेंट तोड़ दी गई और अंग्रेज अधिकारी की हत्या के सिलसिले में मंगल पांडे और ईश्वर पांडे को फांसी की सजा दे दी गई. इन दोनों सैनिकों की मौत की खबर ने आग में घी का काम किया और 10 मई 1857 ईस्वी को इस विद्रोह ने भयंकर रूप धारण कर लिया. विद्रोह के विकास की प्रक्रिया का विवरण इस प्रकार दिया जाता है-

 

9 मई 1857 को मेरठ में 85 सैनिकों ने कारतूसों के प्रयोग से इंकार कर दिया. इन सभी सैनिकों को सैनिक न्यायालय ने 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई. 10 मई को मेरठ में सैनिकों ने खुला विद्रोह कर दिया. और अपने बंदी साथियों को मुक्त कराकर दिल्ली को रवाना हो गए. 12 मई को उन्होंने दिल्ली पर अधिकार कर लिया. बहादुर शाह द्वितीय ने  विद्रोहियों का नेतृत्व किया तथा लाल किले पर अधिकार कर लिया. इन सफलताओं से भारतीय सैनिकों का उत्साह बढ़ा और विद्रोह की आग समस्त उत्तरी और मध्य भारत में फैल गई. इस स्थिति में अंग्रेजों के लिए दिल्ली पर पुनः अधिकार आवश्यक हो गया. पता अंग्रेजो और भारतीयों के बीच में भयंकर संघर्ष हुआ. 20 सितंबर को अंग्रेज दिल्ली पर पुनः अधिकार करने में सफल हो पाए.

 

उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर 1857 ईस्वी के विद्रोह का मुख्य केंद्र रहा. यहां पर नाना साहब पेशवा के नेतृत्व में, जिसमें अजीमुल्ला खान ने उनका पूरा सहयोग किया. 5 जून 1857 को अधिकार कर लिया. यहां पर विद्रोह में कानपुर की जनता के साथ जमींदारों व्यापारियों ने भी बढ़ चढ़कर भागीदारी की तथा नाना साहब पेशवा को तात्या टोपे की सहायता भी प्राप्त हो गई. परंतु सर के कैम्बल ने कानपुर पर 6 दिसंबर को पुनः अधिकार कर लिया. तात्या टोपे यहां से निकलकर झांसी की रानी से मिल गए. 30 मई 1857 के आसपास लखनऊ में विद्रोह भड़क उठा .जिसका मुख्य कारण यहां पर नवाब वाजिद अली शाह को पदमुक्त करने के कारण नागरिकों में पर्याप्त असंतोष का व्याप्त होना था. जल्दी ही लखनऊ के आसपास विद्रोह की आग फैल गई. नवंबर 1857 में अंग्रेजी मुख्य सेनापति कालीन कैम्बल ने गोरखा रेजिमेंट की सहायता से नगर में प्रवेश कर यूरोपियों की सहायता की और मार्च 1858 में नगर पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार हो गया.

 

4 जून 1857 झांसी में विद्रोह प्रारंभ हो गया. यहां पर विद्रोहियों का नेतृत्व महारानी लक्ष्मीबाई ने किया. 22 मार्च 1858  ईस्वी को ब्रिटिश सेना ने ह्यूरोज के नेतृत्व में झांसी के किले को घेर लिया. 2 सप्ताह तक चले भयंकर संघर्ष के बाद अंग्रेजी सेना ने किले पर अधिकार कर लिया. परंतु किस तरह लक्ष्मीबाई वहां से भागने में सफल हो पाई. बाद में लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर में तात्या टोपे के साथ विद्रोहियों  को संगठित किया तथा ग्वालियर पर अधिकार कर लिया. इसी समय ग्वालियर के समय युद्ध में महारानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हो गई. परंतु तात्या टोपे फिर बच निकले. परंतु 1859 मैं उन्हें पकड़ लिया गया और फांसी दे दी गई. इलाहाबाद में आकस्मिक रुप से 6 जून 1857 का विद्रोह भड़क उठा. विद्रोही सैनिकों के साथ सभी ने विद्रोह में भरपूर सहयोग किया तथा सरकारी संपत्ति को तहस-नहस कर सरकारी खजाने लूट लिए गए. जून के अंतिम सप्ताह में विद्रोह का दमन कर 800 विद्रोहियों को फांसी पर लटका दिया गया. जिससे लोगों में आतंक फैल गया. इसके अतिरिक्त बरेली, बिहार के अनेक स्थानों, बनारस आदि पर भी विद्रोहियों ने विद्रोह कर दिया. जिसे अंग्रेजी सेना ने बाद में दृढ़ता से दबा दिया.

 

इस प्रकार 1857 के विद्रोह में समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी बढ़-चढ़कर रही तथा देश लंबे समय तक विद्रोहों से ग्रस्त रहा. जुलाई 1858 तक विद्रोह लगभग शांत हो गया था.

 

विद्रोह की असफलता के कारण (Causes of Failure of the Revolt)

 

1857 का विद्रोह यद्यपि देश के अधिकतर भागों में फैल चुका था परन्तु विभिन्न कारणों से यह असफल रहा. जिनमें सभी प्रकार के अग्रलिखित कारण सम्मिलित थे-

 

विद्रोह की असफलता का प्रमुख कारण यह था कि क्रान्तिकारियों द्वारा कि पूर्व निश्चित योजना के अधीन संगठित रूप में कदम नहीं उठाया गया. विद्रोह अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग समयों में शुरू हुआ था, जिससे अंग्रेजों को विद्रोह के दमन में आसानी रही. विद्रोहों से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्र थे- पश्चिमी बिहार, अवध, रुहेलखण्ड,दिल्ली, लखनऊ, नर्मदा तथा चम्बल के कुछ क्षेत्र. इनके अतिरिक्त बम्बई व मद्रास की सेनाएं तथा सिक्ख और गोरखों ने पूरी तरह अंग्रेजों का साथ दिया. सिंध और राजस्थान में शान्ति रही तथा नेपाल की सहायता महत्वपूर्ण थी.इससे अंग्रेजों को बहुत अधिक मदद मिली. अंग्रेजों के पास साधनों की उपलब्धता विद्रोहियों की अपेक्षा बहुत ज्यादा थी. अधिकतर विद्रोही परम्परागत हथियारों से लड़ रहे थे, जबकि अंग्रेजी सेना आधुनिक हथियारों से लैस थी. अंग्रेज को विद्युत तार व्यवस्था से अत्यधिक सहायता प्राप्त हुई. विद्रोहियों में एकता तथा उचित नेतृत्व का अभाव था. अनुकूल परिस्थितियों, व्यापक सैनिक क्षमता योग्य और प्रभावशाली नेतृत्व आदि अनेक कारणों से अंग्रेजों ने क्रान्ति को विफल कर दिया.

 

1857 के विद्रोह में जहाँ नर्मदा और उत्तर भारत के लोगों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की वहीं दक्षिणी भारत में छिटपुट घटनाओं के सिवाय कुछ नहीं हुआ. इसी तरह अवध और रुहेलखण्ड तथा उत्तरी भारत के सामन्तवादी तत्वों ने विद्रोह का नेतृत्व किया और दूसरी ओर अन्य सामन्तवादी तत्वों, जैसे- पटियाला, जीन्द, ग्वालियर और हैदराबाद के राजाओं ने इस विद्रोह के दमन में सहायता की. विद्रोहियों के पास विदेशी-विरोध भावना के अतिरिक्त अन्य कोई समान उद्देश्य नहीं था. हिन्दू-मुस्लिम मतभेद यद्यपि शत्रु के सामने निष्क्रिय हो गए थे, परन्तु पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे. इसके अतिरिक्त किसानों और अन्य निम्न वर्गीय लोगों की विशेष भागीदारी नहीं रही. अर्थात् यह पूरी तरह जन सामान्य का आंदोलन नहीं बन सका.

 

विद्रोह के प्रभाव (Impact of the Revolt)

1857 का विद्रोह कुछ समय बाद पूर्ण रूप से दबा दिया गया था, परन्तु इस विद्रोह ने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला कर रख दी थी. यद्यपि भारत में नियंत्रण की विधियाँ (Techniques of Controlling) सुदृढ़ हो चुकी थी, परन्तु उन्हें पुन: समान रूप से प्रत्येक स्थान पर लगाया गया. प्रतिक्रियावादी और निहित स्वार्थों को अच्छे ढंग से सुरक्षित किया गया तथा उन्हें प्रोत्साहित किया गया. बाद में वे भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के स्तम्भ बन गये. अंग्रेजी नियंत्रण का मुख्य आश्रय ‘फूट डालो और राज्य करो’ (Divide and Rule) की नीति को बनाया गया तथा सैनिक व असैनिक प्रशासन के प्रमुख और उच्च पदों पर यूरोपियनों का नियंत्रण शक्तिशाली कर दिया गया. भारतीयों का असन्तोष भी इस राष्ट्रव्यापी विद्रोह के बाद समय-समय पर आवश्यकतानुसार संघर्ष के रूप में बदलता रहा और स्वतंत्रता का यह संघर्ष 1947 में देश को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होने तक लगातार चलता रहा.

 

 

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भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन-शुरुआती विद्रोह(The early Uprisings)

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन-शुरुआती विद्रोह(The early Uprisings)

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन-शुरुआती विद्रोह(The early Uprisings)-सही मायने में देश के अंदर राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई थी. परंतु इसके पूर्व भी अर्थात 1757 से 1856 के बीच संपूर्ण देश में अलग अलग समयों में अलग-अलग स्थान पर विद्रोह हुए. जिसमें विदेशी राज्य तथा उनकी नीतियों से उत्पन्न कठिनाइयों के विरुद्ध विद्रोह, सैनिकी असंतोष देखे गये.प्रारंभ में बंगाल में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना के बाद जमींदार किसान तथा शिल्पियों का पतन शुरू हो गया था. जिससे इन लोगों में असंतोष व्याप्त था. 1770 के लगभग ब्रिटिश सरकार द्वारा तीर्थ स्थानों में आने जाने पर प्रतिबंध लगा देने के कारण बंगाल में सन्यासियों ने लोगों के साथ मिलकर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह किया. इतना ही नहीं सन्यासियों ने लोगों के साथ मिलकर कंपनी पर आक्रमण कर दिया. वारेन हेस्टिंग लंबे समय के बाद इस विद्रोह को दबाने में सफल हुए थे. 1768 में अकाल पड़ने के कारण तथा भूमि पर बढ़ा देने तथा अन्य तरह के आर्थिक संकटों के कारण मिदनापुर जिले में आदिम जाति के चुनार लोगों ने हथियार उठा लिए थे.1820-22 तथा 1831 में छोटानागपुर तथा सिंहभूम जिले के ‘हो’ तथा ‘मुंडा’लोगों ने भी कंपनी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था. यह क्षेत्र लंबे समय तक उपद्रव ग्रस्त रहे.

छोटा नागपुर के लोगों ने मुखिया मुंडो की भूमि को छीनकर मुस्लिम तथा सिखों को दिए जाने के विरुद्ध 1831 में विद्रोह कर दिया तथा लगभग 1000 विदेशियों को मौत के घाट उतार दिया.राजमहल जिले के संथाल लोगों ने भी भूमि कर अधिकारियों के दुर्व्यवहार, पुलिस के दमन तथा जमींदारों  वह साहूकारों की वसूली यों के विरुद्ध विद्रोह कर अपने आपको ईस्ट इंडिया कंपनी से स्वतंत्र घोषित कर लिया. 1856 में पृथक संथाल परगना बनाकर इस विद्रोह को अंग्रेजों ने शांत किया. इसी प्रकार अंग्रेजी शासन की नीतियों के विरुद्ध असम के अहोम अभिजीत वर्ग ने 1828 में विद्रोह कर दिया. जिसे शांतिमय नीति द्वारा कंपनी ने 1830 में नियंत्रित किया था. कंपनी द्वारा जयंतिया तथा गारो पहाड़ियों पर अधिकार कर लेने से यहां के लोगों ने विदेशी साम्राज्य के विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दिया. इसे भी 1833 में सैनिक की कार्यवाही के बाद नियंत्रित किया जा सका.  मैसूर का शासक हैदर अली और उसके बाद उसका पुत्र टीपू सुल्तान अंत तक अंग्रेजों के कट्टर विरोधी रहे. टीपू सुल्तान 1799 में अंग्रेजों से युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ.( टीपू सुल्तान के बारे में हम विस्तार से बताएंगे).

 

पश्चिमी भारत में कृषि संबंधित कठिनाइयों तथा बहुत से अन्य परेशानियों के कारण 1812-19 पश्चिमी तट के खानदेश जिले में भीलों का विद्रोह व्याप्त रहा. बाद में 1825,  1831 तथा 1800 46 में यहां फिर से उपद्रव हुए. इसी प्रकार कोलो ने भी 1829, 1839 तथा 1844 से 1848 तक मुख्य रूप से बढ़ती बेकारी के कारण विद्रोह किए. कच्छ में अंग्रेजों द्वारा किए गए राजनीतिक हस्तक्षेप तथा अत्यधिक भूमि कर के कारण यहां के लोगों ने 1819 तथा  1821 में विद्रोह किया था. इसे दबाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को समझौते वाली नीति अपनानी पड़ी. पहले से ही अंग्रेजों के विरोधी ओखा मंडल के बघेरो ने 1818-19 में सशस्त्र विद्रोह कर दिया.

1844 में नमक कर 0.50 रुपया प्रतिमान से बढ़ाकर 1.00 रुपया प्रति मन कर दिए जाने के कारण सूरत में जन आंदोलन हुआ. जिस कारण अंग्रेजी सरकार को अतिरिक्त नमक कर वापस लेना पड़ा. अंग्रेजी  प्रशासनिक पद्धति से अप्रसन्न पश्चिमी घाट पर रहने वाले रामोशी आदिम जाति के लोगों ने 1822 तथा 1825-26 में उपद्रव कर दिए. और सातारा के आसपास लूट पाट मचा दी. इसी समय 1839 में सातारा के राजा प्रताप सिंह के देश निष्कासन के कारण समस्त प्रदेश में असंतोष व्याप्त रहा . तथा 1840-40 में दंगे हुए. 1844 में कोल्हापुर तथा  सावंतवाडी में प्रशासनिक पुनर्गठन के कारण विद्रोह हुए. जिसे शक्तिशाली सैनिकी हस्तक्षेप के बाद बहुत ही मुश्किल से दबाया जा सका.

 

1794 विजयनगरम के राजा को कंपनी ने अपनी सेना भंग करने को कहा  तथा ₹300000 भेंट देने को विवश कर दिया. राजा द्वारा इस बात को अस्वीकार करने पर उनकी जागीर जप्त कर ली गई. इस पर राजा ने विद्रोह कर दिया. राजा को सेना व जनता का पूर्ण रुप से सहयोग प्राप्त था. इस युद्ध में यद्यपि राजा वीरगति को प्राप्त हुआ परंतु अंग्रेजों ने उसके पुत्र को जागीर वापस कर दी और भेंट की रकम भी कम कर दी. डिंडीगुल तथा मालाबार के पोलिगार लोगों ने अंग्रेजी  भूमि कर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया.जो कि 1801 से 1805 तक चला. मद्रास प्रेसीडेंसी में पोलिगार ओके इक्के-दुक्के विद्रोह 1856 तक होते रहे.1805 में अंग्रेजी प्रशासन के दृश्यता पूर्ण व्यवहार के विरुद्ध त्रावणकोर के राजा दीवान वेला तम्पी ने विद्रोह किया. जिसे दबाने के लिए बड़ी संख्या में सेना की मदद लेनी पड़ी.

 

अंग्रेजों पर रायबरेली के सैयद अहमद (1786 -1831) द्वारा चलाए गए आंदोलन ‘ वहाबी आंदोलन’ ( Wahabi   movement) का भी बहुत प्रभाव पड़ा. यह एक मुसलमान आंदोलन था, तथा इस्लाम को उसके मूल रूप में स्थापित करने के पक्ष में था. अर्थात यह इस्लाम में किसी भी सुधार व परिवर्तन के विरुद्ध था. इसके लिए सय्यद ने अपने आपको इसका इमाम( नेता) बनाकर चार खलीफा( उप नेता) नियुक्त किए और इस प्रकार एक देशव्यापी संगठन गठित किया. जिस के संकेत गुप्त थे. उत्तर-पश्चिमी कबायली प्रदेश में सिधाना को आंदोलन का केंद्र बनाया गया. तथा भारत में पटना को मुख्य केंद्र बनाकर बंगाल, यूपी, मुंबई, हैदराबाद, मद्रास आदि स्थानों पर इसकी शाखाएं स्थापित की गई. क्योंकि उनका उद्देश्य मुस्लिम राष्ट्र स्थापित करना था इसलिए उन्होंने पंजाब में सिखों के राज्य के विरुद्ध जिहाद छेड़ दिया. तथा 1830 में पेशावर जीत लिया. परंतु जल्द ही वह पुनः छिन गया और सैयद अहमद युद्ध में मारे गए. 1849 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिख राज्य को समाप्त कर दिया. जिससे अंग राम राज्य के विरुद्ध वहाबियों में रोष व्याप्त हो गया. 18 सो 57 के विद्रोह  के समय अंग्रेज विरोधी भावनाओं के प्रचार में वहाबियों का योगदान बहुत सराहनीय रहा था. 1807 के बाद अंग्रेजी सरकार ने वहाबियों के विरुद्ध व्यापक अभियान शुरू कर दिया. सिधाना पर सैनिक दबाव डाला और वहाबियों पर देश में अनेक स्थानों पर देशद्रोह के अभियोग चलाएं. यद्यपि यह आंदोलन राष्ट्रव्यापी न बन सका परंतु इससे मुसलमानों के पृथकतावाद की भावना का सूत्रपात अवश्य हुआ.

 

अंग्रेजी सरकार ने सेना में भर्ती को निरंतर जारी रखा जोकि साम्राज्य विस्तार के साथ साथ आवश्यक भी था. परंतु सैनिकों को बहुत कम वेतन मिलता था. और अन्य सुविधाएं भी नहीं के बराबर थी. सैनिकों को और भी बहुत सी शिकायतें थी जिस कारण समय-समय पर स्थानीय स्तर के अनेक सैनिक विद्रोह हुए थे. 1764 में  मुनरो की एक बटालियन बक्सर की रणभूमि में मीर कासिम से जा मिली थी. 1806 में सामाजिक तथा धार्मिक रीति रिवाजों में हस्तक्षेप के विरुद्ध वेल्लोर में सैनिक विद्रोह हुआ. 1824 में 47 वी पैदल टुकड़ी ने पर्याप्त भत्ते के बिना बर्मा युद्ध पर जाने के आदेश के विरुद्ध में विद्रोह कर दिया. 1825 में आसाम के तोपखाने ने विद्रोह कर दिया तथा 1858 में कम   भत्ते के विरुद्ध सोलापुर में सैनिकों ने विद्रोह किया 1844 में 34वीं एन आई तथा 64वीं रेंजमेंट ने पुराना भत्ता ना मिलने तक सिंध अभियान में जाने से इंकार कर दिया. 1849-50 में पंजाब पर अधिकार के समय से ही सेना में विद्रोही भावनाएं जगी थी तथा अंत में 1850 में गोविंदगढ़ के रेंजमेंट ने विरोध कर दिया. इस प्रकार अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध प्रारंभ से ही समय समय व स्थान स्थान पर संपूर्ण देश में विद्रोह होते रहे थे. इसके लिए प्रशासनिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सभी प्रकार के कारण जिम्मेदार थे. धीरे-धीरे सुलगती हुई आग 1857 में धधक उठी और उसने अंग्रेजी साम्राज्य को हिलाकर रख दिया.

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